खास रपटः मोहब्बत और नफरत

बलपूर्वक या छलपूर्वक, विवाह के लिए हुए धर्म परिवर्तन को उत्तर प्रदेश ने एक कानून बनाकर प्रतिबंधित कर दिया है. विशेषज्ञों के मुताबिक, यह किसी युगल को संविधान से मिले अधिकारों का अतिक्रमण करता है

भगवा आक्रोश नई दिल्ली में 8 नवंबर को 'लव जेहाद' और धर्मांतरण के खिलाफ प्रदर्शन करते विश्व हिंदू महासंघ के कार्यकर्ता
भगवा आक्रोश नई दिल्ली में 8 नवंबर को 'लव जेहाद' और धर्मांतरण के खिलाफ प्रदर्शन करते विश्व हिंदू महासंघ के कार्यकर्ता

उत्तर प्रदेश पुलिस ने 2 दिसंबर को लखनऊ के डूडा कॉलोनी में 24 वर्षीय मुस्लिम युवक और एक 22 वर्षीया हिंदू युवती की शादी रोक दी. विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार होना था और दोनों परिवारों की इस पर सहमति थी. एक सतर्कता समूह की शिकायत पर पहुंची पुलिस ने दंपती से शादी के लिए जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति लेने को कहा. राज्य में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार की ओर से 28 नवंबर को पारित उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश-2020 के तहत अंतरधार्मिक विवाह के लिए अनुमति लेना अनिवार्य बना दिया गया है.

हालांकि लखनऊ के इस युगल को किसी दंडात्मक कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन उत्तर प्रदेश में हर कोई इनके जैसा भाग्यशाली नहीं है. अध्यादेश लागू होने के बाद से पुलिस ने अंतरधार्मिक विवाह से संबंधित पांच मामले दर्ज किए हैं और सात लोगों को गिरफ्तार किया है. 6 दिसंबर को संघ परिवार से जुड़े बजरंग दल के सदस्य मुरादाबाद में विवाह पंजीकरण कार्यालय पहुंचे और वहां से एक मुस्लिम पुरुष और एक हिंदू महिला को पुलिस के पास ले गए, जो जुलाई में हुई शादी का पंजीकरण कराने आए थे.

उस व्यक्ति और उसके भाई को महिला की मां की इस शिकायत के आधार पर गिरफ्तार किया गया था कि लड़के ने झूठ बोलकर उसकी बेटी से शादी और बाद में उसका धर्म परिवर्तन करा दिया. दूसरी ओर महिला जोर देकर कह रही थी कि उसने यह शादी पूरी रजामंदी से की थी. दो दिन बाद, एक फोन के माध्यम से यह सूचना प्राप्त होने पर कि एक मुस्लिम व्यक्ति एक हिंदू महिला का धर्म परिवर्तन कराकर उससे शादी कर रहा है, अति उत्साही पुलिस ने कुशीनगर में शादी रुकवा दी और दूल्हा-दुल्हन (दोनों मुस्लिम) को थाने ले गई. आरोप झूठा निकला और अगले दिन दोनों की शादी हुई.

इस तरह की पहरेदारी और पुलिस के अतिरेक की मिसालें उत्तर प्रदेश सरकार के उस विवादास्पद अध्यादेश का नतीजा बन रही हैं, जो 'लव जेहाद' की साजिश वाली थ्योरी पर आधारित है. कट्टरपंथी हिंदू समूहों और अंतर-धर्म विवाह को लेकर सशंकित लोगों का आरोप है कि मुस्लिम युवक खुद को हिंदू पुरुषों के रूप में प्रस्तुत कर हिंदू महिलाओं को शादी का लालच देते हैं और बाद में उनका धर्म परिवर्तन कराते हैं. इसे वे 'लव जेहाद' का नाम देते हैं. जैसा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 31 अक्तूबर को जौनपुर में एक रैली में कहा था, ''मैं उन लोगों को चेतावनी देता हूं जो अपनी पहचान छिपाकर हमारी बहनों के सम्मान के साथ खेलते हैं. यदि आप सुधरते नहीं हैं, तो आपकी राम नाम सत्य यात्रा निकलेगी''.

अध्यादेश को सही ठहराते हुए प्रदेश के कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने कहा, ''बलपूर्वक धर्म परिवर्तन कराने की सौ से अधिक घटनाओं की सूचना मिली थी. इसके अलावा राज्य में छल-कपट का सहारा लेकर धर्म परिवर्तन कराने की भी खबरें थीं. इसलिए, इस विषय पर कानून बनाना जरूरी हो गया.'' अध्यादेश जारी होने के ठीक दो दिन बाद कानपुर पुलिस ने अंतर-धार्मिक संबंधों के 14 मामलों की जांच रिपोर्ट दायर की थी. 11 मामलों में धर्म छिपाने और धोखे से शादी करने का आरोप सही पाया गया.

हालांकि, आलोचकों का तर्क है कि इस अध्यादेश के जरिए, प्रदेश सरकार ने औपचारिक रूप से इस विचार का समर्थन किया है कि भारत में मुस्लिम युवक हिंदू युवतियों के साथ विवाह की साजिश रचते हैं और उनका धर्म परिवर्तन कराते हैं जो इस्लाम के प्रसार के उनके बड़े उद्देश्य का हिस्सा है. हालांकि 'लव जेहाद' सिद्धांत की भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की ओर से आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं की गई है. फरवरी में गृह राज्यमंत्री जी. किशन रेड्डी ने लोकसभा में कहा कि मौजूदा कानूनों में 'लव जेहाद' शब्द को कहीं परिभाषित नहीं किया गया है. उन्होंने यह भी कहा कि केंद्रीय एजेंसियों की ओर से भी 'लव जेहाद' के ऐसे किसी मामले की सूचना नहीं मिली है.

मौलिक अधिकारों का हनन

उत्तराखंड धार्मिक स्वतंत्रता कानून, 2018 पर आधारित, उत्तर प्रदेश का अध्यादेश कहता है कि विवाह को अमान्य घोषित किया जा सकता है यदि उसे गैरकानूनी रूप से धर्मांतरण के एकमात्र उद्देश्य के लिए किया गया है या फिर केवल विवाह के उद्देश्य से ही गैरकानूनी रूप से धर्म परिवर्तन किया गया है. साथ ही, अंतरधार्मिक विवाह करने के दो महीने पहले स्थानीय अधिकारियों को सूचित किया जाना चाहिए. माना जाता है कि सरकार ने 'लव जेहाद' पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से यह प्रावधान किया है. बल्लभगढ़ में अक्तूबर के आखिरी सप्ताह में 21 वर्षीया हिंदू महिला की एक मुस्लिम युवक ने उसके कॉलेज के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी थी. कथित तौर पर वह युवक लंबे समय से युवती को परेशान कर रहा था. परिजनों का आरोप है कि युवक शादी के लिए लड़की पर इस्लाम कुबूल करने का दबाव बना रहा था. कई हिंदू संगठनों ने हत्या को 'लव जेहाद' का मामला बताया.

कानून विशेषज्ञों का तर्क है कि उत्तर प्रदेश का अध्यादेश संविधान में निहित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है क्योंकि यह व्यक्तियों को उनकी पसंद के धर्म का पालन करने के अधिकार का अतिक्रमण करता है. नारीवादी कानूनी परामर्श और संसाधन समूह एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी ऐंड लीगल इनिशिएटिव्स (एएएलआइ) की कार्यकारी निदेशक रेणु मिश्रा कहती हैं, ''कोई भी कानून जो व्यक्तियों की शारीरिक स्वतंत्रता और निर्णय लेने के अधिकारों का हनन करता हो, वह संविधान या मानव अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों और मूल्यों से संबंधित कन्वेंशन पर खरा नहीं उतरता जिसका भारत एक हस्ताक्षरकर्ता है.'' मिश्रा कहती हैं, ''सुप्रीम कोर्ट ने दशकों से कई प्रगतिशील फैसलों के माध्यम से तय किया है कि किसी व्यक्ति को अपनी पसंद के मुताबिक किसी भी जातीय या धार्मिक पहचान का जीवनसाथी चुनने का पूरा अधिकार है क्योंकि यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के दायरे में है और राज्य की ओर से इसकी रक्षा की जानी चाहिए. शीर्ष अदालत से निर्धारित पूर्ववर्ती व्यवस्था कायम रखने के बजाए हम पुलिसिंग प्रणाली का अत्यधिक उपयोग कर युवा जोड़ों को दबाने और उन्हें धमकाने का काम कर रहे हैं.''

यह अध्यादेश इलाहाबाद हाइ कोर्ट के 11 नवंबर के फैसले को भी धता बताता है. एक मुस्लिम व्यक्ति के खिलाफ दर्ज एक प्राथमिकी, जिसमें कहा गया था कि उसने एक हिंदू महिला का अपहरण कर जबरिया इस्लाम धर्म कुबूल कराने के बाद उससे शादी की, को रद्द करते हुए अदालत ने कहा कि उक्त मामले में दोनों वयस्क हैं और अपना साथी चुनने के लिए स्वतंत्र हैं. दो न्यायाधीशों की पीठ ने यह भी कहा कि अंतरधार्मिक विवाह के पिछले दो मामलों में हाइ कोर्ट के फैसले, जिसमें यह कहा गया था कि ''केवल विवाह के उद्देश्य से किया गया धर्मांतरण अस्वीकार्य है'', ''सही कानून नहीं'' थे. अदालत ने कहा कि किसी व्यक्तिगत संबंध में हस्तक्षेप से लोगों की पसंद की आजादी के अधिकार का गंभीर अतिक्रमण होता है.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मदन लोकुर ने इंडिया टुडे को बताया, ''यह अध्यादेश चयन की स्वतंत्रता और आत्मसम्मान को दरकिनार करता है. यह समझना मुश्किल है कि यदि अलग-अलग धर्मों के दो बालिग मर्जी से विवाह करना चाहते हैं तो इसमें क्या आपत्ति हो सकती है. आपत्ति जताकर क्या यूपी लिव-इन रिलेशनशिप को प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रहा है? कोई चमत्कार ही इस अध्यादेश को संवैधानिक रूप से वैध घोषित करा पाएगा.'' सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के इन कानूनों को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि ऐसे कानून संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन हैं. इलाहाबाद हाइ कोर्ट में दायर एक रिट याचिका में कहा गया है कि यह अध्यादेश पुलिस को अंतरधार्मिक विवाह करने वालों जोड़ों को आतंकित करने और परेशान करने का लाइसेंस देता है.

विशेषज्ञों के अनुसार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सबसे बड़ा हमला करने वाला तथ्य यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार का अध्यादेश धर्मांतरण को कानूनी रूप से सही साबित करने का भार ''कर्ता'' या ''सहयोग कर्ता'' पर डालता है न कि उस व्यक्ति पर जिसने किया है. मसलन, एक धर्मांतरित महिला अगर गवाही देती है कि उसे इस बात के लिए मजबूर नहीं किया गया, फिर भी उसके साथी, जिसे धर्मांतरण का ''कर्ता'' माना जाता है, को इस निर्णय का औचित्य साबित करना होगा. मतलब, हर धर्मांतरण को तब तक अवैध माना जाएगा जब तक कि इसे वैध सिद्ध न कर दिया जाए.

दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया में समाजशास्त्र विभाग की प्रो अरविंदर ए. अंसारी का तर्क है, ''[इसके जरिए] हम महिला वर्ग की पूरी तरह से अनदेखी कर रहे हैं. हम मान रहे हैं कि वे मूर्ख हैं और अपने सही-गलत का फैसला नहीं कर सकतीं.'' नई दिल्ली स्थित स्वायत्त शोध संस्थान, सेंटर फॉर विमन डेवलपमेंट स्टडीज की निदेशक इंदु अग्निहोत्री कहती हैं कि यह केवल उन महिलाओं को निशाना बनाने के लिए प्रोत्साहित करेगा जो अपनी मर्जी से निर्णय लेना पसंद करती हैं. भाजपा सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थ नाथ सिंह कहते हैं, ''यूपी का कानून किसी के अधि‍कार नहीं छीनता बल्कि‍ छल और बलपूर्वक हुए विवाह के प्रति अधि‍कार देता है.''

भाजपा का एजेंडा

उत्तर प्रदेश के इस अध्यादेश के जारी होने के तुरंत बाद मध्य प्रदेश, कर्नाटक और हरियाणा जैसे कई अन्य भाजपा शासित राज्यों ने 'लव जेहाद' के खिलाफ कानून बनाने का वादा किया. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसे एक और 'बेटी बचाओ आंदोलन' की संज्ञा देते हुए कहा, ''दुर्भावनापूर्ण इरादे से युवतियों को गुमराह करना आसान है. बाद में उनका जीवन नरक बन जाता है.'' हिमाचल प्रदेश में भाजपा सरकार ने पिछले साल धर्मांतरण पर कानून बनाया था, जिसमें विवाहों के लिए धर्मांतरण पर एक विशिष्ट खंड था. राज्य अब विवाह के लिए धर्मांतरण पर रोक लगाने को एक अलग कानून बना रहा है.

'लव जेहाद' के आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में एक प्रमुख चुनावी मुद्दे के रूप में उभरने की भी संभावना है, जहां भाजपा का ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से कड़ा मुकाबला होने वाला है. बंगाल, जिसे भाजपा अपने पूर्वोत्तर विस्तार योजना के अंतिम किले के रूप में देखती है, में विवादास्पद सीएए (नागरिकता संशोधन अधिनियम) और एनआरसी (नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर) के कारण सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ा है. पश्चिम बंगाल के प्रभारी भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने यूपी के अध्यादेश का समर्थन करते हुए कहा है, ''अंतर-धार्मिक विवाह के पीछे की साजिश से निबटने के लिए कानून बनाया जा रहा है. प्रेम सनातन और सहज होना चाहिए.

यह धर्म या जाति नहीं देखता. लेकिन अगर कोई सिर्फ धर्म परिवर्तन कराने की बड़ी योजना के तहत प्रेम और फिर विवाह करता है, तो यह कानून उन्हीं लोगों से निबटने के लिए है.'' खुद अंतरधार्मिक विवाह करने वालीं तृणमूल सांसद नुसरत जहां कहती हैं, ''प्रेम नितांत निजी चीज है. प्रेम और जेहाद एक साथ नहीं होते. लोग चुनाव से ठीक पहले ऐसे विषयों को हवा देते हैं. धर्म को राजनैतिक उपकरण न बनाएं.''

बंगाल में कुछ हिंदू समूह ऑनलाइन अभियान चला रहे हैं जिसमें वे हिंदू महिलाओं को मुस्लिम पुरुषों की साजिश में 'फंसने' से बचने के लिए आगाह करते हैं. 7 फरवरी 2018 को उत्तर 24 परगना जिले की एक 25 वर्षीया महिला सोशल नेटवर्किंग साइट 'हिंदू वार्ता' की ओर से संकलित हिंदू महिलाओं की 100 फेसबुक प्रोफाइल की सूची में अपना नाम देख सदमे में थी. ग्रुप की एक पोस्ट ने इन महिलाओं को 'लव जेहाद' का शिकार घोषित किया और ''हिंदू शेरों से आह्वान किया वे वे उन्हें तलाशें और उनका शिकार करें.'' इसके बाद महिला और उसके मुस्लिम साथी को जान से मारने की धमकी मिलने लगी. पुलिस के साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराने के बाद ही यह पोस्ट हटाई गई.

'लव जेहाद' ने पड़ोसी राज्य असम की राजनैतिक चर्चा में भी घुसपैठ कर ली है. यहां भी 2021 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. असम के 35 प्रतिशत मुसलमानों में से अधिकांश को बांग्लादेश से आए अवैध घुसपैठिए माना जाता है. असम के वित्त मंत्री और पूर्वोत्तर में भाजपा के विस्तार के मुख्य कर्ताधर्ता हेमंत बिस्वा सरमा ने अक्तूबर में कहा, ''कई मुस्लिम लड़के हिंदू नामों से फेसबुक अकाउंट बनाते हैं और मंदिरों की अपनी तस्वीरें पोस्ट करते हैं. ऐसे लड़के से शादी करने के बाद लड़की को पता चलता है कि वह लड़का हिंदू नहीं. यह विवाह नहीं विश्वासघात है.'' एक महीने बाद सरमा ने घोषणा की कि असम सरकार एक विवाह कानून बना रही है जिसके तहत दूल्हा-दुल्हन को शादी से एक महीने पहले आधिकारिक दस्तावेजों में धर्म और आय का खुलासा करना होगा.

राजनैतिक पर्यवेक्षक और चुनाव रणनीतिकार 'लव जेहाद' को केवल चुनावी राजनीति से नहीं बल्कि एक विचारधारा से जुड़े विषय से भी जोड़कर देखते हैं. चुनावों की भविष्यवाणी करने वाली एजेंसी एक्सिस माइ इंडिया के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक प्रदीप गुप्ता कहते हैं, ''लव जेहाद जैसे मुद्दे पार्टी को पिछले चुनाव की तुलना में अतिरिक्त 5-10 प्रतिशत वोट हासिल करने में मदद कर सकते हैं. इस तरह के विभाजनकारी मुद्दे दोनों पक्षों के वोटों का ध्रुवीकरण करते हैं.''
 
बंटा हुआ समाज

यह समझना मुश्किल नहीं कि भाजपा 'लव जेहाद' को फायदेमंद चुनावी मुद्दे के रूप में क्यों देखती है. भारतीय समाज परंपरागत रूप से अंतरधार्मिक विवाहों के प्रति शत्रुतापूर्ण भाव रखता आया है. मैरीलैंड यूनिवर्सिटी और नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च की ओर से किए गए 2005 के भारत मानव विकास सर्वेक्षण के आंकड़ों का उपयोग करते हुए 2013 के एक अध्ययन में पाया गया कि 15-49 आयु वर्ग में केवल 2.21 प्रतिशत महिलाओं ने दूसरे धर्म वाले से शादी की थी. हिंदुओं में केवल 1.5 प्रतिशत महिलाओं ने धर्म से बाहर विवाह किया—जो अंतरधार्मिक विवाह के प्रति घृणा का संकेत देता है. दिल्ली, मुंबई, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर एडवांस स्टडी ऑफ इंडिया (सीएएसआइ) की ओर से 2016 के सर्वेक्षण 'सोशल एटिट्यूड रिसर्च फॉर इंडिया' में ज्यादातर उत्तरादाताओं ने अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह के खिलाफ मत दिया और यहां तक कि ऐसे रिश्तों पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून बनाने की जरूरत बताई.

'लव जेहाद' के समर्थक कुछ घटनाओं का जिक्र करके इसे रेखांकित करते हैं. मई 2019 में राजस्थान के तीन बच्चों के बाप एक शादीशुदा मुस्लिम व्यक्ति इमरान भाटी ने कथित तौर पर एक हिंदू महिला के सामने खुद को 'कबीर शर्मा' के रूप में पेश कर शादी की और दहेज के रूप में 10 लाख रुपए भी लिए. फिर वह अपनी पत्नी के साथ लापता हो गया. एक महीने बाद उसे मुंबई से गिरफ्तार किया गया, जब महिला के माता-पिता को उसकी वास्तविक पहचान का पता चला और उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. अगस्त 2014 में झारखंड पुलिस ने रंजीत कुमार कोहली उर्फ रकीबुल हसन खान को राष्ट्रीय शूटर तारा शाहदेव को धोखा देकर शादी करने और उसे इस्लाम धर्म अपनाने के लिए मजबूर करने के आरोप में गिरफ्तार किया. प्राथमिकी के अनुसार, शाहदेव को उनके पति के धर्म को स्वीकार करने के लिए प्रताड़ित किया गया था. कोहली ने दावा किया कि वे जन्म से हिंदू हैं और उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया था, लेकिन शाहदेव को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करने के आरोपों से इनकार किया.

योगी आदित्य नाथ स्थापित हिंदू युवा वाहिनी की बुलंदशहर इकाई के अध्यक्ष सुनील राघव का दावा है कि पिछले 7-8 वर्षों में उन्होंने अपने जिले में ही धोखे से धर्मांतरण और विवाह के करीब 4,000 मामले देखे हैं. वे कहते हैं, ''हम प्यार या अंतरधार्मिक विवाह के खिलाफ नहीं. हम गलत तरीके से खुद को हिंदू बताने या हिंदू महिलाओं का धर्मांतरण कराने के लिए शादी के हथियार के रूप में इस्तेमाल के खिलाफ हैं. यह एक बड़ी साजिश है.'' यूपी के एक आइपीएस अधिकारी हालांकि अंतरधार्मिक विवाह में कोई बड़ी साजिश नहीं देखते  पर कुछ लोगों के नकली पहचान से ''प्रेमिका हासिल'' करने की बातों को स्वीकारते हैं. वे कहते हैं, ''कुछ मुस्लिम पुरुषों खासकर निचले आर्थिक तबके से ताल्लुक रखने वालों में किसी हिंदू महिला के साथ संबंध रखने की आकांक्षा रहती है या फिर उसे गर्व के रूप में देखते हैं. कुछ ऐसा मानव तस्करी के लिए भी करते हैं. शादी के बाद कुछ लोग लड़की को धर्मपरिवर्तन के लिए मजबूर करते हैं पर यह मुसलमानों की संख्या बढ़ाने के लिए बड़ी साजिश के तहत नहीं किया जा रहा.''

'लव जेहाद' की राजनीति

'लव जेहाद' शब्द पहली बार गुजरात में 2007 में सामने आया जब बजरंग दल के नेताओं ने मुसलमानों के साथ संबंध रखने वाली हिंदू महिलाओं को 'बचाने' के लिए एक मिशन की घोषणा की. 2009 में यह केरल और कर्नाटक में उछला. कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले में हिंदू जनजागृति समिति नामक संगठन ने दावा किया कि 30,000 महिलाएं लव जेहाद का शिकार हुई हैं. चार साल बाद उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद लव जेहाद राजनैतिक नारा बन गया, जो कथित रूप से एक मुस्लिम के जाट लड़की से छेड़छाड़ के बाद भड़का था. 2014 में यह शब्द भाजपा की मुख्यधारा में शामिल हुआ जब पार्टी के मातृ संगठन आरएसएस की ऑर्गेनाइजर और पांचजन्य जैसी पत्रिकाओं ने 'लव जेहाद' पर कवर स्टोरीज की. तब से, 'लव जेहाद' अधिकांश भाजपा चुनाव अभियानों का हिस्सा रहा है.

लेकिन 2016 के केरल के हादिया मामले के बाद लव जेहाद ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थीं. केरल में एक हिंदू माता-पिता की संतान के रूप में जन्मी 24 वर्षीय महिला अखिला ने इस्लाम अपना लिया और हादिया बनकर परिवार की इच्छा के खिलाफ मुस्लिम से शादी की थी. 2017 में केरल हाइ कोर्ट ने इसे 'लव जेहाद' का मामला करार देते हुए शादी रद्द कर दी और हादिया की कस्टडी उसके माता-पिता को सौंप दी. हादिया के पति शफीन जहां ने सुप्रीम कोर्ट में उस आदेश को चुनौती दी. सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में हाइ कोर्ट के आदेश को पलट दिया और कहा कि हादिया पति के साथ रहने को स्वतंत्र है. बाद में उस वर्ष शीर्ष अदालत के आग्रह पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने केरल में 89 अंतरधार्मिक विवाह की सूची में से 11 की जांच की और 'लव जेहाद' का कोई सबूत नहीं पाया.

हालांकि, यह आधिकारिक जांच की पहली घटना नहीं थी जिसने 'लव जेहाद' को खारिज किया था. 2012 में केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री उम्मन चांडी ने कहा था कि राज्य की 2,667 महिलाओं ने 2006 के बाद से इस्लाम अपनाया है, लेकिन उनके साथ जबरदस्ती के कोई सबूत नहीं थे. 2009 में कर्नाटक पुलिस की जांच में पाया गया कि 2005 के बाद से 229 महिलाओं की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी और बाद में पाया गया कि उन्होंने दूसरे धर्म में शादी कर ली थी लेकिन धर्म परिवर्तन केवल 63 मामलों में हुआ था. 2019 के दिल्ली सरकार के आंकड़ों से पता चलता है कि जनवरी और सितंबर के बीच राज्य में पंजीकृत 19,250 विवाह में केवल 589 अंतरधार्मिक विवाह थे.

नई दिल्ली स्थित संस्था सेंटर फॉर सोशल रिसर्च (सीएसआर) की निदेशक रंजना कुमार कहती हैं, ''लव जेहाद के दावों का समर्थन करने के लिए कोई डेटा नहीं है. सांप्रदायिक आधार पर समाज में विभाजन करके वोट पाने के सियासी मकसद के साथ उच्च पदों पर बैठे लोगों ने इस फर्जी नैरेटिव को आगे बढ़ाया है.'' जामिया की प्रो. अंसारी भी इसका समर्थन करती हैं, ''यह मुद्दा आर्थिक संकट, बेरोजगारी और किसानों के संकट जैसे मामलों से लोगों का ध्यान हटाने को उठाया गया है.''

हालांकि, बढ़ते हिंदू राष्ट्रवाद से सतर्क विपक्षी दल और नेता भाजपा के 'लव जेहाद' अभियान पर पलटवार करने से हिचक रहे हैं. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपवाद हैं, जिन्होंने कहा, ''लव जेहाद देश को विभाजित करने और सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाडऩे के लिए भाजपा की ओर से गढ़ी गई एक कहानी है. विवाह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला है और इस पर अंकुश लगाने के लिए कानून लाना पूरी तरह से असंवैधानिक है और कानून की किसी भी अदालत में टिकेगा नहीं. प्रेम में जेहाद का कोई स्थान नहीं है.''
 
दक्षिणपंथी सतर्कता का उदय

लव जेहाद का कोई विश्वसनीय सबूत नहीं होने के बावजूद, सतर्कता समूह, वयस्कों की सहमति से अंतरधार्मिक विवाह में अनाधिकृत हस्तक्षेप कर रहे हैं. वे सोशल मीडिया प्रोफाइल, मंदिरों और विवाह रजिस्ट्रार कार्यालयों पर नजर रखते हैं और अंतरधार्मिक विवाह को रोकने के लिए सभी संभव दबाव की रणनीति का उपयोग करते हैं. इस साल मई में, बठिंडा में अंतरधार्मिक विवाह करने वाले दंपति के घर पर कथित रूप से पथराव करने के लिए पंजाब भाजपा के सचिव सुखपाल सिंह सरा को गिरफ्तार किया गया था. हाल ही में, अपने मुस्लिम प्रेमी से मिलने गई 18 वर्षीय हिंदू लड़की को भाजपा महिला मोर्चा की सदस्यों ने थप्पड़ मारे और इसका वीडियो वायरल हुआ था.

विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के मुखपत्र हिंदू विश्व ने 16-30 सितंबर के अंक को 'लव जेहाद' के लिए समर्पित किया. रिपोर्ट 147 मीडिया रिपोर्टें और मुख्य रूप से हिंदू दक्षिणपंथी राजनीति का प्रचार करने वाले स्रोतों पर आधारित थी. वीएचपी केंद्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने अंक के जारी होने के मौके पर कहा, ''लव जेहाद भारत के जनसांख्यिकी को बदलने की नीयत से रची गई एक बड़ी साजिश का हिस्सा है.''  

सत्रा या वैष्णव मठों को असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों की भूमि कब्जा करने की कोशिशों से रक्षा करने के लिए बने एक मंच का नेतृत्व करने वाले अपूर्ब अधिकारी इसका समर्थन कहते हैं. वे कहते हैं, ''आप्रवासी मूल के कई मुस्लिम सोशल मीडिया पर अपनी गलत पहचान बताकर ऐसा कर रहे हैं. मानव तस्करी की सांठगांठ भी एक वजह है.'' अधिकारी, जिनकी 13 वर्षीया भतीजी का 2003 में आप्रवासी मुसलमानों ने अपहरण कर लिया था, कहते हैं, ''हमें मठ को स्थानांतरित करने के लिए मजबूर किया गया था क्योंकि वोट बैंक की राजनीति के कारण प्रशासन हमें सुरक्षा प्रदान करने में विफल रहा.''

हालांकि, समाज विज्ञानी इस बात से असहमत हैं कि मुस्लिम पुरुष सोशल मीडिया पर नकली पहचान बताकर हिंदू महिलाओं को लुभाते हैं. सीएसआर की रंजना कुमारी जो फेसबुक के वैश्विक सुरक्षा सलाहकार बोर्ड और ट्विटर के ट्रस्ट ऐंड सेफ्टी काउंसिल दोनों की सदस्य हैं, कहती हैं, ''मुझे ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जो बताता हो कि एक बड़ी साजिश के तहत किसी विशेष धार्मिक समूह के पुरुष किसी अन्य धर्म की महिलाओं को इस उद्देश्य से निशाना बनाते हैं कि उन्हें बाद में धर्मांतरण के लिए मजबूर कर सकें. अपराधी मानव तस्करी के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं, लेकिन इसका धर्म या धर्मांतरण से कोई लेना-देना नहीं है.''

समय के साथ, 'लव जेहाद' और अंतरधार्मिक असहिष्णुता ने समाज के बड़े हिस्से को निशाना बनाना शुरू कर दिया है. नवंबर में, विक्रम सेठ के उपन्यास पर आधारित नेटफ्लिक्स की एक सीरीज अ सूटेबल बॉय के एक दृश्य में मुस्लिम व्यक्ति के हिंदू महिला नायिका को मंदिर परिसर में चुंबन करते दिखाए जाने के लिए विवाद में आ गई. भारतीय जनता युवा मोर्चा (बीजेवाइएम) के एक सदस्य ने मध्य प्रदेश में दो नेटफ्लिक्स अधिकारियों के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज की और उस दृश्य के लिए माफी की मांग की, जिसमें उन्होंने दावा किया कि सीरीज ने ''लव जेहाद को बढ़ावा दिया'' है. अक्तूबर में तनिष्क जूलरी के एक विज्ञापन में अंतरधार्मिक युगल की दिखाने के कारण बहुत बवाल हुआ और विज्ञापन वापस लेना पड़ा.

दरकार है एक कानून की जो सुरक्षा दे

अंतरधार्मिक विवाह से संबंधित मौजूदा कानून अपने धर्म से बाहर शादी करने के इच्छुक लोगों को 'लव जेहाद' के नाम पर उत्पीडऩ के खतरे से प्रभावी कानूनी सहारा देने में विफल रहे हैं. कई जानकारों को लगता है कि धर्मांतरण अक्सर शादी से ठीक पहले होता है क्योंकि जोड़े विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत अंतरधार्मिक विवाह पंजीकृत कराने के बजाए समानधर्म विवाह करना पसंद करते हैं. इस अधिनियम के तहत, शादी के इच्छुक दूल्हा और दुल्हन को विवाह दफ्तर में 30 दिन का नोटिस देना होगा और इसकी एक प्रति कार्यालय में प्रदर्शित की जानी चाहिए. इसका उद्देश्य पारदर्शिता सुनिश्चित करना और लोगों को युगल के पूर्व में ही शादीशुदा होने जैसी वैध आपत्तियां दर्ज कराने में सक्षम बनाना है. नोटिस में दूल्हा और दुल्हन के व्यक्तिगत विवरण, जैसे नाम, तस्वीर, जन्म तिथि, उम्र, व्यवसाय, माता-पिता का नाम, पता और फोन नंबर होना चाहिए.

'लव जेहाद' पर नजर रखने वाले ऐसी सार्वजनिक सूचनाओं का उपयोग कर रहे हैं और अंतरधार्मिक जोड़ों को शादी रोकने की धमकी देने के लिए उपयोग कर रहे हैं. मिसाल के तौर पर इस साल जून-जुलाई में केरल में कुछ 120 अंतरधार्मिक युगलों का ब्योरा सोशल मीडिया पर सतर्कता समूहों ने लीक किया था. केरल सरकार ने अब अंतरधार्मिक शादी के आवेदन ऑनलाइन अपलोड करना बंद कर दिया है. अन्य राज्यों ने ऐसी सावधानी नहीं बरती. आसिफ इकबाल जिन्होंने अपनी पत्नी रानू कुलश्रेष्ठ के साथ भारत में अंतरधार्मिक विवाह करने वाले जोड़ों के लिए एक सहायता समूह 'धनक ऑफ ह्यूमैनिटी' की स्थापना की है, कहते हैं, ''महाराष्ट्र में कोई भी सरकारी वेबसाइटों से अंतरधार्मिक विवाह करने वाले जोड़ों के विवरण प्राप्त कर सकता है और इस तरह वे सतर्कता समूहों की निगाह में आ जाते हैं और उन पर खतरा बना रहता है.''

2018 में भारत के विधि आयोग की एक रिपोर्ट में कहा गया कि विशेष विवाह अधिनियम में प्रक्रियात्मक अड़चनों के कारण जोड़े किसी एक का धर्म अपना लेने को विवश हो जाते हैं. समान धर्म होने से विवाह सुनिश्चित करने के लिए नोटिस जारी करने की आवश्यकता आदि नहीं रहती. आयोग ने सिफारिश की थी कि या तो अंतरधार्मिक विवाह के लिए आवश्यक नोटिस की अवधि को समाप्त कर दिया जाए या ऐसे जोड़ों को पर्याप्त सुरक्षा दी जाए.

इस साल सितंबर में, केरल के एक कानून के छात्र के विशेष विवाह अधिनियम को चुनौती देने वाली एक याचिका के बाद, सर्वोच्च न्यायालय इस बात की जांच करने के लिए सहमत हुआ कि क्या भावी दूल्हे और दुल्हन के व्यक्तिगत विवरण को प्रकाशित करना उनके निजता के अधिकार का उल्लंघन है. याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व करने वाले सर्वोच्च न्यायालय के वकील कालेश्वरम राज कहते हैं, ''जब दो बालिग मर्जी से शादी का फैसला करते हैं, तो जनता को आपत्तियों के लिए अवसर देना बहुत असंवैधानिक है. ऐसे प्रावधान पारंपरिक व्यक्तिगत कानूनों में भी अनुपस्थित हैं. इस प्रकार, विशेष विवाह अधिनियम के तहत अंतरधार्मिक विवाह का विकल्प चुनने वालों के मामले में एक तरह का भेदभाव किया जाता है.'' धनक ऑफ ह्यूमैनिटी ने भी विशेष विवाह अधिनियम को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है. धनक ऑफ ह्यूमैनिटी की ओर से याचिका दायर करने वाले वकील उत्कर्ष सिंह कहते हैं, ''लव जेहाद की समस्या की जड़ें इसी अधिनियम में निहित हैं. कानून अपर्याप्त नहीं हैं, लेकिन उन्हें लागू करने वाले लोग उसी सामाजिक सोच का हिस्सा हैं.''

दिलचस्प यह है कि उत्तर प्रदेश का अध्यादेश केवल अंतरधार्मिक विवाह पर लागू होता है, विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह, जिसमें दूल्हा या दुल्हन व्यक्तिगत कानूनों के अनुसार विवाह करने के लिए धर्मांतरण करना चाहते हैं, उन्हें नहीं रोका जाता. इस भेद के कारण लेखक चेतन भगत जैसे लोग इस अध्यादेश का समर्थन करते हैं. भगत ने ट्वीट किया, ''लव जेहाद कानून अंतरधार्मिक विवाह को नहीं रोकता है. यह केवल राज्य पर एक जिम्मेदारी डालता है कि वह नोटिस और सूचना मांगकर प्यार की हकीकत की जांच कर सके. क्या यह वांछनीय है? हां, बिल्कुल. वास्तव में, यह राज्य का कर्तव्य है.''

इस सब में, पूर्व न्यायमूर्ति लोकुर पुलिस की अतिसक्रियता के खिलाफ आगाह करते हैं. वे कहते हैं, ''पुलिस कानून की गलत व्याख्या में अतिसक्रियता दिखा रही है और यही बड़ी समस्या है. आगे क्या होगा, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन जो हो रहा है उसे अच्छा तो बिल्कुल नहीं कह सकते.'' अध्यादेश की घोषणा के बाद से उत्तर प्रदेश के घटनाक्रम कुछ हद तक राज्य सरकार और प्रवर्तन एजेंसियों की मंशा पर शक पैदा करते हैं. मुरादाबाद में दो मुस्लिम पुरुषों की गिरफ्तारी की घटना, एक दिन पहले बरेली में जो हुआ उसके बिल्कुल विपरीत कहानी बयान करती है, जब पुलिस ने एक मुस्लिम की शिकायत सुनने से इनकार कर दिया कि उसकी बेटी ने धर्म परिवर्तन के बाद एक हिंदू युवक से शादी की थी.

पुलिस ने महिला की गवाही को माना कि उसने अध्यादेश लागू होने से पहले, सितंबर में शादी कर ली थी. पुलिस ने इस मामले में सही काम किया, लेकिन पक्षपातपूर्ण आचरण और सत्ता के दुरुपयोग के उदाहरण भरे पड़े हैं. कानून प्रवर्तन एजेंसियों को धार्मिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठने और हर मामले में निष्पक्षता और ईमानदारी के साथ काम करने की जरूरत है.
—साथ में रोमिता दत्ता, रोहित परिहार, राहुल नरोन्हा और अमिताभ श्रीवास्तव

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