बिखरा सूत-कपास

भारत का टेक्सटाइल सेक्टर हाल की भू-राजनीतिक उथल-पुथल से उबरने और 2030 तक 100 अरब डॉलर के निर्यात लक्ष्य पाने को कड़ी मशक्कत कर रहा. इसे फिर से पटरी पर लाने के लिए व्यापार समझौतों और नीतिगत सहयोग के साथ उद्योग का अपग्रेडेशन जरूरी है

सन्नाटा महाराष्ट्र के भिवंडी स्थित बजाज फैब फैक्ट्री में कर्मचारी

मुंबई के पास ठाणे में टेक्सटाइल नगरी भिवंडी के लिए अप्रैल और मई अक्सर सबसे बेरहम महीने होते हैं. यहां की लगभग 50,000 फैक्ट्रियों में ज्यादातर पारंपरिक पावरलूम इकाइयां हैं और इनमें धागे से कपड़ा बनाया जाता है. लेकिन गर्मी के महीनों में जब तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है तो इस शहर से कामगारों का पलायन होने लगता है.

वे अपने-अपने राज्यों को लौट जाते हैं. यहां काम करने वाले 15-20 लाख कामगारों में से ज्यादातर बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से आए प्रवासी हैं. लेकिन इस साल इनमें से आधे कामगार मार्च में ही अपने घर चले गए, जिससे मिलों में उत्पादन पूरी तरह थम गया. ऑप्टिमम सिल्क मिल्स के डायरेक्टर उचित शाह बताते हैं कि यह पलायन पश्चिम एशिया के युद्ध और उसके बाद रसोई गैस की कमी के कारण शुरू हुआ, जिसका असर प्रवासी कामगारों की बस्तियों पर पड़ा.

साथ ही, युद्ध के कारण निर्यात भी पूरी तरह ठप पड़ गया. मुख्य रूप से पश्चिम एशिया और अफ्रीका को निर्यात करने वाले शाह कहते हैं, ''मेरा 3 करोड़ रुपए से ज्यादा का माल पड़ा रहा क्योंकि बीमा कंपनियां उन शिपमेंटों का इंश्योरेंस करने को तैयार नहीं थीं जो पश्चिम एशिया के देशों या उस रास्ते से अन्यत्र जाने वाली थीं.'' उनके पास अपने कुछ कपड़ों को भारी छूट पर घरेलू बाजार में बेचने के अलावा और कोई चारा न था.

भिवंडी जैसे ही मुश्किलों भरे सूरते-हाल सूरत में भी देखने को मिले, जो एक और बड़ी वस्त्र नगरी है. युद्ध विराम से पहले के चार हफ्तों की लड़ाई के दौरान शहर की 25,000 कपड़ा इकाइयों को लगभग 5,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने पूरी वैल्यू चेन—बुनाई और प्रिंटिंग से लेकर कशीदाकारी और मैन-मेड फाइबर्स या एमएमएफ (क्रूड ऑयल और लकड़ी के पल्प से बने सेल्यूलोसिक फाइबर) के उत्पादन तक—को चोट पहुंचाई है.

पॉलिएस्टर और नायलॉन धागे की कीमतें लगभग 50 फीसदी या 10-40 रुपए प्रति किलो बढ़ गई हैं, जबकि ग्रे फैब्रिक (करघे या बुनाई मशीन से निकला कच्चा, बिना फिनिश किया कपड़ा) 3-5 रुपए प्रति मीटर महंगा हो गया है. रंगों और केमिकल की इनपुट लागत में 60 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है, औद्योगिक कोयले की कीमतों में 35 फीसदी इजाफा हो गया है और शिपिंग का भाड़ा 400 फीसदी तक उछल गया है.

परिवहन लागत भी 400 रुपए से बढ़कर 600 रुपए प्रति ट्रक से ज्यादा हो गई है, जिससे पूरी उत्पादन शृंखला में मुनाफा सिकुड़ गया है. फेडरेशन ऑफ गुजरात वीवर्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक जीरावाला कहते हैं, ''इतनी ज्यादा लागत पर हमारे कपड़े बाजार में टिक नहीं पा रहे थे. हमें उत्पादन में कटौती करनी पड़ी. युद्ध के दौरान रोज 100 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ.''

अमेरिका-इज्राएल और ईरान के बीच युद्ध विराम के बाद पश्चिम एशिया की लड़ाई थमने से हालात थोड़े बेहतर हुए हैं. इससे भारत की निर्यात खेपों की कुछ आवाजाही होने लगी है—अलबत्ता इसकी रफ्तार धीमी है. पश्चिम एशिया संकट टेक्सटाइल इंडस्ट्री की समस्याओं की वजह नहीं था. बल्कि इसने उन हालात को और बिगाड़ दिया जो बढ़ती लागत, पुराने उत्पादन तंत्र, श्रमिकों की समस्याएं, वित्तीय मुश्किलें और वैश्विक वस्त्र बाजार के नए क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा करने की अक्षमता से पैदा हुए थे.

भारतीय टेक्सटाइल उद्योग के सामने पैदा हुआ विरोधाभास एकदम स्पष्ट है. युद्ध शुरू होने से पहले से ही भारत का 179 अरब डॉलर (17 लाख करोड़ रु.) का कपड़ा और परिधान उद्योग—जिसमें 4.5 करोड़ लोग काम करते हैं और जिससे 50 लाख छोटे-मझोले उद्यम (एमएसएमई) जुड़े हुए हैं—अपनी प्रतिस्पर्धा की क्षमता खोता जा रहा है.

भले ही घरेलू कपड़ों का बाजार लगभग 100 अरब डॉलर (9.5 लाख करोड़ रु.) का हो और हर साल इसमें 7-9 फीसदी की दर से लगातार इजाफा हो रहा हो और कभी-कभी यह दर दहाई तक भी पहुंच जाती है. इसका ओवरऑल एक्सपोर्ट पिछले एक दशक से 35 अरब से 37 अरब डॉलर (3.3 से 3.5 लाख करोड़ रु.) के बीच झूल रहा है. फिर भी इसका निर्यात पिछले पांच-छह साल से 13-16 अरब डॉलर (1.2-1.5 लाख करोड़ रु.) पर ही अटका हुआ है. इसके विपरीत चीन, वियतनाम और बांग्लादेश सरीखे प्रतिस्पर्धी देशों ने अपने बाजार का विस्तार कर लिया है.

कॉटन का पूरा एक जाल

बड़ी समस्या खाड़ी संकट से कई वर्ष पहले की है. भारत का पहला बड़ा नुक्सान उस वक्त हुआ जब उसने एमएमएफ की तरफ हो रहे वैश्विक झुकाव की अनदेखी कर दी. कपड़ा निर्यात लगातार कॉटन पर ही निर्भर रहा जिसकी निर्यात में हिस्सेदारी 85 फीसदी के आसपास रही. जबकि वैश्विक मांग अब एमएमएफ की ओर शिफ्ट हो रही है जिसका स्पोर्ट्सवियर, विंटरवियर, एथलेजर और टेक्लिकल टेक्सटाइल्स में वर्चस्व है. घरेलू स्तर पर कपास और एमएमएफ की खपत का अनुपात 60 और 40 है, जबकि वैश्विक स्तर पर यह अनुपात 25 और 75 का है.

क्लॉदिंग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीएमएआइ) के मुख्य सलाहकार राहुल मेहता कहते हैं कि इससे भारत के निर्यात का डायवर्सीफिकेशन नहीं हो सका. नोएडा में गारमेंट और होम फर्निशिंग की निर्माता मीनू क्रिएशन के सीईओ अमन पेशावरी कहते हैं, ''इसी कारण से भारतीय कपड़ा उद्योग मुख्य रूप से वसंत-ग्रीष्म ऋतु के वस्त्रों पर ही केंद्रित रहता है. और एमएमएफ आधारित सर्दियों और तकनीकी कपड़ों के क्षेत्रों में इसकी मौजूदगी काफी सीमित है.

इससे हाइ वैल्यू चेन वाले बाजार में हमारी भागीदारी बाधित होती है.'' इसके विपरीत चीन ने दशकों पहले उच्च प्रतिस्पर्धा वाला एमएमएफ ईकोसिस्टम तैयार किया जो वैश्विक सिंथेटिक टेक्सटाइल निर्यात में इसका दबदबा बनाता है. वियतनाम ने आक्रमक रूप से एमएमएफ मैन्युफैक्चरिंग का फायदा उठाकर ग्लोबल फास्ट फैशन सप्लाइ चेन में अपनी पैठ बना ली है. लेकिन भारत कॉटन के भरोसे बैठा रहा.

यहां तक कि भारत के कॉटन सेक्टर में भी दबाव के लक्षण नजर आने लगे. नोएडा की गिन्नी फिलामेंट्स के डायरेक्टर साकेत जयपुरिया कहते हैं, ''कपास की पैदावार भी घट रही है,'' दुनिया भर में कपास की खेती का 40 फीसदी हिस्सा भारत में है. इसके बावजूद, भारत की पैदावार करीब 450 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जो कई दूसरे देशों की लगभग 2,000 किलोग्राम की पैदावार से बहुत कम है. इसके पैदावार में और कमी का अंदेशा है.

भारत क्वालिटी और निर्यात जरूरतों को पूरा करने के लिए हर साल लगभग 20 लाख गांठें (बेल) आयात करता आ रहा है—जो घरेलू उत्पादन की करीब 6.8 फीसदी हैं जिन पर 11 फीसदी ड्यूटी लगती है. सरकार के दखल में एमएमएफ कपड़ों और फैब्रिक के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना भी शामिल है पर उसका असर सीमित ही रहा है.

स्कीम में शामिल होने की शुरुआती शर्तें काफी मुश्किल हैं—पहले कम से कम 300 करोड़ रुपए का निवेश जरूरी था, जिसे बाद में घटाकर 150 करोड़ रुपए किया गया—जिसकी वजह से इस योजना का फायदा ज्यादातर बड़ी कंपनियों को ही मिला है.

बीती 5 मई को सरकार ने अपने 5 एफ विजन: फार्म टु फाइबर टु फैक्ट्री टु फैशन टु फॉरेन के तहत कपास उत्पादकता मिशन को मंजूरी दी है. इसके तहत 2026-31 के लिए 5,659 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है. मिशन के तहत जलवायु सचेत, कीट प्रतिरोधी बीज किसानों को दिए जाएंगे जिससे 32 लाख किसानों को फायदा पहुंचने की उम्मीद है. इससे उनकी आय बढ़ेगी और वैश्विक बाजार में प्रीमियम भारतीय कॉटन का मानकीकरण करने में मदद मिलेगी.

पैमाना उतना बड़ा नहीं
भारत की दूसरी कमी बड़े पैमाने पर काम न करने की क्षमता में है. ज्यादातर फैक्ट्रियों में 100-500 मशीनें ही चलती हैं, जबकि बांग्लादेश में यह संख्या 2,000-5,000 है. दुनिया भर के बड़े खरीदारों की पसंद ऐसे वेंडर होते हैं जो तय समय के भीतर बड़ी मात्रा में सप्लाइ कर सकें. नोएडा की आरएसडब्ल्यूएम लिमिटेड के सीईओ राजीव गुप्ता बताते हैं कि बड़े वैश्विक खरीदार चाहते हैं कि सप्लायर कम हों पर वे भारी मात्रा में बेहतर गुणवत्ता के साथ एकदम तय समय पर सप्लाइ करते रहें. लेकिन बड़े पैमाने का अंतर स्पष्ट है. जहां घरेलू ऑर्डर आमतौर पर हर महीने दो से तीन लाख पीस के होते हैं, वहीं अंतरराष्ट्रीय खरीदार अक्सर कम से कम 10 लाख पीस की मांग करते हैं.

कपड़ा उद्योग की बिखरी भौगोलिक स्थिति भी समस्या को और बढ़ा देती है. अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के महासचिव मिथलेश्वर ठाकुर कहते हैं, ''कपास मुख्य रूप से गुजरात और महाराष्ट्र में उगाया जाता है, जबकि धागा कताई (यार्न स्पिनिंग) ज्यादातर तमिलनाडु में होती है, कपड़ा गुजरात या महाराष्ट्र में प्रोसेस किया जाता है और कपड़ों का निर्माण पूरे देश में फैला हुआ है. इस बिखराव से लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ जाती है, और परिचालन क्षमता प्रभावित होती है.''

इसके विपरीत चीन और वियतनाम ने एकीकृत टेक्सटाइल क्लस्टर बनाए हैं जहां स्पिनिंग, वीविंग, प्रोसेसिंग और वस्त्र बनाने का काम मजबूती से आपस में जुड़े औद्योगिक ईकोसिस्टम में होता है. इससे परिवहन लागत घटने के साथ समन्वय बढ़ता है और तेजी से काम काम पूरा होता है. भारत में तीसरी बाधा के रूप में तकनीक की कमी आती है. भिवंडी में 'मिशी फैब्रिक्स' के मालिक 70 वर्षीय आरिफ अंसारी कहते हैं, शहर के धीरे-धीरे पीछे जाने की वजह उद्योग का आधुनिकीकरण में नाकाम रहना भी है. वे कहते हैं, ''पच्चीस साल पहले, भिवंडी में सात से आठ लाख करघे हुआ करते थे.

आज, इनकी संख्या लगभग चार से पांच लाख ही रह गई है.'' अंसारी के 120 करघों में से केवल 20 ही आधुनिक हैं; बाकी 1948 के जमाने के हैं. चीन से आयातित धागा कम से कम 25 फीसदी सस्ता है, जिससे घरेलू धागा बाजार में नहीं टिक पा रहा. जयपुरिया कहते हैं, ''पिछले 20 साल में टेक्सटाइल सेक्टर ने टेक्नोलॉजी के लिहाज से अपने आप को अपग्रेड नहीं किया है.''

कम उत्पादकता
चीन की बढ़त आज की तारीख में केवल सस्ते श्रम तक सीमित नहीं. उत्पादकता, ऑटोमेशन, तकनीकी गहराई और एकीकृत सप्लाइ चेन में भी वह आगे है. लेबर उत्पादकता भारत में अब भी बहुत कम है. पेशावरी कहते हैं, ''आज भी एक कामगार एक एम्ब्रॉयडरी मशीन मैनेज करता है, जबकि चीन में एक आदमी चार मशीन संभाल सकता है.'' श्रम का मसला ढांचागत मुश्किल बना हुआ है.

दिल्ली-एनसीआर, बेंगलूरू, चेन्नै और तिरुपुर इसके मुख्य हब हैं लेकिन वे श्रमबल की बहुलता वाले स्थानों से दूर हैं इसलिए आवास और वेतन की कठिनाई सामने आती है. अत्याधुनिक मैन्युफैक्चरिंग के लिहाज से श्रमिक भी बहुत कुशल नहीं है, और कौशल विकास योजनाओं को असरदार तरीके से लागू नहीं किया गया है.

इंडस्ट्री कहती है कि नीतिगत स्तर पर भी भारत ने हालात को मुश्किल कर लिया है. तैयार परिधानों का आयात अपेक्षाकृत खुला हुआ है लेकिन महत्वपूर्ण कच्चे माल और मशीनरी पर शुल्क है जिससे घरेलू उत्पादन लागत बढ़ जाती है. अत्याधुनिक टेक्सटाइल मशीनरी आमतौर पर आयात की जाती है जिससे विदेशों से सप्लाइ पर निर्भरता बढ़ती है. उद्योग के प्रतिनिधि कहते हैं कि थोड़े वक्त के लिए इस तरह की मशीनरी पर कस्टम ड्यूटी घटाने से आधुनिकीकरण तेज हो जाएगा.

खरीदारों का रुझान भी विपरीत रहा है. सीएमएआइ के मेहता के अनुसार, लोग अब परिधान खरीदने के बजाय ज्यादातर पैसा यात्रा और लाइफस्टाइल से जुड़े अनुभवों पर खर्च कर रहे हैं. समस्या इसलिए और बढ़ गई है क्योंकि 2,500 रुपए से ज्यादा कीमत के कपड़ों पर 18 फीसदी जीएसटी लगता है. इसका मिड-रेंज के सेगमेंट में कपड़ों की मांग पर बुरा असर पड़ा है. मेहता कहते हैं, ''यह इस गलत धारणा पर आधारित है कि मध्य वर्ग के लोग सिर्फ 2,500 रुपए कीमत तक के ही कपड़े खरीदते हैं.''

बड़ा नीतिगत प्रोत्साहन
यह देखकर कि भारत वैश्विक मार्केट में हिस्सेदारी गंवा रहा है सरकार ने आक्रामक व्यापारिक और औद्योगिक नीतियों से सेक्टर को पटरी पर लाने की कोशिश की है. हाल ही सरकार ने यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) किए हैं. इन समझौतों में बिना किसी शुल्क के बाजार तक पहुंच का वादा किया गया है, जिससे निर्यातकों को बांग्लादेश, वियतनाम और तुर्किए जैसे प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले 9-12 फीसदी टैरिफ के नुक्सान से उबरने में मदद मिलेगी.

जुलाई 2025 में हुए भारत-यूके एफटीए से भारत के 99 फीसद निर्यात को ड्यूटी फ्री पहुंच मिलेगी. ईयू से एफटीए भारत के सबसे बड़े परिधान बाजारों में से एक को खोलता है जहां वस्त्र आयात का करीब 60 फीसद रेडीमेड परिधान हैं. 

सरकार ने 2030 तक 100 अरब डॉलर (9.5 लाख करोड़ रु.) के निर्यात का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, जो अभी करीब 40 अरब डॉलर (3.8 लाख करोड़ रु) है. इस रणनीति में हाइ वैल्यू उत्पादों जैसे ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (जीआइ) उत्पादों, कालीनों, हथकरघा और रेशम जैसे ज्यादा महंगे सेगमेंट पर ध्यान देने के साथ गैर निर्यात जिलों को एक्सपोर्ट हब बनाना शामिल है. पीएम मित्र (प्रधानमंत्री मेगा इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल रीजन ऐंड अपैरल) पार्क योजना का उद्देश्य समूची वस्त्र मूल्य शृंखला को एक ही स्थान पर लाना है, ताकि लॉजिस्टिक्स की लागत कम हो और बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हो सके.

अकेले पहुंच से प्रतिस्पर्धा के संकट का मुकाबला नहीं हो सकता. बांग्लादेश को कुछ बाजारों में ड्यूटी में छूट के साथ मजदूरी की कम लागत का भी लाभ मिलता है. वियतनाम अपनी एकीकृत सप्लाइ चेन, मजबूत एमएमएफ ईकोसिस्टम और तेजी से काम निबटाने की क्षमता की बदौलत पसंदीदा सोर्सिंग गंतव्य बनकर उभरा है.

बढ़ते वेतन के बावजूद चीन मात्रा, तकनीक और दक्षता की बदौलत दबदबा कायम किए हुए है. भारत बांग्लादेश और वियतनाम को बड़े पैमाने पर यार्न और फैब्रिक निर्यात करता है जहां इन्हें ग्लोबल ब्रांडों के लिए कपड़ों में तब्दील किया जाता है. दूसरे शब्दों में भारत सप्लाइ चेन की कम वैल्यू वाली चीजें निर्यात करता है जबकि प्रतिद्वंद्वी अधिक मुनाफे वाले गारमेंट सेक्टर पर कब्जा करके बैठे हैं.

लक्ष्य विविधता लाने का
इंडस्ट्री दिग्गज कह रहे हैं कि अगर भारत सचमुच ग्लोबल रिटेलर्स की तरफ से अपनाई गई 'चाइना प्लस वन' की रणनीति का फायदा लेना चाहता है तो उसे निचले स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं को तत्काल मजबूत करना होगा. गुप्ता कहते हैं कि धागे और फैब्रिक बनाने में ज्यादा पूंजी की जरूरत होती है और इसके लिए 300-400 करोड़ रुपए का निवेश चाहिए, लेकिन कपड़ों का निर्माण मात्र 1-2 करोड़ रुपए के निवेश से शुरू किया जा सकता है जिससे ज्यादा संख्या में रोजगार सृजन और वैल्यू एडिशन किया जा सकता है. विविधीकरण भी बहुत महत्वपूर्ण है. एमएमएफ आधारित उत्पादों, टेक्निकल टेक्सटाइल और फास्ट फैशन कैटेगरी में आक्रामक ढंग से विस्तार अनिवार्य है. जयपुरिया कहते हैं, ''बड़े ग्राहकों की जरूरतें पूरी करने के लिए पूरी मूल्य शृंखला में विश्वसनीयता होनी चाहिए.'' वे प्रोसेसिंग तथा फिनिशिंग में होने वाली विसंगतियों का जिक्र करते हैं जो अक्सर निर्यात ऑर्डरों को कमजोर करती हैं.

खाड़ी संकट ने भारत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री की कमजोरियों को उघाड़ दिया लेकिन सच यह है कि ये बरसों की उपेक्षा की वजह से पनपी हैं. भारत के लिए अवसर अभी भी अपार हैं. इंटरनेशनल ब्रांड सक्रिय रूप से चीन से इतर देख रहे हैं. देश के सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले सेक्टरों में से एक और रणनीतिक रूप से अहम मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के सामने साधारण चुनौती निर्यात बढ़ाने की है, ताकि वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बना जा सके. 

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