सिनेमाः सच ही हिट है

बॉलीवुड में बायोपिक की बहार है. नई कहानियों के शौकीन दर्शक सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्माें पर जमकर प्यार लुटा रहे. साल 2016 की दो सबसे बड़ी हिट एयरलिफ्ट और नीरजा इसी का उदाहरण हैं.

साल 2016 की दो सबसे बड़ी हिट एयरलिफ्ट और नीरजा में एक बात समान थी. दोनों ही सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्में थीं. बहादुर फ्लाइट अटेंडेंट नीरजा भनोट की जीवनी पर फिल्म बनाते हुए निर्देशक राम माधवानी के दिमाग में एक बात साफ थी कि वह पैनएम की उस फ्लाइट के 250 यात्रियों को महज एक्सट्रा नहीं दिखाना चाहते थे. माधवानी कहते हैं, ''वे मेरी पृष्ठभूमि नहीं बल्कि मेरी अग्रभूमि हैं. निगाह ठीक इसी जगह जाएगी. मनुष्य के नाते मेरा केंद्रबिंदु उथला नहीं है.'' उनकी कास्टिंग डायरेक्टर कणिका बेरी ने दहशत दिखा पाने वाले माकूल चेहरों की तलाश में हजारों कलाकारों को परखा. उनके एसोसिएट डायरेक्टर विनोद रावत ने वर्कशॉप आयोजित कीं और यहां तक कि कुछ यात्रियों को पृष्ठभूमि से जुड़ी कहानियों का जिम्मा सौंपा. अदाकारी में असलियत लाने के लिए यात्रियों को पासपोर्ट और टिकट के साथ विमान में बोर्ड करवाया गया.

यह विमान मुंबई के बोरिवली में बनाया गया था. शूटिंग के पहले कुछ दिन माधवानी ने कलाकारों का हौसला बढ़ाने के लिए बमन ईरानी को सेट पर आमंत्रित किया. ईरानी कहते हैं, ''कोई रोल छोटा नहीं होता, सिर्फ अदाकार छोटे होते हैं.'' विमान में सवार होने के बाद सेट डिजाइनर अपर्णा सूद ने मुकम्मल इंतजाम किया कि बाथरूम से लेकर इंटरकॉम तक और पीने के पानी की मशीन तक हर चीज सही तरीके से काम करे. माधवानी ने कहा, ''यह सेट नहीं है. यह असली चीज है. अगर यह नहीं होती, तो आप महसूस नहीं कर पाते.''

दूसरी कई वजहों के अलावा छोटी से छोटी बारीकी पर ध्यान देने का ही नतीजा था कि प्रचार और विज्ञापन पर हुए खर्च को मिलाकर कुल 21 करोड़ रु. में बनी नीरजा ने बॉक्स ऑफिस पर 75 करोड़ रु. बटोरे और महीने भर से ज्यादा सिनेमाघरों में चली. नीरजा के अलावा राजा कृष्ण मेनन की एयरलिफ्ट इराक के कब्जे के दौरान कुवैत से एक लाख हिंदुस्तानियों को निकालकर लाने की घटना पर केंद्रित है और 2016 की यह अकेली फिल्म है जिसने 100 करोड़ रु. का आंकड़ा पार किया. इन दोनों फिल्मों की कामयाबी इस बात का सबूत है कि हकीकत केवल चुभती ही नहीं, बिकती भी है.

यह इस बात का उत्साहवर्धक संकेत भी है कि दर्शकों की उम्मीदें भी बढ़ गई हैं और वे अब असली नायकों को देखने के लिए तैयार हैं और यहां तक कि नायिकाएं भी असली देखना चाहते हैं. अगर पर्दे पर बहादुरी के कारनामे दिखाए जाते हैं और वे आपकी आंखों में कुछ आंसू ला पाते हैं या देशभक्ति की भावनाएं जगा पाते हैं, तब तो और भी अच्छा.

बॉलीवुड अब ऐसी कहानियां सुनाने में जी-जान से जुटा है, जो उसे उम्मीद है कि ज्यादा समझदार होते जा रहे दर्शकों को छुएंगी. इसीलिए फिल्म निर्माता दमदार चरित्रों और उनकी प्रेरक कहानियों को रौशनी मं  ला रहे हैं. अभी तक रुझान यह रहा है कि फिल्म निर्माताओं ने खुद को केवल सियासतदानों तक ही सीमित रखा था. अब ऐसा नहीं है. अगर 2016-17 में आने वाली फिल्मों की फेहरिस्त पर नजर दौड़ाएं, तो आप पाएंगे कि उनमें खेल जगत के नायकों और विवादों में घिरे चरित्रों की जिंदगी पर बन रही फिल्में शुमार हैं. उमंग कुमार की सरबजीत और टोनी डिसूजा की अजहर मई में सिनेमाघरों में लगेंगी. उसके बाद रुस्तम (अगस्त), धोनीः द अनटोल्ड स्टोरी (सितंबर) और आमिर खान की अदाकारी से सजी दंगल (दिसंबर) आएंगी.

अनुराग कश्यप की आरआर 2.0 (मई) में बताया जाता है कि नवाजुद्दीन सिद्दीकी 1960 के दशक में मुंबई को दहला देने वाले सीरियल किलर रमन राघव के समकालीन अवतार में आ रहे हैं. यहां तक कि शाहरुख खान के साथ राहुल ढोलकिया की फिल्म रईस की कहानी भी गुजरात के डॉन अब्दुल लतीफ की जिंदगी से मिलती-जुलती बताई जाती है. हालांकि ढोलकिया ने दोनों में समानता होने से इनकार किया है और कहा है कि ईद पर रिलीज हो रही यह फिल्म ''काल्पनिक कहानी है और किसी भी शख्स की असल जिंदगी पर आधारित नहीं है.''

बायोपिक्स या जीवनी पर आधारित फिल्में मोटे तौर पर उस शख्स की तस्दीक से बनाई जाती हैं जो फिल्म की प्रेरणा होते हैं, या कम से कम उनके परिवार के सहयोग और समर्थन से तो बनाई ही जाती हैं. नीरजा और आने वाली फिल्म सरबजीत इसकी मिसाल हैं. निर्देशक उमंग कुमार जानते हैं कि बायोपिक का तानाबाना किस तरह बुना जाता है. अपनी पहली फिल्म में उन्होंने दिखाया था कि मैरी कॉम किस तरह तमाम रुकावटों को पार करके आखिरकार ओलंपिक पदक जीतने वाली मुक्केबाज बनीं. अपनी अगली बायोपिक के लिए वे हिंदुस्तानी किसान सरबजीत सिंह की बहन दलबीर कौर से मिले और उनके साथ बातचीत रिकॉर्ड की.

सरबजीत को पाकिस्तान में जासूसी के आरोप में पकड़कर जेल में डाल दिया गया था, ताउम्र उनके सिर पर फांसी का फंदा लटकता रहा और 2013 में उनकी हत्या कर दी गई. कुमार को कौर के लगातार जूझते रहने के हौसले ने आकर्षित किया. इसी की बदौलत वे अपने भाई की रिहाई के लिए अकेले अपने दम पर जंग लड़ती रहीं. कुमार कहते हैं, ''कहानी के विषय का या उसके नजदीकी संबंधी का भरोसा जीतना अहम बात है.'' उमंग कुमार ने सरबजीत सिंह के किरदार में रणदीप हुडा को और दलबीर कौर के किरदार में ऐश्वर्य राय को लिया है. कुमार को लगता है कि बायोपिक बनाते वक्त फिल्मकार की जिम्मेदारी और भी ज्यादा बढ़ जाती है. वे कहते हैं, ''आपको खास तौर पर और भी ज्यादा सतर्क रहना होता है, क्योंकि आप जिस चीज पर काम कर रहे हैं, वह आखिर किसी की जिंदगी है.''

पटकथा लिखने के दौरान हकीकत से थोड़ी-बहुत छेड़छाड़ तो स्वाभाविक है, मगर अहम बात यह है कि जिस शख्स की जिंदगी पर फिल्म बनाई जा रही है, उसे बताना जरूरी रहता है कि लेखक ने कौन-कौन-सी सिनेमाई छूट ली हैं.

सचाई की ताकत इस बात पर भी गौर करना जरूरी है कि बायोपिक डॉक्यूमेंट्री फिल्में नहीं हैं. माधवानी कहते हैं, ''हालांकि जिंदगी की और इतिहास की सचाई में मेरी दिलचस्पी है, मगर मेरी दिलचस्पी मनोवैज्ञानिक और जज्बातों की सचाई में भी है. इसे दिखाने का एक तरीका तो यह है कि किरदार ने ऐसा किया था या किरदार ऐसा महसूस करता या सोचता था.''

बकौल माधवानी, तरकीब यह है कि दर्शकों के दिल के तार तो छेड़े जाएं, मगर ''धोखेबाजी और बेईमानी का सहारा लिए बगैर.'' वे कहते हैं, ''आप हंसने, रोने और महसूस करने के लिए आ रहे हैं. आप यह कहने के लिए नहीं आ रहे हैं कि फिल्म सही-सही तथ्यों पर तो आधारित थी, मगर बहुत खराब फिल्म थी.''

नीरजा और सरबजीत सरीखी फिल्मों के लिए फिल्मकारों को या तो कल्पना करनी पड़ती है या नजदीकी रिश्तेदार की बातों पर भरोसा करना पड़ता है कि फिल्म के मुख्य किरदार पर क्या गुजरी थी. भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और मोहम्मद अजहरुद्दीन सरीखी  हस्तियों पर बन रही फिल्मों के मामले में ऐसा नहीं है.

जाने-पहचाने रहस्यों का खुलासा
लोकप्रिय शख्सियत पर फिल्म बनाना दोधारी तलवार भी हो सकती है. एक तरफ तो धोनी और अजहरुद्दीन पर बनी फिल्मों को बेचना आसान हो जाता है, बजाए पहाड़ काटने वाले शख्स पर बनी मांझीः द माउंटेन मैन (2015) या गलत आरोपों में फंसा दिए गए लोगों के मुकदमे लडऩे वाले वकील पर बनी शाहिद (2014) के. जहां अजहर और एम.एस. धोनीः द अनटोल्ड स्टोरी के फिल्म निर्माताओं के पास ज्यादा जाने-पहचाने नायक हैं, वहीं वे एक चुनौती से भी घिरे हैं. उन्हें अपने नायकों की ऐसी कहानियां सामने लानी हैं, जो अखबारों या टेलीविजन पर नहीं आई हैं और बनिस्बत कम जानी जाती हैं. इमरान हाशमी की अदाकारी से सजी अजहर के लेखक रजत अरोड़ा इसे बड़ी चुनौती मानते हैं.

अजहर के स्वघोषित फैन अरोड़ा कहते हैं कि यह बेहद जरूरी है कि लेखक 'आभामंडल के फुसलावे में' न आए और ''उस शख्सियत के पीछे के शख्स की तलाश करे.'' अरोड़ा ने अजहरुद्दीन से 'व्यवहार के बारे में पूछने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें प्रेरित करने वाली बातों को समझने के लिए' मुलाकातें कीं. एक के बाद एक हर बैठक में अरोड़ा को जैसे-जैसे पूर्व कप्तान के व्यक्तित्व की ''कई जटिलताओं'' के बारे में पता चलता गया, वैसे-वैसे कहानी की परतें खुलती गईं. इसी वजह से यह पूरी प्रक्रिया भी दिलचस्प हो गई.

अलबत्ता इस विधा की फिल्में पूरी तरह लेखक के हाथ में नहीं होतीं. अदाकारों को सिर्फ किरदार को ही नहीं देखना होता, उन्हें उसके जज्बे को पर्दे पर उतारना होता है. धोनी के किरदार को निभाने के लिए सुशांत सिंह राजपूत ने 11 महीनों तक प्रशिक्षण लिया, जिसमें मशहूर हेलिकॉप्टर शॉट को साधना भी शामिल था. गाजी में एक नौसैनिक अफसर का किरदार निभाने के लिए राणा डग्गुबत्ती को पानी के भीतर प्रशिक्षण लेना पड़ा. गाजी पाकिस्तानी पनडुब्बी के डूबने और साथ ही 1971 की भारत-पाकिस्तान लड़ाई के दौरान 18 दिन तक फंसे रहे हिंदुस्तानी नौसैनिक जहाज एस21 के सदस्यों पर दो भाषाओं तमिल और हिंदी में बन रही फिल्म है.

बॉलीवुड में हकीकत का यह नया उभार किसी सनक का नतीजा नहीं है. कंगना रनोट को रानी लक्ष्मीबाई पर बन रही फिल्म से जोड़ा गया है, जिसका निर्देशन केतन मेहता कर रहे हैं. जावेद अख्तर एक पटकथा लिख रहे हैं जिसमें बताया जाएगा कि बंटवारे के बाद की भीषणता के बीच भी भारत की हॉकी टीम ने किस तरह ओलिंपिक गोल्ड मेडल जीता था. असल जिंदगी के मुकाबले बेहद भारी-भरकम फिल्मों के लिए पहचाना जाने वाला बॉलीवुड सयाना हो रहा है और हकीकत के नजदीक आ रहा है.

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