शिक्षकों की सियासत से बेजार
बीएचयू ट्रॉमा सेंटर में बीए दूसरे वर्ष के छात्र से दुव्र्यवहार के बाद छात्रों और रेजिडेंट डॉक्टरों के बीच जमकर मारपीट. बमबारी और आगजनी से परिसर में हड़कंप. 15 लोगों पर मुकदमा.

यह कुछ ऐसा था मानो 1916 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की स्थापना के सौ वर्ष बाद इस विश्व प्रसिद् संस्थान में प्रशासनिक जड़ता के खिलाफ आजादी की जंग लड़ी जा रही हो. इसका बिगुल फूंकने वाली संस्थान की छात्राएं थीं. दरअसल 21 सितंबर की शाम साढ़े छह बजे बीएचयू परिसर में भारत कला भवन चौराहे से गुजर रही एक छात्रा से छेडख़ानी के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन का रवैया चिरपरिचित उदासीनता भरा रहा. नाराज छात्र-छात्राओं ने बीएचयू के मुख्य सिंह द्वार पर निरंतर 40 घंटे तक अभूतपूर्व धरना दिया. प्रधानमंत्री और वाराणसी के सांसद नरेंद्र मोदी भी शहर में थे.
लेकिन प्रदर्शनकारी छात्राओं के बीच जाकर उनकी समस्याएं सुनने की बजाए कुलपति प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी अपने कार्यालय से बाहर निकलने को तैयार नहीं थे. बात बढ़ती गई और 23 सितंबर की रात जायज मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रही निरीह छात्राओं पर पुलिस की लाठियां टूट पड़ीं. छात्राओं को हॉस्टल में घुस कर पीटा गया. 50 से ज्यादा छात्राओं को गंभीर चोटें आईं.
प्रदर्शन में शामिल और बीएचयू में फूड ऐंड न्यूट्रिशन में एमएससी कर रहीं नेहा सवाल करती हैं, ''हम तो अपनी सुरक्षा की मांग कर रहे हैं, यह भी गुनाह है?'' देश-विदेश में किरकिरी होने के बाद बीएचयू प्रशासन ने विश्वविद्यालय बंद करा दिया. हॉस्टल खाली करवा लिए. चीफ प्रॉक्टर प्रो. ओ. एन. सिंह से इस्तीफा ले लिया गया. यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार भी हरकत में आई. थानाध्यक्ष, सीओ को हटाकर और करीब एक हजार अज्ञात लोगों पर मुकदमा दर्ज कर पल्ला झाडऩे की कोशिश की गई.
लेकिन अभी भी उन सवालों का हल नहीं निकल पाया है जिसने पिछले एक वर्ष के दौरान शिक्षा के इस केंद्र को अराजकता की धुरी बना दिया है. छात्र समुदाय गुस्से में है, शिक्षकों की तैनाती संदेह के घेरे में है, छात्राओं की सुरक्षा का सवाल बड़ा होता जा रहा है, क्षेत्रवाद और जातिवाद के शिकंजे में घिरे बीएचयू में आगे की राह आसान नहीं नजर आ रही है.
छेडख़ानी का दाग
1,360 एकड़ में फैले बीएचयू परिसर के सामने छात्राओं से छेडख़ानी के बढ़ते मामलों को रोकना बहुत बड़ी चुनौती है. बीएचयू के प्रॉक्टर ऑफिस के आंकड़ों के मुताबिक, परिसर में पिछले एक वर्ष के दौरान छेडख़ानी के 50 से ज्यादा मामले सामने आए हैं. इनमें से कई मामलों पर प्रशासन की ढिलाई ने ही परिसर में अराजकता का माहौल पैदा किया है (देखें बॉक्स). बीएचयू के त्रिवेणी संकुल में रहने वाली छात्रा मीनाक्षी शर्मा बताती हैं, ''हॉस्टल से सेंट्रल लाइब्रेरी की दूरी करीब दो किलोमीटर पड़ती है. इसी रास्ते पर सबसे ज्यादा छेडख़ानी के मामले आते हैं पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं किए हैं.''
विश्वविद्यालय के प्रॉक्टोरियल बोर्ड में महिला सदस्यों की संख्या तो पांच है लेकिन महिला सुरक्षाकर्मियों का कोई इंतजाम नहीं है. बीएचयू परिसर में हर वक्त औसतन एक लाख लोग मौजूद रहते हैं और यहां 15,000 से अधिक छात्राएं पढ़ती हैं पर इनकी सुरक्षा भगवान भरोसे ही है. बीएचयू के वाराणसी और मिर्जापुर परिसर को मिलाकर कुल 450 सुरक्षाकर्मी हैं. ये सुरक्षाकर्मी तीन शिफ्ट में काम करते हैं. विश्वविद्यालय के एक सुरक्षा अधिकारी बताते हैं, ''बीएचयू के वाराणसी परिसर के चार मुख्य द्वारों पर तैनाती के बाद करीब तीन दर्जन ही सुरक्षाकर्मी बचते हैं जिनसे पूरे परिसर की निगरानी करा पाना संभव नहीं है.'' बीएचयू की महिला महाविद्यालय की छात्राओं ने केंद्रीय युवा कार्यक्रम और खेलकूद मंत्रालय के संयुक्त सचिव को शिकायती पत्र भेजकर एक असिस्टेंट प्रोफेसर पर यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाया है.
छात्राओं का आरोप है कि ये शिक्षक एनएसएस की ओर से अवार्ड दिलाने, विदेश भेजने जैसे प्रलोभन देकर लड़कियों को अपनी शरण में आने को विवश करते हैं. हालांकि बीएचयू के जनसंपर्क अधिकारी राजेश सिंह बताते हैं, ''विश्वविद्यालय ने इस मामले की जांच कराई थी जो सही नहीं पाई गई.'' छात्राओं से छेडख़ानी के मामले पर बीएचयू प्रशासन के रवैये ने भी परिसर का माहौल खराब किया है. प्रॉक्टोरियल बोर्ड की एक पूर्व सदस्य बताती हैं, ''छेडख़ानी के मामलों में बीएचयू प्रशासन घोर पक्षपात करता है. यही वजह है कि प्रशासन की कार्रवाई से असंतुष्ट छात्र आंदोलन की राह पकड़ते हैं.'' छात्रा नेहा का आरोप है कि इस बार भी छात्राओं के पक्ष में खड़ा होने की बजाए ज्यादातर शिक्षकों और वॉर्डन ने उलटे छात्राओं को धमकाया, उनके अभिभावकों को फोन कर शिकायत की और हॉस्टल छोड़कर घर जाने को मजबूर किया.
शिक्षकों में खेमाबंदी
बीएचयू के प्रशासनिक भवन में प्रवेश करते ही संस्थान के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय की एक उक्ति लिखी है, ''मुझे राज्य की कामना नहीं, मुझे स्वर्ग की कामना नहीं, मुझे मोक्ष की कामना भी नहीं, मेरी एक मात्र कामना बस यही है कि मैं दुखी प्राणियों के दुख दूर करूं.'' उनके संदेश को आत्मसात करने की बजाए शिक्षकों की नियुक्ति और तैनाती में कुलपति की जातिवाद तथा क्षेत्रवाद की कामना ने बीएचयू में शिक्षकों के दो गुट तैयार कर दिए हैं. बीएचयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. कृष्णकांत बताते हैं, ''डॉ. पंजाब सिंह और उसके बाद डॉ. लालजी सिंह के कार्यकाल में बीएचयू में क्षत्रिय जाति के शिक्षकों को नियुक्ति में प्राथमिकता मिली.
अब प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी ने जमकर ब्राह्मणवाद चलाया है. यही वजह है कि शिक्षकों का एक गुट प्रो. त्रिपाठी के खिलाफ खड़ा है.'' बीएचयू के धर्मागम विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. भक्तिपुत्र रोहतम ने कुलपति के खिलाफ राष्ट्रपति से शिकायत की है. डॉ. रोहतम का आरोप है कि क्षत्रिय होने की वजह से साजिशन उन्हें विभाग का प्रोफेसर नहीं बनाकर उनसे जूनियर ब्राह्मण जाति के शिक्षक को प्रोफेसर बना दिया गया है. वैसे कुलपति प्रो. त्रिपाठी ऐसे किसी आरोप को खारिज करते हैं.
वेद विभाग में एक शिक्षक को नियम विरुद्घ प्रोन्नति देने पर भी विवाद खड़ा हो गया है. अभ्यर्थियों की योग्यता जांचने वाले अगर खुद ही अभ्यर्थी बन जाएं तो इसे न्न्या कहेंगे? ऐसी ही उलटी गंगा केमिस्ट्री डिपार्टमेंट में बही. विश्वविद्यालय की नियमावली को ताक पर रखकर आवेदन पत्रों की छंटाई करने वाले फैकल्टी अफेयर्स कमेटी के सदस्यों ने खुद को ही प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के चार पदों के लिए शॉर्ट लिस्ट कर लिया. शिक्षकों के चयन में गड़बड़ी को लेकर भी छात्र कुलपति का विरोध कर रहे हैं.
दागियों को प्रश्रय विवादों में घिरे शिक्षकों को प्रशासनिक पदों पर तैनात करने को लेकर भी कुलपति छात्रों के निशाने पर हैं. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यकर्ता कुलपति के खिलाफ धरना दे रहे हैं. एबीवीपी के काशी प्रांत के प्रदेश मंत्री भूपेंद्र सिंह बताते हैं, श्श्चीफ प्रॉन्न्टर पद पर तैनात रहे डॉ. ओ.एन. सिंह पर झारखंड पीसीएस परीक्षा में गड़बड़ी की जांच चल रही है. वहीं सर सुंदरलाल अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट पर यौन उत्पीडऩ का आरोप सिद्घ हुआ है.
दोषियों को अहम पदों पर तैनात कर कुलपति ने बीएचयू की गरिमा गिराई है.'' अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. ओ.पी. उपाध्याय को 2013 में फिजी की एक कोर्ट ने युवती से यौन उत्पीडऩ का दोषी पाया था. उस वक्त डॉ. उपाध्याय शैक्षिक अवकाश लेकर फिजी में थे. पिछले वर्ष अप्रैल में डॉ. उपाध्याय को अस्पताल का मेडिकल सुपरिटेंडेंट बना दिया गया. कुलपति के इस निर्णय पर बीएचयू की कार्य परिषद ने भी सवाल उठाए हैं. यही नहीं, चीफ प्रॉक्टर के रिश्तेदारों को विश्वविद्यालय में शिक्षक पद पर नियुक्ति के खिलाफ शिक्षक और छात्र लामबंद हैं. परीक्षाओं पर भी सवाल उठे हैं. बीएचयू ने 25 मई को अखिल भारतीय स्तर पर एमसीए की प्रवेश परीक्षा कराई थी.
इसकी मेरिट लिस्ट में एक ही जिले के सर्वाधिक अभ्यर्थियों के नाम आने पर सवाल खड़े हो गए. बीएचयू ने आनन-फानन में परीक्षा रद्द कर बवाल को थामने की कोशिश की. इसी तरह बीएससी (कृषि) की प्रवेश परीक्षा भी रद्द करनी पड़ी थी क्योंकि इसमें एक सेंटर पर निर्धारित दो घंटे से आधा घंटा ज्यादा अभ्यर्थियों को दिया गया. बीएचयू प्रशासन अभी तक प्रवेश परीक्षा से जुड़े उन अधिकारियों की जिम्मेदारी नहीं तय कर पाया है जो इन गड़बडिय़ों के पीछे थे.
विश्वविद्यालय के छात्र विकास सिंह बताते हैं, ''प्रवेश परीक्षाओं में गड़बडिय़ों के आरोपियों को चिह्नित न करने से छात्र गुस्साए हुए हैं. ऐसी गड़बड़ी दूसरी परीक्षाओं में नहीं हुई होगी, इसकी गारंटी नहीं.'' छात्रा नेहा कहती हैं, ''कुलपति, प्रशासन और शिक्षकों की आपसी खींचातान तथा अराजकता का नुक्सान आखिरकार हम स्टुडेंट्स को ही उठाना पड़ता है.'' जाहिर है, शिक्षकों की सियासत और स्वार्थ में फंसकर बीएचयू की प्रतिष्ठा तार-तार हो रही है.
—साथ में सरोज कुमार