भारत और ओमान: अगला व्यापार मोर्चा

भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच ओमान से व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता भारत को वैकल्पिक व्यापार और निवेश का रास्ता दिखाएगा

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अनिल वाधवा

जब भारत और ओमान ने 2025 के आखिरी महीनों में व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते पर दस्तखत किए, तो यह न केवल ट्रेड डील पर दस्तखत करना था बल्कि जीवनरेखा खींचना भी था. समझौता पहली जून से लागू हो गया. पश्चिम एशिया संकट और होर्मुज जल संधि के बंद होने से इसने तुरत-फुरत अहमियत भी हासिल कर ली.

ऊर्जा और व्यापार का बहुत बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है. भारत के लिए समझौते का मतलब ऐसे वक्त अपने भविष्य को सुरक्षित करना है जब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के नीचे से जमीन खिसक रही है. ओमान ने भारतीय साज-सामान के लिए अपने दरवाजे लगभग पूरे खोल दिए हैं.

तकरीबन हर उत्पाद समूह—98 फीसद—को ओमान में मुक्त प्रवेश मिल गया है. इसमें कपड़ों और चमड़े से लेकर रत्न-आभूषणों, मशीनरी, दवाइयों और कृषि उपज तक हर वह चीज शामिल है जो भारत वहां बेचता है.

अपनी ओर से भारत ने ओमान से आने वाली करीब 78 फीसद वस्तुओं पर शुल्क घटा दिया है. हालांकि, भारत ने डेयरी, कीमती धातुओं और फुटवियर सरीखी संवेदनशील चीजों के लिए संरक्षण बनाए रखा है.

समझौते ने सेवाओं के भी दरवाजे खोल दिए. भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनियों, कंसल्टेंट, शिक्षकों और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को ओमान में काम करते हुए कम रुकावटों का सामना करना पड़ेगा, जिससे पेशेवरों का आना-जाना बढ़ सकता है. दरअसल, भारतीय कारोबारी अब सोहर और सलाला जैसे विशेष आर्थिक जोन समेत पूरे ओमान में अपने 100 फीसद कामकाज के मालिक हो सकते हैं.

फिलहाल भारत और ओमान के बीच हर साल करीब 10.5 अरब डॉलर (10,045 करोड़ रुपए) का व्यापार होता है, जिसमें भारत 4.1 अरब डॉलर (3,922 करोड़ रुपए) का निर्यात करता है. इस समझौते की बदौलत यह आंकड़ा कुछेक सालों में ही संभवत: 13 अरब डॉलर (12,437 करोड़ रुपए) के पार पहुंच सकता है.

ओमान में पहले ही कुल 7.5 अरब डॉलर (7,175 करोड़ रुपए) से ज्यादा के निवेश के साथ 6,000 भारतीय कंपनियां काम कर रही हैं. भारतीय फर्में अब ओमान के सौर बुनियादी ढांचे और स्मार्ट सिटी पहलों में ज्यादा सहजता से काम कर सकती हैं. बदले में ओमान को भारत के टेक्नोलॉजी ईकोसिस्टम तक पहुंच मिल गई है, जिससे नवाचार और विशेषज्ञता का दोतरफा आना-जाना होगा.

समझौते से निवेश के रिश्तों में भी गहराई आएगी. भारत मैन्युफैक्चरिंग और स्वच्छ टेक्नोलॉजी में महारत की बदौलत ओमान के उभरते उद्योगों में निवेश के मंसूबे बना रहा है. ओमानी संप्रभु पूंजी भारतीय मैन्युफैक्चरिंग में ज्यादा स्वतंत्रता से निवेश कर सकती है और अपनी खाद्य सुरक्षा को बेहतर बना सकती है.

दुक्म और सलाला सरीखे ओमानी बंदरगाह, जो पहले से ही ट्रांसशिपमेंट (माल को एक जहाज से उतारकर दूसरे जहाज में लादने) और बंकरिंग (जहाजों में ईंधन भरने) के क्षेत्रीय केंद्र हैं, सामान को रास्ता बदलकर ले जाने, बेहद अहम आपूर्तियों को छांटने और उत्तरी खाड़ी की फौरी उथलपुथल से दूर रहकर व्यावसायिक कामकाज चलाने के लिए सुरक्षित ठिकानों की तरह काम कर सकते हैं. 

यह व्यापार समझौता बाजारों तक पहुंच भी कई गुना बढ़ाने वाला है. ओमान के आधुनिक बंदरगाहों और अन्य क्षेत्रों के साथ उसके तरजीही व्यापार समझौतों ने ट्रांसशिपमेंट को इतना कुशल और समर्थ बना दिया है कि इससे दूरदराज के बाजारों तक पहुंचने की लेनदेन लागतें कम हो गई हैं.

इसका मतलब यह है कि कपड़ों और दवाइयों से लेकर ऑटोमोबाइल और कृषि-प्रसंस्करित खाद्य पदार्थों तक के भारतीय निर्यातकों को पूरी तरह नए दोतरफा तंत्रों के बिना ही खरीदारों तक पहुंचने के ज्यादा तेज और ज्यादा सस्ते गलियारे मिल जाएंगे. भारतीय सामान ब्रिटेन, ईयू और अमेरिका के खरीदारों के लिए ज्यादा आकर्षक हो सकते हैं क्योंकि इन देशों के ओमान के साथ मुक्त व्यापार समझौते हैं और ये आपूर्ति शृंखलाओं को लचीला बनाना चाहते हैं.

भारत-ओमान व्यापार समझौता भारत को शायद बड़े क्षेत्रीय युद्ध के बड़े आर्थिक झटके से न बचा सके. लेकिन इसने भारत को व्यावहारिक औजार दे दिए हैं—वैकल्पिक लॉजिस्टिक्स, अनुकूल ट्रांसशिपमेंट बेस, निवेश की कड़ियां, और ऐसा व्यापार साझेदार जो गलियारों को खुला रख सकता है.

इक्कीसवीं सदी के वाणिज्य और संघर्ष के बीच होने वाले मुकाबले में भूगोल भी मायने रखता है, और ऐसे समझौते इसमें निहित फायदों को कई गुना बढ़ा सकते हैं. यह समझौता ऐतिहासिक नजीर कायम करता है और इसे ऐसे आधुनिक बफर और ब्रिज में बदल देता है जो भारतीय व्यापार को तात्कालिक क्षेत्रीय प्रभावों से बचाता है, और साथ ही उन बाजारों तक पहुंच भी बढ़ाता है जो भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के लिए सबसे ज्यादा मायने रखते हैं.

 - अनिल वाधवा (विदेश मंत्रालय में सचिव और ओमान में भारत के राजदूत रह चुके हैं)

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