''यहां ना लोकसभा, ना विधानसभा, सबसे बड़ी ग्रामसभा''

''प्रधानमंत्री को भी गांव में प्रवेश के लिए हमारी इजाजत लेनी होगी.''

सभी फोटोःसोमनाथ सेन
सभी फोटोःसोमनाथ सेन

खूंटी-जमशेदपुर की लंबी और घुमावदार सड़क के नजदीक गांवों के बाहर पत्थरों की बड़ी-बड़ी पट्टियां खड़ी कर दी गई हैं जो किसी गैर-सरकारी जांच चौकियों की तरह काम कर रही हैं और लोगों को सूचित कर रही हैं कि ये आदिवासी इलाके अब भारत सरकार के अधीन नहीं हैं.

पूर्वजों की याद में बनाए गए 'पत्थलगड़ी' से मिलते-जुलते इन पत्थरों का इस्तेमाल आदिवासी बस्तियों की निशानदेही के लिए किया जा रहा है कि ये बस्तियां ग्रामसभा के तहत स्वायत्त हैं, सरकार के अधीन नहीं हैं और यहां बाहरी लोगों का प्रवेश वर्जित है.

हालांकि मुख्यमंत्री रघुबर दास के नेतृत्व में राज्य सरकार का कहना है कि राष्ट्रविरोधी तत्वों की ओर से पत्थलगड़ी का इस्तेमाल भोले-भाले निवासियों को भ्रमित करने के लिए अलगाववादी हथियार के तौर पर किया जा रहा है लेकिन लगता है, स्थानीय आदिवासी छोटे-छोटे आजाद राज्य के अधिकारों में विश्वास करने लगे हैं.

तमार-खूंटी-कोलेबिरा सड़क पर खूंटी जिला मुख्यालय के दक्षिण में उदबुरू गांव के प्रवेश द्वार पर स्थित ऐसी ही पत्थलगड़ी इसे स्वतंत्र घोषित करती है. यहां लगी पत्थर की पटिया पर लिखा है कि इस गांव के अंदर बाहरी लोगों का प्रवेश या कोई व्यापार करना वर्जित है और संसद या भारत सरकार के पास उदबुरू या झारखंड के किसी भी आदिवासी गांव पर शासन करने का कोई अधिकार नहीं है.

ग्राम सभा का शासन सर्वोपरि है. विरोधाभासी बात यह है कि वे संविधान की तो शपथ लेते हैं लेकिन संवैधानिक संस्थाओं का विरोध करते हैं.

उदबुरू 'प्रोफेसर' और 'यूसुफ' के नाम से मशहूर आदिवासी महासभा नेता जोसेफ पूर्ति का गांव है. इस अलगाववादी आंदोलन के कथित मास्टरमाइंड 42 वर्षीय विजय कुजूर को 18 मार्च को दिल्ली से गिरफ्तार किए जाने के बाद कॉलेज के पूर्व अध्यापक 38 वर्षीय पूर्ति 'पत्थलगड़ी' आंदोलन के मुख्य नेता के तौर पर उभरे हैं. पूर्ति का नाम पुलिस की वांछितों की सूची में दर्ज हो गया है.

रांची के दो आदिवासी युवकों की मदद से इंडिया टुडे को उदबुरू में प्रवेश करने में सफलता मिली. ये दोनों युवक पहले पूर्ति से मिल चुके थे. गांव में प्रवेश करते ही आदिवासी युवाओं के एक समूह ने इंडिया टुडे के दल का स्वागत किया.

ये युवक दरांती और तीर-कमानों से लैस थे और अपनी स्थानीय बोली में जोर-जोर से बोल रहे थे. इंडिया टुडे के वाहन का रास्ता रोकने के लिए उसके सामने एक ऑटोरिक्शा खड़ा कर दिया गया. एक स्कूल में दो घंटे से ज्यादा समय तक इंतजार करने और टीम के सदस्यों के पहचान पत्रों से संतुष्ट होने के बाद इंडिया टुडे को आखिरकार पूर्ति से मिलने की मंजूरी् मिल गई. इसके बाद पूर्ति एक स्कूटी पर पीछे बैठकर मिलने के लिए आए. स्कूल की घंटी बजाई गई और कुछ ही मिनटों के भीतर करीब सौ आदिवासी वहां एकत्र हो गए.

पूर्ति ने कहा, ''1931 के गांधी-इरविन समझौते के तहत आदिवासी इलाकों में किसी भी तरह का चुनाव कराने की मनाही है. ग्राम सभा के पास स्वशासन का पूरा अधिकार है. ब्रिटिश साम्राज्य के साथ भारत के समझौते में गैर-आदिवासियों को केवल 1969 तक हम पर शासन करने का अधिकार था.

हम अपना शासन स्थापित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र से सीधे हस्तक्षेप के लिए कह सकते हैं.'' आर्थिक रूप से ज्यादातर गरीब और निरक्षर उनके अनुयायियों ने पूर्ति की बात पर सहमति जताई. उनमें से एक ने कहा,  ''प्रधानमंत्री को भी गांव में प्रवेश के लिए हमारी इजाजत लेनी होगी.'' एक अन्य अनुयायी का कहना था कि विमानों और ट्रेनों पर केवल आदिवासियों का स्वामित्व है.

पूर्ति ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, ''यह सरकार आदिवासियों के खिलाफ है. वे हमारा दोहरा काश्तकारी कानून सीएनटी और एसपीटी बदल देना चाहते हैं. लेकिन ये गैर-कानूनी हैं जिन्हें ब्रिटिश संसद से मंजूरी मिलनी बाकी है.'' लगता है, पूर्ति इन आदिवासियों को यह बात समझाने में सफल हो गए हैं क्योंकि उनकी बात खत्म होते ही वे नारे लगाने लगते हैं, ''ना लोकसभा, ना विधानसभा, सबसे बड़ा ग्राम सभा.''

उनके बगावती तेवर तब साफ नजर आने लगे जब उन्होंने अपने पारंपरिक हथियार और नकली बंदूकें हवा में लहराईं. पूर्ति ने पूरे आवेश के साथ कहा, ''अगर राज्य सरकार हमारी बात नहीं सुनती तो हमें फ्रांस की सरकार को सूचित करना पड़ेगा.

वे हमारे दोस्त हैं. वे इस सरकार को हटाने के लिए अपनी सेना भेज सकते हैं.'' उनकी बात सुनकर सारे आदिवासियों ने खुशी का इजहार किया. इसके बाद पूर्ति ने कागज का एक पन्ना दिखाया जिस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, महारानी एलिजाबेथ और कोहिनूर हीरे का चित्र चिपका हुआ था.

वे कहते हैं, ''क्या आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री ने ब्रिटेन से कोहिनूर हीरा वापस करने के लिए अनुरोध किया था. लेकिन ब्रिटिश संसद ने इसे मोदी को देने से मना कर दिया क्योंकि मोदी के पास ग्राम सभा की मंजूरी नहीं थी.''

इंडिया टुडे ने जब वहां मौजूद आदिवासियों को 'जनता' कहकर संबोधित किया तो पूर्ति ने तुरंत आपत्ति की. उन्होंने कहा, ''उन्हें 'जनता' मत कहिए, वे भारत के मालिक हैं. चुनाव आयोग गैर-कानूनी रूप से पांचवीं अनुसूची के इलाकों में चुनाव कराता है.''

पिछले साल अगस्त से खूंटी, चाईबासा, सिमडेगा और सरायकेला-खरसावां जिलों के 100 गांवों से पत्थलगड़ी के आयोजनों की खबरें मिलती रही हैं.

इनमें से अकेले खूंटी से 62 गांव शामिल हैं जो मुरहू-बीरबांकी रोड—तुबिल, बहमवा, सिजुरी, तुसुंगा, साके, तोटकोरा और अन्य जगहों पर बसी आदिवासी बस्तियों के आसपास हैं.

रांची में एक वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी ने कहा, ''झारखंड में 30,000 से ज्यादा गांवों को देखते हुए यह संख्या भले ही छोटी लगती हो लेकिन उनके नेता भोले-भाले आदिवासियों के दिमाग में जहर भरने की कोशिश कर रहे हैं और समझा रहे हैं कि ग्राम सभा के पास इन इलाकों को संयुक्त राष्ट्र को सौंपने और भारत से अलग होने का अधिकार है.''

पत्थलगड़ी के नेताओं ने आदिवासियों से चुनावों, सरकारी योजनाओं, स्कूलों और अस्पतालों का बहिष्कार करने को कहा है. उदबुरू के एक स्कूल के वीडियो क्लिप में दिखता है कि बच्चों को दूसरे समुदायों को गालियां देने के लिए उकसाया जा रहा है.

पिछले साल अगस्त में एसपी अश्विनी कुमार सिन्हा समेत खूंटी जिला प्रशासन के 80 अधिकारियों को कांकी गांव में 12 घंटे तक बंधक बनाकर रखा गया था. इस साल फरवरी में अफीम की अवैध खेती करने वाले सागर मुंडा की गिरफ्तारी के बाद अरकी पुलिस स्टेशन के लोगों को कुरुंगा गांव में बंधक बना लिया गया था.

सागर मुंडा पर प्रतिबंधित पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट (माओवादियों का एक अलग हुआ समूह) के साथ मिलकर यह खेती करने का आरोप था. लोगों के दबाव में आकर सागर और गांव वालों को उकसाने वाले कुछ अन्य लोगों को छोडऩा पड़ा था. पुलिस और जिला प्रशासन के अधिकारी अब इन गांवों में जाने से अब हिचकिचाते हैं.

मुख्यमंत्री पहले ही पत्थलगड़ी को अफीम की खेती से जोड़े जाने के बारे में कह चुके हैं. जनवरी और मार्च 2017 के बीच पुलिस खूंटी सदर, मुरहू और अरकी पुलिस स्टेशनों के तहत आने वाले 40 गांवों में 1,550 एकड़ जमीन में लगी पोस्ता की खेती को नष्ट कर चुकी थी.

चतरा, लातेहार, गढ़वा और पलामू जिलों में भी हजारों एकड़ में अफीम की खेती को नष्ट किया गया था. मई 2017 में पुलिस ने अफीम से भरा ट्रक पकड़ा था. सिन्हा ने इंडिया टुडे को बताया कि इस साल 1,200 एकड़ में पोस्तदाना की खेती को नष्ट किया जा चुका है. इसके अलावा आंशिक रूप से तैयार 60 किलोग्राम अफीम खूंटी से पकड़ी गई और 17 लोगों को जेल भेजा जा चुका है. सिन्हा कहते हैं,

'पत्थलगड़ी पीएफएलआइ की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और अफीम खेती का मिला-जुला मामला है. पूरा खेल अफीम के कारोबार से पुलिस को दूर रखने का षड्यंत्र है. अफीम की खेती बहुत मुनाफे का धंधा है, लोगों को इससे एक एकड़ से एक लाख रु. की कमाई होती है. एक किलोग्राम अपरिष्कृत अफीम की कीमत 70,000 रु. है. यह पैसा माओवादियों और गांववालों के बीच बंटता है.'' अफीम की खेती रांची, खूंटी, गुमला, सिमदेगा, लातेहर, चत्रा और पलामू जिलों में की जाती है.

2 अप्रैल को पुलिस ने उत्तर प्रदेश से अफीम के दो डीलरों को गिरक्रतार किया था जो बीचू पाहन नाम के एक व्यक्ति को अग्रिम भुगतान के तौर पर 70,000 रु. देने जा रहे थे. पूर्ति अफीम की खेती का समर्थन करते हैं. वे कहते हैं, ''आदिवासियों को यह चुनाव करने का पूरा अधिकार है कि वे अपने खेतों में क्या उगाना चाहते हैं.''

मुख्यमंत्री पत्थलगड़ी के लिए पीएलएफआइ को जिम्मेवार ठहराते हुए कहते हैं, ''पीएलएफआइ जैसे संगठनों के साथ कुछ राष्ट्रविरोधी ताकतें आदिवासियों को गुमराह कर रही हैं. वे इन्हें देश के खिलाफ भड़का रही हैं.'' लेकिन इस मुद्दे पर राज्य सरकार की ओर से उठाया गया अब तक का एकमात्र कदम राज्यपाल द्रौपदी मूर्मू की 3 अप्रैल को करीब 400 आदिवासी मुखियों के साथ मुलाकात के रूप में आया है. फिर भी, पूर्ति और उनके सहयोगियों ने करीब 40 मुखियों को राजभवन न जाने के लिए मना लिया था.

सरकार और आदिवासी संगठनों के बीच अविश्वास का माहौल छोटानागपुर काश्तकारी कानून और संथाल परगना काश्तकारी कानून में संशोधन के मुख्यमंत्री के प्रस्ताव के बाद से बन गया था. रघुबर दास चाहते थे कि जमीन का 'गैर-कृषि' उपयोग किया जा सके.

उन्हें उम्मीद थी कि इससे अधिग्रहण की समस्या का समाधान भी निकल जाएगा. आदिवासियों को लगा कि यह उनकी जमीन छीनने की साजिश है और इससे कट्टरपंथी आदिवासी नेताओं को उन्हें भड़काने का मौका मिल गया. उसी समय आदिवासियों के एक समूह ने आदिवासी महासभा नाम के एक संगठन को पुनर्जीवित कर अलगाववादी भावनाओं को भड़काना शुरू कर दिया.

आखिरकार राज्यपाल मूर्मू ने इस विधेयक को जून, 2017 में वापस भेज दिया. अगस्त 2017 में राज्य सरकार ने राइट टु फेयर कंपन्सेशन ऐंड ट्रांसपेरेंसी इन लैंड एक्विजिशन, रिहैबिलिटेशन ऐंड रिसेटिलमेंट (झारखंड एमेडमेंट) ऐक्ट, 2017 प्रस्तावित किया. राज्य कैबिनेट ने सार्वजनिक उपयोग की परियोजनाओं के लिए जमीन के अधिग्रहण के मामले में सामाजिक प्रभाव के आकलन की शर्त को कमजोर करने का प्रस्ताव रखा.

आदिवासी पार्टियों ने इसका विरोध किया. सरकार को अब इस मुद्दे पर केंद्र के इशारे का इंतजार है. लेकिन खूंटी के डिप्टी कमिशनर सूरज कुमार कहते हैं, ''हमने आदिवासी प्रमुखों के साथ जमीनी स्तर पर बातचीत करनी शुरू कर दी है. प्रशासन लोगों के साथ मिलकर कम करेगा.

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