घर में घुसा वायरस

घरेलू हिंसा का शिकार महिलाओं के लिए तो यह महामारी जैसे कयामत बनकर आई है. राहत का कोई रास्ता न बनता देख मानवाधिकार कार्यकर्ता, पीड़िताओं की मनोदशा पर पड़ने वाले इसके असर को लेकर खासे चिंतित हैं.

इलस्ट्रेशनः नीलांजन दास
इलस्ट्रेशनः नीलांजन दास

कमलिनी* के लिए कोविड-19 का फैलाव रोकने की खातिर लगाए गए लॉकडाउन से बुरा वक्त और कोई नहीं हो सकता. यही कोई 10 साल तक दांपत्य जीवन में जिल्लत झेलने के बाद, आखिरकार उसने तलाक की प्रक्रिया शुरू करने को एक वकील से बात करने की हिम्मत जुटाई. कोलकाता के बाहरी इलाके में महिला छात्रावास अधीक्षक के रूप में उसने नौकरी का भी जुगाड़ कर लिया था. जिंदगी में आजादी का स्वाद वह चखने ही वाली थी कि तभी उसकी सावधानीपूर्वक बनाई गई योजना भी कोरोना वायरस की वजह से ठहर गई. मामला और बदतर हो गया जब उसकी इस योजना के बारे में पति को खबर लगी. उसके बाद जो हुआ, वह शारीरिक और मानसिक स्तर पर तोड़ देने वाला था.

प्रताड़ना के बारे में कहीं भी मुंह खोलने पर पति ने जान से मारने की धमकी दी. उसका मोबाइल फोन जब्त कर लिया गया और घर का इंटरनेट कनेक्शन काट दिया गया. किसी तरह वह लैंडलाइन से 'स्वयं' के हेल्पलाइन नंबर पर फोन करने में कामयाब रही. लेकिन जब हिंसा पीड़ित महिलाओं और बच्चों की मदद करने वाली संस्था ने मदद की पेशकश की, तो उसने कहा कि वह माता-पिता के लिए शर्मिंदगी का कारण नहीं बन सकती. उसने यह भी कहा कि वह कहीं नहीं जा सकती. मौजूदा समय में संसाधनों की कमी के कारण 'स्वयं' ने भी इस मामले पर ध्यान नहीं दिया.

स्वयं की संस्थापक-निदेशक अनुराधा कपूर का कहना है, ''राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान घरेलू दुर्व्यवहार के मामलों में शहरी क्षेत्र में 33 फीसद और ग्रामीण क्षेत्रों में 20 फीसद की बढ़ोतरी हुई है. लेकिन यह एक मोटा आकलन है, जो संकटकालीन फोन और ईमेल पर आधारित है. ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में महिलाओं की मौजूदगी को देखते हुए यकीनन यह तादाद बहुत ज्यादा होगी. उन महिलाओं की न तो इंटरनेट तक पहुंच है और न ही फोन को रिचार्ज करने के लिए पैसे हैं.'' राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्लू) की रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू हिंसा लगभग दोगुनी हो गई है. यदि जनवरी और फरवरी में क्रमश: 300 और 280 मामले दर्ज किए गए, तो मार्च के अंतिम सप्ताह में मात्र आठ दिनों में ही 250 मामले दर्ज किए गए. पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में लॉकडाउन के दौरान घरेलू अत्याचार और यहां तक कि वैवाहिक बलात्कार के मामलों में बड़ी वृद्धि दर्ज की गई है.

लॉकडाउन मजबूत रिश्तों को परख रहा है. महिलाओं के जिम्मे रहने वाले घरेलू कामों को लेकर छोटे-मोटे वाद-विवाद विस्फोटक बन रहे हैं और कुछ मामलों में हिंसा में तब्दील हो रहे हैं. जैसा कि मनोवैज्ञानिक सलाहकार अनुपमा बनर्जी कहती हैं, जिस तरह महिला अधिकार संगठनों के पास आने वाले व्यथित और घबराई महिलाओं के फोन कॉल में तेजी आ रही है, उसे देखकर लगता है कि अधिकतर विवाह और संबंध भुरभुरी जमीन पर टिके हैं. बनर्जी कहती हैं, ''रिश्ते टूट रहे हैं और लॉकडाउन समाप्त हो जाने के बाद बहुत से ब्रेक-अप दिख सकते हैं. कई लोग अपने रिश्तों पर नए सिरे से सोच रहे हैं.''

मुंबई की 42 वर्षीय ग्राफिक डिजाइनर पी. श्रीकला* लॉकडाउन में असंवेदनशील पति के साथ घर पर रहने के कारण नर्वस ब्रेकडाउन के कगार पर आ गईं. वे कहती हैं, ''लॉकडाउन में एक पखवाड़े तक रहने के बाद मुझे महसूस हुआ कि अब मैं और दुर्व्यवहार बर्दाश्त नहीं कर सकती. मेरे पति का व्यवसाय अच्छा नहीं चल रहा है और वे इसका गुस्सा मेरे ऊपर निकाल रहे हैं, खाने और हर छोटी-छोटी बात पर नखरे दिखा रहे हैं. मेरा काम पीछे छूट गया है, क्योंकि मुझे दिन भर उनकी और उनकी मां की खाने की फरमाइशों को पूरा करना है. मेरे पति ने किराने का सामान और दूध के लिए पैसे देना बंद कर दिया है और घर का सारा आर्थिक बोझ मुझ पर डाल दिया है. जब मैंने यह समझाने की कोशिश की कि मुझे अभी इतना काम नहीं मिल पा रहा है, तो उसने गर्म चाय ऊपर फेंक दी, जिससे मेरी त्वचा जल गई. उसके बाद मैं उससे इतना डर गई कि उसे जब भी देखती थी, मेरे हाथ कांपने लगते थे. आखिरकार जब मैंने पुलिस को बुलाकर मदद लेने की हिम्मत जुटाई, तो अधिकारी ने सख्त चेतावनी दी. मेरे दो बच्चे हैं और मैं नहीं चाहती कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद मैं शादी से अलग हो जाऊं,'' वे कहती हैं. उसका पति फिलहाल खामोश है, लेकिन श्रीकला को उस तूफान का डर है, जो ऐसी असहज शांति के बाद आ सकता है.

कुछ के लिए दुर्व्यवहार बहुत हल्का होता है, पर फिर भी वह जबानी रूप से अपमानजनक और उतना ही खतरनाक होता है. कोलकाता में रहने वाली जानकी* कहती हैं, ''चूंकि मैं एक गृहिणी हूं और मुझे घर से काम नहीं करना पड़ता, (मेरे पति) को लगता है कि मेरे पास कम काम है और मैं खूब मजे करती हूं. वह हर तरह का घरेलू काम मेरे ऊपर थोप देता है. ऐसा लगता है कि घरेलू काम कभी खत्म नहीं होने वाला है. इसके अलावा, जब वह देर तक काम करता है, तो ऐसी अपेक्षा रखता है कि मैं भी जागती रहूं और उसके इशारे पर नाचूं. वह हमेशा मुझे बुलाता रहता है.'' महिलाओं को दबाव में फंसे देखना भी अपमानित करने वालों को उसे अपमानित करने का एक और कारण देता है. बनर्जी कहती हैं, ''लॉकडाउन और उससे पैदा हुई कठिनाई भी इसमें मदद करती है, वास्तव में यह हिंसा करने वालों को ऐसा करने का आत्मविश्वास देती है.''

विडंबना यह है कि पीड़ित महिलाओं को अपने खिलाफ गुनाह करने वालों को यह लॉकडाउन एक और मौका देने की खातिर बहुत अधिक धैर्य रखने के लिए प्रेरित करता है.

अर्थव्यवस्था को लेकर उनकी आशंका और अनिश्चितता, उनकी अपनी वित्तीय स्थिति और सामाजिक जीवन इसके कुछ कारण हैं. मनोवैज्ञानिक और मुंबई में एक्वपावर सेंटर में आउटरीच एसोसिएट दिशा देसाई कहती हैं कि कुछ मामलों में पति एक बहाने के रूप में कोविड-19 का इस्तेमाल करते हुए अपनी शारीरिक आक्रामकता और मौखिक तेवरों को सही ठहरा रहे हैं और महिलाएं इस पर विश्वास कर स्वयं को भ्रमित कर रही हैं. हालांकि इन सबसे ज्यादा चिंता की बात महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर है. कपूर को डर है कि ''इतने लंबे समय के लिए धीरज बस उन्हें कगार पर ही ले जा सकता है और अगर वे लंबे समय तक समस्याओं को दूर करने और साझा करने में असमर्थ हैं तो इससे उन्हें गंभीर क्षति हो सकती है.''

यह जरूरी नहीं कि दुर्व्यवहार की शिकायतें केवल पति-पत्नी संबंधों या लिव इन पार्टनर के बीच तक ही केंद्रित हों. ''ऐसी शिकायतें 18 से 30 वर्ष की महिलाओं की तरफ से आ रही हैं, चाहे वे शादीशुदा हों या नहीं. उनका अपमान करने वाले भाई, पिता, बहनोई यहां तक कि ग्राम प्रधान भी हो सकते हैं. मानसिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता रत्नाबली राय के मुताबिक, 16 साल और 18 साल की युवा लड़कियों को सगाई करने के लिए मजबूर किया जा रहा है. ताकि लॉकडाउन खत्म होने के बाद उपलब्ध शुरुआती तारीख में उनकी शादी हो सके. इनमें से ज्यादातर मामलों में, दबाव शायद घर के पुरुषों की ओर से आ रहा है, क्योंकि वे अर्थव्यवस्था पर कोविड-19 के भावी प्रभाव-वेतन में कटौती और नौकरियों के नुकसान को लेकर चिंतित हैं.''

निम्न और मध्यम आय वर्ग में भी पुरुषों की तरफ से महिलाओं को छोड़ दिए जाने के मामले भी सामने आए हैं, क्योंकि वे मुश्किल समय को अपनी जिम्मेदारियों से छुटकारा पाने के बहाने के रूप में देखते हैं.

मुंबई में घरों में अंशकालिक रूप से काम करने वाली अश्विनी* एक दु:स्वप्न की तरह याद करते हुए कहती हैं कि कैसे लॉकडाउन के दौरान उसे दस बजे रात को उसके घर से बाहर निकाल दिया गया था. अश्विनी कहती हैं, ''झगड़े के बाद मुझे घर से निकाल दिया गया. मेरे पास न कोई पैसा था और न ही फोन. सुनसान सड़क पर चलने में मुझे डर लगता था. मैं बसस्टॉप पर बैठ गई, तब एक गश्त लगाने वाली पुलिस वैन मुझे घर ले आई और मेरे पति को धमकी दी कि अगर उसने फिर से मुझ पर हाथ उठाया तो उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा. उसके पास मुझे घर में रखने के अलावा कोई चारा नहीं था. मैं डरी हुई हूं. वह शराब पीता है और शराब नहीं मिलने पर वह बेचैन हो जाता है और अपनी निराशा मुझ पर उतारता है.''

किसी राहत की संभावना न देख लॉकडाउन का संभावित विस्तार पीड़िताओं के दिलों में केवल भय पैदा करने वाला है. घर उनके लिए सुरक्षित स्वर्ग नहीं है.

(आग्रह पर पीडि़ताओं के नाम बदल दिए गए हैं)

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