खास रपटः भगवा दल को अन्नदाता की चुनौती 

कृषि कानूनों के विरोध में आयोजित महापंचायत में किसान नेताओं ने भाजपा विरोधी सुर फूंका. काश्तकारों के मोहभंग के मद्देनजर अगले साल विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी पार्टी के लिए मुश्किलें आने का अंदेशा.

ताकत का प्रदर्शन मुजफ्फरनगर की किसान पंचायत में डायस के पास खड़े राकेश टिकैत
ताकत का प्रदर्शन मुजफ्फरनगर की किसान पंचायत में डायस के पास खड़े राकेश टिकैत

पश्चिमी यूपी के जिले मुजफ्फरनगर में 2013 के सांप्रदायिक दंगों के आठ साल बाद पहला मौका था जब पूरे जिले में सुरक्षा के इतने कड़े इंतजाम थे. कृषि कानूनों की वापसी की मांग को लेकर पिछले नौ महीने से पश्चिमी यूपी के गाजीपुर बॉर्डर पर धरना दे रहे किसान 5 सितंबर को मुजफ्फरनगर में महापंचायत कर अपने आंदोलन को विस्तार दे रहे थे.

संयुक्त किसान मोर्चा के तत्वावधान आयोजित किसान महापंचायत के आयोजन स्थल मुजफ्फरनगर राजकीय इंटमीडिएट कालेज (जीआइसी) की ओर जाने वाली सभी सड़कों के चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल तैनात था. सुरक्षा के कड़े इंतजाम भी महापंचायत में भाग लेने वाले किसानों का उत्साह कम नहीं कर पाए.

5 सितंबर की सुबह 10 बजे महापंचायत शुरू होने से पहले जीआइसी ग्राउंड यूपी समेत देश के करीब 13 प्रदेशों से आए करीब डेढ़ लाख किसानों से भर गया था. जीआइसी ग्राउंड में जगह न होने से डेढ़ लाख के करीब किसान मुजफ्फरनगर की सड़कों पर जमा थे. संयुक्त किसान मोर्चा की महापंचायत में पहली बार देश भर के 40 किसान संगठन एकसाथ मंच पर मौजूद थे.

महापंचायत उस वक्त अपने चरम पर पहुंची जब दोपहर एक बजे भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत मंच पर पहुंचे. टिकैत ने तीनों कृषि कानूनों की वापसी, किसानों को एमएसएपी की गारंटी, गन्ना मूल्य बढ़ाने की मांग उठाने के साथ 27 सितंबर को ''भारत बंद’’ करने की घोषणा की.

महापंचायत के जरिए ''मिशन यूपी’’ की शुरुआत कर रहे टिकैत ने अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बाहरी बताते हुए इन्हें यूपी से भगाने का आह्वान भी किया. मौजूद किसानों की सहानुभूति बटोरने के लिए राकेश टिकैत ने कहा कि जब तक केंद्र की भाजपा सरकार कृषि कानूनों को वापस नहीं लेती है तब तक वे अपने घर नहीं जाएंगे, चाहे आंदोलन स्थल पर ही बलिदान क्यों न हो जाए.

राजनैतिक दलों से दूरी बनाने वाली महापंचायत में यूपी-उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हराने का जिस तरह आह्वान किया गया, उससे किसान आंदोलन की राजनैतिक महत्वकांक्षा भी सामने आई.

किसान आंदोलन के नेताओं को यह एहसास था कि उनकी राजनैतिक महत्वकांक्षा हिंदू-मुस्लिम एकता के बगैर पूरी नहीं हो सकती है. इसीलिए छह घंटे चली महापंचायत में बात खेती और किसानों की हो रही थी लेकिन मंच से बोलने वाला हर वक्ता 2013 को हुए मुजफ्फरनगर दंगों की याद दिलाते हुए अमन का संदेश भी दे रहा था.

किसान महापंचायत के अंत में राकेश टिकैत ने कहा ‘‘अब भाजपा को दंगे नहीं करने देंगे. वे लोगों को तोड़ेंगे तो हम जोड़ेंगे. अब पहले की तरह किसानों के मंच से अल्लाह हो अकबर और हर-हर महादेव के नारे गूंजेंगे.’’

यूपी में 2022 को होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर पश्चिमी यूपी के जिले मुजफ्फरनगर में राजनीति करवट ले रही है. पश्चिमी यूपी प्रदेश की राजनीति के लिहाज से इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव के चरणों की शुरुआत यहीं से होती है.

शुरुआती चरणों के चुनाव से ही भाजपा को चुनौती देने के लिए पश्चिमी यूपी किसान आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण हो गया है. इसीलिए किसान आंदोलन के जरिए पश्चिमी यूपी में कृषि से जुड़े दो प्रमुख समुदाय जाट और मुस्लिम में एकता का प्रयास हो रहा है. ‘‘ऑल इंडिया किसान खेत मजदूर संगठन’’ के मुजफ्फरनगर जिले के संयोजक हरीश त्यागी कहते हैं, ''किसानों से जुड़ी समस्याओं पर भाजपा सरकारों के अड़ियल रवैये के चलते जाट और मुस्लिम समुदाय एक दूसरे के करीब आ रहे हैं.

2022 के विधानसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी से भाजपा की सीटों में बड़ी गिरावट देखने को मिलेगी.’’ किसान नेताओं का दावा है कि महापंचायत को मिले किसानों के भारी समर्थन को देखकर वे किसान भी सामने आएंगे जो भाजपा सरकार की नीतियों से त्रस्त हैं लेकिन सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के कृषि विभाग में पंजीकृत किसानों की संख्या 3.27 करोड़ है लेकिन अगर इनमें गैर पंजीकृत किसान और खेतिहर मजदूर को भी जोड़ लें तो यह संख्या छह करोड़ से अधिक बैठती है. 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले किसान यूपी की राजनैतिक का केंद्र बनते जा रहे हैं.

वर्ष 1931 की जनणना के अनुसार, पश्चिमी यूपी के छह मंडलों में जाट समाज की जनसंख्या का 99 फीसद केंद्रित है. सामाजिक न्याय समिति-2001 की रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी की पिछड़ी जातियों में जाट का प्रतिशत 3.60 है. हालांकि पश्चिमी यूपी के इन छह मंडलों में इनका प्रतिशत 18 से 20 प्रतिशत है. पश्चिमी यूपी की 136 विधानसभा सीटों में 49 ऐसी हैं जिन पर मुस्लिम आबादी 30 फीसद या इससे अधिक है.

करीब दो दर्जन सीटें ऐसी हैं जिन पर जाट और मुस्लिम मिलकर 50 फीसद से अधिक बैठते हैं. पश्चिमी यूपी में किसान आंदोलन को सफल बनाने के लिए संयुक्त किसान मोर्चा का प्रमुख घटक भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत और राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत जाट समुदाय की खाप पंचायतों का समर्थन बटोरने में लगे हैं.

बालियान खाप से ताल्लुक रखने वाले नरेश टिकैत यूपी के सभी खापों का समूह ‘‘सर्वखाप पंचायत’’ के मुखिया भी हैं. किसान महापंचायत को पश्चिमी यूपी की प्रमुख खाप पंचायत देशखाप, गठवाला, बालियान, लाटियान, अहलावत खाप पंचायतों ने अपना समर्थन दिया था.
किसान आंदोलन से अभी तक अलग रही गठवाला खाप को महापंचायत में सबसे ज्यादा तरजीह दी गई.

गठवाला खाप के थांबेदार (मुखिया) श्याम सिंह को महापंचायत की अध्यक्षता करने की जिम्मेदारी सौंपी गई. मुजफ्फरनगर के डीएवी कॉलेज में समाजशास्त्र विभाग के पूर्व एचओडी कलम सिंह बताते हैं, ‘‘पश्चिमी यूपी में किसान आंदोलन को राजनैतिक रूप से प्रभावी बनाने के लिए भाकियू को जाट-मुस्लिम एकता के अलावा त्यागी, सैनी, कश्यप, गुर्जर जैसी जातियों को भी अपने साथ जोड़ना होगा.

अगड़ी जातियों के साथ ये जातियां जुड़कर पश्चिमी यूपी की 60 विधानसभा सीटों पर प्रभावी साबित होती हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में यही जातियां भाजपा के पक्ष में लामबंद हो गई थीं.’’ 2017 के विधानसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी की 136 विधानसभा सीटों में भाजपा ने रिकार्ड 102 सीटें जीती थीं.

भाजपा सरकार के खिलाफ किसान आंदोलन को तेज करने के लिए भाकियू प्रदेश से लेकर गांव तक के संगठन को सक्रिय किया है. जालौन निवासी राजबीर जादौन को भाकियू का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है. इनकी सहायता के लिए चार उपाध्यक्ष तैनात किए गए हैं. प्रदेश के हर मंडल (कमिशनरी) में मंडल अध्यक्ष, हर जिले मे जिला अध्यक्ष, ब्लॉक पर ब्लॉक अध्यक्ष और प्रत्येक गांव में गांव अध्यक्ष की तैनाती की गई है.

भाकियू के प्रदेश उपाध्यक्ष (लखनऊ) हरनाम सिंह वर्मा बताते हैं, ''हर महीने की पहली तारीख को भाकियू की गांव की कमेटी की बैठक होती है. इसमें प्रस्ताव पारित करके किसानों की समस्याओं को राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंचाया जाता है. उसके बाद इन्हीं मुद्दों पर आंदोलन की रूपरेखा तय होती है.’’ नरेश टिकैत गांव की कमेटी से मिली जानकारियों के आधार पर स्थानीय स्तर पर किसान आंदोलन की रूपरेखा तय करते हैं.

इसी फीडबैक के आधार पर भाकियू ने ''अपना गांव, अपना कट’’ अभियान की शुरुआत की है. इसमें हाइवे और एक्सप्रेसवे के किनारे बसे गांव के लोगों को सड़क के दूसरी ओर जाने की व्यवस्था करने के लिए प्रदर्शन किया जा रहा है. मुजफ्फरनगर में जाट बाहुल्य सिसौली कस्बे में पिछले 43 वर्षों क्लिनिक चला रहे डॉ. बाबूराम मलिक कहते हैं ''यूपी में भाजपा विरोधी राजनैतिक दलों की निष्क्रियता ने भाजपा के विरोध में खड़ी भाकियू के लिए जगह बनाई है.

भाजपा विरोधी मतदाता टिकैत बंधुओं के साथ लामबंद हो रहा है. यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राजनैतिक पार्टियों से दूरी बनाने वाले टिकैत अपने समर्थकों को कैसे भाजपा विरोधी राजनैतिक पार्टियों को वोट देने को राजी कर पाते हैं?’’

पश्चिमी यूपी में सबसे बड़ा मुद्दा गन्ने के दाम से जुड़ा है. यूपी में 45 लाख गन्ना किसान हैं जो पिछले तीन वर्षों से गन्ना मूल्य बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. मार्च, 2017 में सत्ता में आने के बाद योगी सरकार ने गन्ने का राज्य परामर्शी मूल्य अस्वीकृत, सामान्य और अगैती प्रजाति के लिए क्रमश: 310 रुपए, 315 रुपए और 325 रुपए घोषित किया था. अब किसान आंदोलन की तपिश को कम करने के लिए योगी सरकार जल्द ही गन्ने के मूल्य में बढ़ोतरी करने पर विचार कर रही है. 

किसानों को भाजपा के विरोध में लामबंद होने से रोकने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद सामने आ रहे हैं. योगी हर महीने किसानों के साथ बैठक करके उनकी समस्याओं की जानकारी ले रहे हैं. 26 अगस्त को मुख्यमंत्री योगी ने लखनऊ में अपने सरकारी आवास पर प्रगतिशील किसानों के साथ बैठक करके सरकार के कामकाज की जानकारी ली.

किसानों से मिले फीडबैक के आधार पर योगी ने पराली जलाने पर किसानों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने, गन्ना मूल्य बढ़ाने की घोषणा की थी. पश्चिमी यूपी के जिलों में योगी सरकार ने करीब दस हजार करोड़ रुपए से अधिक की विकास योजनाओं की शुरुआत की है. मेरठ से प्रयागराज तक 594 किलोमीटर लंबा देश के सबसे बड़े गंगा एक्सप्रेसवे के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई है.

किसानों को लुभाने के लिए मुख्यमंत्री योगी ने तीर्थस्थलों के विकास पर खास ध्यान दिया है. मुजफ्फरनगर के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल शुकधाम का सुंदरीकरण किया जा रहा है. सहारनपुर में 200 करोड़ रुपए की लागत से 19 किलोमीटर लंबे फोरलेन बाइपास रोड के निर्माण का निर्णय लिया गया है. इसके बन जाने सहारनपुर में हिंदुओं के तीर्थ स्थल शाकुंबरी देवी के मंदिर तक पहुंचना आसान हो जाएगा.

योगी आदित्यनाथ ने 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले शाकुंबरी देवी के मंदिर में पूजा करके अपने चुनाव अभियान की शुरुआत की थी. वे एक बार फिर शाकुंबरी देवी के मंदिर से ही 2022 के विधानसभा चुनाव अभियान की शुरुआत करेंगे. देखना होगा कि मुख्यमंत्री योगी विधानसभा चुनाव में भाजपा को किसान आंदोलन की तपिश से कितना बचा पाते हैं? 

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