सेक्स सर्वेक्षणः आखिर औरतों को क्यों है ज्यादा की हसरत

लड़कियों ने बेशक अपना जीवनसाथी चुनने जैसा भारी-भरकम काम अपनी मम्मियों को सौंप रखा है लेकिन वे पहले अछूते रहे लक्ष्य यानी सेक्स का आनंद उठाने को अपने हाथों में ही लिए हुए हैं. शादी इंतजार कर सकती है लेकिन चरमसुख हासिल करने को नहीं टाला जा सकता.

अगर लोगों के हाल के संस्मरणों को बढ़ते आंकड़ों के आईने में रखकर देखें तो हमें यह बात माननी ही पड़ेगी कि भारत यौन क्रांति के बीचोबीच खड़़ा है. कुछ हफ्ते पहले ही अमेरिका आधारित ऐप टिंडर उस समय सुर्खियों में आया था जब उसने अपना एकमात्र इंटरनेशनल ऑफिस भारत में खोलने का ऐलान किया था. टिंडर ऐसा ऐप है जो डिजिटली 'हुक-अप कल्चर' यानी मौज-मस्ती केलिए साथी ढूंढने संबंधी कवायद में मददगार साबित होता है. यह एक बहुत ही सोचा-समझा कदम था, जिसके पीछे पिछले साल भर में ऐप डाउनलोड में 400 फीसदी की वृद्धि, 75 लाख डेली स्वाइप्स, रोजाना की एक फीसदी की वृद्धि दर और महिला यूजर्स की संख्या में अभूतपूर्व उछाल जैसी वजहें थीं.

भारत के इतिहास में यह पहला मौका है जब इतनी बड़ी संख्या में लोग अपनी सेक्स संबंधी जरूरतों पर खुलकर बात कर रहे हैं. आज से पहले सेक्स तक इतनी आसान पहुंच नहीं हुआ करती थी. सिर्फ मोबाइल पर उंगली को दाईं तरफ सरकाना है. लड़कियों ने बेशक अपना जीवनसाथी चुनने जैसा भारी-भरकम काम अपनी मम्मियों को सौंप रखा है लेकिन वे पहले अछूते रहे लक्ष्य यानी सेक्स का आनंद उठाने को अपने हाथों में ही लिए हुए हैं. शादी इंतजार कर सकती है लेकिन चरमसुख हासिल करने को नहीं टाला जा सकता.

सबसे दिलचस्प बात यहां महिलाओं की यौन संबंधों को लेकर विविधता और अपने साथी के साथ सेक्स को लेकर अपनी पसंद पर बात करने को लेकर तत्परता है. सबसे बड़ा बदलाव जो देखने को मिला वह है एक हाथ दे, दूसरे हाथ ले. किसी भी यौन संबंध में परस्पर संतुष्टि अहम हो गई है.

16 फीसदी महिलाओं ने माना कि अगर उनके साथियों ने उनके साथ मुख मैथुन से इनकार किया तो वे उसके साथ सेक्स करने से मना कर देंगी, जबकि 2003 में सिर्फ 6 फीसदी औरतें ही ऐसा कहती थीं. इस बदलाव को इस तथ्य के आईने में भी परखा जा सकता है कि 19 फीसदी महिलाओं ने माना है कि वे हस्तमैथुन करती हैं. 2003 में ऐसा करने वाली महिलाएं सिर्फ 9 फीसदी ही थीं. इससे इशारा मिलता है कि औरतें इस बात को लेकर जागरूक हो रही हैं कि उनके शरीर में क्लाइटॉरिस (भग-शिश्न) है और उससे जुड़ी चरमसुख देने वाली 8,000 कोशिकाएं हैं. संभवतः महिलाएं पहले से ज्यादा चरमसुख पाने लगी हैं.

यहां एक बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि आखिर पॉपुलर कल्चर ने इस रिझाने वाले रुझान में दखल क्यों नहीं दिया है? आखिर, हमें पुरुषों के महिलाओं के साथ मुख मैथुन करने के अधिक दर्शन क्यों नहीं होते हैं? ज्यादातर अमेरिकी टेलीविजन चैनल और साहित्य पहले ही औरतों के पुरुषों को मुख से सुख के दिन लद जाने का ऐलान कर चुके हैं, साथ ही पुरुषों के स्त्रियों को मुख से सुख देने के दौर के उदय का भी. इसका इशारा गल्र्स सीरियल के एक सीन में मिलता है जिसमें हना नाम की कैरेक्टर अपने दोस्त के उसके साथ मुखमैथुन करने के अनुरोध पर जवाब देती है, ''पहले तुम मेरे साथ मुख मैथुन करो.'' वह उसकी इस बात को मान जाता है. मुझे इस बात का बड़ी ही बेताबी से इंतजार है कि इस तरह का सीन भारतीय टेलीविजन या बॉलीवुड में कब दिखेगा.
इस तरह के मौके के लिए हमें स्त्री के साथ किए जाने मुख-मैथुन से जुड़ी सभी बातों को अच्छे से समझ लेना चाहिए. मेरी तरह आप भी विभिन्न रुझान और दिलचस्पियों वाली ऐसी औरतों को बड़ी संख्या में जानते होंगे जो चुपचाप लेटी रहें, लेकिन अधिकतर शिकायत करती हैं कि पुरुष सही जगह पर नहीं जा रहे हैं और चरमसुख देने वाली राह से भटक रहे हैं. कुछ ऐसी औरतें जो लगभग 20 मिनट तक पुरुष की नाकाम कोशिशों के बाद अपनी टागों के बीच किसी तरह की अनुभूति पाने की बजाए उन्हें नीचे सुन्न होने जैसा एहसास होने लगता है. कई तो पुरुषों के अनाड़ीपन की वजह से मुखमैथुन के जरिए मिलने वाले सुख से इनकार ही कर डालती हैं.

हर रोज नहीं तो अक्सर ऐसे मौके आ ही जाते हैं या ऐसे साथी मिल ही जाते हैं जिन्हें याद करना वाकई सुखद होता है. ऐसा अचानक आया मौका (कैजुअल सेक्स) जिसको याद किया जा सकता है. जिसमें पूरे प्रसंग को बिना किसी शोर-शराबे और प्रेमी से कुछ कहे बिना आनंद प्राप्त किया जाता है और जिसमें ऐसा कुछ नहीं होता जो दुखद हो.

हमारा इशारा सुख देने वाले उन पुरुषों की ओर है जो किसी चीज की तमन्ना नहीं रखते, वे बदले में कुछ नहीं चाहते, वे पूरी तरह से आपको सुख देने की एकमात्र वजह से बंधे नजर आते हैं. वे कैजुअल सेक्स को इसकी परिधि से बाहर ले जाते हैं. वे ऐसे अनुभवी मार्गदर्शक होते हैं जो कभी-कभार आपको ऐसे शॉर्टकट्स से रू-ब-रू करा सकते हैं, जहां से पहले आप कभी न गुजरी हों. ऐसे रोमांच दे सकते हैं जिसका आपने पहले अनुभव न किया हो. जो इसे किसी काम की तरह नहीं बल्कि रहस्यों पर से परदे उठाने की तरह लेते हों.

और यही वजह है कि हम औरतों ने मानकों को और बढ़ा दिया है. महिलावादी पुरुष के साथ सेक्स करना औरतों से घृणा करने वालों की अपेक्षा ज्यादा आनंद और उत्तेजना देने वाला है. संभवतः यह बहुत गूढ़ है. जब हम भरपूर सुख भोग सकती हैं तो उससे मुंह क्यों मोड़ें, वह भी जब हम ढेरों चरमसुख पाने के मुहाने पर हों? आखिर हम उस समय क्यों कम में गुजारा करें जब हम सातवें आसमान को छूने की कुव्वत रखती हों?

सदियों से भारतीय पुरुष इस बात से कन्नी काटते आए हैं कि वह यौन संबंधों में कमतर रहा है. इसलिए औसत पुरुष मानते हैं कि उसे दूसरे को सुख देने की कोई वजह नहीं है. अगर यौन क्रांति आ चुकी है तो फिर हमें अपनी बड़ी भागीदारी का दावा करना चाहिए. बिल्कुल एरिस्टोफेन्स की नायिका लिस्त्राता की तरह जो अपनी साथियों के दम पर पीलोपोनिश्यां की जंग खत्म करने का आगाज करती हैं. वे अपनी साथियों को यह कसम लेने के लिए तैयार करती हैं कि वे पतियों के साथ तब तक यौन संबंध न बनाएं जब तक वे शांति की बात न करें. इसी तरह हमें भी उन पुरुष प्रेमियों को सुख नहीं देना है जो हमें सुख देने का इरादा या कुव्वत नहीं रखते. आइए, सेक्स संतुष्टि को अपनी प्राथमिकता बनाएं. अब समय आ चुका है.

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