मध्य प्रदेश के खेतों में लहलहाई उम्मीद
मध्य प्रदेश में खेती उछाल मार रही है पर दूसरी ओर दस साल में 11 लाख से ज्यादा किसान खेती छोड़ गए.

मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के चित्तोरा गांव के प्रगतिशील किसान सोहैल खान रोज सुबह अपना ट्रैक्टर लेकर कीचड़ भरे रास्तों से होते हुए धान के खेतों की ओर निकल पड़ते हैं. पिछले पांच साल के दौरान धान की खरीद के लिए चावल कंपनियों ने जब से इस इलाके का रुख किया है, खान तब से लगातार धान बो रहे हैं और मुनाफे की फसल काट रहे हैं. खान के पास खेती के लिए मौजूद उपकरणों में ट्रैक्टर, हाइड्रॉलिक युक्त हेवी ड्यूटी ट्रॉलियां, हल, ड्रिल और स्प्रे शामिल हैं. सभी अच्छी स्थिति में हैं और इन सभी को उन्होंने खेती से हुई अपनी आय से खरीदा है. देखकर समझ में आ जाता है कि खान को अपने काम पर गर्व है और यह गर्व उन्हें अपने काम में हासिल महारत से होता है. वे कहते हैं, ''मेरे पास अगर चुनने का विकल्प होता, तब भी मैं पेशे के बतौर कोई और काम नहीं करता. '' वे जब खेतों में होते हैं तो हाथों से निराई और कीटनाशकों के छिड़काव के काम पर बारीक निगाह रखते हैं ताकि मजदूरों से एक भी क्यारी छूटने न पाए. वे जानते हैं कि उनकी फसल ही उनका सोना है. वे भले देर शाम थके-हारे घर लौटेंगे, लेकिन उनके मन में संतोष होगा कि आज से कुछ महीनों बाद उनके खेतों से बंपर पैदावार होगी.
यह सारा कायाकल्प मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में हुआ है और इस मुद्दे के साथ उनका सीधा जुड़ाव भी है. वे महीने में कम से कम दो से तीन बार भोपाल से 60 किलोमीटर दूर स्थित विदिशा जिले के बैस गांव में अपने खेतों का दौरा करते हैं. वहां जाकर वे अपने अनार के खेतों और पॉलीहाउस—एक किस्म का ग्रीनहाउस—का निरीक्षण करते हैं जिसमें गेरबेरा डेजी फूल की खेती होती है. वे इस बात का ध्यान रखते हैं कि उनके फूल बाजार में किस दाम पर बिक रहे हैं. अपने राजनैतिक करियर में 'किसानपुत्र' की उपाधि का कामयाब इस्तेमाल कर चुके शिवराज आजकल खुद किसान की भूमिका में हैं. वे विभिन्न जनसभाओं में प्रदेश के 98.8 लाख किसानों को सलाह दे रहे हैं कि कैसे परंपरागत खेती को छोड़कर खेती के प्रगतिशील तरीके अपनाए जाएं ताकि खेती लाभ का सौदा बन सके. हालांकि मध्य प्रदेश में कृषि के कायाकल्प का सारा श्रेय अकेले उन्हें ही नहीं दिया जाना चाहिए. इसके पीछे कई वजहें हैं जिनमें से एक है खुद यहां के किसानों का उद्यमी स्वभाव.
दस साल पीछे जाकर 2005 में देखें तो उस वक्त मध्य प्रदेश के किसानों के लिए संपन्नता की फसल बताया जा रहा सोयाबीन अचानक कुछ अहम संकटों में फंस गया था. मसलन कम निर्यात, खराब बारिश और कीट नियंत्रण की दिक्कत. अस्सी के दशक के बाद से सोयाबीन की खेती की शुरुआती कामयाबी ने मशीनीकरण और गांवों की संपन्नता में पर्याप्त योगदान दिया लेकिन 2005 में इस फसल से मिलने वाला फायदा कम हो गया. किसानों को अब किसी और चमत्कार का इंतजार था. इसके बाद ही किसानों को बासमती की खेती बेहतर विकल्प के तौर पर नजर आई (मध्य प्रदेश फिलहाल अपनी चावल की फसल को 'बासमती' का दर्जा दिलवाने की कानूनी लड़ाई लड़ रहा है जो कि एक भौगोलिक टैग है, जैसे चाय के लिए दार्जिलिंग या स्पार्कलिंग वाइन के लिए 'शैम्पेन.' अब तक मध्य प्रदेश के चावल को यह दर्जा नहीं मिला है).
इस इलाके में बढ़ती संपन्नता के बारे में रायसेन जिले की बाई तहसील के किसान धर्मेंद्र चौहान एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं, ''कुछ साल पहले पड़ोसी गांव का एक किसान अपनी फसल बेचने के बाद घर लौटते वक्त रात को मेरे पास आया. उसने कहा कि उसके पास एक बोरा है जिसे वह साथ नहीं ले जाना चाहता. वह उसे मेरे पास छोड़कर जाना चाहता था. मैंने उससे कहा कि उसे शेड में रख दे और पूछा कि उसमें क्या है. जब उसने बताया कि उसमें 600 क्विंटल धान की बिक्री से आया पैसा है, तो मैं हैरान रह गया. मैंने उसे बोरे को कमरे में ताले में बंद कर के रखने को कहा.''
इस इलाके की संपन्नता बढ़ी तो उपभोक्ता सामग्री बनाने वाली कंपनियों में भी इसे अपने पक्ष में करने की होड़ लग गई. खासकर वाहनों की बिक्री बढ़ गई. महिंद्रा के डीलर विन विन ऑटोमोबाइल्स के वीरेंद्र सिंह कहते हैं, ''नर्मदा के दोनों ओर रायसेन और होशंगाबाद में तीन साल तक एसयूवी की बिक्री में लगातार 30 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. ऐसा किसानों के धान की खेती को अपनाने से मुमकिन हुआ. बुंदेलखंड को छोड़ दें तो सभी इलाकों में बिक्री में इजाफा दर्ज किया गया था. इसी तरह ट्रैक्टरों की बिक्री में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई.''
अगर सरकार की ओर से कुछ हस्तक्षेप नहीं किए गए होते, तो यह कामयाबी शायद मुमकिन न हो पाती. इसमें एक अहम काम सिंचाई के लिए पानी का पक्का इंतजाम कराना रहा है. पहले से घोषित सिंचाई परियोजनाओं के कार्यान्वयन में तेजी लाई गई और जलक्षेत्र की पुनर्संरचना का काम भी किया गया जिसमें विश्व बैंक से मिले सहयोग का भी योगदान रहा है. ग्रामीण विकास विभाग ने भी पैदावार की इस वृद्धि में मनरेगा के तहत कपिल धारा जैसी कुछ योजनाओं के जरिए योगदान दिया. प्रमाणित बीजों की बढ़ी हुई उपलब्धता भी राज्य सरकार के हस्तक्षेप का परिणाम थी. इसे वृद्धि का मुख्य चालक माना गया और बीते 20 वर्षों में प्रमाणित बीजों की उपलब्धता में नौगुने का इजाफा हुआ है. इसी तरह आज से पांच साल पहले तक मध्य प्रदेश की कृषि में खाद की कमी का रोना हमेशा बना रहता था लेकिन अग्रिम भंडारण जैसी प्रशासनिक योजनाओं ने किसानों के लिए इसकी उपलब्धता में इजाफा किया है.
खेती के लिए बिजली की उपलब्धता ऐसा ही एक अन्य कारक है. पिछले कुछ समय से मध्य प्रदेश में बिजली का मुद्दा काफी विवादपूर्ण रहा है तथा बीजेपी ने 2003 के विधानसभा चुनावों में बिजली, सड़क और पानी का मुद्दा उठाया था जिसके चलते कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई थी. यहां 2008 में पंपों के लिए बिजली की उपलब्धता 0.80 किलोवॉट प्रति हेक्टेयर थी लेकिन 2013-14 में यह बढ़कर प्रति हेक्टेयर 1.36 किलोवॉट हो गई है. खेती के लिए करीब 16.1 अरब यूनिट बिजली मुहैया कराई जा रही है जबकि 2009-10 में यह उपलब्धता सिर्फ 6.7 अरब यूनिट थी.
कामयाबी की इस रक्रतार को बनाए रखने के लिए राज्य सरकार ने मिट्टी की सेहत पर अपना जोर केंद्रित करने का फैसला किया है ताकि यह पता लग सके कि किस किस्म की खादों की जरूरत होगी. 10.7 करोड़ किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड दिए जाएंगे तथा मौसमी बदलावों के बेहतर पूर्वानुमान के लिए राज्य में 1,200 ऑटोमेटेड मौसम केंद्र और 33,000 रेन गेज स्थापित किए जाएंगे. जरूरत के हिसाब से खेती के उपकरणों को मुहैया कराने पर भी जोर है ताकि मशीनों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा सके. गर्मियों में तीसरी फसल चक्र के लिए ज्यादा रकबा बढ़ाने पर भी जोर होगा जो फिलहाल 3.6 लाख हेक्टेयर है.
राज्य सरकार ने अगले पांच साल में खेती से होने वाली आय को दोगुना करने का लक्ष्य भी रखा है. वैसे आलोचक एक दिलचस्प आंकड़े की ओर ध्यान दिलाते हैं जो प्रदेश की कामयाबी की इस दास्तान पर दाग की तरह नजर आता है. राज्य में 2001 की जनगणना के हिसाब से 1.1 करोड़ किसान थे लेकिन 2011 की जनगणना में यह संख्या घटकर 98.8 लाख रह गई यानी दस साल में 11.2 लाख लोग खेती को छोड़कर चले गए. मध्य प्रदेश में खेती अगर असल में फायदे का सौदा थी तो किसानों ने खेती क्यों छोड़ी? यह सवाल कुछ आलोचक पूछ रहे हैं. इतना ही नहीं, 2001 में 70 लाख लोग खेतिहर मजदूर थे जबकि 2011 में यह संख्या बढ़कर 1.22 करोड़ हो गई. क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि किसान खुद अपनी ही जमीन पर मजदूर में तब्दील होता जा रहा है या फिर मजदूरों की तादाद में इजाफा कहीं और से हुआ है?