खास रपटः फिर लटकी खतरे की घंटी
राजस्थान के रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान में एक बाघ के गले से तार लटकता मिलने से मची सनसनी. वन्यजीव शिकारियों की सक्रियता से राज्य में बाघों की सुरक्षा फिर सवालों के घेरे में. प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी से संरक्षण के प्रयासों में कामयाबी नहीं मिल पा रही

राजस्थान के रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान के भीतर लगे दर्जनों कैमरों में से किसी एक ने दिसंबर महीने की शुरुआत में एक तस्वीर खींची जिसको देखकर वहां के अधिकारी और ऐक्टिविस्ट सनाका खा गए. इसमें दिखा कि एक बाघ तार के फंदे से जूझ रहा है. तुरंत पता लगाकर उसे बेहोश किया गया और गले से लटकता लोहे का तार निकालकर उसे जंगल में छोड़ा गया.
इस घटना ने सवाई माधोपुर में करीब 1,334 वर्ग किमी में फैले राष्ट्रीय उद्यान में शिकारियों की गतिविधियों को लेकर फिर से खतरे की घंटी बजा दी है. तुरत-फुरत कार्रवाई करते हुए राजस्थान की मुख्य वन संरक्षक श्रुति शर्मा ने राज्यभर में रेड एलर्ट घोषित कर दिया, फरवरी तक के लिए मैदानी वनकर्मियों की छुट्टियां रद्द कर दीं और भारी पैट्रोलिंग के आदेश जारी कर दिए. उन्होंने बताया कि 5 दिसंबर को कुछ शिकारियों को माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य में एक सांभर के शिकार के बाद गिरफ्तार किया गया है.
राजस्थान के तीन राष्ट्रीय उद्यान (रणथंभौर, केवलादेव और मुकुंदरा हिल्स) में 2018 की बाघों की गिनती के मुताबिक, कुल 69 बाघ हैं जिनमें से 52 रणथंभौर में ही हैं. अधिकारियों का कहना है कि उद्यान में वयस्क बाघों की आबादी काफी है और कई युवा बाघों को नए इलाकों की तलाश में विचरते हुए देखा गया. इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं भी बढ़ी हैं.
रणथंभौर लंबे समय से शिकारियों का ठिकाना रहा है. अप्रैल 2018 में यहां दो शावकों की मौत उस सांड को खाने से हो गई थी, जिसके बारे में शक था कि उसे शिकारियों ने जहर दे रखा था. इस साल अप्रैल में वन कर्मचारियों ने एक शिकारी को गिरफ्तार किया था जो एक जानवर का मांस पका रहा था. फरवरी में कैमरा ट्रैप्स ने एक सिरकटे चिंकारा को ले जा रहे शिकारियों की तस्वीर कैद की थी. संदिग्धों को पकड़ने गए वन और पुलिस अधिकारियों पर गांववालों ने पत्थरबाजी की थी जिससे टीम के छह सदस्य घायल हो गए थे. उसी के बाद राजसमंद की सांसद और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) सदस्य दिया कुमारी ने रणथंभौर से पिछले एक दशक में 26 बाघों के रहस्यमय तरीके से गायब होने का दावा करते हुए इसकी जांच की मांग की.
शिकारियों की पौ-बारह
राजस्थान में वन्यजीवों के शिकार की सबसे खौफनाक खबर 2005 में आई थी जब अलवर में सरिस्का अभयारण्य में मौजूद सभी आठ बाघों को मार डाला गया था. वन्यजीव प्रबंधन के साथ समस्याएं बाघों तक ही महदूद नहीं हैं. 12 दिसंबर को शिकारियों के खिलाफ रेड अलर्ट के ऐलान के हफ्ते भर बाद वन अधिकारियों ने रणथंभौर से लगे एक गांव के रहने वाले मीठालाल मीणा को अदालत में पेश किया. उस पर दो दिन पहले अभयारण्य के भीतर एक बनैले सूअर का शिकार करने का आरोप था. बाड़मेर जिले में 11 दिसंबर को वन मंत्री सुखराम बिश्नोई के बेटे भूपेंद्र बिश्नोई प्रदर्शनकारियों के साथ शामिल होकर उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे थे जिन पर 3 दिसंबर को हथियारों और चिंकारा की लाश के साथ गिरफ्तार शिकारी के साथ सांठगांठ का आरोप है. अप्रैल में जैसलमेर जिले में चार शिकारियों के पास से तीन चिंकारा के अवशेष जब्त किए गए थे.
कर्मचारियों की कमी
राजस्थान वन्यजीव बोर्ड की सदस्य सिमरत संधू कहती हैं, ''मुझे इस रेड एलर्ट का किसी भी स्तर पर असर होने पर शक है क्योंकि दस दिन के बाद भी बाघ के शिकार की कोशिश करने वाले आरोपियों की पहचान तक नहीं की जा सकी है.'' उनकी बात खारिज भी नहीं की जा सकती. वन्यजीवों और शिकारियों की निगरानी करने वाले वन विभाग के पास कर्मचारियों की भारी कमी है—9,980 पदों में से 3,642 पद रिक्त पड़े हैं.
पिछली वसुंधरा राजे सरकार ने 2017 में वॉच टावर और थर्मोग्राफिक कैमरों के इस्तेमाल से निगरानी व्यवस्था बनाने के लिए 100 करोड़ रुपए आवंटित किए थे. इनमें से 50 करोड़ रुपए रणथंभौर, सरिस्का और मुकुंदरा हिल रिजर्व और जयपुर के झालाना तथा पाली के जवाई बांध के तेंदुआ अभयारण्य में 50 टावर खड़े करने में खर्च किए गए. कैमरे की तस्वीरों के विश्लेषण के लिए निजी एजेंसियों और एनजीओ को शामिल किया गया था. अतिरिक्त 45 करोड़ रुपए 2021 तक इस परियोजना पर खर्च किए जाने थे लेकिन अशोक गहलोत सरकार ने परियोजना के मौजूदा स्वरूप की निरर्थकता का तर्क देते हुए नया फंड जारी करने से इनकार कर दिया.
संधू कहती हैं, ''ऐसा लगता है कि परियोजना ठीक से बनाई ही नहीं गई. इसका एकमात्र मकसद कुछ एनजीओ के लिए फंड जारी करना था. इससे किसी शिकारी को पकड़ने में कोई मदद नहीं मिली.'' वे यह भी जोड़ती हैं कि अधिकारियों को इस आधी-अधूरी परियोजना के मद में पैसे बर्बाद करने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है. वे 2018-2019 में दो बाघों और कुछ शावकों के रणथंभौर से तुरत-फुरत मुकुंदरा स्थानांतरित करने के बाद जुलाई-अगस्त में हुई उनकी मौत की ओर भी ध्यान दिलाती हैं.
इधर, नवंबर में 881 वर्ग किलोमीटर के सरिस्का पार्क में 20 बाघों के लिए एक प्रस्तावित पुनर्वास स्थल का काम फिर से शुरू हो गया जो आसपास के 26 गांवों के पुनर्वास में देरी के चलते बरसों से अटका हुआ था. गांववालों ने सरकार के इस कदम पर यह कहते हुए सवाल उठाए हैं कि पर्यटकों और होटल कारोबारियों को लुभाने के लिए ऐसा किया जा रहा है. सरिस्का में रणथंभौर की बनिस्बत कम पर्यटक जाते हैं लेकिन वहां कड़ी निगरानी की जरूरत है क्योंकि स्थानीय लोगों की आवाजाही काफी होती है. विशेषज्ञों का कहना है कि बाघों के पुनर्वास में देरी ने सरिस्का में उनके लिंगानुपात को गड़बड़ा दिया है. वहां आठ बाघिनों पर एक बाघ है.
बहरहाल, बाघों का स्थानांतरण भी बड़ा जोखिम है. 2019 में एक स्वस्थ बाघ को सरिस्का स्थानांतरित किया गया था और उसको जब एक ट्यूमर की सर्जरी के लिए बेहोश किया गया तो उसके ठीक बाद उसकी मौत हो गई. मौत की वजह लू लगने और ट्रैंक्वलाइजर की ओवरडोज देने को माना गया. 2008 के बाद से सरिस्का लाए गए 11 में से 8 बाघों की अकाल मृत्यु हुई है. 2018 में ट्रैंक्वलाइजर का ओवरडोज देने से 11 साल के बाघ की मौत हो गई थी जो रणथंभौर पार्क से बाहर घूम रहा था.
विशेषज्ञों की जरूरत
बाघों की देखभाल में इस विशेषज्ञता की कमी इसलिए है क्योंकि विशेषज्ञ वन्यजीव चिकित्सक उपलब्ध नहीं हैं. अमूमन वन्यजीव ड्यूटी पर तैनात वेटरिनरी डॉक्टर के पास पशुपालन और मुर्गीपालन में पढ़ाई की डिग्री होती है. ज्यादातर राज्यों में वन महकमा उनको प्रतिनियुक्ति पर लेता है और वन्यजीव मामलों में छोटे-मोटे प्रशिक्षण के बाद उनको काम पर रख लेता है. राजस्थान की प्रमुख सचिव (वन और पर्यावरण) श्रेया गुहा कहती हैं कि वन विभाग के पास सिर्फ छह पशु चिकित्सक ही प्रतिनियुक्ति पर हैं, जबकि जरूरत 23 की है और उनके सहायक कर्मचारियों के नाम पर कोई है ही नहीं, जबकि जरूरत 33 की है. पूरे राज्य में महज एक पशु चिकित्सक है जिसको बाघों को ट्रैंक्वलाइज यानी बेहोशी का इंजेक्शन देने का विशेषज्ञ माना जाता है.
पिछले साल अक्तूबर में केंद्रीय वन, पर्यावरण और जलवायु मंत्रालय ने एनटीसीओ को हर बाघ अभयारण्य में एक पशु चिकित्सक की तैनाती का निर्देश दिया था. बहरहाल, राजस्थान में इस निर्देश पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया जहां पशुपालन विभाग तक में पशु चिकित्सकों की भारी कमी है. इस साल अप्रैल में सेंट्रल जू अथॉरिटी ने कोविड के डर से सभी 160 चिडिय़ाघरों को निर्देश दिया कि वे पशु चिकित्सकों को जूनोटिक रोगों में प्रशिक्षित करें. जयपुर के नाहरगढ़ चिडिय़ाघर में सितंबर 2019 के बाद से लैप्टोस्पाइरोसिस की वजह से आठ बाघों की जान जा चुकी है. गुहा ने वन विभाग में खास तौर पर पशु चिकित्सकों का विंग तैयार करने पर जोर दिया है जिनका वन्यजीवन को लेकर गहन प्रशिक्षण हो. वे कहती हैं, समावेशी वन्यजीव संरक्षण के लिए राज्य को सिर्फ शिकारियों पर रोक से कहीं आगे की सोच रखनी होगी.