खास रपटः स्थानीय कोटे का शिगूफा

मूल निवास के आधार पर नौकरियों में आरक्षण संविधान के खिलाफ है तो फिर मध्य प्रदेश और बिहार की सरकारों ने अपने प्रदेश के लोगों को सरकारी नौकरी में तवज्जो देने की घोषणा कैसे कर दी?

बराबरी की जंग साल 2018 में मराठा आरक्षण के लिए कांग्रेस और एनसीपी विधायकों ने प्रदर्शन किया, बाद में यह लागू भी हुआ पर अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई चल रही है
बराबरी की जंग साल 2018 में मराठा आरक्षण के लिए कांग्रेस और एनसीपी विधायकों ने प्रदर्शन किया, बाद में यह लागू भी हुआ पर अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई चल रही है

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 18 अगस्त को अपने वीडियो संदेश के बाद ट्वीट करते हैं, ''अपने भांजे-भांजियों के हित को ध्यान में रखते हुए हमने निर्णय लिया है कि प्रदेश में शासकीय नौकरियां अब सिर्फ मध्य प्रदेश के बच्चों को ही दी जाएंगी. इसके लिए आवश्यक कानूनी प्रावधान किया जा रहा है.

प्रदेश के संसाधनों पर प्रदेश के बच्चों का अधिकार है.’’ शिवराज से पहले 2019 में कमलनाथ प्रदेश की नौकरियों में 70 फीसद स्थानीय लोगों को आरक्षण का ऐलान कर चुके हैं. इससे पहले 1998 में दिग्विजय सिंह सरकार ने 10वीं-12वीं के बाद पांच साल तक प्रदेश में पढ़ाई करने वालों को सरकारी नौकरियों में रखने की व्यवस्था की थी लेकिन ये आदेश अदालत में नहीं टिका इसलिए लागू नहीं हुआ.

शिवराज के बाद बिहार सरकार ने भी शिक्षक भर्ती में प्रदेश के अभ्यर्थियों को तरजीह देने का फैसला किया है. सवाल यह उठता है कि मूल निवास (डोमिसाइल) के आधार पर क्या आरक्षण दिया जा सकता है. विशेषज्ञ कहते हैं कि संविधान में इसका कोई प्रावधान नहीं है. लेकिन कोर्ट के आदेश मिले-जुले हैं. 

संविधान किसी भी आधार पर भेदभाव की इजाजत नहीं देता है लेकिन भेदभाव मिटाने के लिए और पिछड़े तबके को बराबरी पर लाने के लिए अपवाद स्वरूप दिए गए सरकार को अधिकार के इर्द-गिर्द ही आरक्षण के प्रावधान घूमते हैं.

संविधान के मुताबिक, भारत के नागरिक देश में कहीं भी जाकर रह सकते हैं और रोजगार पा सकते हैं. अनुच्छेद 15 में जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव न करने की बात कही गई है. अनुच्छेद 16 (2) में निवास स्थान के आधार पर नौकरी में भेदभाव नहीं किया सकता. न्यायविद कहते हैं कि डोमिसाइल के आधार पर आरक्षण का कानून बनाने का अधिकार राज्यों को नहीं है. 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले शैक्षिक संस्थानों में दाखिले में स्थानीयता के आधार पर दाखिले को सही बताते हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ही कुछ फैसले नौकरियां सौ फीसद स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित करने को गलत भी ठहराते हैं. यह फैसला आदिवासियों को नौकरी के मामले में आया था. फिर भी मूल निवास के आधार पर नौकरियों में भेद हो रहा है.

लगभग सभी राज्यों में एससी-एसटी, ओबीसी और आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोगों के लिए आरक्षित पद (मोटे तौर पर 60 फीसद) सिर्फ प्रदेश के लोगों के लिए ही हैं. अन्य प्रदेशों के कोटे वाले आवेदक सामान्य श्रेणी के माने जाते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि आरक्षण जातियों पर आधारित है और हर राज्य की अपनी-अपनी एससी-एसटी और ओबीसी सूची है.

इंदिरा साहनी के केस में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसद तय कर दी है, इसके बावजूद सरकारें इस सीमा को तोड़ रही हैं. इन सभी मामलों को अदालत में चुनौती दी जा चुकी है और केस चल रहा है. आर्थिक आधार पर आरक्षण को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है. अब सारी उठापटक अनारक्षित वर्ग में हो रही है. 

मध्य प्रदेश में मूल निवासियों को आरक्षण के मसले पर जाने-माने वकील और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा, ''डोमिसाइल के आधार पर आरक्षण देने के मसले पर सुप्रीम कोर्ट से 1954 से लेकर अब तक कई फैसले आ चुके हैं. इनमें कोर्ट ने कहा है कि डोमिसाइल के आधार पर आरक्षण नहीं हो सकता. सौ फीसद आरक्षण नहीं हो सकता, यह भी सुप्रीम कोर्ट ने ही व्यवस्था दी है.’’

इतना ही नहीं मध्य प्रदेश की घोषणा के बाद तन्खा ने चौहन को भेजे पत्र में कहा है, ''यह घोषणा लुभावनी अवश्य प्रतीत होती है किंतु इसे वर्तमान के धरातल पर उतारने में व्यावहारिक कठिनाइयों की अनदेखी की गई है...आपको इस निर्णय से पूर्व संविधान विशेषज्ञों से राय अवश्य लेनी चाहिए थी.’’

झारखंड में उच्च न्यायालय ने शासकीय नौकरियों में शत प्रतिशत आरक्षण की झारखंड सरकार की कोशिश को असंवैधानिक मानते हुए शासन के आदेश पर रोक लगा दी. इसी तरह सिक्किम सरकार ने भी नौकरियों में 90 फीसद आरक्षण देने की योजना बनाई थी जिसे राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया. तन्खा ने बताया कि यह विषय समवर्ती सूची का होने की वजह से राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए गया था.

अब सवाल उठता है कि अगर संविधान में व्यवस्था नहीं है तो फिर राज्य डोमिसाइल या मूल निवास के आधार पर आरक्षण दे कैसे रहे हैं? संविधानविद सुभाष कश्यप कहते हैं कि राज्य अनुच्छेद 16 के प्रावधानों के तहत कुछ वर्गों के लिए ऐसा कर सकते हैं. ये संविधान का थोड़ा सा ग्रे एरिया है. इसी की आड़ में आंध्र प्रदेश ने राज्य के नागरिकों के लिए नौकरियों में 75 फीसद आरक्षण कर दिया.

लेकिन मध्य प्रदेश के मामले में सरकारी आदेश नहीं आया है. आदेश आने पर पता चलेगा कि वे किस तरह मूल निवासियों को सौ फीसद आरक्षण के प्रावधान को वैधानिक ठहराते हैं. अरुणाचल प्रदेश में आदिवासियों को नौकरी में 80 फीसद तक आरक्षण पर कश्यप कहते हैं कि एससी-एसटी को आरक्षण दिया जा सकता है और यह भी अनुच्छेद 16 के प्रावधानों के तहत ही दिया गया है. वे कहते हैं, ‘‘सुप्रीम कोर्ट ने 50 फीसद आरक्षण की सीमा तय की है लेकिन इसके भी अपवाद देखने को मिल रहे हैं.’’

इस मामले में जिस तरह रह अदालत के फैसले स्पष्ट नहीं हैं उसी तरह कानून के जानकारों की भी राय बंटी हुई है. सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, ‘‘सिर्फ डोमिसाइल के आधार पर आरक्षण का मसला अभी तक कहीं से (संसद या सुप्रीम कोर्ट से) सेटल नहीं हुआ.’’ जयपुर हाइकोर्ट के अधिवक्ता सुधीर तिवारी का कहना है कि कानूनन डोमिसाइल रिजर्वेशन नाम की कोई चीज नहीं है.

वे कहते हैं, ‘‘जब राजनैतिक निर्णय होता है तो उसकी बहुत सी वजहें होती हैं. कई बार नेता घोषणा कर देते हैं, घोषणा के तहत हुआ निर्णय भले ही अदालत से खारिज हो जाए, उनका राजनैतिक मकसद तो पूरा हो जाता है.’’ लोकसभा के पूर्व सेक्रेटरी जनरल पी.डी.टी. आचारी कहते हैं, ''डोमिसाइल के आधार पर कानून संसद ही बना सकती है. राज्य सरकार नहीं बना सकती. संसद जब कोई कानून बनाती है तो इसे लागू करने में राज्यों को भी अधिकार मिलता है.’’ 

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील डी.के. गर्ग कहते हैं कि राज्यों को अनुच्छेद 309 के तहत नौकरियों की शर्त तय करने का अधिकार है. राज्य डोमिसाइल के आधार पर कानून बना सकते हैं.

अलबत्ता, मध्य प्रदेश के मामले में आचारी का कहना है कि वहां की सरकार जब आदेश जारी करेगी तब ही सही स्थिति पता चलेगी. संविधान में निवास स्थान के आधार पर आरक्षण की बात अपवाद स्वरूप की गई है. स्थानीय जरूरतों के मुताबिक, कुछ जगहों पर डोमिसाइल आरक्षण की व्यवस्था की गई है.

आंध्र में तेलंगाना, महाराष्ट्र में विदर्भ के लिए कुछ प्रावधान हैं और उत्तर-पूर्व के आदिवासी इलाकों में डोमिसाइल आधार पर विशेष आरक्षण लागू हैं. कई आदिवासी प्रधान क्षेत्रों में कानून के बजाए परंपराओं से व्यवस्था चल रही है तो ऐसा स्थानीयता के आधार पर ही हो रहा है.

राजस्थान में भी सीमा से परे जाकर आरक्षण दिया जा रहा है. राजस्थान में ट्राइबल सब प्लान (टीएसपी) एरिया में आदिवासियों को 45 फीसद आरक्षण दिया गया है. इन इलाकों में अनारक्षित श्रेणी में भी स्थानीय लोगों का कोटा है. जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ काम कर रही संस्था समता आंदोलन के अध्यक्ष पाराशर नारायण शर्मा का कहना है कि डोमिसाइल के आधार पर आरक्षण देना सीधे तौर पर संविधान के प्रावधानों के खिलाफ है.

वे कहते हैं, ‘‘अदालतें भी कई बार नोटिस देकर मामला लटका देती हैं उस पर स्टे नहीं देती हैं. राजस्थान में गूजरों को आरक्षण दिया गया. हम दो बार इसके खिलाफ कोर्ट गए और इसे रद्द किया जा चुका है. लेकिन फिर आरक्षण दे दिया गया. हमने फिर सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई कि राज्य के मुख्यमंत्री लगातार कोर्ट के आदेश की अवहेलना कर रहे हैं लेकिन उस रिट में सवा साल हो चुके हैं अभी तक नोटिस जारी नहीं हुआ है.’’

शिक्षा में डोमिसाइल के आधार पर आरक्षण मौजूद है. 1984 के प्रदीप जैन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में सुप्रीम कोर्ट ने ऑल इंडिया कोटा की व्यवस्था की ताकि राज्यों को उनकी सीमा में आने वाले मेडिकल कॉलेजों में डोमिसाइल और स्थानीय संस्थान कोटे के जरिए 100 फीसद सीटें आरक्षित करने से रोका जा सके.

मौजूदा समय में मेडिकल कॉलेजों में 15 फीसद सीटें ऑल इंडिया कोटे के लिए हैं. यानी इन सीटों पर दूसरे राज्यों के विद्यार्थी दाखिला ले सकेंगे. एनआइटी, मेडिकल कॉलेज जैसी अन्य शैक्षिक संस्थाओं में भी डोमिसाइल कोटा हैं. 

पिछले डेड़ साल के भीतर मध्य प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, हरियाणा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश मूल निवासियों को सरकारी-प्राइवेट नौकरियों में आरक्षण का प्रवाधान या ऐलान कर चुके हैं जो कि लागू होने के विभिन्न चरणों में हैं. गुजरात, गोवा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड आदि राज्य भी स्थानीय निवासियों को प्राइवेट सरकारी नौकरियों में आरक्षण दे रहे हैं.

राज्यों ने ब्लू कॉलर जॉब तो राज्यों के लिए ही आरक्षित किए हैं. मूल निवासियों को नौकरी में तरजीह देने के लिए राज्य स्थानीय भाषा में दक्षता की शर्त जोड़ते हैं. जानकार मानते हैं कि प्राइवेट सेक्टर में स्थानीय लोगों के लिए नौकरियां आरक्षित करना थोड़ा मुश्किल होता है क्योंकि कंपनियां जरूरत पडऩे पर भर्ती करती हैं न कि नौकरी का सालाना अभियान चलाती हैं.

गुजरात में स्थानीय कंपनियों को सरकारी छूटों का लाभ तब देने का प्रावधान है जब वे तय संख्या में स्थानीय लोगों की भर्ती करें. व्यवहारिक रूप से यह संभव नहीं है. गुजरात और महाराष्ट्र प्रवासियों को रोजगार देने के मामले में सबसे आगे हैं. 

बाहरी राज्यों के लोगों के नौकरी करने का व्यावहारिक पक्ष भी है. शर्मा कहते हैं कि नौकरियों में पांच से सात फीसद ही दूसरे प्रदेश के लोग हैं. राजस्थान में सात लाख सरकारी कर्मचारी हैं, इनमें से 35-36 हजार से ज्यादा बाहरी राज्यों के नहीं हैं.

लोग अपने राज्य में रहना चाहते हैं. सीमावर्ती जिलों में बाहरी राज्यों के लोगों की नौकरी में दिलचस्पी रहती है जैसे धौलपुर आदि. लेकिन गुजरात की सीमा पर ऐसा नहीं है. गुजरात से बमुश्किल ही कोई नौकरी करने राजस्थान आता है. वहां के लोग बिजनेस ज्यादा करते हैं.

मध्य प्रदेश के मामले में मुख्यमंत्री ने घोषणा शायद उपचुनाव के लिहाज से की है क्योंकि जिस ग्वालियर-भिंड इलाके की सीटों में उपचुनाव होने हैं, वहां पुलिस भर्ती में पड़ोसी राज्यों के लोग ज्यादा बाजी मार ले जाते हैं. डोमिसाइल के आधार पर आरक्षण पर कानूनी स्पष्टता अपरिहार्य है चाहे वह संसद तय करे या सुप्रीम कोर्ट.

बहरहाल, 27 अगस्त 2020 को सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संविधान पीठ ने फैसले में कहा कि वंचित तबकों को बराबरी पर लाने और असमानता दूर करने के लिए राज्य आरक्षण दे सकते हैं और सकारात्मक कदम उठाने में कोई  संवैधानिक बाधा नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी आरक्षण में उप वर्गीकरण के लिए कही है. लेकिन इसकी व्याख्या और भावार्थ राज्यों को आरक्षण देने के व्यापक अधिकार की ओर भी इशारा करते हैं. देखते हैं, राज्य किस तरह कदम उठाते हैं. 

1995
डी.पी. जोशी बनाम स्टेट ऑफ मध्य भारत के केस में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य भारत (आज का मध्य प्रदेश) सरकार के उस फैसले को सही ठहराया जिसमें मेडिकल कॉलेज में सिर्फ मध्य प्रदेश के छात्रों की फीस माफ की थी. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, कुछ छात्रों से फीस लेना और बाकी से न लेना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं है क्योंकि वर्गीकरण तर्कसंगत है. इसके पीछे बड़ा उद्देश्य है, अपने राज्य की सीमा के भीतर शिक्षा को बढ़ावा देना.

1985
उच्च शिक्षण संस्थाओं में अभ्यर्थियों का चयन उनके निवास स्थान के आधार पर करना संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन है. लेकिन इस पर कोई रूलिंग नहीं दी थी. 
—सुप्रीम कोर्ट (1984 के प्रदीप जैन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में)  

2004
राज्य में रिहाइश की शर्त पोस्ट ग्रेजुएट केस में दाखिले का आधार नहीं हो सकती.
—संविधान पीठ, सुप्रीम कोर्ट (सौरभ चौधरी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया) 

2014
डोमिसाइल (स्थायी निवास) की संकल्पना तर्कसंगत नहीं है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन है.

—सुप्रीम कोर्ट (चारु खुराना बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के 2014 के फैसले में व्यवस्था)
2018
किसी राज्य में अनुसूचित जाति की श्रेणी का अभ्यर्थी दूसरे राज्य में नौकरी या पढ़ाई करने जाएगा तो वह उस दूसरे राज्य मे अनुसूचित जाति का नहीं माना जाएगा. अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग इस श्रेणी के आरक्षण का लाभ सिर्फ अपने गृह राज्य में ले सकेंगे.
—सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों का फैसला

अप्रैल 2020
सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाइकोर्ट के उस आदेश को पलट दिया जिसमें सरकार के आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षकों के 100 फीसद पद आदिवासियों के लिए आरक्षित कर दिए गए थे. जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने 1992 के इंदिरा साहनी मामले का हवाला देते हुए कहा कि आरक्षण 50 फीसद से ज्यादा नहीं हो सकता. उन्होंने कहा कि यह इलाका सौ फीसद आदिवासी आबादी वाला नहीं है इसलिए यह फैसला मेरिट की उपेक्षा करता है.

संविधान के प्रावधान
अनुच्छेद 16 (1) राज्य के भीतर रोजगार और नियुक्तियों में सभी नागरिकों के लिए समान अवसर की बात कहता है

अनुच्छेद 16 (2) कहता है कि किसी भी नागरिक को उसके धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, कुल, जन्मस्थान या इनमें से किसी भी एक के आधार पर रोजगार में भेदभाव नहीं किया जा सकता.

अनुच्छेद 16 (3) यह अनुच्छेद संसद को राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के किसी वर्ग या स्थानीय निवासियों के लिए नौकरी में प्रावधान के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है.

''अपने भांजे-भांजियों के हितों का ध्यान रखते हुए हमने निर्णय लिया है कि प्रदेश में शासकीय नौकरियां अब सिर्फ मध्य प्रदेश के बच्चों को ही दी जाएंगी. इसके लिए आवश्यक कानूनी प्रावधान किया जा रहा है’’ 
शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री, मध्य प्रदेश

''यह घोषणा लुभावनी अवश्य प्रतीत होती है किंतु इसे वर्तमान के धरातल पर उतारने में व्यावहारिक कठिनाइयों की अनदेखी की गई है. आपको इस निर्णय से पूर्व संविधान विशेषज्ञों से राय अवश्य लेनी चाहिए थी ’’ 
विवेक तन्खा, सांसद, राज्यसभा.

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