गन्ना बेल्ट में बिछ गई सियासी जंग की बिसात
विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी यूपी में बढ़ी मुख्यमंत्री योगी की सक्रियता. सपा, रालोद और आसपा ने भी मैदान में उतर कसी कमर. वहीं, किसान, जाति, हिंदुत्व और दलित-मुस्लिम समीकरण चुनावी राजनीति के केंद्र में है

विधानसभा चुनाव का समय जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है सभी सियासी पार्टियों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावी जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लगातार बढ़ती सक्रियता इस बात का संकेत दे रही है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पश्चिमी यूपी को केवल चुनावी क्षेत्र नहीं, बल्कि अपनी राजनैतिक रणनीति के केंद्र के रूप में देख रही है.
बिजनौर के बढ़ापुर विधानसभा क्षेत्र के आलमपुर गांवड़ी में पहली जून को आयोजित कार्यक्रम औपचारिक रूप से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए विस्थापित हिंदू परिवारों को भूमिधरी अधिकार प्रमाण पत्र देने के लिए था. लेकिन योगी का लगभग 35 मिनट का भाषण इस सरकारी आयोजन को एक व्यापक राजनैतिक संदेश में बदलता नजर आया.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति मंल किसान हमेशा निर्णायक रहे हैं. बिजनौर गन्ने की खेती का एक अहम जिला है और यहां जाट किसानों का भी खासा दबदबा रहा है. योगी ने गन्ने का मूल्य बढ़ाकर 400 रुपए प्रति क्विंटल किए जाने का उल्लेख करते हुए संदेश दिया कि उनकी सरकार किसानों के हितों के प्रति संवेदनशील है. साथ ही राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) और उसके समर्थक जाट मतदाताओं को भी यह संकेत देने की कोशिश की गई कि उनकी मांगों को सरकार महत्व दे रही है.
जयंत चौधरी के एनडीए में शामिल होने के बाद भाजपा पश्चिमी यूपी में जाट वोटों को स्थायी रूप से अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है. इसी क्रम में चौधरी चरण सिंह की 125वीं जयंती पर बड़े कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा भी राजनैतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है. पश्चिमी यूपी में चरण सिंह किसान राजनीति के सबसे बड़े प्रतीक हैं. भाजपा लंबे समय से उनके राजनैतिक प्रभाव को अपने पक्ष में साधने की कोशिश कर रही है. बिजनौर की सभा में उनका उल्लेख इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
हालांकि योगी के भाषण का सबसे चर्चित हिस्सा रहा गाजियाबाद में हाल में बकरीद के मौके पर एक युवक की हत्या, गौमाता और कट्टरपंथ पर उनका बयान. योगी ने कानून व्यवस्था पर अपनी सख्त छवि को रेखांकित करते हुए अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का संदेश दिया. साथ ही गौ-संरक्षण और धार्मिक पहचान के मुद्दों को भी प्रमुखता दी. राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा पश्चिमी यूपी में विकास और हिंदुत्व के दोहरे मॉडल को फिर से सक्रिय करने की कोशिश कर रही है.
बिजनौर में योगी ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और विस्थापित हिंदुओं के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया. कार्यक्रम में 1,645 परिवारों को भूमिधरी अधिकार प्रमाणपत्र वितरित किए गए और मुख्यमंत्री ने कहा कि आगे चलकर हजारों अन्य परिवारों को भी इसका लाभ मिलेगा. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विभाजन के चलते पड़ोसी देशों से आए हिंदू परिवारों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही है. ऐसे में यह मुद्दा भाजपा के वैचारिक और राजनैतिक एजेंडे दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है. तीन दिन बाद 4 जून को संभल के प्रभारी मंत्री जे.पी.एस. राठौड़ ने 1978 के दंगों के पीड़ित रस्तोगी परिवार को भूमि के पट्टे का प्रमाणत्र सौंपा.
फोकस सहारनपुर पर
सहारनपुर की अहमियत केवल इस बात से नहीं समझी जा सकती कि यहां सात विधानसभा सीटें हैं, बल्कि इसलिए भी कि यह जिला पश्चिमी यूपी में सियासी सोच को दिशा देने में अहम माना जाता है. सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत और मेरठ की करीब 26 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है, जबकि दलित वोट बैंक भी बेहद प्रभावशाली है. सहारनपुर जिले में हिंदू और मुसलमान आबादी का अंतर बहुत ज्यादा नहीं है. यही वजह है कि यहां की राजनैतिक हवा का असर पूरे पश्चिमी यूपी पर पड़ता है.
मुख्यमंत्री योगी का इस वर्ष अब तक कुल छह बार सहारनपुर दौरा करना इस जिले के बढ़ते राजनैतिक महत्व को रेखांकित करता है. 7 मई को देवबंद विधानसभा क्षेत्र के जड़ौदा जट्ट गांव में आयोजित कार्यक्रम भी केवल विकास परियोजनाओं के उद्घाटन और शिलान्यास तक सीमित नहीं था. अपने संबोधन में योगी ने देवबंद और फतवों का जिक्र कर अपने कोर हिंदुत्व समर्थक आधार को भी स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की थी.
यह स्पष्ट संकेत था कि योगी पश्चिमी यूपी में बहुस्तरीय चुनावी रणनीति के साथ आगे बढ़ रहे हैं. लोकसभा चुनाव 2024 में सहारनपुर सीट लगातार दूसरी बार भाजपा के हाथ से निकल गई थी. योगी को यह एहसास है कि अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनैतिक संतुलन बिगड़ा तो उसका असर पूरे प्रदेश में दिखाई देगा.
सहारनपुर के सामाजिक कार्यकर्ता और राजनैतिक विश्लेषक अविनींद्र कमल कहते हैं, ''पश्चिमी यूपी में भाजपा की चुनौती केवल विपक्षी दल नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक समीकरण भी हैं. किसान आंदोलन के बाद जाट राजनीति में बदलाव आया है. दलित मतदाता भी पहले के मुकाबले ज्यादा स्वतंत्र राजनैतिक विकल्पों की ओर देख रहे हैं. वहीं मुसलमान वोटर बड़ी संख्या में विपक्षी दलों के साथ खड़े दिखाई देते हैं. ऐसे में भाजपा अब केवल ध्रुवीकरण की राजनीति पर निर्भर नहीं रहना चाहती. पार्टी विकास, इन्फ्रास्ट्रक्चर, लाभार्थी योजनाओं और हिंदुत्व को एक साथ जोड़कर नया राजनैतिक मॉडल तैयार कर रही है.''
खेत से खड़ी होगी सपा?
समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पश्चिमी यूपी में राजनैतिक कार्यक्रमों के जरिए नए सामाजिक और चुनावी समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं. 25 अप्रैल को गाजियाबाद में आयोजित 'विजन इंडिया कार्यक्रम' में किसानों से वर्चुअल संवाद करते हुए अखिलेश ने खेती-किसानी, एमएसपी, किसानों की आय और कृषि संकट जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया. सपा का मानना है कि पश्चिमी यूपी में जाट, मुसलमान, गुर्जर और अन्य किसान समुदाय चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं और इन वर्गों का बड़ा हिस्सा खेती से जुड़ा हुआ है.
ऐसे में पार्टी किसान मुद्दों को केंद्र में रखकर अपने सामाजिक आधार को विस्तार देना चाहती है. पश्चिमी यूपी के वरिष्ठ जाट नेता सुधीर पंवार बताते हैं, ''भाजपा सरकार ने किसानों की आय दोगुनी करने का वादा पूरा नहीं किया. गन्ना भुगतान, लागत और रोजगार जैसे सवाल आज भी किसानों के सामने खड़े हैं. पार्टी इन्हीं मुद्दों के सहारे ग्रामीण मतदाताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करना चाहती है.'' इससे पहले 29 मार्च को गौतमबुद्धनगर के दादरी में आयोजित 'समाजवादी समानता भाईचारा रैली' को भी सपा की नई राजनैतिक रणनीति का हिस्सा माना गया.
रैली के लिए मिहिर भोज डिग्री कॉलेज मैदान का चयन अपने आप में राजनैतिक संदेश था. 2021 में मिहिर भोज की पहचान को लेकर गुर्जर और राजपूत समुदायों के बीच विवाद चर्चा में रहा था. ऐसी जगह रैली कर सपा ने गुर्जर समाज को विशेष संदेश देने का प्रयास किया. राजनैतिक जानकारों का मानना है कि रालोद के एनडीए में जाने के बाद पश्चिमी यूपी में जाट वोटों की चुनौती से निबटने के लिए सपा अब गुर्जर नेतृत्व को आगे बढ़ा रही है.
इसी रणनीति के तहत कर्मवीर सिंह गुमी को मेरठ में जिलाध्यक्ष बनाया गया है, जबकि राजकुमार भाटी जैसे नेता भी क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. दूसरी ओर मुजफ्फरनगर के सांसद हरेंद्र मलिक, विधायक पंकज मलिक और शामली के नेता सुधीर पंवार जाट मतदाताओं के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं. हालांकि सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती पश्चिमी यूपी में मजबूत मुस्लिम नेतृत्व का अभाव है.
जेल में बंद आजम खान के सक्रिय राजनीति से दूर होने के बाद यह खालीपन और बढ़ा है. कैराना की सांसद इकरा हसन और सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के बीच राजनैतिक तनाव भी इंडिया गठबंधन के लिए असहज स्थिति पैदा कर रहा है. इसके बावजूद सपा नेताओं को भरोसा है कि किसान, पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को जोड़कर वे पश्चिमी यूपी में 2027 के लिए मजबूत चुनावी आधार तैयार कर सकते हैं.
जयंत ने बदली रणनीति
रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा के साथ गठबंधन और केंद्र सरकार में भागीदारी मिलने के बाद लगातार उन क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ा रहे हैं जहां पार्टी को भविष्य में राजनैतिक अवसर दिखाई दे रहे हैं. 4 जून को मुरादाबाद जिले के ठाकुरद्वारा में आयोजित रैली को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. सपा के मजबूत गढ़ माने जाने वाले इस इलाके में जयंत ने अपने संबोधन में ठाकुरद्वारा और काशीपुर को अपने परिवार की राजनैतिक और सामाजिक कर्मभूमि बताते हुए स्थानीय लोगों से भावनात्मक जुड़ाव कायम करने की कोशिश की.
जानकारों की मानें तो रालोद अब अपनी पारंपरिक जाट राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती. वह उन विधानसभा सीटों पर भी दावा मजबूत कर रही है जहां भाजपा लंबे समय से जीती नहीं है. मुरादाबाद जिले की छह सीटों में से भाजपा को 2022 में मुरादाबाद नगर सीट मिली थी. बाद में कुंदरकी उपचुनाव उसके खाते में आया. ऐसे में ठाकुरद्वारा, कांठ और मुरादाबाद ग्रामीण जैसी सीटों पर रालोद संभावनाएं तलाश रही है. अब वह जाट-मुस्लिम समीकरण तक सीमित नहीं रहना चाहती, ब्राह्मण-त्यागी जैसे प्रभावशाली वर्गों को भी साथ जोड़ना चाहती है.
मेरठ के ईकड़ी गांव में 25 अप्रैल को हुई रैली में जनता दल यूनाइटेड से शामिल हुए वरिष्ठ नेता के.सी. त्यागी की मौजूदगी जयंत की इसी रणनीति को पुष्ट कर रही थी. पश्चिमी यूपी में भाजपा का इस वर्ग पर मजबूत प्रभाव रहा है, वहां रालोद का यह दांव सीधा उस प्रभाव को चुनौती देने जैसा भी है. इसके अलावा मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली और गाजियाबाद के कई विधानसभा क्षेत्रों में भी रालोद की सक्रियता बढ़ी है. जयंत रालोद को गठबंधन की छोटी सहयोगी पार्टी से आगे बढ़ाकर निर्णायक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं.
...और तीसरा मोर्चा आसपा का
नगीना लोकसभा सीट से जीत हासिल कर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने वाले आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद अब 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर नजरें टिकाए हुए हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी बढ़ती सक्रियता संकेत दे रही है कि आसपा अब केवल आंदोलन आधारित संगठन नहीं रहना चाहती, बल्कि खुद को एक प्रभावशाली राजनैतिक विकल्प के रूप में स्थापित करने की तैयारी में है. इसी रणनीति के तहत 4 जून को बिजनौर से 'सत्ता परिवर्तन यात्रा' की शुरुआत की गई, जबकि इससे पहले मेरठ में आयोजित सभा ने पार्टी के राजनैतिक विस्तार का स्पष्ट संदेश दिया.
मेरठ के गुरुकुल गार्डन में 14 मई को हुए कार्यक्रम में सपा और बसपा से जुड़े कई नेताओं को पार्टी में शामिल कराया गया. खास बात यह रही कि इनमें बड़ी संख्या मुस्लिम समुदाय से आने वाले नेताओं की थी. किठौर, सरधना और मेरठ दक्षिण जैसे क्षेत्रों के प्रभावशाली मुस्लिम चेहरों को साथ जोड़कर आसपा ने साफ संकेत दिया कि वह पश्चिमी यूपी में दलित-मुस्लिम राजनैतिक गठजोड़ को नया स्वरूप देना चाहती है.
मुरादाबाद के एक डिग्री कॉलेज में राजनीति शास्त्र विभाग के शिक्षक सर्वेश प्रताप कहते हैं, ''पिछले कुछ चुनावों में बसपा का वोट प्रतिशत लगातार घटा है और जाटव समाज का युवा वर्ग मायावती की पारंपरिक राजनीति से दूरी बनाता दिखाई दे रहा है. यही वर्ग चंद्रशेखर की आक्रामक शैली और भीम आर्मी के दौर से जुड़े संघर्षों के कारण उनकी ओर आकर्षित हो रहा है.
सहारनपुर, बिजनौर और मेरठ में उनकी सभाओं में उमड़ रही भीड़ को इसी बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है.'' बसपा के सामने चुनौती इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि एक तरफ भाजपा उसके परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी ओर सपा और आसपा भी दलित मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की रणनीति पर काम कर रही हैं. पश्चिमी यूपी में दलित और मुस्लिम आबादी कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाती है.
नगीना लोकसभा चुनाव का परिणाम यह दिखा चुका है कि अगर इन दोनों वर्गों का राजनैतिक ध्रुवीकरण किसी नए नेतृत्व के पक्ष में होता है, तो स्थापित दलों के समीकरण बदल सकते हैं. ऐसे में पश्चिमी यूपी में 2027 की लड़ाई केवल भाजपा और सपा के बीच नहीं दिखाई दे रही, बल्कि चंद्रशेखर आजाद की बढ़ती सक्रियता ने बसपा के सामने अपने सबसे भरोसेमंद जनाधार को बचाए रखने की नई चुनौती भी खड़ी कर दी है.
गंगा-यमुना दोआब में राजनैतिक गुणा-गणित
> वर्ष 2022 के विधानसभा उपचुनाव में भाजपा ने रामपुर विधानसभा सीट सपा से और राष्ट्रीय लोकदल ने खतौली सीट भाजपा से छीनी थी. वर्ष 2023 में रामपुर की स्वार विधानसभा सीट भाजपा की सहयोगी अपना दल (एस) ने सपा से छीनी थी.
> वर्तमान में पश्चिमी यूपी की 70 विधानसभा सीट में भाजपा के 41, सपा के 20, रालोद के आठ और अपना दल (एस) का एक विधायक है. 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 27, सपा को 25, रालोद को आठ और कांग्रेस तथा आजाद समाज पार्टी को 5-5 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली थी.
> पश्चिमी यूपी में कुल 14 (रामपुर, मुरादाबाद, गौतमबुद्ध नगर, बिजनौर, सहारनपुर, गाजियाबाद, मुजफ्फरनगर, कैराना, नगीना, संभल, मेरठ, बागपत, अमरोहा और बुलंदशहर) लोकसभा सीटें और 70 विधानसभा सीटें आती हैं.
> 2024 के लोकसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी की 14 लोकसभा सीटों में भाजपा ने पांच (गौतमबुद्धनगर, गाजियाबाद, मेरठ, बुलंदशहर अमरोहा) और सहयोगी रालोद ने दो (बागपत, बिजनौर) सीटें जीती थीं.
> पिछले लोकसभा चुनाव में सपा ने पांच (रामपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, संभल, मुरादाबाद) और सहयोगी कांग्रेस ने सहारनपुर सीट जीती थी. नगीना लोकसभा सीट आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद ने निर्दलीय के तौर पर जीती.
> योगी सरकार में इस समय मेरठ से सोमेंद्र तोमर, हस्तिनापुर से दिनेश खटीक, बागपत से के.पी. मलिक, गाजियाबाद से नरेंद्र कश्यप और सुनील शर्मा, सहारनपुर से जसवंत सैनी और कुंवर ब्रजेश सिंह तथा मुजफ्फरनर से कपिलदेव अग्रवाल मंत्री हैं.
> मुरादाबाद से भूपेंद्र चौधरी, रामपुर से बलदेव सिंह औलख, संभल से गुलाब देवी मंत्री हैं. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले, पहली बार किसी दलित विधायक, मुजफ्फरनगर से रालोद के टिकट पर जीते अनिल कुमार को बतौर कैबिनेट मंत्री योगी सरकार में शामिल किया गया.
> वर्तमान में योगी सरकार में पश्चिमी यूपी से ताल्लुक रखने वाले कुल 12 मंत्री हैं. वर्ष 2017 में भी योगी सरकार में 12 मंत्री थे जिनमें से दो बाद में दिवंगत हो गए थे. वर्ष 2012 की अखिलेश सरकार में पांच और 2007 की मायावती सरकार में तीन ही मंत्री पश्चिमी यूपी से थे.
> योगी सरकार में पश्चिमी यूपी से ताल्लुक रखने वाले 3-3 जाट और दलित, दो ओबीसी के अलावा 1-1 वैश्य, ठाकुर, ब्राह्मण और गुर्जर नेता को शामिल कर जातीय संतुलन साधा गया है.
> केंद्र की मोदी 3.0 सरकार में पश्चिमी यूपी से केवल रालोद कोटे से जयंत चौधरी को ही राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में जगह मिली. मोदी की 2014 की सरकार में जनरल वी.के. सिंह, संजीव बालियान और सत्यपाल सिंह मंत्री बनाए गए थे.
> वर्ष 2019 में भी बालियान और वी.के. सिंह केंद्र में मंत्री रहे लेकिन 2024 में पश्चिमी यूपी का कोई भी भाजपा नेता केंद्र में मंत्री की कुर्सी न पा सका. पश्चिमी यूपी से अंतिम बार कैबिनेट मंत्री पद अजित सिंह (2011-2014) को मिला था.
रालोद के एनडीए में जाने के बाद पश्चिमी यूपी में जाट वोटों की चुनौती से निबटने के लिए सपा अब गुर्जर नेतृत्व को आगे बढ़ा रही है. हालांकि इस इलाके में मजबूत मुस्लिम नेतृत्व का अभाव पार्टी के लिए अब भी बड़ी चुनौती.
किठौर, सरधना और मेरठ दक्षिण जैसे क्षेत्रों के प्रभावशाली मुस्लिम चेहरों को साथ जोड़कर आसपा ने साफ संकेत दिया है कि वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश दलित-मुस्लिम सियासी गठजोड़ को नया स्वरूप देना चाहती है.