चीनः ये आंकड़े! कहां से लाए?

जनवरी में चीन ने ऐलान किया था कि 2015 में उसने 6.9 प्रतिशत की वृद्धि हासिल की. इसके जरिए सरकार यह बताना चाहती थी कि 7 फीसदी वृद्धि भले ही हासिल नहीं हुई हो, पर अर्थव्यवस्था उतनी खराब भी नहीं थी. लेकिन चीन में जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों पर अर्थशास्त्रियों को भरोसा नहीं.

यहां तक कि चीन के प्रधानमंत्री को भी देश के जीडीपी आंकड़े पर भरोसा नहीं है. ली केक्यांग जब उत्तरपूर्वी कोयला-क्षेत्र प्रांत लियाओनिंग में कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया थे, तो वे जीडीपी डाटा पर नहीं, बल्कि आंकड़ों के तीन सेटों पर भरोसा करते थे. वे उन्हीं से अपने प्रांत की अर्थव्यवस्था का आकलन करते थेः बिजली की खपत, रेल से ढोए जाने वाले माल की मात्रा, और बैंक से कर्ज. ये वे आंकड़े हैं, जिनमें स्थानीय अधिकारी आसानी से हेरफेर नहीं कर सकते.

उस समय से चीन में इस विधि को “केक्यांग सूचकांक” के नाम से जाना जाता है. यह उन अर्थशास्त्रियों की ओर से इस्तेमाल किया जाता रहा है, जो मानते थे कि स्थानीय सरकारों ने आंकड़ों में हेरफेर किया है और केंद्र उसी आधार पर जीडीपी का आकलन करता रहा है. आज समस्या आंकड़ों में हेरफेर की नहीं है, बल्कि किसी विशेष वर्ष में सियासी मकसद के लिए जीडीपी में एक या दो फीसदी “जोड़तोड़” को लेकर है. बीजिंग में चाइना यूरोप इंटरनेशनल बिजनेस स्कूल में अर्थशास्त्री जू बिन कहते हैं, “जीडीपी आंकड़े स्वभाव से ही सही नहीं होते हैं. कुछ शोधकर्ताओं का तर्क है कि अर्थव्यवस्था तेज रफ्तार से बढ़ती है तो चीन की जीडीपी नीचे की ओर जाती है और जब अर्थव्यवस्था मंद होती है तो ऊपर की ओर.”

जनवरी में चीन ने ऐलान किया था कि 2015 में उसने 6.9 प्रतिशत की वृद्धि हासिल की. इसके जरिए सरकार यह बताना चाहती थी कि 7 फीसदी वृद्धि भले ही हासिल नहीं हुई हो, पर अर्थव्यवस्था उतनी खराब भी नहीं थी. वह आंकड़ा कितना सही है, इस पर बहस हो चुकी है. लंदन-स्थित कैपिटल इकोनॉमिक्स की एक रिपोर्ट में हिसाब लगाया गया था कि 2015 की पहली दो तिमाहियों में वृद्धि को निश्चित रूप से एक या दो फीसदी बढ़ाकर पेश किया गया था.

चांग लिउ और मार्क विलियम्स ने लिखा, “जीडीपी डिफ्लैटर, जिसका प्रयोग अवास्तविक जीडीपी के अनुमानों को वास्तविक जीडीपी में बदलने के लिए किया जाता है, की गणना में खामियां हैं.” उन्होंने हिसाब लगाया कि पहली तिमाही में वृद्धि 5-6 फीसदी के बीच थी, न कि 7 फीसदी. उनका तर्क था कि वास्तविक जीडीपी के लिए 7 फीसदी का आंकड़ा पाने के लिए सरकार ने महंगाई में कमी का हिसाब लगाया होगा, जबकि हर दूसरी गणना में कीमतें बढ़ रही थीं.

हांगकांग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर कार्सटेन होल्ज ने एक शोधपत्र में लिखा, “नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टेटिस्टिक्स कीमतों के प्रभाव में हेरफेर करके वास्तविक वृद्धि दर में थोड़ा-बहुत ऊपर या नीचे कर सकता है. और बाद के संशोधनों में, जब उस खास वर्ष के डाटा ध्यान से हट जाते हैं तो उसे सुधार लिया जाता है. ऐसा बार-बार नहीं किया जा सकता है, वरना डाटा की जांच होने पर वह उजागर हो जाएगा.” सरकारी आकलनकर्ता अपने हिसाब से आंकड़े में हेरफेर करने के लिए तकनीकी तालमेल का इस्तेमाल करते हैं. चीन के मामले में यह कोई अनोखी बात नहीं है.

अमेरिका-भारत जैसे देश जीडीपी के आकलन के लिए अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, जिन पर गर्मागर्म बहस भी हो चुकी है. चीन में सरकार अपारदर्शिता के साथ काम करती है और उससे समस्या और बढ़ जाती है. 2015 के जीडीपी डाटा की घोषणा के कुछ ही दिन बाद चीन के मुख्य आकलनकर्ता वांग बाओन को रहस्यमय तरीके से 26 जनवरी को “गंभीर अनुशासनात्मक उल्लंघन” के आरोप में बर्खास्त कर दिया गया, यह आम तौर पर भ्रष्टाचार के लिए सौम्य शब्दावली है. सो जब ली केक्यांग ने करीब एक दशक पहले कहा था कि जीडीपी आंकड़े अंततः “मानव-निर्मित” और “सिर्फ दिखावे” के लिए होते हैं तो निश्चित रूप से उनकी बातों में दम था.

क्या चीन अपने जीडीपी डाटा में हेरफेर कर रहा है?

  • चीन कहता है कि 2015 में उसकी अर्थव्यवस्था में 6.9 फीसदी वृद्धि हुई, जो निर्माण क्षेत्र में मंदी के बावजूद 7 फीसदी के लक्ष्य के काफी करीब थी.
  • सरकार कहती है कि इस वृद्धि का कारण सेवा क्षेत्र था, जो पहली बार 50 फीसदी से ऊपर निकल गया था.
  • कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि वास्तविक जीडीपी 2 फीसदी तक नीचे रही होगी, क्योंकि जीडीपी डिक्रलेटर के मामले में आंकड़ों में तोड़-मरोड़ किया गया तो वास्तविक जीडीपी में वृद्धि दिखाई देगी.
  • आम राय यह है कि जीडीपी में 1-2 प्रतिशत की हेरफेर की जा सकती है.

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