उत्तर प्रदेशः करवट लेने लगा हाथी
यूपी में विधानसभा चुनाव का साल लग चुका है. ऐसे में चुनावी रेस में सबसे आगे कोई घोड़ा नहीं, बल्कि हाथी दौड़ रहा है.

अपनी सालगिरह पर राजनैतिक संदेश देने के मामले में बीएसपी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती का कोई सानी नहीं है. चुनावी साल में प्रवेश कर चुके उत्तर प्रदेश में 15 जनवरी को अपना 60वां जन्मदिन मनाने वाली मायावती ने “हाथी” की धमक दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यह पहला मौका था, जब लखनऊ के माल एवेन्यू स्थित मायावती के बंगले के आसपास न जन्मदिन के जश्न का माहौल था, न पार्टी के बड़े नेताओं की कतार. सबको अपने-अपने जिलों में रहकर मायावती का जन्मदिन “जनकल्याणकारी दिवस” के रूप में मनाने का आदेश था.
उस दिन मायावती खुद लखनऊ में थीं. ठीक साढ़े ग्यारह बजे उनका काफिला मॉल एवेन्यू के सरकारी बंगले से निकलकर सामने बीएसपी कार्यालय पहुंचा. यहां मायावती पत्रकारों से रू-ब-रू थीं. इस आयोजन को एक न्यूज चैनल के जरिए प्रदेश के सभी जिलों के बीएसपी कार्यालयों में दिखाने का पुख्ता इंतजाम भी था. मायावती ने चिरपरिचित अंदाज में 40 मिनट तक लिखा हुआ भाषण पढ़ा. वे बोलीं, “हर जिले में कार्यकर्ता मेरा बर्थडे मना रहे हैं. वे प्रतिज्ञा लें और पार्टी का जनाधार बढ़ाने में जुट जाएं. हमारी सरकार बनी तो यही मेरे जन्मदिन का सबसे बड़ा तोहफा होगा.”
जन्मदिन पर कार्यकर्ताओं से रिटर्न गिफ्ट में यूपी की सत्ता मांगने वालीं मायावती ने 403 विधानसभा सीटों में से 300 पर बीएसपी के संभावित उम्मीदवारों की घोषणा कर फिलहाल दूसरी विपक्षी पार्टियों को पीछे छोड़ दिया है. उस रोज चुनावी शंखनाद करके मायावती ने जाहिर कर दिया कि 2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न जीतने वाली बीएसपी विधानसभा चुनाव की जंग जीतने को तैयार है.
छवि बदलने की छटपटाहट
यूपी में पिछली मायावती सरकार के समय एनआरएचएम, लैकफेड, स्मारकों के निर्माण में हुए घोटाले अगले विधानसभा चुनाव में भी विपक्षी पार्टियों के लिए हथियार बनेंगे. इतना ही नहीं, लोकायुक्त चयन के मुद्दे पर बीएसपी और सपा में जिस तरह एकजुटता दिखाई दी थी, उसने भी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मायावती के ढुलमुल रवैए को जाहिर किया था. सेवानिवृत्त जस्टिस वीरेंद्र सिंह के नाम को सपा सरकार के गलत ढंग से सुप्रीम कोर्ट भेजने के मसले ने तूल पकड़ा तो बीएसपी ने इससे पल्ला झाड़ लिया.
मायावती को सत्ता से बाहर हुए चार साल होने को आ रहे हैं, लेकिन इस बार जन्मदिन पर पत्रकारों के सामने भाषण में उन्होंने उन आरोपों पर सफाई दी, जो बीएसपी शासन में उन पर लगते थे. इनमें से एक था नेताओं से धन वसूलने का आरोप, जिसके चलते विपक्षी नेता मायावती को “दौलत की बेटी” कहकर संबोधित करते रहे हैं. मायावती बोलीं, “बीएसपी के लोग मानते हैं कि यदि उनकी नेता आर्थिक तौर पर मजबूत बनी रहती हैं तो वे विकट परिस्थिति में किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएंगी.”
पार्टी नेताओं से मिलने वाली आर्थिक मदद को पारदर्शी बनाने के लिए मायावती ने बीएसपी कूपन की शुरुआत की है. बीएसपी के एक पूर्व सांसद बताते हैं, “बीएसपी कूपन 10 रु. से लेकर 10,000 रु. तक के हैं. इससे गरीब से लेकर अमीर कार्यकर्ता तक अपनी क्षमता के अनुसार कूपन खरीदकर पार्टी को आर्थिक मदद करते हैं.”
गठबंधन पर विकल्प खुले
जन्मदिन के मौके पर पत्रकारों के सामने मायावती ने “कृपया आप सब लोग केक खाकर जाइएगा,” कहकर अपनी बात समाप्त की और किसी को कोई सवाल पूछने का मौका दिए बगैर हॉल से बाहर निकल गईं. दरअसल उन्हें पता था कि यूपी में संभावित गठबंधन को लेकर उनसे ज्यादा सवाल पूछे जाएंगे. और वे अपनी किसी रणनीति का सार्वजनिक तौर पर खुलासा नहीं करना चाहतीं.
बिहार में जिस तरह महागठबंधन भारी बहुमत लेकर सत्ता पर काबिज हुआ है, उससे यूपी में भी गठबंधन की सुगबुगाहट तेज हुई है. बिहार के मुख्यमंत्री और जेडी(यू) नेता नीतीश कुमार इस संभावित गठबंधन को शक्ल देने में लगे हैं. जेडी(यू) के एक सांसद बताते हैं, “नीतीश ने बिहार में मोदी को पटखनी दी है और अब मुलायम सिंह की बारी है, जिन्होंने बिहार चुनाव के ऐन वक्त उन्हें धोखा दिया था.”
यूपी में सपा और बीजेपी विरोधी गठबंधन की धुरी मायावती के इर्द गिर्द घूमती नजर आ रही है. दिल्ली में अधिकांश समय बिताने वाले बीएसपी के एक राष्ट्रीय महासचिव की संभावित गठजोड़ को लेकर कांग्रेस के शीर्ष नेताओं से अनौपचारिक बातचीत हो चुकी है. बीएसपी को केंद्र में रख बनने वाले इस गठबंधन में अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल, कांग्रेस और जेडी(यू) जैसी पार्टियों को शामिल करने की गुपचुप कवायद चल रही है. गठबंधन बनने की शक्ल में मायावती किसी भी हालत में 300 सीटों से कम पर समझौता नहीं करेंगी और बाकी सौ सीटें सहयोगी पार्टियों के लिए छोड़ी जा सकती हैं. हालांकि बीएसपी के प्रदेश प्रवक्ता स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं, “बीएसपी यूपी में अकेले ही चुनाव लड़ेगी. विरोधी पार्टियां गठबंधन के बारे में अफवाह फैला रही हैं.”
पर जिताऊ समीकरण बनाना चुनौती
अगले विधानसभा चुनाव में सत्ता में वापसी का ख्वाब देखने वालीं मायावती के लिए इस बार 2007 की तरह का जिताऊ जातीय समीकरण फिट कर पाना आसान नहीं होगा. दलित जनाधार वाली बीएसपी ने 2007 में ब्राह्मण और ऊंची जातियों का समर्थन पाकर बहुमत हासिल किया था. मायावती इस बार मुसलमानों के समर्थन से दोबारा ऐसा करिश्मा करने की कोशिश में हैं. घोषित 300 उम्मीदवारों में एक चौथाई से ज्यादा मुसलमान हैं. दंगा पीड़ित पश्चिमी यूपी में मुसलमानों को बीएसपी से जोडऩे की कमान मायावती ने अपने सबसे विश्वसनीय सिपहसालार नसीमुद्दीन सिद्दीकी को सौंपी है.
पूर्वांचल में मुस्लिम समाज को बीएसपी से जोडऩे के लिए मायावती ने पश्चिमी यूपी के कई मंडलों के जोनल कोऑर्डिनेटर रहे मुनकाद अली को जिम्मा सौंपा है. मुनकाद को वाराणसी, आजमगढ़, मिर्जापुर और इलाहाबाद मंडल का जोनल कोऑर्डिनेटर बनाया गया है. बीएसपी के कुछ गैर-मुस्लिम नेताओं ने मायावती से पूर्वांचल में पीस पार्टी से गठबंधन करने की पैरवी भी की थी. इसी से उत्साहित होकर पीस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मोहम्मद अयूब ने पिछले साल नवंबर में कुछ अखबारों में बाकायदा विज्ञापन देकर मायावती से महागठबंधन करने की गुहार लगाई थी.
फिलहाल मायावती अपने नेताओं के बूते मुस्लिम आबादी में पैठ मजबूत करने में जुटी हैं. 30 नवंबर को राज्यसभा में मायावती ने संविधान दिवस पर चर्चा के दौरान गरीब अगड़ों को आरक्षण देने के अलावा निजी क्षेत्र और प्रमोशन में आरक्षण की मांग की. सवर्णों की ओर आरक्षण का दांव फेंकना वोट बैंक को मजबूत करने की मायावती की रणनीति का ही हिस्सा है.
मायावती के जन्मदिन के मौके पर लखनऊ के रिफाह-ए-आम क्लब मैदान में आयोजित समारोह में बीएसपी के राष्ट्रीय महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी अपनी शायरी से विपक्षियों पर तंज कस रहे थेरू प्रदेश के हर मोड़ पर कोई चराग तो ऐसा है, जो मुसाफिर के लिए हर रास्ता रोशन करे. खो दिए ये प्यार के सब चराग ऐ अखिलेश तुमने, ऐ अंधेरी बस्तियों तुम्हें बहनजी ही रौशन करेंगी. सिद्दीकी की इन पंक्तियों ने ही सबसे ज्यादा वाहवाही बटोरी और इस ख्वाब को हकीकत में बदलने के संकल्प के साथ सभा समाप्त हुई.