स्वास्थ्यः आखिरकार सुध ली गई सेहत की
कोविड महामारी ने उजागर कर दिया है कि हमारी स्वास्थ्य प्रणाली किस कदर खस्ताहाल है. अब बदलाव की कोशिश

सोनाली आचार्जी
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से घोषित स्वास्थ्य सुधारों में फिलहाल तो पूरा ध्यान कोविड-19 को पर केंद्रित है, लेकिन प्राथमिक स्तर पर चिकित्सा के बुनियादी ढांचे के विकास पर भी उल्लेखनीय ध्यान दिया गया है. बीमारी के लिए प्रतिक्रिया समय को कम करने और देश के दूरदराज के क्षेत्रों में निदान और उपचार सेवाएं प्रदान करने के लिए देश के 6,612 ब्लॉक में संक्रामक रोग अस्पताल और जांच लैब स्थापित किए जाएंगे. हालांकि, लंबी दूरी तय करने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को अधिक व्यापक सुधार और निवेश की आवश्यकता होगी. फिलहाल, इसे अच्छी शुरुआत और सही दिशा में पहला कदम कहा जा सकता है.
सुधार
स्वास्थ्य पर ज्यादा खर्च: सीतारमण ने कहा है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश को मौजूदा जीडीपी के एक प्रतिशत से बढ़ाया जाएगा, जो विश्व में सबसे कम है.
स्वास्थ्य तकनीक: ईसंजीवनी जैसी टेली कम्युनिकेशन सेवाएं, स्वास्थ्यकर्मियों के लिए ई-ट्रेनिंग मॉड्यूल्स और आरोग्य सेतु ऐप जैसी कई पहल हुई हैं. इन सेवाओं को आने वाले महीनों में और विस्तारित किया जाएगा और कई नए फीचर जोड़े जाएंगे.
ग्रामीण पहुंच: ब्लॉक स्तर पर सरकारी जांच लैब और संक्रामक रोगों के अस्पताल को स्थापित करने की घोषणा की गई है.
औचित्य
देश के करीब 25,000 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) में से 60 प्रतिशत में सिर्फ एक डॉक्टर है; और 5 प्रतिशत में एक भी डॉक्टर नहीं है.
जिला अस्पतालों में भी अक्सर ऑक्सीजन सिलिंडर, मेडिकल उपकरण, बिस्तरों और डॉक्टरों की कमी रहती है.
खराब बजटीय आवंटन के कारण स्वास्थ्य सेवा को अब बदहाल नहीं रखा जा सकता. वियतनाम और दक्षिण कोरिया से भारत सबक ले सकता है, जो अपने जीडीपी का करीब 8 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च करता है.
संभावना
केंद्र की ओर से घोषित 15,000 करोड़ रुपए के कोविड आपातकालीन प्रतिक्रिया कोष में से 4,113 करोड़ रुपए सीधे कोविड इलाज के लिए जारी किए गए हैं; 3,750 करोड़ रुपए की आवश्यक वस्तुएं और 550 करोड़ रुपए के जांच किट राज्यों को वितरित किए गए हैं.
ऐसे देश में जहां निकटतम प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की औसत दूरी 9 किमी और जिला अस्पताल 32 किमी (2014 के शोध के अनुसार) से अधिक दूर है, ब्लॉक स्तर पर जांच लैब और संक्रामक रोग अस्पतालों के उपलब्ध होने से लोगों तक उपचार की पहुंच में काफी सुधार होगा.
अंतर
सितंबर, 2019 तक, भारत में 12 लाख पंजीकृत एलोपैथिक डॉक्टर हैं. अगर इनमें से 80 प्रतिशत को भी उपलब्ध मानें तो प्रति 1,400 लोगों पर एक डॉक्टर है. डब्ल्यूएचओ के मानदंड के मुताबिक, हमें कम-से-कम 4,00,000 और डॉक्टरों की जरूरत है.
देश में 70,000 एमबीबीएस सीटें हैं, जो डॉक्टरों की मांग को पूरा करने में सक्षम नहीं है. जिला अस्पतालों से संबद्ध मेडिकल कॉलेज इस अंतर को भर सकते हैं.
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, प्रति 1,000 लोगों पर पांच बिस्तर होने चाहिए, जबकि हमारे पास फिलहाल 0.55 बिस्तर ही हैं. इस दिशा में काम करने की जरूरत है.
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