और गहरी हुई लक्ष्मण रेखा
संघर्ष के साल भर बाद ऑपरेशन सिंदूर ने भारत में टेक्नोलॉजी के लिहाज से सेनाओं को आधुनिक बनाने के अभियान की राह दिखाई. पाकिस्तान भी अचानक झटका खाकर अपनी युद्धक तैयारियों और कमान ढांचे की दरारें भरने में जुटा

अभी-अभी ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ थी. यह सैन्य कार्रवाई पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) और उसके पंजाब प्रांत में नौ आतंकी ठिकानों पर भारत के मिसाइल हमलों के साथ शुरू हुई थी. मई की 7 से 10 तारीख के बीच चार दिनों तक 88 घंटे लंबे उस टकराव से दोनों मुल्कों ने क्या सबक सीखे? हवाई ताकत और हवाई प्रतिरक्षा और साथ ही लंबी दूरी की तोपें इस युद्ध का अहम पहलू थीं.
वहीं, इलेक्ट्रॉनिक लड़ाई और लड़ाकू विमानों, जमीनी रडार और हवाई चेतावनी और नियंत्रण प्रणाली (अवॉक्स) के बीच तालमेल ने इसे सचमुच स्मार्ट युद्ध बना दिया. एक और नई बात थी गैर बराबर युद्ध रणनीतियों की शुरुआत. इसमें पाकिस्तान ने सस्ते ड्रोन और साइबर हमलों का इस्तेमाल किया, जिन्हें भारत ने असरदार ढंग से नाकाम कर दिया.
पहले दिन के बाद जब पाकिस्तान ने भारत के लड़ाकू विमानों को मार गिराने का दावा किया, तभी से संघर्ष भारत के पक्ष में झुक गया. इसके बाद पाकिस्तान के पास भारत की ब्रह्मोस और स्केल्प मिसाइलों की आंधी का कोई जवाब नहीं था, जिन्होंने गहरे जाकर उसके आठ सैन्य हवाई अड्डों पर जोरदार प्रहार किए. इसी के नतीजतन संघर्ष विराम हुआ. ऑपरेशन सिंदूर छोटी और पैनी कार्रवाई थी. वहीं इससे भारत-पाकिस्तान के बीच टकराव में आमूलचूल बदलाव भी आया.
इसने नपे-तुले ढंग से युद्ध की तीव्रता बढ़ाने और पाकिस्तान के भीतर गहराई तक हमला करने की भारत की क्षमता का प्रदर्शन किया, तो पाकिस्तान की युद्धक तैयारी, कमान ढांचे और डर दिखाकर रोकने की विश्वसनीयता में आई दरारों को उघाड़कर रख दिया. बाद के महीनों में भारतीय सेना ने अपने को आधुनिक बनाने का अभियान तेज कर दिया जबकि पाकिस्तान तत्काल कमान ढांचे को नए सिरे से गढ़ने, रक्षा समझौते करने और चीन तथा तुर्की से आपातकालीन खरीद करने को मजबूर हो गया.
भारत ने तेज की रफ्तार
ऑपरेशन सिंदूर भारत के सैन्य सिद्धांत में निर्णायक बदलाव साबित हुआ. इसने भारत को टेक्नोलॉजी के बूते एकीकृत युद्ध की राह पर डाल दिया. संघर्ष ने भारत के सामरिक सिद्धांत को भी बदल दिया. 'शून्य सहनशीलता' की औपचारिक नीति के तहत भारतीय सरजमीन पर अब किसी भी आतंकी हमले को युद्ध की कार्रवाई माना जाता है.
संघर्ष की सालगिरह के अवसर पर 7 मई को डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (स्ट्रैटजी) लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने कहा कि नियंत्रण रेखा के आसपास कोई आतंकी ठिकाना अब सुरक्षित नहीं. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशन रहे ले. जनरल घई ने कहा, ''हम हर चीज पर हमला करेंगे. हम हर चीज को जांचेंगे-परखेंगे...पर स्थितियां, टाइमिंग और तरीका हमारा होगा.''
भारत में बीते साल हवाई प्रतिरक्षा और जवाबी ड्रोन युद्ध पर जबरदस्त जोर दिया गया है. हालांकि पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइलों को बीच में रोक लिया गया, लेकिन इसे विकसित होता खतरा माना जा रहा है. भारत ने एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की तैनाती का काम तेज कर दिया, स्वदेशी प्रोजेक्ट कुश (लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों का कार्यक्रम) को तय समय से पहले पूरा करने का फैसला किया, और सेना की आकाशतीर प्रणाली, भारतीय वायु सेना की एकीकृत एयर कमान और नियंत्रण प्रणाली (आइएसीसीएस) और नौसेना की त्रिगुण के बीच हवाई प्रतिरक्षा एकीकरण को और तेज कर दिया.
वहीं मिशन सुदर्शन चक्र का उद्देश्य मिले-जुले राष्ट्रीय हवाई प्रतिरक्षा कवच का निर्माण करना है. संघर्ष से पाकिस्तानी ड्रोन के खिलाफ रक्षाकवच प्रदान करने वाली बोफोर्स एल70 ऐंटी एयरक्राफ्ट गन और सतह से हवा में मार करने वाली पिचोरा एस-125 मिसाइल सरीखे रक्षा उपकरणों की क्षमता और प्रभाव भी सामने आया.
ऑपरेशन सिंदूर के बाद ड्रोन से लड़ा जाने वाला युद्ध सैन्य योजना के केंद्र में आ गया. इससे रणक्षेत्र में लॉइटरिंग म्यूनिशन, कामिकाजे ड्रोन, स्वार्म प्रणालियों और जासूसी प्लेटफॉर्म की अहमियत सामने आई. नतीजतन स्वदेशी सस्ते यूएवी और एआइ से लैस स्वायत्त इलेक्ट्रॉनिक युद्ध-प्रतिरोधी प्रणालियों में निवेश बढ़ा दिया गया है. भारत ने प्रीसिजन-गाइडेड या सटीक-निर्देशित गोलाबारूद और 300 किमी से ज्यादा दूरी तक मार करने वाली डीप-स्ट्राइक मिसाइलों के विकास का काम भी तेज कर दिया है.
नई सैन्य रणनीति
पाकिस्तानी वायु सेना के लड़ाकू विमानों ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान खतरा पैदा किया. लिहाजा भारतीय वायु सेना दिखाई देने वाली दूरी से आगे के युद्ध, हवाई युद्धक्षेत्र की मिली-जुली साज-संभाल और नेटवर्क केंद्रित युद्ध को प्राथमिकता दे रही है. युद्धक विमानों को आधुनिक बनाने के कार्यक्रम को बढ़ावा मिला है. ज्यादा राफेल खरीदने और स्वदेशी बहुउद्देश्यीय स्टेल्थ उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान (एएमसीए) कार्यक्रम पर ध्यान दिया जा रहा है.
संघर्ष ने साइबर युद्ध और डिजिटल बुनियादी ढांचे की सुरक्षा की बढ़ती अहमियत को पुख्ता कर दिया. भारत अब साइबर प्रतिरक्षा और दुष्प्रचार-रोधी कार्रवाइयों को सैन्य योजना में ज्यादा नजदीक से जोड़ रहा है.
संगठन के स्तर पर सेना सबसे तेजी से आगे बढ़ी. उसने भैरव बटालियन बनाईं. ये हल्की कमांडो टुकड़ियां हैं जिन्हें एकीकृत ड्रोन कार्रवाइयों में महारत के साथ तेज रफ्तार से सीमा-पार और पहाड़ी कार्रवाइयां करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. रुद्र ब्रिगेड पैदल सेना, हथियारबंद सेना, तोपखानों, ड्रोन और हवाई प्रतिरक्षा को जोड़कर बनाई गई संयुक्त सैन्य रचनाओं के रूप में उभरी. पैदल सेना की तमाम बटालियनों में अश्नी ड्रोन दस्ते शुरू किए गए. इस तरह ड्रोन को अगली कतार की सैन्य रचनाओं में जोड़ा गया.
आखिर में भारत के सैन्य सिद्धांत में तीनों सेनाओं का एकीकरण सबसे अहम हो गया है. संयुक्त संचालन योजना, एकीकृत अमल, लॉजिस्टिक को आधुनिक बनाने और निगरानी बढ़ाने के कामों को तेज कर दिया गया है.
पाकिस्तान की जद्दोजहद
पाकिस्तान की तमाम सैन्य कमजोरियों में से एक को भारत ने उसके सैन्य हवाई अड्डों पर मनमर्जी हमले करके बेनकाब कर दिया. यह अहम था, खासकर रावलपिंडी स्थित जनरल हेडक्वाटर्स के पास नूर खान एयरबेस पर हमले के जरिए संदेश दिया कि उसके बुनियादी ढांचे को तबाह करके भारत जीएचक्यू, कोर हेडक्वाटर्स और उनके मातहत सैन्य संगठनों के बीच कामकाजी कड़ियों को नेस्तोनाबूद करने के लिए तैयार है. सरकारी सूत्रों को लगता है कि पाकिस्तान ने 10 मई को संघर्ष विराम की मांग इसलिए की क्योंकि उसने जोखिम का गुणा-भाग कर लिया था.
उसकी एक और कमजोरी पाकिस्तान आर्मी रॉकेट फोर्स कमान (एआरएफसी) की अगस्त, 2025 में हुई स्थापना की तह में छिपी है. यह फतह सीरीज की मिसाइल और रॉकेट प्रणालियों के इर्द-गिर्द बनी है. गुजरांवाला छावनी और पानो अकील छावनी स्थित थल सेना की सैन्य रचनाओं का एआरएफ डिविजन (नॉर्थ) और एआरएफ डिविजन (साउथ) में पुनर्गठन किया गया.
साथ ही, जीएचक्यू के सीधे नियंत्रण के तहत अतिरिक्त मिसाइल रेजिमेंट शामिल की गईं. इससे लंबी दूरी की आक्रमण क्षमता और रणक्षेत्र में भय प्रतिरोधक क्षमता में अतीत की कमियों-खामियों का पता चलता है. इसी तरह पाकिस्तान की हवाई प्रतिरक्षा ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी क्षमता से कम प्रदर्शन किया. पाकिस्तानी वायु सेना (पीएएफ) ने तुर्की की कोरकुट वायु प्रतिरक्षा प्रणालियां खरीदीं, जिससे हवाई खतरे से रक्षा में सुधार की जरूरत का पता चलता है.
चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के नए पद के तहत पाकिस्तान के सेना प्रमुख की सत्ता को मजबूत करके और जॉइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी का पद खत्म करके पाकिस्तान ने अपनी तीनों सेनाओं के बीच तालमेल की कमजोरियों को स्वीकार कर लिया लगता है. पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर नए सीडीएस हैं और तीनों सेनाओं की समग्र कमान उनके हाथ में है. सेना के एक लेफ्टिनेंट जनरल के मातहत नेशनल स्ट्रैटजिक कमान की स्थापना से यह भी पता चलता है कि पाकिस्तान अपने एटमी तेवर और भय प्रतिरोधक की विश्वसनीयता बहाल करने की कोशिश कर रहा है.
यह विश्वसनीयता उस वक्त तार-तार हो गई जब भारत ने इस्लामाबाद की लगातार दी जाने वाली एटमी धमकी को धता बताकर सैन्य कार्रवाई करने की तत्परता दिखाई. सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान के रणनीतिक आपसी रक्षा समझौते (एसएमडीए) को भी ऑपरेशन सिंदूर सरीखी किसी भी भारतीय कार्रवाई के खिलाफ भय प्रतिरोधक के रूप में देखा जा रहा है.
नया ड्रोन बल
पाकिस्तान के ज्यादातर यूएवी (मानवरहित हवाई वाहन) भारत की वायु प्रतिरक्षा प्रणालियों को भेद नहीं पाए. ऐसे में वह अपने ड्रोन बल को मजबूत और असरदार बनाना चाहता है. इसका संकेत उन रक्षा समझौतों से मिलता है जो उसने संघर्ष के बाद लंबी दूरी के सीएच-4 और सीएच-5 ड्रोन और एसए-180 लॉइटरिंग म्यूनिशन के लिए चीन के साथ किए. यूएवी बल विकसित करने पर दिया जा रहा जोर खुफिया, निगरानी और टोही (आइएसआर) और रणभूमि को लेकर आई जागरूकता के बारे में बताता है. आइएसआर ड्रोन पर दिए जा रहे जोर से पता चलता है कि पाकिस्तानियों ने अपनी निगरानी और सटीक लड़ाई की क्षमताओं का नाकाफी होना स्वीकार किया है.
पाकिस्तान ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल किए गए उपकरणों से भी आगे के सैन्य उपकरण खरीद रहा है. सूत्रों का कहना है कि तमाम कमियों-कमजोरियों को ढकने के लिए कई तरह के सैन्य उपकरण हासिल किए जा रहे हैं. तुर्किए की ओएमटीएएस और एरीक्स टैंक-रोधी मिसाइल प्रणालियों की खरीद बख्तरबंद सुरक्षाकवच को भेदने की क्षमता में परिचालन आकलनों के दौरान पहचानी गई कमियों की तरफ इशारा करती है. चीनी जेड-10एमई अटैक हेलिकॉप्टरों को शामिल करने से नजदीकी हवाई सहायता क्षमताओं को मजबूत करने की जरूरत का पता चलता है.
पाकिस्तान 155 एमएम की नई तोप और गोलाबारूद उत्पादन सुविधा स्थापित करने की भी कोशिश कर रहा है, जो बाहरी आपूर्ति शृंखलाओं पर बहुत ज्यादा निर्भरता की तरफ संकेत करता है. चीनी एसएच-15 माउंटेड गन सिस्टम की 25 से ज्यादा रेजिमेंट की चरणबद्ध खरीद से माना जा रहा है कि पाकिस्तान अपने भारी हथियारों को एक से दूसरी जगह तेजी से ले जाने की क्षमता को लेकर चिंतित है, और साथ ही भारत की तरफ से अपनी तोप इकाइयों को सटीक निशाना बनाए जाने से भी परेशान है.