प्रधान संपादक की कलम से

सेहत को लेकर वैसे सामान्य शक, जो हर किसी को कभी न कभी होते हैं, उनसे घिरकर ये लोग डॉक्टर के बजाए सर्च बार या चैटबॉट से जवाब लेने लगते हैं.

इंडिया टुडे हिंदी, 17 जून 2026 अंक
इंडिया टुडे हिंदी, 17 जून 2026 अंक

—अरुण पुरी.

महाराष्ट्र के 41 साल के एक बैंकर को पक्का यकीन हो गया था कि उन्हें बोन कैंसर है और वे चौथी राय लेने मुंबई से न्यूयॉर्क तक चले गए. एक 'मरीज’ राष्ट्रीय स्तर के एक अस्पताल में पहुंचकर तुरंत टीबी की दवा की मांग करने लगा. एक प्रोडक्ट मैनेजर हाथों में झनझनाहट महसूस होने पर नेक ब्रेस खरीदने के चक्कर में पड़ गया.

इनमें से किसी को भी असल में कुछ खास नहीं था. बैंकर ने मुंबई के तीन कैंसर विशेषज्ञों की बात नहीं मानी, उन्होंने इसे मामूली सूजन बताया था. परिवार में कैंसर की हिस्ट्री होने की वजह से वे पहले से ही फिक्रमंद थे. इसलिए उन्होंने अपने घुटने की गांठ से जुड़ी हर जानकारी चैटजीपीटी में डाल दी.

जवाब में उन्हें लंबी-चौड़ी व्याख्या मिली, जिसमें बोन कैंसर का अंदेशा जताया गया था. अमेरिका में क्लिनिकल टेस्ट के बाद जाकर पता चला कि उन्हें ऐसी कोई बीमारी नहीं है. टीबी वाला व्यक्ति तो डॉक्टर पर इलाज से इनकार करने का आरोप लगाने को तैयार था. उसके कजिन को टीबी थी.

और एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) ऐप ने पूछने पर उसे टीबी एक्सपोजर के सबसे खराब नतीजों को लेकर चेताया था. उसे शांत करने से पहले एक या दो नहीं, बल्कि तीन बार नेगेटिव टेस्ट रिपोर्ट दिखानी पड़ी. जिस व्यक्ति ने खुद से नेक ब्रेस पहन लिया था, उसे इंटरनेट पर मिली एक्सरसाइज से अलग, टारगेटेड एक्सरसाइज की जरूरत थी.

दक्षिण दिल्ली की 29 साल की एक महिला का मामला इससे भी बदतर निकला. उसने डॉक्टर से सलाह लिए बगैर ही और बिना अल्ट्रासाउंड कराए गर्भपात की गोलियां ले लीं. नतीजा: तेज ऐंठन, भारी ब्लीडिंग और अधूरे गर्भपात के साथ उसे अस्पताल पहुंचना पड़ा.

इन सबमें एक चीज वाकई गलत थी. ऑनलाइन मेडिकल जानकारी के विस्फोट से पैदा हुई एक जुनूनी व्यवहारगत प्रवृत्ति. सेहत को लेकर वैसे सामान्य शक, जो हर किसी को कभी न कभी होते हैं, उनसे घिरकर ये लोग डॉक्टर के बजाए सर्च बार या चैटबॉट से जवाब लेने लगते हैं. यूजर-फ्रेंड्ली एआइ मॉडल आने के बाद यह आदत बिल्कुल अलग ही स्तर पर पहुंच गई है.

''अपने लक्षण गूगल करने’’ वाली पुरानी आदत अब जनरेटिव एआइ से और तेज हो गई है. यह एआइ साफ-सुथरी, निजी लगने वाली ऐसी व्याख्या देता है जो असली क्लिनिकल सलाह जैसी लगती है. इसी से सेल्फ-डायग्नोसिस और सेल्फ-मेडिकेशन में इतना खतरनाक उछाल आया है कि इसके लिए एक शब्द गढ़ा गया है: 'साइबरकॉन्ड्रिया’. यह पुराने हाइपोकॉन्ड्रिया का 21वीं सदी वाला रूप है.

यह कोई हल्का-फुल्का, थोड़े समय का चलन नहीं है. 2026 में द साइंटिफिक वर्ल्ड जर्नल (टीएसडब्ल्यूजे) के एक ग्लोबल रिव्यू ने दुनिया की 30 फीसद से ज्यादा वयस्क आबादी को साइबरकॉन्ड्रिएक बताया है; यह 2024 की उस स्टडी की पुष्टि करता है, जिसमें भारत के आइटी कर्मचारियों में सबसे ज्यादा (55.6 फीसद) असर बताया गया था. भारतीय छात्र भी एक कमजोर समूह हैं: उनके बीच अनुमान 22 फीसद से 49 फीसद तक जाते हैं.

डॉक्टर के पास जाना हमेशा सबसे बेहतर विकल्प है, लेकिन साइबरकॉन्ड्रिया वहां भी भीड़ बढ़ा रहा है. आर्टेमिस गुरुग्राम में क्लिनिकल कार्डियोलॉजी के चीफ डॉ. राहुल मेहरोत्रा कहते हैं, ''एआइ सिम्प्टम चेकर और हेल्थ वीडियो तक आसान पहुंच की वजह से अब मरीजों का घबराहट में और सबसे बुरी स्थिति के बारे में सोचते हुए इमरजेंसी रूम में आना तेजी से आम हो रहा है.’’

डॉक्टर अब ऐसे मरीज देख रहे हैं जो सिरदर्द, चक्कर या थोड़ी देर के लिए याददाश्त चूकने को स्ट्रोक, ब्रेन ट्यूमर आदि मान लेते हैं. सीने में उठे हर दर्द को दिल की बीमारी समझ लेना पुरानी आदत रही है. अब ''डॉ. चैटजीपीटी’’ उनके सबसे बड़े डर पर मुहर लगा देता है. गाइनेकोलॉजी में महिलाएं मान बैठती हैं कि उन्हें पीएमओएस, पीसीओएस, थायरॉइड की दिक्कत या पेरिमेनोपॉज है.

एआइ चेकलिस्ट का हर लक्षण, या इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर खुद को 'मेडिकल एक्सपर्ट’ बताने वालों की हर बात, उन्हें अपने ऊपर फिट बैठती दिखती है. ऑर्थोपेडिक्स में लोग आम एक्सरसाइज वीडियो देखकर उन्हें अपनाते हैं, और कई बार अपनी समस्या और बढ़ा लेते हैं.

साइबरकॉन्ड्रिया दोनों छोरों पर नुक्सान करता है: बीमार लोग गलत डायग्नोसिस कर लेते हैं या सही इलाज में देरी करते हैं, और स्वस्थ लोग गैरजरूरी स्कैन के पीछे भागते हैं. अब डॉक्टरों को हर जगह थोड़ा-बहुत मनोचिकित्सक भी बनना पड़ रहा है. मरीजों की गलत धारणा तोड़नी पड़ती है, उनकी चिंता कम करनी पड़ती है और उन्हें असलियत से रू-ब-रू कराना पड़ता है.

वरना पीड़ित हेल्थ एंग्जाइटी, डिप्रेशन और तनाव के चक्र में फंसे रहते हैं. 'एआइ साइकोफैंसी’ यानी एआइ मॉडल्स की जरूरत से ज्यादा हामी भरने और मान्यता देने की प्रवृत्ति इसे और बढ़ा देती है. अगर आप गलती से मान बैठे हैं कि आपको कैंसर है, तो एआइ का पहले से मौजूद सहमति वाला लहजा समस्या बन जाता है.

लेकिन ''डॉ. चैटजीपीटी’’ के आने से पहले ही 2022 की एक स्टडी में 45.3 फीसद भारतीय वयस्कों में साइबरकॉन्ड्रिया पाया गया था. यह आदत इतनी सहज हो चुकी है कि शोधकर्ताओं ने इसके लिए साइबरकॉन्ड्रिया सीवियरिटी स्केल जैसे औपचारिक स्क्रीनिंग टूल बना लिए हैं. 2025 में भारतीय आबादी इनके लिए स्वाभाविक टेस्टिंग ग्राउंड बन गई.

टीएसडब्ल्यूजे की स्टडी साइबरकॉन्ड्रिया को साफ तौर पर ''मानसिक सेहत पर खराब असर’’ से जोड़ती है. लेकिन शारीरिक सेहत भी कम दांव पर नहीं है. मुनाफे से चलने वाले मेडिकल सिस्टम को लेकर शक, स्पेशलिस्ट तक असमान पहुंच और डॉक्टर के पास जाने में लोगों की झिझक, इन सबको अब एक ऐसा विकल्प हवा दे रहा है, जिसके साथ अपनी वैधानिक चेतावनी होनी चाहिए.

यह आपके दिमाग में ''सबसे खराब स्थिति’’ को गलत तरीके से जिंदा कर सकता है. ऑनलाइन सलाह की राहें क्वालिटी और भरोसे के मामले में बहुत अलग-अलग हो सकती हैं. ये ओजेम्पिक या स्टेरॉयड वाली क्रीमों को लेकर लापरवाह रवैया पैदा कर सकती हैं.

फेसबुक पर आया कोई पॉप-अप क्विज आपको यह यकीन दिला सकता है कि आपको एडीएचडी है, और फिर आप संदिग्ध ऐप्स, सप्लीमेंट्स या पास वाली दवाई की दुकान की ओर कदम बढ़ा सकते हैं.

इसका जवाब यह नहीं कि टेक्नोलॉजी को खलनायक घोषित कर उसे खारिज कर दिया जाए. सही इस्तेमाल हो तो यह बहुत काम की चीज हो सकती है. इस हफ्ते की हमारी कवर स्टोरी, सीनियर एडिटर सोनाली आचार्जी ने लिखी है.

यह आपको सही आदतें अपनाने में मदद करती है: अपनी अगली एआइ डायग्नोसिस को अंतिम फैसला नहीं, बल्कि बहुत शुरुआती संकेत मानें. उससे कड़े सवाल पूछें. यह आपकी मदद के लिए बना औजार है. आपको हमेशा परेशान रखने के लिए नहीं.

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