देश का मिजाजः तंगहाली और महंगाई से मोदी का जादू हवा

अच्छे दिनों का चुनावी वादा जमीन पर नहीं उतरा तो बेहतर भविष्य के लिए नरेंद्र मोदी की ओर झुके लोगों में भारी मोहभंग दिखने लगा.

अमूमन दुनिया भर में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारें अपने कार्यकाल के बीच में घिसटने लगती हैं. नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली एनडीए सरकार भी इस मामले में अपवाद नहीं है. इंडिया टुडे-कर्वी इनसाइट्स देश का मिजाज जनमत सर्वेक्षण 2016 से पता चलता है कि प्रधानमंत्री 2014 में 57 फीसदी के साथ लोकप्रियता की बुलंदी से ढलान पर हैं जबकि राहुल गांधी की लोकप्रियता का ग्राफ लगातार चढ़ रहा है. पिछले छह महीने में ही राहुल की लोकप्रियता 8 फीसदी से 22 फीसदी पर पहुंच गई है. मोदी अब भी 40 फीसदी पर आगे चल रहे हैं लेकिन मौजूदा सत्ता विरोधी रुझान आगे भी जारी रहा, तो कहना मुश्किल है कि भविष्य में यह सियासी ज्वार कहां पहुंचेगा.

राहुल की लोकप्रियता में इस उफान की वजह क्या है? आखिर एनडीए 2014 की आरामदेह स्थिति से नीचे कैसे आ गया? दोनों का ही जवाब अर्थव्यवस्था में छिपा है. इसकी वजहें वास्तविक भी हैं और लोगों की धारणा से जुड़ी हुई भी. जनमत सर्वेक्षण 2016 के निष्कर्ष जहां लोगों की निगाह में बढ़ती आर्थिक असुरक्षा का अक्स दिखा रहे हैं, वहीं आर्थिक आंकड़े दिखाते हैं कि अर्थव्यवस्था संकट में है.

अहम आर्थिक मामलों पर सर्वेक्षण के नतीजों पर एक निगाह डालें. सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश (53 फीसदी) लोग मानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी विदेश से काला धन वापस लाने के अपने मुख्य चुनावी वादे को पूरा करने में नाकाम हो गए हैं, जबकि सिर्फ 33 फीसदी लोग मानते हैं कि वे अब भी ऐसा कर सकते हैं. यही 53 फीसदी लोग यह भी मानते हैं कि मोदी सरकार अच्छे दिन लाने में नाकाम रही है जो कि एक अहम चुनावी वादा था. सिर्फ 40 फीसदी लोग मान रहे हैं कि वे ऐसा करने में कामयाब हुए हैं. इनमें 51 फीसदी लोग मानते हैं कि मोदी के सत्ता में आने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है जबकि 43 फीसदी मानते हैं कि उनकी जिंदगी में सुधार आया है.

अल्पसंख्यकों के बीच 65 फीसदी ऐसे हैं जो मानते हैं कि मोदी के सत्ता में आने के बाद उनकी आर्थिक हैसियत जस की तस है. मोदी सरकार देश में गरीबी कम करने में कामयाब हुई है या नहीं, इस पर 57 फीसदी लोग सोचते हैं कि सरकार ऐसा नहीं कर पाई है जबकि 37 फीसदी इस पक्ष में हैं कि ऐसा हुआ है. अल्पसंख्यकों के बीच धारणा और बुरी हैः 69 फीसदी मानते हैं कि मोदी गरीबी दूर करने में नाकाम रहे हैं, सिर्फ 24 फीसदी मानते हैं कि वे इसमें कुछ कामयाब रहे हैं.

भ्रष्टाचार को काबू में रखने के एनडीए सरकार के दावे से 59 फीसदी लोग सहमत नहीं हैं जबकि 32 फीसदी मानते हैं कि भ्रष्टाचार नियंत्रण में है. अल्पसंख्यकों में 69 फीसदी लोगों की राय में भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं आई है, सिर्फ 20 फीसदी ही सरकार के दावे पर भरोसा कर रहे हैं.

यही हाल महंगाई का है. इसे काबू में रखने के सरकार के दावे पर कोई ऐतबार नहीं करता. कुल 58 फीसदी लोग कहते हैं कि मोदी सरकार कीमतों को नीचे ला पाने में नाकाम रही है, सिर्फ 34 फीसदी इसके विरोध में हैं. अल्पसंख्यकों में 68 फीसदी लोग मानते हैं कि मोदी इस मोर्चे पर नाकाम रहे हैं. सिर्फ 28 फीसदी उन्हें इसका श्रेय देते हैं.

लोगों की धारणा और सरकारी दावे में यही फर्क सरकार के खिलाफ माहौल को हवा दे रहा है. सरकार इन गंभीर मसलों की ओर से आंखें मूंदे हुए है जबकि राहुल गांधी इन मसलों को उठा रहे हैं. राहुल ने 8 दिसंबर, 2015 को पुदुच्चेरी  और तमिलनाडु के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों कुड्डलूर और चेन्नै का दौरा किया, तो 23 जनवरी को वे सूखा प्रभावित बुंदेलखंड में पदयात्रा पर निकल गए जहां माना जा रहा है कि बीते एक साल में 400 किसान खुदकुशी कर चुके हैं. उनकी यह सक्रियता उनके लोकप्रियता के ग्राफ को लगातार बढ़ाती जा रही है.

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर देखें तो गांवों का संकट भीषण है. 29 में से कुल 18 राज्य लगातार दूसरे साल सूखा झेल रहे हैं. इसके चलते किसानों की खुदकुशी के मामलों में इजाफा हुआ है. ट्रैक्टरों और दोपहिया वाहनों की बिक्री में गिरावट आई है, जो सीधे तौर पर ग्रामीण आर्थिक संकट का सूचक है.

बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई ने लोगों में नाराजगी, भय और हताशा को पैदा किया है जिसकी झलक सड़कों पर देखी जा सकती है. कुल 30 जिंसों में से 23 का निर्यात पिछले एक साल में लगातार गिरा है. शून्य से पांच फीसदी नीचे जा चुका निर्यात 2014-15 में 7.2 फीसदी के ऊपर वृद्धि दर के सरकारी अनुमान पर शक पैदा कर रहा है. सरकारी बैंकों के डूबत कर्जों (एनपीए) में भारी इजाफा हुआ है.

सीएसओ अनुमानों के मुताबिक, उत्पादन क्षेत्र में 2014-15 के दौरान मामूली 2.3 फीसदी की वृद्धि हुई है. मोदी के नेतृत्व में भारतीय अर्थव्यवस्था के कायाकल्प की उक्वमीद में बाजार का जुनून न सिर्फ बैठा है बल्कि वह प्रतिकूल आशंकाओं में घिरता जा रहा है. सिर्फ अमेरिकी डॉलर चढ़ रहा है.

फरवरी 2014 में मोदी की जीत की उम्मीद में चढ़ता हुआ शेयर बाजार, जो मई 2014 में उनकी जीत पर शिखर पर पहुंच गया था, अब फिर से गोता लगाकर पुराने ढर्रे पर आ गया है. शेयर सूचकांक 28 जनवरी, 2015 के उच्चतम स्तर 29,559 से गिरकर इस साल फरवरी में 22,98 6 पर आ चुका है. इसका दोष चीन की सुस्ती को दिया जा सकता है लेकिन देश का मिजाज सर्वेक्षण दिखाता है कि लोग मोदी सरकार को भी इसका बराबर का दोषी मानते हैं. विदेश नीति की कामयाबियों के चलते मोदी का करिश्मा अब भी भले थोड़ा बरकरार हो, लेकिन आर्थिक संकट को सुलझाने के लिए एनडीए अब भी अंधेरे में तीर मारता नजर आ रहा है.

लोकतंत्र में मतदान का मानक नुस्खा यह है कि “जब मतदाता को यह लगने लगता है कि उसकी आर्थिक स्थिति में गिरावट आई है तो वह सत्तारूढ़ दल या नेता के खिलाफ  वोट करता है क्योंकि वह उसे ही अपनी बदकिस्मती का कारण मानता है.” लोकतांत्रिक सरकारों की हार का यह सबसे ठोस कारण होता है. भारत का मतदाता महसूस कर रहा है कि उसकी आर्थिक स्थिति महंगाई के कारण खराब हुई है क्योंकि अनौपचारिक और कृषि क्षेत्रों में कमाई महंगाई के बढऩे से नहीं बढ़ती है जबकि इन्हीं क्षेत्रों में सबसे ज्यादा लोग रोजगार में लगे हैं और अपना जीवन बसर करते हैं. बेरोजगारी, गरीबी कम करने वाली नीतियों की कमी में नाकामी और प्रशासनिक भ्रष्टाचार मिलकर सीधे तौर पर गरीब को आर्थिक रूप से प्रभावित करते हैं.

देश का मिजाज जनमत सर्वेक्षण के नतीजों में आर्थिक मोर्चे पर नाकामी एनडीए की लोकप्रियता में ढलान और कांग्रेस का ग्राफ बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है. अर्थव्यवस्था के व्यापक संकट को दुरुस्त करने जितना ही जरूरी यह भी है कि ग्रामीण संकट को हल किया जाए. विदेश नीति की कामयाबियां तब तक किसी सत्ता को दोबारा चुने जाने में मदद नहीं करती हैं जब तक कि कोई जंग न हो.

भारी बहुमत चौंकाने वाली हार में भी तब्दील हो सकता है, जैसा कि 1989 में राजीव गांधी का अनुभव रहा था. मोदी अगर सत्ता विरोधी माहौल को दुरुस्त करना चाहते हैं, तो उन्हें सबसे पहले अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने पर ध्यान देना होगा. यूपीए-1 सरकार 2009 में सत्ता विरोधी माहौल से निपटनें में इसलिए आंशिक रूप से कामयाब हो गई थी क्योंकि सरकार ने देश को वैश्विक मंदी के चक्कर में नहीं पडऩे दिया था और तब भी अर्थव्यवस्था 8 फीसदी से ऊपर की वृद्धि दर पर मंडरा रही थी.

वैश्विक अर्थव्यवस्था कमजोर है और यह कभी भी दोबारा मंदी का शिकार हो सकती है, लिहाजा मोदी के पास वैश्विक वृद्धि के कंधे पर अपनी नाव पार लगाने का कोई मौका नहीं है. उनकी सरकार को इस आर्थिक संकट को पलटना ही होगा वरना उसके खुद पलटे जाने का खतरा पैदा हो जाएगा. अगर ऐसा हुआ, तो मोदी के नेतृत्व वाला एनडीए 2019 में एनडीए-1 की 2004 वाली कहानी को दोहराता दिखेगा.

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