वर्चुअल कोर्टः न्याय का नया दौर
लॉकडाउन के दौरान देश की न्यायपालिका ने लाइव वीडियो सुनवाई से तकनीक के दौर में कदम रखा लेकिन लॉकडाउन खुलने के बाद अदालतों के सामने सोशल डिस्टेंसिंग और सीमित विकल्पों के साथ न्याय देने की चुनौती बरकरार रहेगी

केरल हाइकोर्ट के जस्टिस ए.के. जयशंकरन नांबियार ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से अपनी पहली सुनवाई का तजुर्बा कुछ यूं बताया, ''ये प्लेस्कूल में पहले दिन जाने जैसा अनुभव था. बहुत सारी आवाजें आ रही थीं. हालांकि 10 मिनट में सभी चीजें नियंत्रण में आ गई. हमने लोगों को समझाया कि उन्हें माइक्रोफोन के साथ किस तरह पेश आना है. वकीलों ने बहुत तेजी से पूरा सिस्टम समझा और जब सबके माइक्रोफोन बंद हो गए तो माहौल बिल्कुल ओपन कोर्ट जैसा हो गया. ये सब कुछ बहुत तेजी से हुआ और वकील भी हैरान थे कि इतनी जल्दी सुनवाई और ऑर्डर तक आ गया.'' जस्टिस नांबियार ने ये बातें 23 अप्रैल को दक्ष नामक संगठन के एक वेबिनार में बताईं. जाहिर है कि अदालतों ने बड़ी तेजी से नए दौर में प्रवेश कर लिया. कोरोना लॉकडाउन के दौरान अदालतें प्रक्रिया बदलने पर मजबूर हुईं.
हालांकि अभी सिर्फ बेहद आवश्यक मामलों की सुनवाई हो रही है. सवाल यह है कि क्या रुटीन मामलों की सुनवाई भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से होगी या नियमित अदालतें बैठेंगी? सुप्रीम कोर्ट लॉकडाउन शुरू होने के दौरान ही निचली अदालतों तक में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई और सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल रखने के निर्देश जारी कर चुका है. राज्यों की निचली अदालतों के लिए नियम बनाने की जिम्मेदारी हाइकोर्टों पर है. कोरोना खत्म होने के आसार नहीं दिखते, ऐसे में सवाल यह है कि देश के 39 हाइकोर्ट परिसरों और 3,219 निचली अदालतों में आखिर न्याय की प्रक्रिया लॉकडाउन के बाद कैसे चलेगी?
ओडिशा के एडवोकेट जनरल अशोक कुमार परीजा ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा, ''वर्चुअल कोर्ट निर्विवाद रूप से वक्त की मांग है. कोरोना काल में इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है. बार काउंसिल कहती है लॉकडाउन के बाद वर्चुअल कोर्ट नहीं चलना चाहिए. हालांकि पहले लोग सोचते थे कि वर्चुअल कोर्ट किताबी बात है पर अचानक ही अमल में आ गई. कोरोना से तीन महीने पहले कभी कोई बोलता कि सुप्रीम कोर्ट में वर्चुअल कोर्ट होगा तो हम कहते थे ये हो ही नहीं पाएगा. अब यह हाइकोर्ट तक आ गया है. यह जल्द ही लोअर कोर्ट तक जाएगा. नई पीढ़ी टेक सेवी है. चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी स्मार्टफोन फ्रेंड्ली हो गया है. तकनीक को मजबूत करना होगा, बैंडविड्थ बढ़ानी होगी.''
उधर, देश के 19 लाख वकीलों में से सक्रिय 16.5 लाख वकीलों का तकनीक में हाथ तंग है. वकीलों की सर्वोच्च संस्था बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्र कहते हैं, ''यह एकदम से नहीं हो सकता. इसके लिए ट्रेनिंग की जरूरत है.'' मिश्र के मुताबिक, देश के 90 फीसद वकील और जज तकनीक से अनभिज्ञ हैं और इसकी बारीकियां नहीं जानते हैं. हालांकि वे हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई और ई-फाइलिंग जैसी सेवाओं का स्वागत करते हैं लेकिन इनके सिर्फ अर्जेंट मैटर में इस्तेमाल के हिमायती हैं.
रेगुलर कोर्ट में भीड़ बड़ी चुनौती है. सीनियर एडवोकेट और मानसरोवर एडवोकेट्स क्लब ट्रस्ट के अध्यक्ष सुधीर कुमार तिवारी कहते हैं कि यह साल इसी तरह से गुजरेगा. वे कहते हैं, ''वकील इस बात से आशंकित हैं कि उनके पास आया शख्स क्लाइंट है या मौत है. कोर्ट खुलेंगे तो भीड़ वकील ही पैदा कर देंगे. सोशल डिस्टेंसिंग कायम रख पाना बहुत मुश्किल होगा.''
56 साल से प्रैक्टिस कर रहे झारखंड हाइकोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रेम चंद त्रिपाठी मानते हैं कि पूरे झारखंड में वर्चुअल कोर्ट होना अभी तो बहुत मुश्किल है. नाम मात्र के वकील इसके एक्सपर्ट हैं. त्रिपाठी कहते हैं, ''प्रदेश में बहुत सारे वकील गरीब हैं. सभी वकीलों के पास लैपटॉप और यहां तक कि स्मार्ट फोन तक नहीं है. न्याय के लिए न्यायाधीशों को ओपन कोर्ट में डिस्टेंस मेंटेन करते हुए ओपन कोर्ट एक सीमित समय के लिए तो खोलना ही चाहिए.
वर्चुअल कोर्ट कोई नकारात्मक चीज नहीं है लेकिन उसके लिए न्यायपालिका को तैयार करने की जरूरत है. झारखंड के 32 हजार वकीलों के कामकाज में रातोरात बदलाव मुमकिन नहीं है. इसकी ट्रेनिंग होनी चाहिए. बिजली, इंटरनेट और फोन नेटवर्क दुरुस्त किए बगैर निचली अदालतों में तकनीक का इस्तेमाल कर पाना संभव नहीं है.''
लखनऊ हाइकोर्ट की वकील रंजना अग्निहोत्री भी कहती हैं, ''कोई विकल्प नहीं है इसलिए वर्चुअल कोर्ट लग रहे हैं. इसमें बुनियादी मुश्किलें काफी हैं. अर्जेंट केस के लिए ई-फाइलिंग हो रही है जो काफी पेचीदा प्रक्रिया है. ऐसे में अगर तत्काल सुनवाई की अर्जी खारिज होती है तो सारी मेहनत भी बर्बाद हो जाती है.
जो वकील 50 साल से ज्यादा उम्र के हैं वे तो कंप्यूटर के मामले में काफी कमजोर हैं. तीस साल वाले वकील तेज हैं. जजों को भी दिक्कत हो रही है. अनेक वकीलों के पास सिस्टम ही नहीं हैं, अगर वे मोबाइल से सुनवाई में हिस्सा बनते हैं और बीच में कोई फोन आ गया तो जिरह वहीं खत्म होने की आशंका रहती है.
जिसके पास लैपटॉप और ब्राडबैंड के साथ इनके इस्तेमाल की जानकारी है, उनके लिए तो यह ठीक है. पर जो वकील जूनियर्स, मुंशियों और क्लर्कों के सहारे हैं, उनके लिए मुश्किल.''
उम्र के लिहाज से वकीलों की समस्या को और स्पष्ट करते हैं फरवरी में रिटायर हुए ओडिशा हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के.एस. जावेरी. वे कहते हैं, ''1970 से पहले जन्मे वकील तकनीक का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें कंप्यूटर से एलर्जी है. जो इसके बाद पैदा हुए हैं वे कंप्यूटर के इस्तेमाल का प्रयास कर रहे हैं. 1985 के बाद पैदा हुए वकील पूरी तरह तकनीक का इस्तेमाल कर पा रहे हैं.
आज के ज्यादातर जज भी जब वकीलों के भाव पकड़ लेते हैं तो बात समझने में आसानी हो जाती है. जजों को भी वर्चुअल कोर्ट में परेशानी आती है क्योंकि इनमें से ज्यादातर की पैदाइश 1970 से पहले की है.''
कई वर्चुअल सुनवाई में हिस्सा बन चुके राजस्थान हाइकोर्ट के वकील हरिकिशन शर्मा इसकी हिमायत में कहते हैं, ''यह व्यवस्था आगे जा सकती है. इससे समय की बचत और पेपरलेस काम होता है. ऑनलाइन होने से सभी पक्षों के पास कॉपी रहती है और किसी तरह की लेटलतीफी नहीं होती. राजस्थान में गर्मी में मॉर्निंग कोर्ट सुबह 8.30 से 11 बजे तक लगते हैं.
अभी एक सुनवाई के लिए काफी कम समय दिया जा रहा है. हाइकोर्ट में पूरा इन्फ्रास्ट्रक्चर है. वकीलों के पास अगर लैपटाप या कंप्यूटर नहीं है तो भी उसका काम स्मार्टफोन से चल सकता है. बस उसे हमेशा इंटरनेट चालू रखना होगपर फोन पर फ्री रखे यानी कोई कॉल न करे.''
वकीलों और जजों के अलावा न्याय व्यवस्था का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है मुवक्किल. मुवक्किल की तसल्ली शायद फैसले से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होती है. क्लाइंट चाहता है कि वह जिरह सुने. वह जानना चाहता है कि वकील ने क्या सवाल किया, कौन-सी किताब कोर्ट में दिखाई. विरोधी वकील क्या कह रहा है और हमारे वकील ने क्या कहा. वकील कहते हैं कि वर्चुअल कोर्ट में माहौल नहीं बन पाता. अग्निहोत्री कहती हैं, ''हम जीतने के मकसद से नहीं बल्कि क्लाइंट की संतुष्टि के लिए लड़ते हैं. हारने के बाद भी अगर क्लाइंट संतुष्ट है तो वकील कामयाब है. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में अगर क्लाइंट को बैठा भी लिया जाए तो उसके लिए ये सब समझना आसान नहीं होगा. ओपन कोर्ट में क्लाइंट को जो संतुष्टि मिलती है वह वर्चुअल कोर्ट में नहीं है.''
दरअसल जो बात आमने-सामने की बहस में होती है वह वीडियो कॉलिंग में नहीं आ पाती है. समय की बचत और काम तेजी से होता है. हरिकिशन शर्मा कहते हैं, ''वर्चुअल सुनवाई में वकील अपनी पूरी बात नहीं कह पाता. वीडियो कॉलिंग में क्लाइंट को साथ न रखने से न्यायपालिका की पारदर्शिता पर असर पड़ेगा.
ओपन कोर्ट में क्लाइंट पास बनवाकर कोर्टरूम में आ जाता है. एक और समस्या समय की है. किसी वकील को पांच मिनट मिले पर वह पांच मिनट में जज को कैसे सारी बात बता सकता है. कोई नई रूलिंग आई तो किताब का हवाला देकर जज को वीडियो कॉलिंग से कैसे समझाएगा. ओपन कोर्ट में तो किताब ही सामने रख दी जाती है. जज कोर्ट में आते हैं. वर्चुअल कोर्ट में वकील को घर में भी पूरी ड्रेस में होना पड़ता है. एक दो घंटे बाद फैसला आ जाता है.''
कोरोना संकट के दौर में संक्रमण का खतरा सब पर है लेकिन अदालतों में सबके बचाव के तरीके समान नहीं हैं. अग्निहोत्री कहती हैं, ''हाइकोर्ट की लखनऊ बेंच में यहां जज साहब चैंबर में बैठते हैं और अपनी अलग लिफ्ट से आते-जाते हैं. लेकिन वकीलों और बाकी लोगों को तो कॉमन लिफ्ट से आना होगा. सोशल डिस्टेंसिंग के लिए चीफ जस्टिस और सरकार को मिलकर रास्ता निकालना होगा.''
सिविल कोर्ट में सोशल डिस्टेंसिंग फिलहाल संभव नहीं है. अदालत पब्लिक डीलिंग की जगह है. जज तो सामाजिक दूरी बना लेंगे. लेकिन वकील को डायस पर खड़ा होना है तो उनके साथ क्लर्क भी जाएगा और जूनियर भी. आरोपी को पुलिस लेकर आएगी उसकी तलाशी होगी और फिर उसे कठघरे में खड़ा किया जाएगा. निचली अदालतों में कमरे इतने बड़े नहीं हैं कि सामाजिक दूरी कायम रखी जा सके. मुकदमों का अंबार देखते हुए एक दिन में पांच-दस मामलों की सुनवाई होने का भी कोई अर्थ नहीं है.
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के मामले में जजों और वकीलों की सुविधाओं में भी बहुत फर्क है. जस्टिस जावेरी कहते हैं, ''जजों को यह सुविधा है कि वे इंजीनियर को बुलाएं और अपनी तकनीकी परेशानी दूर करा लें. लेकिन वकील अपने दफ्तर में इंजीनियर नहीं रख सकते. तालुका स्तर के अनेक वकील तो कंप्यूटर भी नहीं खरीद सकते हैं. वर्चुअल कोर्ट सिस्टम चरणबद्ध तरीके से योजना बनाकर ही लागू किया जा सकता है.''
वकीलों के रास्ते में तकनीकी दिक्कत बहुत बड़ी है. सुधीर कुमार तिवारी कहते हैं, ''दिल्ली की बात अलग है. पहले केवल टाइपिस्ट से काम चल जाता था लेकिन अब वैसा नहीं है. वकीलों को कॉमन वर्किग प्लेस बनाना होगा और जाहिर है कि वह किसी वकील का ऑफिस ही होगा. वहीं से कम साधन वाले वकील भुगतान कर ई-फाइलिंग से लेकर तकनीक से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग तक की सुविधाएं ले सकेंगे.''
परीजा कहते हैं, ''निचली अदालतों को भी यह अपनाना होगा. वर्चुअल कोर्ट की जो कमियां हैं वे दूर की जाएंगी. प्रोफेशन और सोशल डिस्टेंसिंग को बैलेंस करने का सबसे बढिय़ा तरीका वर्चुअल कोर्ट है. ये कोरोना के बाद भी जारी रहेंगे. अभी यह मजबूरी है और बाद में वैकल्पिक हो सकता है. कोरोना की वैक्सीन आए बगैर रेगुलर कोर्ट खोलना अव्यवस्था को न्योता देना होगा.'' न्यायिक क्षेत्र में काम करने वाले संगठन दक्ष के प्रोग्राम डायरेक्टर सूर्यप्रकाश बी.एस. कहते हैं कि लॉकडाउन के बाद निचली अदालतों में काम सुचारू करने का सबसे बढिय़ा तरीका यह है कि मुकदमों की नए सिरे से सूची बनाई जाए और जो पक्ष आ सकने में समर्थ हों उनके ही मुकदमे नियमित सुनवाई में शामिल किए जाएं. निचली अदालतों में वर्चुअल कोर्ट शुरू करने का यह सबसे बढिय़ा मौका है.
इस मामले में दूसरे देशों के उदाहरण भी देखना चाहिए. दुनिया के 23 देशों की सर्वोच्च अदालतों ने वर्चुअल कोर्ट शरू किए. अमेरिका में तो फोन से सुनवाई भी शुरू हो गई है. लॉकडाउन में इटली, जर्मनी में ज्यादातर वक्त कोर्ट की कार्रवाई नहीं हुई. अमेरिका में 2003 में ज्यादातर जिला अदालतें और फेडरल कोर्ट ऑडियो-वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा से लैस हो गई थीं और ई-फाइलिंग भी शुरू हो गई थी. लॉकडाउन के दौरान भारत के सुप्रीम कोर्ट ने कामकाज के मामले में अन्य सर्वोच्च न्यायालयों को काफी पीछे छोड़ दिया है. लेकिन चुनौती निचली अदालतों का कामकाज सुचारू करने की है. जस्टिस नांबियार कहते हैं, ''वर्चुअल कोर्ट लॉकडाउन के बाद भी जारी रहेंगे. यह बदलाव महज माइंडसेट का मामला है कि हम इसे कब अपनाते हैं.''
डिजिटल लिट्रेसी आंकड़े चाहे जो हों पर गांव-गांव से लोग टिक-टॉक पर वीडियो डाल रहे हैं और वीडियो कॉल भी कर रहे हैं. वर्चुअल कोर्ट में वीडियो कॉल में शामिल होने में इससे से ज्यादा का तकनीकी ज्ञान नहीं लगता. ई-फाइलिंग पेचीदा प्रक्रिया है और इसके लिए वकीलों को पैसे खर्च करने पड़ेंगे. लेकिन कोर्ट में सरकारी एजेंसियों के भरोसे तकनीकी इन्फ्रास्ट्रक्चर लगाने-चलाने के अनुभव उत्साहजनक नहीं रहे हैं. इसके लिए निजी क्षेत्र की मदद लेनी पड़ेगी, ठीक उसी तरह जैसे पासपोर्ट के काम में ली गई है.
बहरहाल, वायरस से बचने और जिंदगी चलाने के लिए आहिस्ता ही सही न्यायिक सिस्टम रास्ता खुद निकाल लेगा.