पर्वत प्रदेश में अब छाया तेंदुओं का खौफ
पहाड़ी राज्य के कई इलाकों में इंसान और जंगली जानवरों के बीच बढ़ते संघर्ष से दोनों तरफ जान जा रही. दहशत के चलते स्कूल किए जा रहे बंद और गांवों से पलायन हो रहा तेज

- एम.सी. पांडेय
उनतीस अप्रैल की शाम नैनीताल जिले के भीमताल-भवाली मार्ग पर खुटानी के पास एक तेंदुआ अचानक पहाड़ी से छलांग लगाकर सड़क पर आ गया और तेज रफ्तार बाइक से टकराकर उसके पहिए में फंस गया.
बाइक सवार किसी तरह जान बचाकर भागे. घंटों तक तेंदुआ खुद को छुड़ाने की कोशिश करता रहा. आखिरकार वन विभाग की टीम ने उसे ट्रेंक्वलाइज कर रानीबाग रेस्क्यू सेंटर भेजा. यह इस तरह की कोई अकेली घटना नहीं थी.
यह उत्तराखंड की बदलती वन्यजीव पारिस्थितिकी की प्रतीकात्मक तस्वीर थी जहां जंगल और इंसानी बस्तियों के बीच की सीमाएं तेजी से मिट रही हैं. पौड़ी गढ़वाल के कमांद गांव में 60 वर्षीय महेश चंद्र मलासी 15 मई को रोज की तरह मवेशियों के लिए घास लेने खेतों की ओर गए थे. देर रात उनका क्षत-विक्षत शव झाड़ियों में मिला. ग्रामीणों का आरोप था कि इलाके में लंबे समय से गुलदार की गतिविधियां बढ़ रही थीं लेकिन वन विभाग ने समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया.
उत्तराखंड की विधानसभा में रखे गए सरकारी आंकड़े इस संकट की भयावहता को और स्पष्ट करते हैं. राज्य गठन के बाद से जनवरी 2026 तक वन्यजीव हमलों में 1,296 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि 6,624 लोग घायल हुए हैं. यानी औसतन हर सप्ताह एक व्यक्ति वन्यजीव संघर्ष में अपनी जान गंवा रहा है. सबसे ज्यादा 543 मौतें तेंदुओं के हमलों में हुईं. हाथियों के हमलों में करीब 230 लोग मारे गए जबकि बाघों ने 106 लोगों की जान ली.
सबसे चिंताजनक संकेत 2026 के शुरुआती महीनों के आंकड़े दे रहे हैं. जनवरी से मार्च 2026 के बीच राज्य में 118 से ज्यादा हमले दर्ज किए गए जिनमें 20 लोगों की मौत हुई. इनमें लगभग आधी मौतें अकेले बाघों के हमलों में हुईं. वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2026 में बाघों के हमलों का 'स्ट्राइक रेट' 100 प्रतिशत रहा. यानी जिस व्यक्ति पर हमला हुआ, वह जीवित नहीं बचा. कॉर्बेट टाइगर रिजर्व, रामनगर और नैनीताल वन प्रभाग इस संघर्ष के सबसे बड़े केंद्र बनकर उभरे हैं. जुलाई 2022 में कॉर्बेट के ढिकाला मार्ग पर बाइक से लौट रहे दो युवकों पर बाघ ने हमला कर दिया था. पीछे बैठे युवक को बाघ जबड़ों में दबाकर जंगल की ओर ले गया जबकि उसका साथी सड़क पर चीखता-चिल्लाता रह गया.
अब हालात ये हैं कि गांवों में सामान्य जीवन तक प्रभावित होने लगा है. पौड़ी जिले के कमंद गांव में गुलदार के हमले के बाद 15 स्कूल बंद करने पड़े. प्रशासन ने आदमखोर घोषित गुलदार को देखते ही गोली मारने के आदेश जारी कर दिए. दिसंबर 2025 में भी पौड़ी के 55 स्कूल गुलदार के डर से बंद किए गए थे. बच्चों की सुरक्षा के लिए स्कूलों के समय तक बदलने पड़े. नैनीताल जिले में अप्रैल 2026 में भीमताल और हल्द्वानी के आसपास 100 से ज्यादा स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र बंद कर दिए गए. वजह थी वह आदमखोर तेंदुआ जिसने दो महीने में आठ लोगों को अपना शिकार बनाया था.
यह संघर्ष आखिर इतना भयावह क्यों होता जा रहा है? विशेषज्ञ इसके पीछे कई कारण गिनाते हैं. सबसे बड़ा कारण है जंगलों का सिकुड़ना और वन्यजीव गलियारों का खत्म होना. उत्तराखंड में पिछले दो दशकों में सड़क, होटल, रिजॉर्ट, रेल परियोजनाओं और शहरी विस्तार में तेजी आई है. जंगलों के भीतर तक इंसानी दखल बढ़ा है. वन्यजीवों के पारंपरिक रास्ते टूट गए हैं. परिणामस्वरूप जानवरों और इंसानों का आमना-सामना बढ़ता जा रहा है.
दूसरा बड़ा कारण है पलायन. पहाड़ों से लाखों लोग शहरों की ओर जा चुके हैं. खाली पड़े घर और वीरान गांव अब जंगली जानवरों की शरणस्थली बनते जा रहे हैं. मई 2023 में पिथौरागढ़ के सिलपाटा गांव में एक खंडहर मकान के भीतर तेंदुए के तीन शावक मिले थे. यह घटना बताती है कि जंगली जानवर अब इंसानी बस्तियों को भी सुरक्षित आश्रय समझने लगे हैं. ग्रामीण विकास एवं पलायन निवारण आयोग ने भी स्वीकार किया है कि जंगली जानवरों का आतंक पलायन की बड़ी वजह बन रहा है. आयोग के अध्यक्ष एस.एस. नेगी ने माना कि आबादी वाले इलाकों में वन्यजीवों की बढ़ती मौजूदगी से लोगों का पलायन बढ़ा है.
लेकिन सबसे दिलचस्प वजह जॉय हुकिल बताते हैं. अब तक 49 नरभक्षी तेंदुओं को ढेर करने वाले हुकिल ने तेंदुओं के बदलते आचरण पर बारीकी से गौर किया है. वे बताते हैं, ''पिछले कुछ सालों में तेंदुओं ने बस्तियों के आसपास की झाड़ियों में ही बच्चे देने शुरू कर दिए. उन बच्चों ने असली जंगल कभी देखा ही नहीं. वे बड़े होकर बस्ती में होने वाले सामूहिक नाच-गानों से मनोरंजन करने लगे हैं.''
तीसरा कारण है वन्यजीवों की बदलती आबादी और जंगल के भीतर का संघर्ष. 2022 की गणना के अनुसार उत्तराखंड में 560 बाघ हैं. भारतीय वन्यजीव संस्थान की 2024 की रिपोर्ट में राज्य में 652 तेंदुए कम पाए गए. वैसे, हुकिल का कहना है, ''सरकारी आंकड़े कुछ भी कहें मगर तेंदुओं की संख्या 5,000 से कम नहीं.'' विशेषज्ञों का कहना है कि जहां बाघों की संख्या बढ़ती है वहां तेंदुए अपना इलाका छोड़कर मानव बस्तियों की तरफ खिसकने लगते हैं क्योंकि बाघ अपने क्षेत्र में दूसरे शिकारी को बर्दाश्त नहीं करते. यानी जंगल के भीतर का शक्ति संतुलन बिगड़ने का असर सीधे गांवों पर पड़ रहा है.
संघर्ष का असर सिर्फ इंसानी जान पर नहीं, बल्कि खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है. जंगली सूअर, बंदर और लंगूर फसलों को बर्बाद कर रहे हैं. तेंदुए मवेशियों को उठा ले जाते हैं. लोग खेतों में काम करने से डरने लगे हैं. परिणामस्वरूप खेती की जमीनें बंजर होती जा रही हैं.
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, संघर्ष में सबसे ज्यादा शामिल 3 से 7 वर्ष के युवा बाघ और तेंदुए होते हैं जो अधिक आक्रामक होते हैं. 2010 के बाद से जंगली जानवरों का आतंक तीन से चार गुना बढ़ा है. यही वजह है कि पिछले 12-14 वर्षों में 7 से 10 प्रतिशत तक पलायन बढ़ने की बात कही जा रही है.
लेकिन यह संघर्ष सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं, वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए भी खतरनाक होता जा रहा है. उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित राजाजी से लगे क्षेत्र में 18 और 19 मई को एक के बाद एक कर मिले दो बाघ बाघिनों के शव भी इसी संघर्ष का परिणाम माने जा रहे. गुर्जरों ने इन दोनों बाघों से उनकी भैंस को मारने का बदला लेने के लिए भैंस के शव पर जहर छिड़ककर उन्हें मारने की योजना बनाकर लेना चाहा. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2000 से 2020 के बीच संघर्ष के चलते करीब 1,396 तेंदुओं की भी मौत हुई. कई मामलों में जानवरों को जहर देकर मारा गया या फंसाकर खत्म कर दिया गया.
गढ़वाल के सांसद अनिल बलूनी ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव से मिलकर इस संघर्ष के कारणों पर विस्तृत अध्ययन कराने की मांग की है. राज्य का 65 प्रतिशत हिस्सा जंगलों से ढका है. राज्य में 12 राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य हैं जो करीब 13,800 वर्ग किलोमीटर में फैले हैं. लाखों ग्रामीण आज भी लकड़ी, घास और चारे के लिए जंगलों पर निर्भर हैं. यानी इंसान और जंगल का रिश्ता यहां खत्म नहीं हो सकता. असल चुनौती संतुलन बनाने की है. एक तरफ बाघों और तेंदुओं का संरक्षण राष्ट्रीय प्राथमिकता है. दूसरी तरफ गांवों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा और आजीविका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. अगर ग्रामीणों को लगेगा कि वन्यजीव संरक्षण उनकी जान पर भारी पड़ रहा है तो संरक्षण के खिलाफ सामाजिक गुस्सा बढ़ेगा.
• इंसान-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति उत्तराखंड में कितनी गंभीर है?
हमारा राज्य बाघ संरक्षण से लेकर वन्यजीवों के बड़े स्केल पर संरक्षण से जुड़ा है. उत्तराखंड देश में दूसरी सबसे ज्यादा बाघों की आबादी वाला राज्य है. यह हमारे लिए सुखद तो है मगर इसके नतीजे इंसान-वन्यजीव संघर्ष के रूप में भी सामने आ रहे हैं. इसको लेकर राज्य में 'ह्यूमन वाइल्डलाइफ कन्फ्लिक्ट मिटिगेशन सेल' का गठन किया गया है, जो वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करता है. राज्य में 12 राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य हैं, जो 13,800 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए हैं. इसके अलावा, वन्यजीव गलियारों के माध्यम से संरक्षित क्षेत्रों को आपस में जोड़ने भी अत्यंत अहम है.
• इस बढ़ते संघर्ष की मुख्य वजह क्या है?
जंगली जानवर भोजन, शिकार और पानी की तलाश में मानव बस्तियों और ग्रामीण इलाकों की ओर भटक रहे हैं.
• सरकार इस संघर्ष को कम करने के लिए क्या कर रही?
सरकार और वन विभाग सोलर फेंसिंग, सेंसर-आधारित अलर्ट सिस्टम, और नसबंदी केंद्रों (बंदरों के लिए) जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर रही है. साथ ही, भारतीय वन्यजीव संस्थान के सहयोग से मानव-वन्यजीव संघर्ष की गहन समझ के लिए बाघों और दूसरे वन्यजीवों की गणना और कर्मचारियों की ट्रेनिंग करवा रही है. हॉटस्पॉट मैपिंग, त्वरित प्रतिक्रिया टीमों की तैनाती और वन्यजीव गलियारों के संरक्षण पर काम जारी है. गुलदार प्रभावित क्षेत्रों में 'लिविंग विद लेपर्ड' जैसे व्यवहार परिवर्तन कार्यक्रमों के जरिए जागरूकता फैलाई जा रही है.
• इस समस्या को कम करने को लेकर आपके क्या सुझाव हैं?
बस्तियों और गांवों के बाहर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर अधिक ध्यान रखने की जरूरत है. अमूमन कचरे के ढेरों के आसपास भी भालू या अन्य जानवरों का आना-जाना देखा गया है.
• कुछ अध्ययन बता रहे कि बाघों और हिंसक तेंदुओं की प्रकृति बदल रही है.
वन्यजीवों के स्वभाव में परिवर्तन आ रहा है. सावधानी बरतते हुए इस स्थिति के बीच रहना सीखना होगा. इसके लिए प्रे-बेस को बढ़ावा देने के लिए सावधानी बरती जा रही है. बाघों और तेंदुओं को उनका प्रे-बेस मिलता रहे तो वे बस्तियों की ओर नहीं आएंगे. इकोलॉजी और इकोनॉमी के बीच में सामंजस्य बनाना जरूरी है.