मनोरोग भी हुए वायरल
मरीजों की तादाद में हालिया बढ़ोतरी के साथ मानसिक रुग्णता अब साफ तौर पर भारत की तेजी से बढ़ती दूसरी महामारी है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च को राष्ट्रव्यापी पूर्णबंदी का ऐलान क्या किया कि उसके चार दिन बाद प्रीति बोरकर बिस्तर से बाहर निकली ही नहीं. मुंबई की 46 वर्षीय अंग्रेजी शिक्षिका का न कुछ खाने का मन करता है और न किसी से बात करने का. वे कहती हैं, ''जब से मैंने सुना कि कोविड-19 भारत पहुंच गया है, मुझे दहशत के दौरे पड़ने लगे. मेरे लिए सांस लेना मुश्किल हो रहा था लिहाजा मैंने सोचा कि मैं संक्रमित हो गई हूं.
मैं सोचती रही कि मेरे परिवार में कोई संक्रमित हो गया तो क्या होगा; हमें किसी अस्पताल में गंदे बिस्तर पर डाल दिया जाएगा और मैं मरने के लिए अकेली रह जाऊंगी.'' वे कल्पना करने लगीं कि उन्हें बुखार है और उनका गला खराब है. साल 2005 से ही अवसाद का इलाज करवा रही बोरकर जानती थीं कि उन्हें डॉक्टरी सलाह की जरूरत है. वे मनोचिकित्सक के पास गईं और दवाई से उनके लक्षण चले गए.
मुंबई के डॉ एल.एच. हीरानंदानी अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ हरीश शेट्टी को लगता है कि कोविड-19 बोरकर सरीखे लोगों के लिए जो पहले से मानसिक स्वास्थ्य विकारों से ग्रस्त हैं, खासतौर पर मुश्किल हो सकता है. वे कहते हैं, ''अचानक सदमे, मौत के डर या परिवार से बिछुड़ने का एहसास होता है.'' लॉकडाउन के कुछ हफ्तों बाद अब ऐसे प्रमाण हैं कि 'स्वस्थ' लोगों में भी चिंता और अवसाद के लक्षण दिख रहे हैं.
व्यवस्था के लिए झटका
बेंगलूरू स्थित राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान (एनआइएमएचएएनएस) ने भारत में मानसिक स्वास्थ्य के परिदृश्य का आखिरी सर्वे 2015-16 में करने का जतन किया था. उसके नतीजों के मुताबिक, भारत की 13.7 फीसद आबादी मानसिक बीमारी से ग्रस्त थी. जहां 3 करोड़ लोगों की देश में मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था के आधारभूत ढांचे तक पहुंच थी, वहीं 12 करोड़ लोग उपेक्षित रह गए थे.
भारत में मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग हमेशा उनकी सुलभता से कहीं ज्यादा रही है. मानसिक रोगों के डॉक्टर देश में वैसे भी बहुत कम हैं. कोविड-19 ने हमारे मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था के संकट को उजागर करके बढ़ा दिया है. लॉकडाउन के एक हफ्ते बाद इंडियन साइक्रिएट्री सोसायटी ने देश में मानसिक तौर पर रुग्ण आबादी के बढ़कर 20 फीसद हो जाने का अनुमान लगाया. अगर यह सच है तो हमें एक और ज्यादा तेजी से बढ़ती महामारी से लड़ना होगा.
मनोचिकित्सक डॉ अनिरुद्ध देब बताते हैं कि भारत में ''मनोरोग से ग्रस्त आबादी के लिए बहुसंख्यक सेवाएं गैर-सरकारी स्रोतों से प्रदान की जाती हैं.'' पश्चिम बंगाल में इस कमी को पूरा करने की खातिर डॉ. देब कोलकाता में मनोरोगों का एक नर्सिंग होम 'मोन' (मन को बंगाली में ऐसे ही बोला जाता है) चलाने में मदद करते हैं. लॉकडाउन के कुछ ही दिनों के भीतर डॉ. देब और उनके साथियों ने अस्पताल में भर्ती करके इलाज की सेवा बंद कर दी.
डॉ. देव बताते हैं, ''आमतौर पर हमारे पास नौ से 10 मरीज ही होते हैं, पर उनकी देखभाल के लिए हमें करीब 25 स्टाफ की जरूरत होती है. उन सभी के लिए खाना ला पाना नामुमकिन हो गया था. फिर दिमागी मरीजों को शारीरिक दूरी और हाथ धोने की अहमियत समझा पाना भी बहुत मुश्किल होता है. कई बार करीबी संपर्क के बगैर मरीज को संभालना भी दूभर हो जाता है.'' मोन के नौ मनोचिकित्सकों और छह मनोवैज्ञानिकों ने अपने मरीजों की देखभाल का जिम्मा परिवारों और रिश्तेदारों को सौंप दिया, वहीं वे खुद बहुत कम स्टाफ के साथ आपात सेवाएं चला रहे हैं और दिन में पांच से आठ कॉल का जवाब दे रहे हैं.
डर और नफरत
कोलकाता में रहने वाली फ्रीलांस ग्राफिक आर्टिस्ट 35 वर्षीय तनिका मजूमदार बत्रा को 2012 में बायपोलैरिटी या द्विध्रुवीयता, उत्कंठा और सदमे के बाद तनाव विकार (पीटीएसडी) का पता चला. वे जी-जान से कोशिश कर रही हैं कि अपने वित्तीय भविष्य के बारे में न सोचें, ''फ्रीलांसर होने के नाते हमारे पास अब कुछ भी नहीं है और काम की अनिश्चितता के असर से मेरी चिंता बढ़ जाती है.'' हालांकि फिलहाल वे कोई दवाई नहीं ले रही हैं, पर कहती हैं, ''मैं ठीक-ठाक रहने की कोशिश कर रही हूं पर मेरे पीटीएसडी की वजह से मानसिक उन्माद तीव्र हो गया है.'' बत्रा सामान पहुंचाने वालों के आने से डर जाती हैं. वे दिन खासतौर पर मुश्किल होते हैं जब उनके पति अपनी मां को डायलिसिस के लिए अस्पताल ले जाते हैं. बत्रा कहती हैं, ''मुझे अपनी बिल्लियों, अपने पति, अपने भाई को लेकर डर लगता है. मैं अचानक डर जाती हूं कि इनमें से किसी को कुछ होने वाला है.''
जिनके दिलो-दिमाग पहले ही उथल-पुथल से गुजर रहे हैं, वे मौत और बीमारी की संभावना को अक्सर बहुत बढ़ा-चढ़ाकर देखने लगते हैं. खासकर हाइपोकोंड्रिएक यानी बीमारियों का वहम पालने वाले लोग उत्पीड़न और सामाजिक प्रतिशोध के विचारों को आत्मसात कर लेते हैं. इस हकीकत से अच्छी तरह वाकिफ संदीप चौधरी ने अपने हाइपोकोंड्रिएक पिता को कोविड-19 की खबरों से दूर रखने की बहुतेरी कोशिशें कीं. वे कहते हैं, ''हम अखबार नहीं लेते और टीवी बमुश्किल चलाते हैं, पर लोगों को मास्क में देखकर ही बाबा घबरा जाते हैं.'' चौधरी और उनका परिवार हालांकि बाहर बरामदे में ही हाथ धोते और मास्क सुखाते हैं, पर उनके पिता ने इतना तो देख ही लिया है कि उन्होंने साजिश और जैविक युद्ध की अपनी थ्योरी गढ़ ली हैं.
तनाव के सामान्य असर के चलते होने वाला मतिभ्रम ऐसा लक्षण है जो बायपोलर या द्विध्रुवीय मरीजों में उन्माद के ऊंचे स्तर को बताता है. डॉ. शेट्टी एक ऐसे नौजवान के बारे में बताते हैं जिसे कोविड-19 के प्रकोप के सुर्खियों में आने के कुछ दिन बाद द्विध्रुवीयता की बीमारी होने की तस्दीक हुई. वे कहते हैं, ''वह कल्पना करने लगा कि कोविड-19 के संकट के लिए वह जिम्मेदार है और उसके पास इसके समाधान की विशेष शक्ति है.'' शेट्टी दो अन्य मरीजों में आत्महत्या की प्रवृत्ति आ गई और वे कहने लगे, ''कोविड-19 से मरने के बजाय वे ही खुद को मार लेंगे.''
खबरें मतिभ्रम और मानसिक उन्माद को बेशक बढ़ा सकती हैं, पर डॉ. देब के मुताबिक, तथ्यों की संपादकीय प्रस्तुति की भी अहमियत है. वे कहते हैं, ''जब आप बीमारी को जानबूझकर फैलाने के लिए एक समुदाय विशेष को दोषी ठहराते हैं, तो खास किस्म के फोबिया (भय और आशंका) सक्रिय हो जाते हैं.'' मिसाल के लिए, स्किजोफ्रेनिया के मरीजों को मानसिक उन्माद बहुत जल्दी पकड़ लेता है और जब आप कहते हैं कि एक बीमारी को जानबूझकर फैलाया जा रहा है, आप ''उनके डरों को और बढ़ा देते हैं.'' डॉ. देब कहते हैं कि वे दुर्भाग्यपूर्ण उभार देख रहे हैं, ''दो-एक वर्षों से भले-चंगे रहे लोगों पर अचानक पागलपन सवार है कि कोई उन पर हमला कर देगा.''
अंधेरे में आशा की किरण
पूर्णबंदी के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंस की टेक्नोलॉजी कई लोगों के लिए वरदान साबित हुई. इनमें से कई अपने डॉक्टर से ऑनलाइन बात कर सकते हैं. मगर बेंगलूरू के 'एमपॉवर सेंटर' के प्रमुख और मनोचिकित्सक डॉ विनोद कुमार मानते हैं कि ऑनलाइन बातचीत आमने-सामने की बातचीत जितनी संतोषजनक नहीं हो सकती.
मानसिक स्वास्थ्य चिंताओं वाले लोगों के साथ काम कर रहे एमपॉवर ने 3 अप्रैल को कोविड से जुड़ी चिंताओं को कम करने में मदद के लिए एक हेल्पलाइन लॉन्च की. इस पर 4,000 से ज्यादा लोग कॉल कर चुके हैं. डॉ. कुमार कहते हैं, ''सामान्य जिंदगी में किसी भी किस्म की उथल-पुथल—बेरोजगारी, रिश्तों में परेशानियां, घरेलू हिंसा—मानसिक तनाव के स्तरों में बढ़ोतरी की तरफ ले जाती है. मगर सबसे बड़ा सदमा शायद उन्हें लग रहा है जिन्हें या तो इस वायरस का संक्रमण हो गया है या जिन्होंने अपने किसी प्रिय को इसकी वजह से खो दिया है. ऐसे अनुभव गंभीर और चिरस्थायी पीटीएसटी की वजह बन सकते हैं.''
कुछ अन्य डॉक्टर उजला पहलू देखने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं. डॉ. शेट्टी कहते हैं कि उन्होंने अवसाद का इलाज करवा रहे ऐसे मरीज देखे हैं जिनके लक्षण महामारी के प्रकोप के बाद खत्म हो गए, ''अचानक उसने संकल्पशक्ति का परिचय दिया और पारिवारिक जिम्मेदारियां संभाल लीं. उसका अवसाद गायब हो गया.'' डॉ. देब कहते हैं कि अचानक परिजनों की नजदीकी से लोगों का अकेलापन कम हो सकता है. वे कहते हैं, ''जिन लोगों पर हाथ धोने का खब्त सवार था, उन्हें यह देखकर अच्छा लग सकता है कि अब हर कोई हाथ धो रहा है.'' वहीं बत्रा कहती हैं, ''जब 2015 में मैं रोग से पहली बार उबरने लगी, तब मुझे एकांत अच्छा लगने लगा. इसने मुझे खुद को समझने में मदद की. तभी से मैं आगे की चिंता के बगैर हर दिन नए सिरे से शुरू करती हूं. मैं खुश हूं कि अब अन्य लोग भी ऐसा ही कर रहे हैं.''
(आग्रह पर पीड़िताओं के नाम बदल दिए गए हैं)
—साथ में, अदिति पै और रोमिता दत्ता