मास्क के पीछे
कोविड-19 वायरस का अभी तक कोई इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन भारत और अन्य जगहों पर इसके उपचार में एकमात्र कड़वी दवाई—लॉकडाउन—इस्तेमाल हो रही है. आर्थिक रूप से कमजोर लाखों नागरिकों के जीवन और आजीविका में.

इंडिया टुडे
कोविड-19 वायरस का अभी तक कोई इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन भारत और अन्य जगहों पर इसके उपचार में एकमात्र कड़वी दवाई—लॉकडाउन—इस्तेमाल हो रही है. आर्थिक रूप से कमजोर लाखों नागरिकों के जीवन और आजीविका में जो व्यवधान उत्पन्न हुआ है, तमाम सामाजिक दूरियां बरतने के बावजूद उसकी अनदेखी मुश्किल है.
फिर भी, स्पष्ट रूप से दिख जाती कठिनाई और गरीबी की संकटपूर्ण छवियों से परे भी, इस लॉकडाउन के नतीजे सामने आ रहे हैं. ऐसे मरीज जो कोविड संक्रमित तो नहीं हैं लेकिन गंभीर बीमारियों से पीडि़त हैं, उनका इलाज अधर में है; एक ऐसी दुनिया जहां प्राथमिकताएं बदल गई हैं, वहां कमजोर बच्चों की जान अब भगवान भरोसे है; महिलाओं के पास जीवनसाथियों के शारीरिक और यौन शोषण से बचने के सारे रास्ते बंद से हैं; वैश्विक व्यामोह के इस दौर में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे मरीजों को कोई पूछने वाला नहीं. और शायद सबसे दुखद स्थिति तो उनकी है जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया है.
लेकिन वे दिवंगत आत्माओं को आखिरी विदाई देने के लिए प्रचलित रस्में भी नहीं निभा पा रहे. निश्चित रूप से इस नुक्सान का कोई सही आकलन और रिकॉर्ड तो नहीं है कि महामारी ने समानांतर रूप से कितनी और कहां तक क्षति पहुंचाई है, लेकिन यह इस बात की याद दिलाता रहता है कि महामारी पर यथाशीघ्र अंकुश लगाना जरूरी है, नहीं तो समानांतर संकटों का पहाड़ खड़ा हो जाएगा.
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