लूट-पाट कर कहां गए?
बिजली और रोजगार के सपने दिखाकर 15 साल पहले किसानों की दो हजार एकड़ से ज्यादा जमीन ली गई, फिर उसी को बंधक रख 1,500 करोड़ रुपए का कर्ज उठा कंपनियां चंपत हुईं

कानपुर देहात मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर स्टेट हाइवे-46 के किनारे बसे चपरघटा गांव में 75 वर्षीय कनौजीलाल अब अपनी बंद पड़ी परचून की दुकान के बाहर बैठकर आने-जाने वालों को देखते रहते हैं. कभी हरियाणा में मजदूरी करने निकले कनौजीलाल 2011 में यह सुनते ही गांव लौट आए थे कि यहां 1,320 मेगावाट का बड़ा थर्मल पावर प्लांट लगने वाला है.
उन्हें लगा कि अब गांव की तस्वीर बदल जाएगी. बाहर से लोग आएंगे, बाजार बढ़ेगा, रोजगार मिलेगा. अपनी 10 बीघा जमीन उन्होंने पावर प्लांट के लिए खुशी-खुशी दे दी और मुआवजे से घर में परचून की छोटी-सी दुकान खोल ली. अपने विकलांग भाई कैलाश के साथ वे दुकान पर बैठने लगे. अब आ जाइए उससे 15 साल आगे...मई 2026 में. न कहीं पावर प्लांट है, न बाजार आया और न ही रोजगार. दुकान घाटे में डूब गई और कनौजीलाल कर्ज में. वे कहते हैं, ''जमीन भी चली गई, दुकान भी बंद हो गई. अब बचा ही क्या?''
चपरघटा के ही 40 वर्षीय किसान मुंशीलाल की कहानी भी कुछ अलग नहीं. आठ बीघा जमीन देने के बाद वे भी सपने देखने लगे थे कि प्लांट में नौकरी मिलेगी और परिवार के दिन बहुरेंगे. आज वे भूमिहीन हैं और कभी-कभार मजदूरी करके परिवार पाल रहे हैं. उनके शब्दों में, ''सरकार और कंपनी ने सपना दिखाया था, अब हम खाली हाथ हैं.'' कनौजीलाल और मुंशीलाल अकेले नहीं हैं. भोगनीपुर तहसील के चपरघटा, अमिलिया, सिहारी, कछगांव, कृपालपुर, रसूलापुर, भुरमुंडा और भरतौली जैसे गांवों के सौ से ज्यादा किसान परिवार पिछले डेढ़ दशक से उस पावर प्लांट का इंतजार कर रहे हैं, जिसने कभी विकास और रोजगार का सपना दिखाया था. अब वही परियोजना उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े जमीन और बैंकिंग घोटालों में बदलती दिखाई दे रही है.
खेल हुआ जमीन का
वर्ष 2010-11 में प्रदेश सरकार ने कानपुर देहात के भोगनीपुर क्षेत्र में 1,320 मेगावाट क्षमता का थर्मल पावर प्लांट स्थापित करने की योजना बनाई थी. उस समय प्रदेश में बिजली संकट बड़ा मुद्दा था. सरकार निजी क्षेत्र की कंपनियों के जरिए बिजली उत्पादन बढ़ाना चाहती थी. इसी के तहत गुरुग्राम स्थित हिमावत पावर प्राइवेट लिमिटेड और उसकी सहयोगी कंपनी लैंको अनपरा पावर लिमिटेड को यह परियोजना दी गई.
इसके लिए सात गांवों की करीब 2,332 एकड़ जमीन अधिग्रहीत की गई. इसमें किसानों की निजी भूमि के साथ ग्राम समाज की जमीन भी शामिल थी. सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, ग्राम समाज की जमीन कंपनियों को 30 वर्ष की लीज पर दी गई थी. समझौते की शर्तें स्पष्ट थीं. कंपनियों को तीन साल के भीतर पावर प्लांट बनाकर बिजली उत्पादन शुरू करना था. साथ ही भूमि अधिग्रहण अधिनियम-1894 के सेक्शन 41 के अनुसार, बिना राज्य सरकार की अनुमति जमीन को न बेचने, न बंधक रखने, न लीज पर देने और न किसी अन्य उपयोग में लाने की शर्त भी थी.
उस समय गांवों में यह प्रचार हुआ कि इलाके में बड़ा औद्योगिक विकास होगा. ग्रामीणों को बताया गया कि स्थानीय लोगों को नौकरी मिलेगी, सड़कें बनेंगी, बाजार विकसित होंगे और आसपास छोटे उद्योग भी लगेंगे. बहुत से किसानों ने इसी भरोसे अपनी जमीन दे दी...लेकिन परियोजना जमीन पर उतरने से पहले ही कथित भ्रष्टाचार, फर्जीवाड़े और बैंकिंग गठजोड़ में फंस गई.
यह मामला शायद और वर्षों तक दबा रहता, अगर पिछले वर्ष कानपुर देहात के जिलाधिकारी कपिल सिंह की नजर एक अखबार में छपे विज्ञापन पर न पड़ती. इसमें एक बैंक ने अपने पास बंधक 285 हेक्टेयर जमीन की 28 जुलाई, 2025 को नीलामी की सूचना दी थी. इसके बाद ऐसा ही एक विज्ञापन अगस्त के महीने में भी प्रकाशित हुआ जिसमें 30 अगस्त को 350 हेक्टेयर जमीन की नीलामी की सूचना थी. उन्होंने गुपचुप जांच कराई. शुरुआती पड़ताल में पता चला कि यह वही जमीन है जो थर्मल पावर प्लांट के लिए अधिग्रहीत की गई थी. इसके बाद राजस्व अभिलेख, खतौनी, बैंक दस्तावेज और रजिस्ट्री रिकॉर्ड खंगाले गए. जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, वैसे-वैसे एक बड़े फर्जीवाड़े की परतें खुलती चली गईं.
जमीन अधिग्रहण से बैंक गिरवी तक
जांच में सामने आया कि अधिग्रहीत जमीन को ऊर्जा विभाग के नाम दर्ज कराने के बजाए सीधे कंपनियों के नाम कर दिया गया. यही सबसे बड़ी प्रशासनिक चूक मानी जा रही है. नियम यह था कि अधिग्रहण के बाद जमीन का स्वामित्व सरकार या ऊर्जा विभाग के पास रहता और कंपनी को केवल उपयोग का अधिकार मिलता. लेकिन यहां कथित तौर पर कंपनियों को ऐसा दर्जा मिल गया जिससे वे जमीन को अपनी संपत्ति की तरह इस्तेमाल करने लगीं.
जांच में पता चला कि जिन कंपनियों को केवल लीज और शर्तों के आधार पर जमीन दी गई थी, उन्होंने कथित रूप से कूटरचित दस्तावेज तैयार कर जमीन को अपने पूर्ण स्वामित्व वाली संपत्ति की तरह दिखाया. इसके बाद उसी जमीन को अलग-अलग बैंकों में बंधक रखकर करीब 1,500 करोड़ रुपए का कर्ज उठा लिया. यह सब बिना सरकारी अनुमति और नियमों के खिलाफ हुआ. सरकारी और ग्राम समाज की जमीन को गिरवी रखने के लिए न तो राज्य सरकार की अनुमति ली गई और न ही प्रशासनिक स्तर पर कोई आपत्ति दर्ज हुई.
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि वर्षों तक किसी विभाग, अधिकारी या बैंक ने इस पर सवाल नहीं उठाया. कंपनियों ने न केवल कर्ज लिया, बल्कि बाद में खुद को दिवालिया घोषित कर दिया. उधर, कर्ज की वसूली के लिए बैंकों ने जमीन की नीलामी शुरू कर दी. आइडीबीआइ बैंक ने लगभग 350 हेक्टेयर जमीन की ई-नीलामी की. एक अन्य मामले में 545 एकड़ जमीन, जिस पर बैंक ने 169 करोड़ रुपए का कर्ज दिया था, उसे मात्र 11.64 करोड़ रुपए में बेचने की तैयारी थी. लेकिन प्रशासनिक जांच के चलते यह प्रक्रिया रुक गई.
बैंक, अफसर और कंपनियों का गठजोड़
छह महीने से ज्यादा समय तक भोगनीपुर के पावर प्लांट की जमीन पर हुए घोटाले की गोपनीय जांच में यह स्पष्ट हो गया कि इसमें कई स्तरों पर गड़बड़ घोटाला है. जिलाधिकारी कपिल सिंह ने इसकी जानकारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दी. मुख्यमंत्री के निर्देश पर मामले में 12 मई को मूसानगर थाने में एफआइआर दर्ज की गई.
तहसीलदार प्रिया सिंह की ओर से दर्ज कराई गई एफआइआर में तत्कालीन अपर जिलाधिकारी (भूमि अध्याप्ति) ओ.के. सिंह, उनके कार्यालय के कर्मचारियों, हिमावत पावर प्राइवेट लिमिटेड, लैंको अनपरा पावर लिमिटेड तथा पंजाब नेशनल बैंक, केनरा बैंक और आइडीबीआइ बैंक के अधिकारियों-कर्मचारियों को आरोपी बनाया गया.
एफआइआर में धोखाधड़ी, कूटरचित दस्तावेज तैयार करने, सरकारी संपत्ति को नुक्सान पहुंचाने और साजिश जैसी धाराएं लगाई गई हैं. प्रशासन का आरोप है कि कंपनियों ने समझौते की शर्तों का उल्लंघन करते हुए जमीन को बैंक में गिरवी रखा और राज्य सरकार को 300 से 400 करोड़ रुपए का नुक्सान पहुंचाया.
कानपुर देहात में भारतीय जनता पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष और जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति (दिशा) के सदस्य श्याम सिंह सिसोदिया कहते हैं कि इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर 14-15 वर्षों तक प्रशासन, ऊर्जा विभाग और बैंकिंग तंत्र कैसे चुप रहे. सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि कंपनियों ने लीज पर मिली जमीन का वार्षिक किराया भी नियमित रूप से जमा नहीं किया.
आरोप है कि 2011 के बाद कंपनियों ने मुश्किल से एक बार किराया दिया. इसके बावजूद न लीज रद्द हुई, न जमीन वापस ली गई और न ही परियोजना की समीक्षा की गई. सिसोदिया बताते हैं, ''और भी हैरानी की बात यह है कि वर्षों तक जमीन बैंक में गिरवी रही, कर्ज लिया गया, फिर नीलामी की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन स्थानीय प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगी.'' यही वजह है कि अब इस पूरे मामले को केवल कंपनी स्तर की धोखाधड़ी नहीं, बल्कि प्रशासनिक और बैंकिंग के भ्रष्ट गठजोड़ के रूप में देखा जा रहा है.
अब पुलिस और प्रशासनिक एजेंसियां कई अहम बिंदुओं पर जांच कर रही हैं. सबसे पहले यह देखा जा रहा है कि जमीन की प्रकृति और स्वामित्व में बदलाव किस स्तर पर हुआ. दूसरा, बैंक अधिकारियों ने किन दस्तावेजों के आधार पर कर्ज मंजूर किया. तीसरा, नीलामी प्रक्रिया में जमीन का मूल्यांकन कैसे किया गया. इसके अलावा उस समय तैनात राजस्व अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है. कई और अधिकारियों के जांच के दायरे में आने का अंदेशा है. भोगनीपुर के रहने वाले कई प्रभावी लोग इस पूरे मामले में प्रदेश सरकार के एक मंत्री पर भी संलिप्तता के आरोप लगा रहे हैं. हालांकि, प्रशासन ने खतौनी में आदेश दर्ज कर जमीन की खरीद-फरोख्त पर रोक लगा दी है. स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि इन जमीनों पर राज्य सरकार और ग्रामसभा का हित निहित है, इसलिए कोई भी विक्रय या निबंधन नहीं किया जाएगा.
खाली पड़ी जमीन और टूट चुका भरोसा
आज चपरघटा और आसपास के गांवों में राज्य हाइवे के किनारे हजारों एकड़ जमीन खाली पड़ी है. कहीं जंगली घास उग आई है, कहीं मिट्टी के टीले दिखाई देते हैं. गांव वालों के लिए यह जमीन अब अधूरे सपनों की निशानी बन चुकी है. ग्रामीण कहते हैं कि अगर पावर प्लांट लग जाता तो इलाके की तस्वीर बदल सकती थी. लेकिन यहां तो विकास के नाम पर जमीन चली गई और बदले में मिला सिर्फ धोखा. कई बुजुर्ग किसान अब यह भी नहीं जानते कि उनकी जमीन वापस मिलेगी या नहीं. युवा पीढ़ी गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रही है.
इस पूरी परियोजना में सबसे बड़ा नुक्सान किसानों का ही हुआ. ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें जमीन का बहुत कम मुआवजा दिया गया. कई किसानों को पूरे 21 एकड़ के केवल तीन लाख रुपए मिले, जबकि वे लगभग दोगुनी रकम की मांग कर रहे थे. आज स्थिति यह है कि जिन किसानों ने जमीन दी, वे भूमिहीन होकर मजदूरी करने को मजबूर हैं. गांवों की बड़ी जमीनें खाली पड़ी हैं और वहां सिर्फ अधूरी उम्मीदों का सन्नाटा है. हालांकि अभी भी एक आस है. इस प्रकरण के सामने आने के बाद इसकी 2,332 एकड़ जमीन पर प्रदेश सरकार का कब्जा हो गया है. पूरे प्रदेश में सरकार के पास एक साथ इतनी बड़ी जमीन फिलहाल नहीं है. इस जमीन पर सही निवेश इसे सोना बना सकता है.
अब गांव वालों की निगाह जांच पर टिकी है. उन्हें उम्मीद है कि दोषियों पर कार्रवाई होगी. उन्हें डर भी है कि कहीं यह मामला भी बाकी बड़े घोटालों की तरह लंबे समय तक फाइलों में न उलझ जाए. कनौजीलाल कहते हैं, ''हमें अब पावर प्लांट नहीं चाहिए. जिसने गलत किया है, उसके खिलाफ कार्रवाई हो. हमारी जमीन वापस मिले ताकि गुजारा हो सके.''
दस बीघा जमीन देने के बाद इस किसान को उम्मीद थी कि पावर प्लांट में नौकरी मिलेगी और परिवार की जिंदगी सुधरेगी. लेकिन आज वे भूमिहीन हैं और कभी-कभार मजदूरी करके किसी तरह परिवार पाल रहे हैं. पछताते हुए से वे कहते हैं, ''सरकार और कंपनी ने सपना दिखाया था लेकिन अब हम पूरी तरह से खाली हाथ हैं.'' कनौजीलाल और मुंशीलाल अकेले नहीं हैं. भोगनीपुर तहसील के चपरघटा, अमिलिया, सिहारी, कछगांव, कृपालपुर, रसूलापुर भुरमुंडा और भरतौली जैसे गांवों के सौ से ज्यादा किसान परिवार पिछले डेढ़ दशक से खाली हाथ हैं. ये लोग उस पावर प्लांट की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जिसने कभी इस पूरे इलाके को विकास और रोजगार का सपना दिखाया था. अब वे ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं.