अब पढ़ाई जा सकेगी स्कूलों में राजस्थानी

राजस्थानी को मान्यता दिलाने के 82 वर्ष से चल रहे संघर्ष में आया नया मोड़. सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक ताजा फैसले में इसे स्कूलों में पढ़ाए जाने के दिए निर्देश. नेताओं के बयानों, वादों, आश्वासनों, संसद में निजी विधेयकों के सिलसिले के बाद अब एक ठोस कदम

राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के लिए श्रीगंगानगर के सूरतगढ़ में किया जा रहा विरोध प्रदर्शन

बारह मई को दिए अपने एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थानी भाषा के लिए नया जीवन दे दिया. बयासी साल का लंबा इंतजार, मायड़ (मातृ) भाषा की वह पुकार, जो कभी लोकगीतों में गूंजी, कभी संसद के गलियारों में सुनाई दी, कभी जंतर मंतर के धरनों में फूटी और कभी गांव की चौपालों की बहस बनी.

राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की लड़ाई पीढ़ियों से चलती रही लेकिन हर बार दिल्ली की चौखट पर आकर ठहर गई. मगर 12 मई का फैसला उसके लिए ऐतिहासिक था. इसने उस संघर्ष को नई सांस दी. अदालत ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिए हैं कि राज्य के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में राजस्थानी भाषा पढ़ाई जाए.

देश की शीर्ष अदालत का यह फैसला केवल एक भाषा का नहीं, बल्कि उस अस्मिता का सम्मान है, जिसे राजस्थानी समाज पिछले आठ दशकों से बचाए रखने की लड़ाई लड़ रहा है. राजस्थानी भाषा के लिए लंबे समय से संघर्षरत पदम मेहता और कल्याण सिंह शेखावत की याचिका पर जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा देना राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की मूल भावना है.

अदालत ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक मान्यता का इंतजार करते हुए किसी भाषा को शिक्षा से बाहर रखना तर्कसंगत नहीं. अदालत ने राजस्थान सरकार से पूछा कि जब विश्वविद्यालयों में राजस्थानी पढ़ाई जा रही है, तो स्कूलों में इसे लागू करने में देरी क्यों? राजस्थान सरकार को 30 सितंबर, 2026 तक इसकी अनुपालना रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने के लिए कहा गया है.

कोर्ट का यह रुख इसलिए भी अहम है क्योंकि अब तक सरकारें राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल न होने का हवाला देकर स्कूली शिक्षा में इसे लागू करने से बचती रही थीं. सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि भाषा केवल संवैधानिक सूची का विषय नहीं, बल्कि बच्चों के सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकारों का सवाल भी है.

राजस्थानी भाषा के लिए यह केवल शब्दों की यात्रा नहीं, बल्कि पहचान, स्वाभिमान और सांस्कृतिक अस्तित्व की लड़ाई रही है. नेपाल में बाबूराम भट्टराई सरकार में मंत्री रहे हेमराज तातेड़ जब 2011 में जोधपुरी साफा पहनकर राजस्थानी में शपथ लेते हैं, तब यह भाषा सीमाओं से परे अपनी जीवंतता साबित करती है. हेमराज ने इंडिया टुडे को बताया, ''नेपाल में भारत की तरह संवैधानिक अनुसूचियां तो नहीं बनी हैं लेकिन वहां हर समुदाय को अपनी मातृभाषा में काम करने की आजादी है. हमारी मातृभाषा मारवाड़ी (राजस्थानी) है ऐसे में हमें राजस्थानी बोलने और लिखने की पूरी छूट है.'' मगर विडंबना देखिए कि जिस भाषा में नेपाल का मंत्री शपथ ले सकता है, उसी भाषा में राजस्थान विधानसभा का विधायक शपथ नहीं ले सकता. 

राजस्थान की मौजूदा 16वीं विधानसभा में शिव क्षेत्र के विधायक रवींद्र सिंह भाटी और कोलायत के विधायक अंशुमान सिंह भाटी समेत 24 विधायकों ने राजस्थानी में शपथ लेने की इच्छा जताई थी. उन्होंने मायड़ भाषा में शपथ-पत्र पढ़ा भी, मगर संवैधानिक मान्यता के अभाव में उसे सदन की कार्यवाही का हिस्सा नहीं बनाया गया. विधानसभा और लोकसभा जैसे सदनों ने कई बार राजस्थानी भाषा के लिए आवाज सुनी मगर संविधान में अभी तक उसे भाषा का दर्जा हासिल नहीं हुआ.

गौरतलब है कि संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं को ही संसद और विधानसभा में शपथ से लेकर संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं तक विशेष अधिकार प्राप्त हैं. 1950 में 14 भाषाओं से शुरू हुई यह सूची आज 22 तक पहुंच चुकी है, लेकिन राजस्थानी को अब भी मान्यता का इंतजार है. केंद्र सरकार खुद संसद में कबूल चुकी है कि राजस्थानी समेत 38 भाषाएं मान्यता की प्रतीक्षा में हैं, मगर इसके लिए कोई तय मापदंड नहीं है.

राजस्थानी को लेकर सबसे बड़ा विवाद हमेशा यही रहा कि आखिर 'कौन-सी राजस्थानी' को मान्यता मिले. कहावत है न कि कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी. मारवाड़ी, मेवाड़ी, हाड़ौती, ढूंढ़ाड़ी, शेखावाटी, बागड़ी, मेवाती, वागड़ी, अहीरवाटी, मालवी और निमाड़ी जैसी अनेक बोलियां यहां जीवित हैं जिनका हवाला देकर हुक्मरान इसे मान्यता देने से बचते रहे हैं. मगर राजस्थानी साहित्यकार इन बोलियों को कमजोरी नहीं, बल्कि भाषा की सबसे बड़ी ताकत मानते हैं. 

राजस्थानी भाषा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार हासिल कर चुके भरत ओला कहते हैं, ''बोलियों की विविधता भाषा की खूबसूरती होती है, खामी नहीं. संस्कृत के अलावा कोई भाषा ऐसी नहीं जिसमें बोलियों की विविधता न हो. दुनिया की कोई भी भाषा बिना बोलियों के नहीं हो सकती. भाषा के पर्यायवाची शब्द तभी होंगे जब उसकी बोलियां होंगी.''

जोधपुर विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्रभारी डॉ. गजे सिंह राजपुरोहित इस बहस को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ''भाषा के लिए बोलियां रुकावट नहीं बल्कि उसकी ताकत हैं. मराठी, हिंदी, गुजराती भाषा की तरह राजस्थानी की बोलियां भी उसकी जड़ों के लिए खतरा नहीं बल्कि उसे और मजबूत बनाती हैं.''

मायड़ भाषा की मान्यता में स्वतंत्र लिपि न होने को भी अड़चन के तौर पर देखा जाता है, लेकिन राजस्थानी के साहित्यकार इससे इत्तेफाक नहीं रखते. डॉ. राजपुरोहित कहते हैं, ''जब संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 में से आठ भाषाओं की लिपि देवनागरी हो सकती है तो राजस्थानी की क्यों नहीं? संस्कृत भाषा की देवनागरी लिपि को जब हिंदी और दूसरी भाषाएं अपना सकती हैं तो राजस्थानी के लिए ही अड़चन क्यों? देवनागरी लिपि में राजस्थानी भाषा का जितना विपुल साहित्य मौजूद है शायद ही उतना देश की किसी दूसरी भाषा का हो.'' 

देखा जाए तो तकनीकी और व्याकरण के तौर पर भी राजस्थानी भाषा बहुत समृद्ध है. पद्मश्री सीताराम लालस, गियर्सन, टैस्सीटोरी, आचार्य हेमचंद्र, नरोत्तमदास स्वामी और सुनीति कुमार चाटुर्ज्या ने राजस्थानी भाषा के शब्दकोश और व्याकरण की रचना की. बद्री प्रसाद साकरिया और बी.एल. माली के शब्दकोश भी प्रकाशित हैं. राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और कई विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा पढ़ाई जाती है. आकाशवाणी जयपुर से रोज राजस्थानी में समाचार और कार्यक्रम प्रसारित होते हैं और पिछले 40 साल से राजस्थानी भाषा में फिल्मों का निर्माण हो रहा है. साहित्य अकादमी दिल्ली भी 52 साल पहले राजस्थानी को भाषा का दर्जा दे चुकी है. साहित्य अकादमी देश की जिन 24 भाषाओं के लिए पुरस्कार प्रदान करती है उनमें संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं के अलावा राजस्थानी भी है. राजस्थानी के ख्यातनाम साहित्यकार विजयदान देथा की लोक कथाओं पर आधारित पुस्तक बातां री फुलवारी को 1974 में साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया. 1974 से अब तक हर साल राजस्थानी भाषा में प्रकाशित किताबों को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलता रहा है.

राजस्थानी के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले पदम मेहता कहते हैं, ''इस फैसले का असर केवल भाषा तक सीमित नहीं रहेगा. राजस्थानी अगर स्कूलों में विषय के रूप में लागू होती है तो शिक्षकों की भर्ती होगी, रीट (आरईईटी) जैसी परीक्षाओं में इसे शामिल किया जा सकेगा और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर खुलेंगे. सबसे बड़ी बात यह कि नई पीढ़ी मातृभाषा में इतिहास, लोककथाएं और साहित्य पढ़ सकेगी.

अतीत के आइने में राजस्थानी
राजस्थानी भाषा की उत्पति 11वीं सदी में मानी जाती है लेकिन स्वतंत्र भाषा के तौर पर इसका विकास सोलहवीं शताब्दी में हुआ. राजस्थानी शब्द का पहली बार प्रयोग 1912 में जॉर्ज अब्राहम गियर्सन ने 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' में किया था. इसे मान्यता अंग्रेजों के शासनकाल में ही मिल गई थी. अंग्रेजों ने सन् 1909 में द इंडियन एंपायर (इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया) में राजस्थान में तैनात होने वाले ब्रिटिश अधिकारियों के लिए राजस्थानी भाषा का ज्ञान अनिवार्य माना था. वर्ष 1928 में कर्नल जेम्स टॉड ने एनाल्स ऐंड एंटीक्वीटीज ऑफ राजस्थान पुस्तक में प्रदेश की भाषा राजस्थानी बताई.

सोलहवीं शताब्दी में अबुल फजल की आइने अकबरी में मारवाड़ी भाषा का जिक्र है. डॉ. नामवर सिंह ने पूर्वी राजस्थानी के साहित्य रूप को पिंगल और पश्चिमी राजस्थानी का साहित्य स्वरूप डिंगल माना. पश्चिमी राजस्थानी में मारवाड़ी, मेवाड़ी, बागड़ी, शेखावाटी और पूर्व राजस्थानी में ढूंढ़ाती, हाड़ौती, मेवाती और अहीरवाटी बोलियां मानी गई हैं. साहित्यकार डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित कहते हैं, ''संविधान की मान्यता प्राप्त 22 भाषाओं में राजस्थानी 17 भाषाओं से बड़ी है. राजस्थानी बोलने वालों की संख्या 10 करोड़ से ज्यादा है.''

भाषा की मान्यता के ये फायदे
संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषा का सबसे बड़ा फायदा यह है कि उस भाषा को संघ लोक सेवा आयोग की ओर से आयोजित होने वाली प्रशासनिक परीक्षाओं में वैकल्पिक भाषा का दर्जा प्राप्त हो जाता है. राजस्थानी को मान्यता मिलने से प्रतियोगी परीक्षाओं में इसके भी 100 नंबर जुड़ जाएंगे, जिसका फायदा स्थानीय विद्यार्थियों को मिलेगा. मान्यता के बाद स्कूलों में राजस्थानी को पढ़ाने के लिए विषय विशेषज्ञों की भर्ती होगी. अभी कुछ स्कूलों में ही राजस्थानी के शिक्षक हैं, जिनके रिटायर होते ही पद खत्म किया जा रहा है. 

कुल मिलाकर राजस्थानियों के लिए यह फैसला किसी कानूनी आदेश से ज्यादा भावनात्मक महत्व रखता है. यह उस भाषा की वापसी है, जिसे लोग मायड़ कहकर सम्मान देते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भले ही आठवीं अनुसूची का दरवाजा न खोला हो लेकिन वहां जाने वाला रास्ता जरूर दिखा दिया है.

संविधान से मान्यता प्राप्त 22 भाषाओं में राजस्थानी 17 भाषाओं से बड़ी है. इसे बोलने-बरतने वालों की तादाद 10 करोड़ से भी ज्यादा  है.
डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित, राजस्थानी के साहित्यकार

संघर्ष पूरे आठ दशक का
1 सितंबर, 1944: राजस्थान के पहले मनोनीत मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास ने पुरुषोत्तम दास टंडन समिति को ज्ञापन सौंपकर राजस्थानी को प्रादेशिक भाषा का दर्जा देने की मांग उठाई.

14 मार्च, 1966/16 फरवरी, 1968: बीकानेर के पूर्व महाराजा तथा पूर्व सांसद डॉ. करणीसिंह राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में जोड़ने के लिए संसद में दो बार निजी बिल लाए.

1967 और 1968: सांसद डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी ने लोकसभा और राज्यसभा में राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए निजी बिल पेश किए.

25 जनवरी, 1983: राजस्थान में अलग से राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृत अकादमी की स्थापना हुई. साथ ही दो विश्वविद्यालयों जयनारायण विश्वविद्यालय जोधपुर और मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय उदयपुर में राजस्थानी भाषा के विभाग बनाए गए.

22 जुलाई, 1992: राजस्थानी भाषा को मान्यता देने के लिए दिल्ली के बोट क्लब पर गुमानमल लोढ़ा, बलराम जाखड़, नाथूराम मिर्धा जैसे दिग्गज सांसदों और जोधपुर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य गजसिंह समेत कई विधायकों और साहित्यकारों ने धरना दिया.

1994: तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत ने राजस्थानी भाषा साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सौभाग्यसिंह शेखावत की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय राजस्थानी भाषा संवैधानिक मान्यता और उन्नयन समिति का गठन किया. समिति की 13 फरवरी, 1995 को प्रस्तुत रिपोर्ट के आधार पर 104 विधायकों के हस्ताक्षर का ज्ञापन प्रधानमंत्री को भेजा गया. 

25 अगस्त, 2003: अशोक गहलोत के नेतृत्व में राजस्थान विधानसभा ने राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में जोड़ने के लिए के लिए सर्वसम्मति से संकल्प पारित किया जिस पर 200 विधायकों ने हस्ताक्षर किए.

21 फरवरी, 2005: गंगानगर से दिल्ली तक मायड़ भाषा सम्मान रथयात्रा शुरू हुई. 19 जिलों में रथ पहुंचा. राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील को ज्ञापन दिया.

20 जुलाई, 2015: मुंबई से दिल्ली तक मायड़ भाषा सम्मान रथयात्रा निकाली गई. सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत और अर्जुनराम मेघवाल को ज्ञापन सौंपा.

2003, 2009, 2015, 2017, 2019, 2020 और 2023: राजस्थान के मुख्यमंत्रियों की ओर से राजस्थानी भाषा को मान्यता दिए जाने की मांग को लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिखे गए.

5 अगस्त, 2022: राजसमंद से सांसद दीया कुमारी ने राजस्थानी भाषा को मान्यता के लिए संसद में संविधान संशोधन विधेयक पेश किया.

16 मार्च, 2023: राजस्थान सरकार ने राजस्थानी भाषा को प्रदेश की दूसरी राजभाषा घोषित किए जाने को लेकर एक समिति का गठन किया.

2021: आरईईटी और स्कूली शिक्षा में राजस्थानी को शामिल करने की मांग को लेकर राजस्थान हाइकोर्ट में याचिका दायर हुई.

27 नवंबर, 2024: हाइकोर्ट ने इस जनहित याचिका को नीतिगत मामला बताते हुए खारिज कर दिया. बाद में यही याचिका सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का आधार बनी.

6 दिसंबर, 2024: राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर की पहल पर मुख्य सचिव सुधांश पंत ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की सिफारिश की.

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