तेल ने पतली की हवा
जंग से ईंधन की कीमतों के झटके, हवाई मार्ग बंद होने से एअरलाइनों की उड़ानों पर अंकुश, इससे हवाई किरायों में आता उछाल. पहले से ही तंगहाली का शिकार विमानन क्षेत्र का बुरा हाल.

यह उलझन कुछ ऐसी है जो सुलझने का नाम नहीं ले रही. देश का विमानन क्षेत्र ऐन ऐसे समय भू-राजनैतिक झंझावात में फंसा, जब हवाई यात्रा आसमान छू रही थी, एअरलाइनें ज्यादा विमानों के ऑर्डर दे रही थीं, पुराने हवाई अड्डों का विस्तार और नए हवाई अड्डे बन रहे थे.
फरवरी के आखिर में शुरू हुई पश्चिम एशिया की जंग के नतीजे उस पर बहुत भारी पड़ रहे हैं. एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) की कीमतों में भारी उछाल है, जिससे एअरलाइनों की उड़ान लागत बढ़ गई है. हवाई मार्ग बंद होने से दुनिया के कुछ सबसे व्यस्त हवाई कॉरिडोर अवरुद्ध हैं. एअरलाइनों को रूट बदलने या उड़ान रद्द करने पर मजबूर होना पड़ा है.
मुंबई की कंटेंट स्ट्रैटेजिस्ट सांची मेहता की दोस्तों के साथ तय छुट्टियों की योजना से कुछ हफ्ते पहले ही हांगकांग की उड़ान में उनकी बुकिंग रद्द हो गई. बताया गया कि ज्यादा बुकिंग हो गई थी और उन्हें पैसे वापस ले लेने चाहिए. लेकिन उनके दोस्तों की बुकिंग उसी उड़ान में थी. दूसरी उड़ान का किराया बहुत ज्यादा था और पैसे वापस मिले नहीं थे, तो मेहता को यात्रा मुल्तवी करनी पड़ी, जबकि वे होटल और दूसरी चीजों के लिए भुगतान कर चुकी थीं.
किराए कई गुना बढ़ गए हैं. अबू धाबी-दिल्ली रूट का किराया 10,000-15,000 रु. से बढ़कर 70,000 रु. तक हो गया है. भारत-अमेरिका उड़ान के दाम 45,000-एक लाख रु. से बढ़कर 1.3-2.25 लाख रु. हो गए. बेंगलूरू-फ्रैंकफर्ट का किराया करीब 80,000 रुपए से बढ़कर 1.9 लाख रुपए हो गया (देखें, किराए कैसे उछले).
लंबी चकरघिन्नी
अलबत्ता, कीमतों में उछाल एक पहलू है. हवाई क्षेत्र बंद होने से अब उड़ानों में ज्यादा समय लग रहा है. 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ही पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र पर रोक है. 28 फरवरी को नागरिक विमानन महानिदेशक (डीजीसीए) ने पाइलटों को सलाह दी कि वे ईरान, इराक, इज्राएल, सीरिया, यमन और सऊदी अरब के कुछ हिस्सों वाले 11 उड़ान सूचना क्षेत्रों से न गुजरें. यूरोप और उत्तरी अमेरिका जाने वाली उड़ानें पहले पाकिस्तान और खाड़ी देशों के ऊपर से गुजरती थीं, अब मध्य एशिया, काकेशस, मिस्र और पूर्वी अफ्रीका होते हुए उत्तर और पश्चिम की ओर मुड़ती हैं.
इससे दिल्ली-लंदन की उड़ान में दो घंटे ज्यादा लग रहे हैं क्योंकि विमान ईरान और इराक के हवाई क्षेत्र से नहीं जा रहे. यूरोप की कुछ उड़ानें अफ्रीका से होकर जा रही हैं. मार्च में दिल्ली-मैनचेस्टर की एक उड़ान को इरिट्रिया के ऊपर से गुजरने की मंजूरी नहीं मिली, तो वह करीब 13 घंटे हवा में रहने के बाद दिल्ली लौट आई.
एअर इंडिया ने उत्तरी अमेरिका की कुछ उड़ानों के लिए टेक्निकल स्टॉप शुरू किए हैं, जिससे दिल्ली-न्यूयॉर्क यात्रा का समय करीब 17 घंटे से बढ़कर तकरीबन 22 घंटे हो गया है (देखें, चक्करदार आकाश मार्ग). पूरी पेलोड क्षमता पर चलने वाले लंबी दूरी के विमानों के लिए विएना, रोम, कोपेनहेगन और अदीस अबाबा में तकनीकी ईंधन स्टॉप भी आम होते जा रहे हैं.
पाकिस्तान के आसमान पर लगी रोक से भारतीय एअरलाइनें पहले से ही मुकाबले में पिछड़ गई थीं. लुफ्थांसा जैसी यूरोपीय एअरलाइनें और कैथे पैसिफिक जैसी एशियाई एअरलाइनें छोटे रूट पर उड़ानें भरती हैं, जबकि भारतीय एअरलाइनों को लंबे चक्करदार रास्ते लेने पड़ रहे हैं. इससे हर उड़ान में 1.3 से 1.9 टन ज्यादा ईंधन खर्च हो रहा है, और समय भी हर सेक्टर के लिए 35 से 70 मिनट तक बढ़ गया है. अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए युद्ध जोखिम बीमा किस्त भी कथित तौर पर कई गुना बढ़ गई है.
लिहाजा, एअर इंडिया ने जून और अगस्त के बीच सात अंतरराष्ट्रीय रूटों पर उड़ानें रोक दीं, इंडिगो ने पहली जुलाई से 30 सितंबर के बीच कुछ अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की संख्या घटा दी है. स्पाइसजेट की यूएई की उड़ानों पर भी असर पड़ा है. घरेलू रूटों पर एअरलाइनों ने जून में पिछले साल के मुकाबले सात फीसद कम साप्ताहिक उड़ानें भरी हैं.
सो, डीजीसीए के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल में भारतीय एअरलाइनों से यात्रा करने वाले अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की संख्या में साल-दर-साल 39.3 फीसद की गिरावट आई, जबकि घरेलू यात्रियों की संख्या में 3.47 फीसद की कमी दर्ज की गई.
ईंधन के झटके
एअरलाइनों के लिए ईंधन का खर्च सबसे बड़ी और फौरी चुनौती बन गया है. दिल्ली में घरेलू जेट ईंधन की कीमतें जंग से पहले करीब 90,455 रुपए प्रति किलोलीटर थीं, जो करीब 1.05 लाख रुपए हो गई हैं. अंतरराष्ट्रीय एटीएफ कीमतें पहले ही 73-75 रुपए प्रति लीटर बढ़ाई जा चुकी थीं, जिसके खिलाफ फेडरेशन ऑफ इंडियन एअरलाइंस (एफआइए) ने आवाज उठाई थी.
उसने सरकार से कहा, ''अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए एटीएफ की कीमत में 73 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानें भी घाटे का सौदा बन गईं और भारी नुक्सान हुआ.’’ लुढ़कते रुपए ने हालात और बदतर कर दिए.
बेशक, कुछ हद तक तो भारतीय एअरलाइनें खुद भी जिम्मेदार हैं. वे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव की चपेट में फौरन आ जाती हैं क्योंकि पहले से इंतजाम नहीं करतीं. मसलन, आइरिश अल्ट्रा-लो-कॉस्ट एअरलाइन रायनएयर ने जंग से पहले ही 2026 के लिए लगभग 80 फीसद ईंधन जरूरतों को लॉक कर लिया था; लुफ्थांसा ने पहली तिमाही की जरूरतों का 80 फीसद सुरक्षित कर लिया था. इंडिगो ने ऐसी कोशिश से किनारा कर लिया है.
फिर भी, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 3 जून को कीमतों में अचानक उतार-चढ़ाव से निबटने के लिए 10,000 करोड़ रुपए तक के एकमुश्त एटीएफ कीमत स्थिरीकरण फंड को मंजूरी दी. इसके तहत, तेल कंपनियों को सूचीबद्ध भारतीय एअरलाइनों के लिए एटीएफ की कीमतों के झटके से उबरने के लिए बिना ब्याज वाला एडवांस दिया जाएगा, जिसे कीमतें सामान्य होने पर अंतर की राशि वसूल ली जाएगी.
उड्डयन परामर्श कंपनी सीएपीए इंडिया के सीईओ कपिल कौल कहते हैं, ''फरवरी से ही सरकार पश्चिम एशिया जंग के कारण एअरलाइनों की मदद के लिए सक्रिय रही है. यह फंड मददगार साबित होगा.’’ इंडिगो ने उसे ''स्वागत योग्य राहत बताया, जो लोगों की आवाजाही और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में विमानन की अहम भूमिका के बारे में सरकार की समझ को दर्शाता है.’’
अप्रैल में सरकार ने सरकारी तेल कंपनियों को निर्देश दिया था कि वे कीमतों में बढ़ोतरी को लगभग 25 फीसद—यानी लगभग 15 रुपए प्रति लीटर—तक सीमित रखें और बाकी का बोझ खुद उठाएं. एअरलाइनों के मुताबिक, जंग से पहले लागत खर्च में 30-40 फीसद हिस्सा ईंधन का होता था, जो अब 55-60 फीसद है.
दिल्ली और महाराष्ट्र से भी राहत मिली, जो भारतीय उड्डयन क्षेत्र की रीढ़ जैसे हैं. एअरपोर्ट्स काउंसिल इंटरनेशनल के मुताबिक, 2024 में दिल्ली से 7.78 करोड़ लोग उड़े-उतरे, जबकि मुंबई देश का दूसरा सबसे व्यस्त विमानन हब है, जहां लगभग 5.5 करोड़ लोगों का आना-जाना है. महाराष्ट्र ने 15 मई को छह महीने के लिए एटीएफ पर वैट (वैल्यू-एडेड टैक्स) 18 फीसद से घटाकर 7 फीसद कर दिया.
एक दिन बाद दिल्ली ने भी वैट 25 फीसद से 7 फीसद कर दिया. उसके बाद केंद्र सरकार ने दूसरे राज्यों से भी ऐसा ही करने को कहा. नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने कहा, ''हम कुछ समय से और खासकर संकट के समय में राज्य सरकारों से एटीएफ पर वैट कम करने के लिए बातचीत कर रहे हैं.’’ राज्यों ने इसका विरोध किया है क्योंकि एटीएफ पर वैट राजस्व का बड़ा स्रोत है. दिल्ली को कम दर से सालाना 985 करोड़ रुपए घाटे का अनुमान है. चिंताएं ये भी हैं कि यह कहीं मिसाल न बन जाए.
वैसे, एअरलाइनों पर कर का बोझ सिर्फ वैट ही नहीं है. एटीएफ पर 11 फीसद उत्पाद शुल्क भी है, जो कीमतें बढ़ने पर अपने आप बढ़ जाता है क्योंकि उसकी गणना फीसद के हिसाब से की जाती है. एफआइए ने कहा, ''पहले भी एअरलाइनों ने मांग की है कि उत्पाद शुल्क को एटीएफ की कीमत के फीसद के बजाए तय रकम के रूप में लिया जाना चाहिए.’’ फर्क के दायरे बढ़ते जाते हैं. कच्चे और रिफाइंड तेल की कीमतों का अंतर भी दबाव को बढ़ाता है.
इस बीच, सबसे बड़ा यानी एटीएफ को जीएसटी के दायरे में लाने का मुद्दा अभी भी अनसुलझा है क्योंकि यह राजनैतिक रूप से मुश्किल फैसला है. एटीएफ को जीएसटी के दायरे में लाने से पेट्रोल और डीजल को भी उसी ढांचे में लाने का दबाव बढ़ सकता है, जिससे राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और कम हो सकती है.
उछलता घाटा
पश्चिम एशिया में जंग शुरू होने के पहले से ही भारतीय एअरलाइनें मुश्किलों का सामना कर रही थीं. जून 2025 में अहमदाबाद में एअर इंडिया की उड़ान के दुर्घटनाग्रस्त होने और दिसंबर में डीजीसीए के नए नियमों (पाइलटों और दूसरे विमानकर्मियों के काम के घंटों की सीमा) पर अमल न कर पाने के कारण इंडिगो जैसी देश की बड़ी एअरलाइन की कमियां सामने आ गई थीं. प्रैट ऐंड व्हिटनी इंजन में तकनीकी खराबी के कारण इंडिगो के 50-70 विमान भी बेकार खड़े थे. उड़ानों का रद्द होना आम बात हो गई थी.
संसद में पेश सरकारी आंकड़ों से पता चला कि इस उद्योग को वित्त वर्ष 24 में कुल 924 करोड़ रुपए का घाटा हुआ था, जो वित्त वर्ष 25 में बढ़कर 5,290 करोड़ रुपए हो गया (देखें, वजूद बचाने की जुगत).
सरकार की 5,000 करोड़ रुपए की इमरजेंसी लोन स्कीम से कुछ तो राहत मिली है लेकिन एअरलाइनों ने इसका हल मुख्य रूप से उड़ानें कम करके और किराए में फ्यूल सरचार्ज जोड़कर निकालने की कोशिश की है.
घरेलू यात्रियों को अब प्रति टिकट 299-899 रुपए अतिरिक्त देने पड़ते हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय यात्रियों को यूरोप के लिए प्रति सेक्टर लगभग 17,000 रुपए और उत्तरी अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया के लिए 23,200 रुपए का सरचार्ज देना पड़ता है. हालांकि, किराया बढ़ाने की भी एक सीमा होती है.
एक एअरलाइन के अधिकारी कहते हैं, ''आखिरकार, मैं नहीं चाहूंगा कि किराए इतने बढ़ जाएं कि मैं मुकाबले से ही बाहर हो जाऊं. ग्राहकों पर बोझ डालने की भी अपनी सीमाएं हैं.’’
क्रिसिल इंटेलिजेंस में कंसल्टिंग के सीनियर डायरेक्टर तथा ग्लोबल हेड जगन्नारायण पद्मनाभन के मुताबिक, भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते उड्डयन बाजारों में से एक बना हुआ है, जहां बढ़ते मध्यवर्ग की यात्राएं, इन्फ्रास्ट्रक्चर के विस्तार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी से मजबूत मांग उभर रही है. वे कहते हैं, ''लेकिन मौजूदा दौर यह दिखा रहा है कि सिर्फ ग्रोथ से ही लंबे समय तक मुनाफा नहीं कमाया जा सकता.’’
मतलब यह है कि जो एअरलाइन बड़े पैमाने पर कामकाज करती हैं, कीमतें अपेक्षाकृत वाजिब रखती हैं और ईंधन खर्च को ध्यान में रखकर उड़ानें संचालित करती हैं, उनके इस मुश्किल दौर में उबरने की संभावना है. लेकिन जिनकी बैलेंस शीट पहले ही कमजोर है, यानी जो जैसे-तैसे काम चला रही हैं, वे शायद इस संकट से पार न पाएं.
मार्च में क्रेडिट रेटिंग एजेंसी आइसीआरए ने उड्डयन सेक्टर के लिए अपने नजरिए को 'स्थिर’ से बदलकर 'नकारात्मक’ कर दिया था. एजेंसी अपने उस अनुमान पर अभी भी कायम है. भारत के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर डिपार्चर बोर्ड पर अभी भी वही डेस्टिनेशन या उड़ान मंजिलें दिखाई देती हैं. बस उड़ान में ज्यादा समय लगता है, खर्च बहुत ज्यादा होता है और कभी-कभी वे उड़ान ही नहीं भरतीं.
एअर इंडिया ने जून और अगस्त के बीच सात अंतरराष्ट्रीय रूटों पर उड़ानें मुल्तवी कर दी हैं, इंडिगो और स्पाइसजेट ने भी उड़ानों में कई तरह की कटौती की. घरेलू रूटों पर एअरलाइनों ने जून में पिछले साल के मुकाबले सात फीसद कम साप्ताहिक उड़ानें भरीं.