मनरेगाः जहान बचाने की जिम्मेदारी

मोदी सरकार के लिए मनरेगा कांग्रेस की विफलता का स्मारक था, लेकिन इसी पर है महामारी में गांव लौटते मजदूरों को रोजगार देकर अर्थव्यवस्था की नब्ज थामने की जिम्मेदारी.

गांव की उम्मीद प्रवासी मजदूरों को मनरेगा में काम मिलने का सहारा है
गांव की उम्मीद प्रवासी मजदूरों को मनरेगा में काम मिलने का सहारा है

एर्णाकुलम से झारखंड के जसीडीह के लिए चली श्रमिक विशेष ट्रेन में 1,127 साथी मजदूरों के साथ बैठे मुकेश को आने वाले कल की चिंता खाए जा रही थी. देवघर जिले के गांव सापतर लौट रहे मुकेश 15 साल पहले सुदूर दक्षिण के सूबे केरल गए थे. पर, कोविड-19 महामारी की वजह से उन्हें लौटना पड़ा. सारे रास्ते वे खुद को और साथियों को इस बात का ढाढस देते रहे, ‘‘नै होते त मनरेगा में काज करबे (नहीं होगा तो मनरेगा में काम करेंगे).’’

देशभर के ऐसे लाखों मजदूरों के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) आखिरी उम्मीद की किरण है. मुकेश की ही तरह रामजी अहिरवार अपने साथियों, अंगूरी और रमा देवी के साथ दिल्ली से उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में पैतृक गांव पवा लौट आए हैं. इन लोगों को दिल्ली से भूखे पेट भागना पड़ा और थोड़ी दूर पैदल और कुछ दूर ट्रक से सफर करके वे चार दिनों में गांव पहुंच पाए.

लेकिन मजदूरों की बड़े पैमाने पर हो रही इस वापसी से पंचायतों में कामकाज का गणित गड़बड़ा गया है. पवा ग्राम पंचायत की प्रधान ज्योति मिश्रा कहती हैं, ''गांव में मनरेगा के काम के लिए 25 मजदूरों की जरूरत थी, पर काम करने डेढ़ सौ लोग पहुंच गए. लिहाजा, काम रोकना पड़ा.’’ अब ज्योति ने पांच नए निर्माण कार्यों के प्रस्ताव स्वीकृति के लिए भेजे हैं. गैर-सरकारी संगठनों के दावों पर भरोसा करें तो उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में 40,000 मजदूर वापस लौट आए हैं और उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश, दोनों राज्यों में बुंदेलखंड के सभी 14 जिलों में यह संख्या करीब 6 लाख है.

प्रवासी मजदूरों की बड़े पैमाने पर वापसी ने राज्य सरकारों के माथे पर शिकन ला दिया है. सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार सौमित्र रॉय कहते हैं, ‘‘जितने लोग गांव लौटे हैं, उनमें से बहुत सारे लोग अब वापस शहर नहीं जाना चाहेंगे.’’ ऐसे में, मनरेगा के तहत काम मांगने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है और राज्यों ने काम देना भी शुरू किया है. (देखें बॉक्स) ग्रामीण विकास मंत्रालय में मनरेगा के पूर्व सलाहकार मानस रंजन मिश्र कहते हैं, ‘‘राज्यों के सामने चुनौती यह है कि जो लोग पहले से मनरेगा में काम करते रहे हैं उनके साथ-साथ नए आए प्रवासी मजदूरों के लिए भी रोजगार सृजन करना होगा.’’

मनरेगा में काम देने वाले राज्यों में आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ अव्वल हैं. खास बात यह है कि लॉकडाउन की अवधि में जहां पूरे देश में बेरोजगारी की दर बढ़ी, छत्तीसगढ़ में यह पहले के मुकाबले कम हुई.

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) की रिपोर्ट में, अप्रैल में सूबे में बेरोजगारी की दर महज 3.4 फीसद रही, जो साल भर में न्यूनतम है. यह इसलिए भी सुखद है क्योंकि तब देशभर में बेरोजगारी की दर 23.5 फीसद के आसपास थी. असल में, छत्तीसगढ़ में लॉकडाउन की अवधि में राज्य सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए काम करना शुरू कर दिया था.

देशभर में मनरेगा के कुल कार्यों का करीबन एक-चौथाई हिस्सा सिर्फ छत्तीसगढ़ में हुआ और 18.5 लाख से अधिक मजदूरों को रोजगार मिला.

छत्तीसगढ़ के साथ ही राजस्थान ने भी इस पर ध्यान दिया और मनरेगा में काम करने वालों की संख्या में यहां दस गुना से अधिक बढ़ोतरी देखी गई.

इंडिया टुडे ई-कॉनक्लेव में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा, ‘‘राजस्थान में मनरेगा मजदूरों की संख्या पिछले कुछ हफ्तों में एक लाख से बढ़कर 12 लाख हो गई है. हम चाहते हैं कि यह और बढ़कर 30 लाख तक हो जाए.’’

महाराष्ट्र में मनरेगा के तहत काम की तलाश करने वाले मजदूरों की गिनती में भी इजाफा हुआ है. 12 अप्रैल को सूबे में 40,000 लोग मनरेगा में काम कर रहे थे, पर 5 मई को यह संख्या बढ़कर 3.60 लाख हो गई.

महाराष्ट्र के मनरेगा कमिशनर अमगोथू श्रीरंगा नाइक कहते हैं, ‘‘राज्य के 26 जिलों में तेजी से काम चल रहा है, पर गढ़चिरौली, अमरावती, भंडारा, पालघर और बीड जैसे जिलों में ज्यादा काम हुआ है. आगे काम और कामगार, दोनों की संख्या और बढ़ेगी.’’

बिहार में भी अधिकतर पंचायतों में फिजिकलदूरी का ख्याल रखते हुए मनरेगा का काम शुरू हुआ है, पर अभी इसकी रक्रतार कम है. मनरेगा वेबसाइट के मुताबिक, 5 मई को सूबे के 90 फीसद पंचायतों में 7.50 लाख लोग काम में जुटे थे.

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने वापस आए प्रवासी मजदूरों को रोजगार मुहैया कराने के लिए दैनिक कार्यदिवसों की संख्या मौजूदा 5 लाख (27 अप्रैल तक) से दोगुना बढ़ाकर 10 लाख करने के निर्देश दिए. ओडिशा के स्पेशल रिलीफ कमिशनर प्रदीप जेना कहते हैं, ‘‘अभी 7.50 लाख मानव दिवसों का काम हो रहा है. जरूरत पड़ी तो इसे और बढ़ाएंगे. अभी लॉकडाउन की वजह से काम कम हो पा रहा है, पर आगे इसमें प्रवासी मजदूरों को समायोजित किया जाएगा और कोई भी मजदूर बेरोजगार नहीं रहेगा.’’

ओडिशा सरकार की योजना इन मजदूरों को कृषि के साथ-साथ सड़क और सरकारी भवन निर्माण के कामों में लगाने की भी है. राज्य सरकार सूबे के बरगढ़, बलांगीर, नुआपाड़ा और कालाहांडी में एक साल में 200 दिनों का रोजगार देने की योजना पर भी काम कर रही है. एक अनुमान के मुताबिक, इन जिलों में घर लौटने वाले मजदूरों की संख्या ज्यादा है.

सिर्फ बलांगीर में ही 86,000 से अधिक लोग लौट आए हैं. मानस मिश्र कहते हैं, ‘‘घर लौटने के लिए सरकारी वेबसाइट पर पंजीकरण कराने वाले ओडिय़ा मजदूरों की गिनती 5.50 लाख बताई गई, पर वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक होने का अंदेशा है, क्योंकि इतनी संख्या बताने के बाद राज्य सरकार ने आंकड़े जारी करना बंद कर दिए और फिर पंजीकरण तो सिर्फ एंड्राएड फोन से हो रहा है. ऐसे में, जो मजदूर पहले ही पैदल चल पड़े हैं या जिनके पास एंड्राएड फोन नहीं है, वे तो गिनती से बाहर हैं.’’

बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों की घर वापसी से हलकान उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सांस देने के लिए मनरेगा का सहारा है. उत्तर प्रदेश के ग्रामीण विकास विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 5 मई को राज्य में 14.73 लाख मनरेगा मजदूर व्यक्तिगत और सामुदायिक कार्यों में लगे हुए थे. मनरेगा की यह गति उस समय है जब राज्य में कोरोना से अधिक प्रभावित 21 जिलों में काम नहीं के बराबर है. 20 अप्रैल को मनरेगा को छूट मिलने के बाद से कामकाज को रफ्तार दी गई. ग्रामीण विकास विभाग के प्रमुख सचिव मनोज कुमार सिंह कहते हैं, ‘‘अगले एक सप्ताह में मनरेगा के तहत और बड़ी तादाद में अधिक श्रमिकों को काम से जोड़ दिया जाएगा.’’

लॉकडाउन लागू होते समय राज्य में मनरेगा में 611 करोड़ रु. मजदूरी का बकाया था. पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश के बाद प्रदेश के 27 लाख परिवारों के खाते में यह बकाया राशि फौरन भेज दी गई.

मनोज सिंह बताते हैं, ‘‘जो प्रवासी मजदूर दूसरे राज्यों से ग्रामीण इलाकों में आए और जिनके पास जॉबकार्ड नहीं थे, ऐसे 25 हजार लोगों को फौरन जॉब कार्ड बनाकर दिया गया. जिनके पास जॉब कार्ड थे लेकिन नाम मस्टर रोल में नहीं था, ऐसे 15 हजार लोगों का नाम भी जोड़ा गया.’’ अब उत्तर प्रदेश सरकार का लक्ष्य 20 लाख लोगों को मनरेगा के तहत रोजगार देने का है.

ऐसे में लगता है कि मनरेगा ही देश की, खासकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की, डूबती नब्ज को थामे रखेगा. देश के कई राज्यों में मनरेगा के तहत काम मांगने वालों की संख्या बढ़ी है. त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, हरियाणा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में कई गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

पर मानस मिश्रा कहते हैं, ''आंकड़ों में जितने लोग काम मांगते दिख रहे हैं, वह वास्तविक संख्या से बेहद कम है क्योंकि काम मांगने वालों को सरकार दर्ज नहीं करना चाहती. असल में काम मांगने के बाद यदि सरकार रोजगार नहीं दे पाई तो उसमें भत्ते देने का प्रावधान भी है.’’

पहाड़-सी चुनौती

मनरेगा के सामने रोजगार सृजन की परीक्षा की घड़ी बेहद चुनौतीपूर्ण है, खासकर ऐसी स्थिति में जब रबी की कटाई अंतिम दौर में है और जून में खरीफ की बुआई का काम खत्म हो जाएगा. गांव लौट रहे प्रवासियों की संख्या भी काफी बड़ी है. पर यह संख्या कितनी बड़ी हो सकती है, केंद्र सरकार को इसका अंदाजा नहीं है. 5 मई को एक आरटीआइ के जवाब में मुख्य श्रम आयुक्त कार्यालय ने कहा कि लॉकडाउन में फंसे प्रवासी मजदूरों की कोई जानकारी उनके पास नहीं है.

जबकि, 8 अप्रैल को ही मुख्य श्रम आयुक्त कार्यालय ने एक सर्कुलर जारी करके 20 क्षेत्रीय कार्यालयों को तीन दिन में यह आंकड़ा जुटाने को कहा था. 2011 की जनगणना के आधार पर बात करें तो प्रवासी मजदूरों की संख्या देशभर में 45 करोड़ के आसपास है, जिनमें एक से दूसरे राज्य में जाने वाले मजदूर 5.6 करोड़ हैं. वहीं, भारत का आर्थिक सर्वेक्षण, 2017 बताता है कि 2011 से 2016 के बीच भारत में 90 लाख लोग सालाना पलायन का शिकार हुए हैं.

जानकारों का कहना है कि गांव लौटने वाले प्रवासी मजदूरों की संख्या को लेकर सरकार भ्रम में है और यह सरकारी अनुमानों से कहीं अधिक है. यह संख्या 15 से 20 लाख के बीच है. तो क्या मनरेगा इतने लोगों के लिए रोजगार सृजित कर सकता है? मोदी सरकार में मनरेगा का प्रदर्शन देखें तो इस पर शक होता है. अप्रैल, 2020 में इस योजना के तहत रोजगार सृजन का आंकड़ा पिछले सात वर्षों में सबसे कम रहा (देखें बॉक्स). इस वर्ष पूरे अप्रैल में (29 अप्रैल तक) सिर्फ 3.08 करोड़ रोजगार (मानव दिवस) सृजित किए जा सके थे, जबकि पिछले वित्त वर्ष में इसी अवधि में 27.3 करोड़ रोजगार सृजित किए गए थे.

मजदूरों की संख्या के हिसाब से कहा जाए, तो अप्रैल के आखिर तक 30 लाख लोगों को ही मनरेगा में रोजगार मिला जो कुल पंजीकृत जॉब कार्ड का महज 17 फीसद ही है.

अप्रैल के दूसरे हफ्ते तक, कुल पंजीकृत लोगों के महज 1 फीसद लोगों को काम मिला था, पर इसकी वजह जाहिर है, देशभर में लागू लॉकडाउन था. इसलिए इन आंकड़ों को दूसरी निगाह से देखना चाहिए और याद रखना चाहिए कि 15 अप्रैल से मनरेगा के काम को लॉकडाउन अवधि मे ढील दिए जाने के बाद से अगर पिछले साल की इसी अवधि से तुलना की जाए, तो भी यह करीब 78 फीसद कम है.

पर सौमित्र रॉय कहते हैं, ‘‘मनरेगा तो सौ दिन रोजगार देने की गारंटी की योजना थी. दिक्कत यह है कि लोगों को इससे औसतन 47 दिनों का ही रोजगार मिल पा रहा है.’’ वैसे, इस अप्रैल में आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ ने मनरेगा को तेजी दी तो दूसरी ओर ऐसे राज्य भी हैं जहां मनरेगा के कामकाज का आंकड़ा शून्य भी रहा. हरियाणा में इससे महज 1,005, केरल में 2,014 और गुजरात में 6,376 लोगों को ही रोजगार मिल पाया.

हालांकि, आंध्र प्रदेश मनरेगा के तहत काम देने में अव्वल रहा है और सूबे में दस लाख लोगों को काम मुहैया करवाया गया है. फिर भी, पिछले साल के 25 लाख लोगों के आंकड़े के मुकाबले यह काफी कम है. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (आइआइएम) अहमदाबाद में एसोसिएट प्रोफेसर और अर्थशास्त्री रीतिका खेड़ा कहती हैं, ‘‘मनरेगा से जुड़े परिवारों को अप्रैल माह के लिए कम से कम 10 दिन के काम का नकद पैसा देना चाहिए.’’ वे पूछती हैं, ''सरकार ने निजी क्षेत्र से अपने कर्मचारियों को तनख्वाह देने की अपील की है, क्या यही चीज सरकार को भी नहीं अपनानी चाहिए?’’ राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी यही मांग कर चुके हैं कि केंद्र सरकार को मनरेगा मजदूरों को लॉकडाउन की अवधि में भी भुगतान करना चाहिए, चाहे काम हुआ हो या नहीं.

पिछले दो दशकों में सूबे से बाहर गए प्रवासी कामगारों के लौटने से चिंतित पश्चिम बंगाल ने भी मनरेगा के तहत मानव दिवसों की संख्या बढ़ाने का आग्रह किया है. राज्य के पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी ने मीडिया से कहा, ‘‘मनरेगा योजना का आवंटन इस्तेमाल करने और रोजगार देने में पिछले चार साल में हम अव्वल राज्य रहे हैं. इस साल हमें 27 करोड़ मानव दिवस आवंटित हुए हैं. अधिक लोगों को रोजगार देने के लिए इसे बढ़ाना चाहिए.’’ राज्य के पूर्व श्रम मंत्री अनादि साहू इसके एक और आयाम की तरफ ध्यान दिलाते हैं.

उन्होंने कहा, ‘‘सिर्फ मानव दिवस बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा, क्योंकि सौ दिनों का रोजगार देने वाली इस योजना का फोकस तो सिंचाई और कृषि क्षेत्र है. इनके (वापस लौटे मजदूरों) पास उसमें काम करने का कौशल नहीं है. इसके लिए राज्य और केंद्र सरकार को नई परियोजनाएं शुरू करनी होगी ताकि इन मजदूरों को उनमें लगाया जा सके.’’ साहू ने एक खतरे की तरफ संकेत किया, ‘‘मजदूरों की संख्या इस तरह अचानक अधिक होने से खेती समेत हर जगह उनकी मजदूरी कम हो जाएगी. इससे इन मजदूरों के लिए समस्या बढ़ेगी ही.’’

यह मांग नाजायज भी नहीं लगती क्योंकि लॉकडाउन के दौरान धूल चाटती अर्थव्यवस्था में ग्रामीण इलाके ही मांग पैदा कर सकते हैं. इसका इल्म केंद्र सरकार को भी है. ऐसे में, ग्रामीण विकास और रोजगार मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने राज्यों के ग्रामीण विकास मंत्रियों के साथ एक बैठक वीडियो कॉन्फ्रेंसिग के जरिए की और मनरेगा के तहत जल संरक्षण, भूजल रिचार्ज और सिंचाई के कामों पर जोर दिया. तोमर ने कहा, ‘‘मंत्रालय ने मौजूदा वित्त वर्ष में 20,624 करोड़ रु. जारी कर दिए हैं, ताकि पिछले साल की बकाया मजदूरी और सामान की कीमत चुकाई जा सके. आवंटित राशि इस साल जून तक के मनरेगा के खर्चों के लिए पर्याप्त है.’’ तोमर ने राज्यों से कहा कि वे अपने यहां ग्रामीण विकास योजनाओं को तेजी से लागू करें ताकि रोजगार पैदा हो सके.

उम्मीदों का इम्तिहान

क्या ग्रामीण इलाकों में लौट आए लोगों के हुजूम को रोजगार देने की मनरेगा जैसी योजना में कूव्वत है? रॉय दो-टूक जवाब देते हैं, ‘‘नहीं.’’ मनरेगा की वेबसाइट बताती है कि इसने औसतन 5 करोड़ परिवारों (हाउसहोल्ड) को सालाना रोजगार मुहैया कराए हैं और पिछले करीब पांच साल में लगभग 7 से 8 करोड़ लोगों ने मनरेगा में काम किया है.

मौजूदा वित्त वर्ष के लिए केंद्र सरकार ने 280.76 करोड़ मानव दिवस सृजित करने का का लेबर बजट लक्ष्य रखा है. मानव दिवस किसी खास काम की इकाइयों को पूरा करने में लगने वाले श्रम के घंटे होते हैं. पर दिक्कत यह है कि पिछले साल की तुलना में यह महज डेढ़ फीसद ही ज्यादा है. पिछले साल प्रति व्यक्ति लागत करीब 258.41 रु. थी, इससे इस साल की लागत का भी अंदाजा लगाया जा सकता है (क्योंकि यह अभी तक तय नहीं किया गया है).

फरवरी में पेश किए बजट में मनरेगा के लिए 61,500 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे, जो 2019-20 के संशोधित अनुमान से 13 फीसद कम है. मतलब साफ है: प्रवासी मजदूरों को रोजगार दिलाने और गांव में मांग बढ़ाने के लिहाज से मनरेगा का यह आवंटन अपर्याप्त है. लिहाजा, जानकार मानते हैं कि इस साल मनरेगा के बजट में 15,000-20,000 करोड़ रु. की बढ़ोतरी करनी चाहिए.

ऐसे में, 1 मई को रीतिका खेड़ा, ज्यां द्रेज, योगेंद्र यादव, निखिल डे और अरुणा रॉय जैसी आर्थिक और सामाजिक कार्यकर्ताओंकी 35 लोगों की टोली ने केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री को इस बारे में एक पत्र लिखा, जिसमें गांव लौटे प्रवासी मजदूरों के रोजगार के संदर्भ में कई मांगें और सुझाव थे. इस पत्र में अगले तीन महीने तक मनरेगा का बजट एक लाख करोड़ रुपए बढ़ाने, ग्राम पंचायतों को राशि एडवांस में जारी करने, बिना जॉब कार्ड वालों को भी रोजगार देने, घर के एक व्यक्ति की जगह जो भी काम करना चाहे उनको काम देने और भुगतान को आसान करने जैसी मांगे थीं.

सौमित्र रॉय इसमें एक मांग और जोड़ते हैं. वे कहते हैं, ‘‘मनरेगा इस संकट से निपटने में तभी कारगर होगा, अगर कम से कम 200 दिनों का काम दिया जाए, न्यूनतम मजदूरी बढ़े और मजदूरों को काम के बदले अनाज भी दिया जाए. साथ ही गांव के स्तर पर मनरेगा से जुड़े भूमिहीनों को सामुदायिक जमीन पर खेती करने के लिए 5 साल का पट्टा भी दिया जाना चाहिए.’’

हालांकि, एक समस्या यह भी है कि प्रवासी मजदूरों में सभी लोग गांव ही नहीं लौटेंगे, उनमें से बहुत बड़ी संख्या छोटे शहरों और कस्बों में लौटने वाले लोगों की भी होगी. सरकार को उनके लिए भी रोजगार का कुछ उपाय करना चाहिए. सौमित्र रॉय कहते हैं, ‘‘सरकार को छोटे और मंझोले उद्योगों के लिए कोई उपाय, कोई राहत का काम करना चाहिए.’’

असल में, गांव लौट गए प्रवासी मजदूरों का संकट तो और अधिक तब गहराएगा जब खेती से जुड़े कामकाज अगले तीन महीनों के बाद खत्म हो जाएंगे. मनरेगा रोजगार के मामले में शायद मददगार हो, पर अभी तो यूपी को छोड़कर मनरेगा की टेक लेने वाले अधिकतर राज्य कांग्रेसशासित ही हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने भले ही मनरेगा को ‘कांग्रेस के शासन की विफलता का स्मारक’ बताया था, पर इस संकटकाल में अगर मुकेश जैसे लोगों को काम देकर मनरेगा को असरदार ढंग से लागू किया गया तो यह ग्रामीण भारत के कामगार तबके को न सिर्फ आजीविका का आधार देगा, बल्कि वहां अर्थव्यवस्था को भी गति मिल पाएगी. बुरे वक्त में अपनाया गया लचीला रुख विफलता के स्मारकों को सफलता के शिलालेख में तब्दील कर सकता है.

—साथ में, संध्या द्विवेदी, आशीष मिश्र, महेश शर्मा, नवीन कुमार और संतोष पाठक

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