रुहेलखंड में सपा के सामने बढ़त बचाने की चुनौती
दूसरे चरण की 67 सीटों का मिजाज कुछ ऐसा है कि जो पार्टी यहां अपना झंडा गाड़ देती है, उसके लिए सत्ता की राह आसान हो जाती है. मुस्लिम प्रभाव वाले इलाके में सपा का दबदबा बनाए रखने में जुटे आजम खान.

बात शुरू करूं, इससे पहले जिन साहिबान को मुझसे जो शिकायत हो, पहले उसे कह लें. लेकिन ध्यान रखें कि अगर किसी ने जमीन पर कब्जा कर रखा है या जिनका सड़क पर बना मकान तोड़ा गया है या जिनके घर का कोई गुंडा जेल में बंद है, तो उनकी मदद न होने के बारे में शिकायत न करें. मुझे किसी बदमाश का वोट नहीं चाहिए. उनके वोटों के बिना मैं हार भी जाऊं तो कोई शिकवा नहीं.'' रामपुर के डुंडई गांव के एक अहाते में यहां से आठ बार के विधायक मोहम्मद आजम खान धीमी आवाज में वोट मांग रहे थे. लोग चारों ओर से उन्हें घेरे थे. पीछे छूट गए लोग गर्दन उचकाकर उनकी झलक पाने को बेताब थे. गांव की सारी सड़कें पक्की थीं. अहाते के बाहर दिन में भी बल्ब जल रहा था. आजम दोपहर बाद से देर रात तक गांवों में लोगों से मिलते रहे. उन्हें न सिर्फ पूरे प्रदेश में पार्टी के प्रचार के लिए भाग-दौड़ करनी है, बल्कि रुहेलखंड में पहले से बेहतर प्रदर्शन करके दिखाना है. असल में, पहले नेताजी और अब अखिलेश यादव इस इलाके का पासबान आजम को ही मानते हैं.
नवाबी दुर्ग को ढहाने के लिए आजम ने सिविल इंजीनियर छोटे बेटे अब्दुल्लाह आजम को मैदान में उतारा है. आजम की छवि के विपरीत 26 साल के अब्दुल्लाह खासे मासूम नजर आते हैं. पर उनकी तकरीरों का तेवर मीठा व्यंग्य और खानदानी गुस्सा लिए होता है. उनकी सुनिए, ''लोगों से मैं दो ही बातें कह रहा हूं. एक, नवाब ने आपको गुरबत और जहालत के अलावा क्या दिया? दूसराः बीएसपी को दिया एक-एक वोट बीजेपी के खाते में जाएगा. हाथी कमल की गोद में बैठने को उतावला है.'' राजनैतिक पंडित गणित लगा रहे हैं कि अब्दुल्लाह इस सीट पर नवाब को तो हरा देंगे, पर ऐसे में यह सीट बीजेपी की झोली में जा सकती है. रात के अंधेरे में उत्तराखंड से सटे स्वार के पीपली नायक गांव में इसका जवाब अब्दुल्लाह ने यों दिया, ''आप जिन सड़कों से चलकर यहां पहुंचे हैं, वे पिछले डेढ़ साल में यहां बनी हैं. गांव-गांव में बिजली पहुंची है. लोगों को पहली बार लग रहा है कि वे नवाबी दौर से जम्हूरियत में पहुंच रहे हैं. यह सब बब्बा (आजम खान) ने ही तो कराया है.''
पर अखिलेश की बोलती बंद करने के लिए बीएसपी और बीजेपी ने कोई कसर नहीं उठा रखी है. पाकीजा जैसी यादगार फिल्म बनाने वाले कमाल अमरोही के शहर अमरोहा के सियासी मिजाज को ही लीजिए. जिले की चारों सीटें पिछली बार सपा के पास थीं. इस बार अखिलेश के कैबिनेट मंत्री महबूब अली को वोट मांगने तक में दिक्कत आ रही है. यहां एक स्थानीय गैंगस्टर की हत्या के बाद से तुर्क बिरादरी महबूब से ऐसी खफा है कि वे वोट मांगने जाते हैं तो लोग गाली-गलौज पर आमादा हो जाते हैं. उन्हें बीएसपी के नौशाद इंजीनियर टक्कर दे रहे हैं. दो-ढाई सौ की भीड़ के साथ डिडौली गांव में संपर्क पर निकले नौशाद कहते हैं, ''शिवकास का झूठा गाना गाने से गुंडाराज छिप नहीं जाएगा.'' इस बार जिले की दो सीटों पर बीएसपी, तो एक सीट पर बीजेपी कड़ी टक्कर दे रही है.
तभी पार्टी ने बिजनौर सीट से सुचि चौधरी को टिकट दिया है. वे पिछले साल 16 सितंबर को यहां के पेदा गांव में मुसलमानों पर हुए हमले के मुख्य आरोपी मौसम चौधरी की पत्नी हैं. इस कांड में चार मुसलमानों की हत्या हुई थी. मौसम और 20 से अधिक लोग तभी से जेल में हैं. सुचि के प्रचार में लगे शुभम चौधरी मामले को इस तरह बताते हैं, ''25 निर्दोष लोगों को जेल में बंद कर रखा है. पूरा हिंदू समाज एकजुट है. इस बार तो दलित भी बीजेपी को वोट देंगे.'' बिजनौर में पिछली बार बीजेपी और सपा को दो-दो सीटें और बीएसपी को चार सीटें मिली थीं.
सीटों के ये समीकरण मौसम के मिजाज की तरह बदलते हैं. पुरानी सांख्यिकी चाहकर भी कयास लगाने में बहुत मददगार नहीं है, क्योंकि 2007 विधानसभा चुनाव में बीएसपी, 2012 विधानसभा चुनाव में सपा और 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी यहां बुलंदी देख चुकी है. 2017 इन तीनों से अलग है. तो क्या इस बार ध्रुवीकरण की धार से बीजेपी और मुसलमानों के बीच कड़ी मेहनत से बीएसपी, सपा का खेल बिगाड़ देगी? अगले दिन प्रचार अभियान पर निकल रहे आजम खान ने जवाब दिया, ''हम रिश्ते जोडऩा जानते हैं. पार्टी के भीतर रिश्तों को ही तो जोड़ा है. समाज को भी जोड़ेंगे. अखिलेश जी कम कह रहे हैं, इस बार 300 से ज्यादा सीटें आएंगी.'' तभी वसीम बरेलवी का एक मिसरा दिमाग में घूम गयारू ''हम फकीरों की दुआएं रायगां नहीं जातीं.'' क्या ये दुआएं रुहेलखंड में वोटरों की हर चुनाव के साथ झूला झूलती मानसिकता को एक ही तरफ रोक पाएंगी?