चोर कौन, कोतवाल कौन

सीएजी की रिपोर्ट ने लड़ाकू विमानों की कीमत पर मोदी सरकार को भले बख्श दिया हो लेकिन यह सात साल की उस लंबी प्रक्रिया पर सवाल उठाती है, जिसके तहत राफेल को सबसे कम बोली लगाने वाले के रूप में चुना गया.

राफेल पर सीएजी की रिपोर्ट से भाजपा और कांग्रेस को हाथ लगीं कुछ अहम बातें
राफेल पर सीएजी की रिपोर्ट से भाजपा और कांग्रेस को हाथ लगीं कुछ अहम बातें

सोलहवीं लोकसभा के कार्यकाल के आखिरी दिन संसद में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की वह ऑडिट रिपोर्ट रखी गई जिसका अरसे से इंतजार था. सीएजी की रिपोर्ट ने मोदी सरकार के 2016 में 36 राफेल लड़ाकू जहाजों की खरीद के लिए 60,000 करोड़ रु. के सौदे का ऑडिट किया. रिपोर्ट ने सरकार पर लगाए विपक्ष के उन आरोपों को बेबुनियाद बताया कि सरकार ने फ्रांस से जो जहाज खरीदे हैं, उसके लिए पिछली सरकार से तय कीमत से ज्यादा रकम चुकाई है. रिपोर्ट ने मई 2019 के आम चुनावों से पहले सरकार को एक बड़ी राहत दी है. सीएजी ने रिपोर्ट में उल्लेख किया कि 2007 और 2014 के बीच सात साल में यूपीए ने सौदेबाजी के बाद जो कीमतें तय की थीं, मौजूदा सरकार के खरीदे गए जहाज उसकी तुलना में भी 2.86 प्रतिशत सस्ते हैं.

हालांकि रिपोर्ट मोदी सरकार के मंत्रियों के उस दावे को भी अतिरंजित बताती है जिसमें कहा गया था कि इस सरकार ने 2016 की वार्ता में राफेल की जो कीमतें तय कीं, वे पिछली सरकार की तय कीमत से 9 प्रतिशत कम हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस रिपोर्ट को सरकार को बचाने वाली 'कवर-अप' रिपोर्ट बताकर खारिज कर दिया है. उनके मुताबिक, ''इस सौदे में बैंक गारंटी नहीं है और रिपोर्ट में उस गारंटी की लागत की अनदेखी की गई है. साथ ही भारत को ध्यान में रखकर किए जाने वाले बदलावों की लागत भी संदिग्ध रूप से अधिक है.''

पिछले साल 14 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट की ओर से मिले सकारात्मक फैसले के बाद अब सीएजी की रिपोर्ट, मोदी सरकार के लिए एक और संजीवनी के रूप में आई है.

चार जनहित याचिकाओं का जवाब देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा था कि सरकार की राफेल जेट की खरीद पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है. सरकार ने गोपनीयता का हवाला देते हुए इसका खुलासा करने से इनकार कर दिया था कि पूरी तरह से लैस राफेल के लिए उसने कितना भुगतान किया.

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से सीलबंद लिफाफे में राफेल की कीमतों का ब्यौरा लिया था. सीएजी ने भी गोपनीयता बनाए रखी और केवल कीमतों और पिछले सौदे से इस सौदे में लागत के अंतर का प्रतिशत के रूप में उल्लेख किया है.

सीएजी ने मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) के लिए यूपीए सरकार के टेंडर, जिसमें राफेल सबसे आगे रहा, और 2015 में एनडीए-2 सरकार के अंतर-सरकारी समझौते, जिसमें मोदी सरकार ने यूपीए के समझौते को रद्द करते हुए सीधे फ्रांस सरकार से 36 फ्लाइवे राफेल खरीदने का फैसला किया, दोनों की जांच की. कांग्रेस का दावा है कि उसका सौदा बेहतर था क्योंकि 108 जहाज लाइसेंस के तहत भारत में ही बनाए जाने थे.

दोनों सौदों की प्रकृति अलग थी. इस वजह से कीमतों को लेकर सीएजी ज्यादा चौकस है.

उसकी रिपोर्ट कहती है कि 2007 और 2015 की पेशकश के तहत कीमतों की तुलना में अपनी कठिनाइयां रहीं क्योंकि 2007 में हुए सौदे में लाइसेंस उत्पादन की कीमतें शामिल थीं जबकि 2015 की पेशकश में केवल फ्रांस में बने 'उड़ान भरने को तैयार' विमानों का अधिग्रहण शामिल है.

इस साल जनवरी में रक्षा मंत्रालय ने सीएजी को बताया था कि उसने यूपीए के कार्यकाल में हुए सौदे से 9 प्रतिशत कम कीमतों पर राफेल खरीदने का सौदा किया था. हालांकि, सीएजी ने पाया कि बचत केवल 2.86 प्रतिशत की थी. यह आंकड़ा मुख्य रूप से ज्यादा ऊंचाई पर कोल्ड स्टार्ट, टो डिकॉए एरे (एयरक्राफ्ट भेदी मिसाइल को चकमा देने की क्षमता) और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम जैसे भारत को ध्यान में रखकर किए गए बदलाव, जो कि भारत के लिए बनने वाले राफेल को अद्वितीय बनाते हैं, में 17.08 प्रतिशत की कमी के माध्यम से आया. सीएजी ने कहा कि यदि रक्षा मंत्रालय ने दासो एविएशन के साथ थोड़ी और सौदेबाजी की होती, खासकर बैंक गारंटी को लेकर, तो कुछ और पैसे बचाए जा सकते थे. 2007 की अपनी पेशकश के विपरीत दासो ने 2015 में कोई बैंक गारंटी नहीं दी थी. यह गारंटी 15 प्रतिशत अग्रिम भुगतान के लिए होती जो कि जहाजों की डिलिवरी शुरू होने तक बकाया रहेगी.

सौदेबाजी के लिए गए भारतीय दल के नौकरशाहों ने भी बैंक गारंटी नहीं होने पर आपत्ति की थी, जिसे खारिज कर दिया गया. सीएजी ने भी कानून मंत्रालय के उठाए गए एक संप्रभु गारंटी के अभाव जैसे बिंदु का उल्लेख किया है क्योंकि 36,000 करोड़ रु. लागत का लगभग 60 प्रतिशत भारत सरकार दासो को पहले ही भुगतान कर चुकी है. सरकार को फ्रांसीसी सरकार से बस एक लेटर ऑफ कंफर्ट मिला है जो कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है.

हालांकि रिपोर्ट इस बात का जवाब नहीं दे पाती कि प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के साथ भारतीय वायु सेना की 126 लड़ाकू जहाजों (सात स्क्वाड्रन) की जरूरत कब और कैसे फ्रांस में ही तैयार 36 लड़ाकू जहाजों की एकमुश्त खरीद में बदल गई. सीएजी रिपोर्ट कहती है, ''ऑडिट में भारतीय वायु सेना की परिचालन तैयारियों में इस व्यापक अंतर को भरने के लिए भी मंत्रालय के पास मौजूद किसी अन्य प्रस्ताव की जानकारी नहीं मिली है.'' रक्षा मंत्रालय ने सीएजी को बताया था कि उसने जहाजों की कमी का फासला पाटने के लिए रणनीतिक साझेदारी के तहत सिंगल-इंजन लड़ाकू जहाजों के लिए आपूर्तिकर्ताओं से प्रस्ताव की शर्तें रखी थीं.

वायु सेना 19 साल से 126 हल्के लड़ाकू विमानों की तलाश में थी. यह संख्या कम क्यों की गई, जिस पर कि विवाद है, रिपोर्ट इस पर मौन है. हालांकि, यह उस खरीद प्रक्रिया पर भी सवाल उठाती है जिसके तहत राफेल 2012 में विभिन्न आपूर्तिकर्ताओं को पछाड़ते हुए विजेता बनकर उभरा था.

सीएजी की टिप्पणी है कि पांच साल की सौदेबाजी के दौरान राफेल के लिए दासो की बोली को कई बार अयोग्य ठहरा दिया जाना चाहिए था. सौदे को हर बार रक्षा मंत्रालय से मिली रियायतों द्वारा बचाया गया.

2012 में दासो को सबसे कम बोली लगाने वाला घोषित करने के तुरंत बाद ही इसकी मूल्य निर्धारण प्रक्रिया में गड़बडिय़ों की शिकायतें शुरू हो गई थीं.

जांच के लिए समिति बनी, जिसने मार्च 2015 में रिपोर्ट तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर को सौंप दी थी.

इसने छह सनसनीखेज निष्कर्ष दिए—दासो वायु सेना की गुणात्मक जरूरतों का अनुपालन नहीं करता और उसे तकनीकी मूल्यांकन के चरण में ही अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए था; बोली पेश करने की तारीख बीतने के बाद दासो के अतिरिक्त व्यावसायिक प्रस्तावों की स्वीकृति 'वित्तीय स्वामित्व के सिद्धांत के विरुद्ध' थी.

दासो की बोली निर्धारित प्रारूप में नहीं थी. चूंकि दासो 'एल1' या सबसे कम बोली लगाने वाला नहीं था, सो उसके साथ अनुबंध नहीं हो सकता था. यूरोफाइटर का प्रस्ताव भी प्रस्ताव की शर्तों का अनुपालन नहीं करता. मध्यम बहुउपयोगी लड़ाकू जहाज के प्रस्ताव की शर्तों (एमएमआरसीए आरपीएफ) को हटा दिया गया और सरकार ने 2016 में तत्काल आपूर्ति खरीद का विकल्प चुना.

सीएजी ने नोट किया कि राफेल को पहली बार मई 2008 में तकनीकी मूल्यांकन समिति ने अस्वीकार कर दिया था. यह 2012 में आखिरकार राफेल को चुने जाने से पहले हुए कई अविश्वसनीय संयोगों में से पहला था. 2009 में राफेल को फिर से इस आधार पर नकार दिया गया था कि यह वायु सेना की जरूरतों को पूरा नहीं करता. रिपोर्ट कहती है कि मई 2009 में तत्कालीन रक्षा मंत्री ने गुणवत्ता जरूरतों में फेरबदल पर छूट को मंजूरी दी. सीएजी का मानना है कि यह रक्षा मंत्रालय द्वारा किसी भी पूंजीगत रक्षा खरीद के लिए तय प्रक्रिया (डीपीपी) का उल्लंघन है.

सीएजी ने कहा कि रक्षा मंत्रालय के बाद के जवाबों में कहा गया है कि चूंकि रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने डीपीपी में मामूली बदलावों को मंजूरी दे दी है इसलिए इसे डीपीपी का उल्लंघन नहीं माना जाएगा.

रिपोर्ट में लगा नोट कहता है, ''इसलिए दासो एविएशन के प्रस्ताव को स्वीकार किया गया था.'' राफेल के 14 गुणवत्ता जरूरतों में विफल होने पर रक्षा मंत्रालय ने तकनीकी गैर-अनुपालन से जुड़े फैसलों को वार्ता समिति पर छोड़ दिया. सीएजी की टिप्पणी है कि यह 'अनुचित' था. अंतिम आपूर्तिकर्ताओं के रूप में राफेल और यूरोफाइटर टाइफून को चुना गया लेकिन उनकी बोलियां फर्म और निश्चित लागतों का उल्लेख न करने की वजह से अनुपालन योग्य नहीं पाई गईं.

सीएजी की टिप्पणी है कि ''इसलिए इनकी बोलियां गैर-उत्तरदायी बोलियों के रूप में अस्वीकृत होने लायक थीं.'' पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. रक्षा मंत्रालय ने कीमतों को लेकर सौदेबाजी शुरू कर दी जिसके आधार पर यह तय हो सकता था कि दोनों में से कौन-सा विमान सस्ता था. 2012 में इसने राफेल और यूरोफाइटर, दोनों की मूल्य बोलियां खोलीं. राफेल को कम कीमत की बोली लगाने वाला पाया गया और इसलिए रक्षा मंत्रालय ने कीमत पर चर्चा करने के लिए एक अनुबंध वार्ता समिति बनाई.

यह पाया गया कि तैयारशुदा विमान के लिए रक्षा मंत्रालय की निर्धारित बेंचमार्क कीमत सबसे कम बोली लगाने वाले राफेल की वास्तविक कीमत से 47 प्रतिशत कम है. हालांकि फ्रांसीसी जेट को सस्ता पाया गया था पर यहां एक बड़ा झोल था.

और सीएजी की रिपोर्ट का यही सबसे ज्यादा घातक हिस्सा है. सीएजी का कहना है, दासो ने भारत में राफेल के निर्माण की लागत की गणना, फ्रांसीसी उद्योग में मानव घंटे के हिसाब से की थी. अपने उत्पाद की भारत में कीमत की गणना के लिए उसे अपने मानव घंटे में 2.7 के कारक से गुणा करना होगा. ऐसा किया गया होता तो राफेल सबसे सस्ता न होता. यूरोफाइटर की कीमत उससे कम होती और वह सबसे सस्ता होता.

यहां तक कि 2007 में दासो की लगाई बोली उस प्रारूप में नहीं थी जिसमें कीमतों के मूल्यांकन के लिए सात विस्तृत लागत तत्व शामिल थे. यूरोफाइटर के निर्माताओं ने उस प्रारूप का पालन करते हुए कीमतें बताई थीं. दासो ने केवल दो हिस्सों में लागत बताई-सीधे फ्रांस से बनकर आए उडऩे को तैयार जहाजों की कीमत और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की कीमत (टीओटी). शर्तों में फेर-बदल को लेकर सीएजी के उठाए ये मुद्दे अहम हैं जिनमें से अधिकांश कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान हुए थे.

कांग्रेस का एक आरोप यह भी है कि एनडीए के राफेल सौदे में उद्योगपति अनिल अंबानी को अनुचित लाभ पहुंचाने की कोशिश हुई और उन्हें पूरे सौदे में से 30,000 करोड़ रु. का ऑफसेट मिला. हालांकि, सीएजी ने दासो-रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड (डीआरएएल) के ऑफसेट सहित 100 से ज्यादा ऑफसेट भागीदारों में से किसी का भी उल्लेख नहीं किया है. ऐसा इसलिए क्योंकि सौदे पर हस्ताक्षर के तीन साल बाद यानी सितंबर 2019 से ही इन ऑफसेट पर काम शुरू होगा.

सीएजी की रिपोर्ट खारिज करने और राहुल गांधी के 'चौकीदार चोर है' जैसे बयान जारी रखने के संकेतों के साथ, राफेल की बहस अब एक ऐसी बहस प्रतीत होती है जो आम चुनावों में छाई रहेगी.ठ्ठ

राफेल का रगड़ा

सीएजी रिपोर्ट में 2007 और 2014 के बीच रक्षा मंत्रालय के कई अतार्किक फैसलों का जिक्र है जिसने राफेल को लड़ाकू जहाजों की खरीद की दौड़ में सबसे आगे बनाए रखा

2007: दासो एविएशन का राफेल भारतीय वायु सेना की एयर स्टाफ गुणवत्ता जरूरतों में से नौ को पूरा करने में विफल रहा. जबकि अन्य चार दावेदार—यूरोफाइटर टाइफून, ग्रिपेन, एफ-16 और एफ-18 केवल चार आवश्यकताओं को पूरा करने में नाकाम रहे थे.

2009: रक्षा मंत्रालय राफेल को गुणवत्ता जरूरतों के पालन से छूट देता है और प्रस्ताव की शर्तों (आरएफपी) के लिए अनुरोध करता है. राफेल के लिए रक्षा खरीद प्रक्रिया के उल्लंघन की अनुमति दी गई, जो केवल 'मामूली' विचलन की अनुमति देता है न कि '14 मापदंडों में बदलाव कर देने की.

2010: राफेल गुणवत्ता जरूरतों से जुड़े 14 मापदंड पूरा करने में नाकाम रहता है. महानिदेशक अधिग्रहण का कहना है कि इनमें से तीन मापदंडों पर अनुबंध वार्ता समिति (सीएनसी) को बातचीत करनी चाहिए.

2011: राफेल और यूरोफाइटर टाइफून दोनों की ही बोलियां फर्म और निर्धारित मूल्यों का खुलासा नहीं करतीं जिसे आरएफपी में अनिवार्य किया गया है और इस कारण तकनीकी रूप से उन्हें अयोग्य ठहराया जा सकता है. हालांकि, खरीद की प्रक्रिया फिर भी जारी है.

2012: राफेल एमएमआरसीए (मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) के लिए आई बोलियों में सबसे कम बोली लगाने वाला पाया गया. कैग का कहना है कि दासो ने निर्धारित प्रारूप में लागत बोली जमा नहीं की. लाइफ साइकिल कॉस्ट की सही गणना नहीं की गई थी क्योंकि दासो ने जहाज के लाइसेंस के तहत उत्पादन के लिए संयंत्र स्थापना से जुड़े पूंजीगत व्यय के लिए बोली नहीं लगाई थी.

2012: दासो ने भारत में लाइसेंस प्राप्त विमानों के उत्पादन की लागत की गणना फ्रांसीसी मानव घंटों का उपयोग करके की. बेंचमार्क मूल्य और सबसे कम बोली लगाने वाले का आकलन करते हुए सीएनसी ने इसे अनदेखा कर दिया.

2015: तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर को सौंपी गई रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में विभिन्न अनियमितताओं की सूची दी गई हैरू दासो सबसे कम बोली लगाने वाला नहीं था और इसलिए इसके साथ अनुबंध नहीं होना चाहिए था. सबसे कम बोली की गणना दोषपूर्ण थी. राफेल ने भारतीय वायु सेना की जरूरतों का अनुपालन नहीं किया है और तकनीकी मूल्यांकन चरण में ही उसे अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए था. बोली जमा करने की तारीखों के बाद दासो की ओर से अतिरिक्त वाणिज्यिक प्रस्तावों को स्वीकृति दी गई जो कि अभूतपूर्व और वित्तीय स्वामित्व की संधि परंपरा के खिलाफ थी.

''सीएजी रिपोर्ट बैंक गारंटी न होने से जुड़ी लागत की अनदेखी करती है और ''भारत को ध्यान में रखकर किए जाने वाले बदलावों की संदिग्ध लागत पर भी परदा डालती है.''

—राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष

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