देर से भी आए, दुरुस्त भी नहीं
दो समितियों के सुझाए सुधारों के बावजूद नीट (यूजी) एक बार फिर नाकाम हुई क्योंकि राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी ने ढांचागत सुधारों को नजरअंदाज कर दिया

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा-अंडरग्रेजुएट (एनईईटी-यूजी या नीट-यूजी) को नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) ने 12 मई को रद्द कर दिया. यह परीक्षा मेडिकल में प्रवेश के इच्छुक 22 लाख विद्यार्थियों के लिए नौ दिन पहले आयोजित की गई थी. अब यह 21 जून को दोबारा करवाई जाएगी. यह तब हुआ जब एजेंसी ने दो साल यह वादा करते हुए बिताए कि वह सुधर गई है.
मगर देश लड़खड़ाकर एक ही आपदा में दूसरी बार संयोगवश नहीं गिरा. यह कामकाज की ऐसी संस्कृति का संरक्षक है जिसमें इसे रोकने के लिए की गई सिफारिशें या तो चुनिंदा ढंग से लागू की जा सकती हैं या विनम्रता से नजरअंदाज की जा सकती हैं. दो उच्चस्तरीय समितियां अपनी चीर-फाड़ की रिपोर्ट पहले ही लिख चुकी है.
पहली इसरो के पूर्व चेयरमैन डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में बनी उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति थी. इसका गठन नीट (यूजी) का प्रश्नपत्र लीक होने के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने 22 जून 2024 को किया था. उसी अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने इसका दायरा बढ़ाया, जिसके बाद परीक्षा की पूरी शृंखला इसकी जांच के दायरे में थी. समिति ने अपनी रिपोर्ट 21 अक्तूबर 2024 को दी. इसमें 101 सिफारिशें की गईं.
मंत्रालय ने इसे अप्रैल 2025 में सार्वजनिक किया. कई सिफारिशें 2026 से प्रभावी होनी थीं. दूसरी शिक्षा विभाग से संबंधित संसद की स्थायी समिति की 371वीं रिपोर्ट थी. इसके अध्यक्ष दिग्विजय सिंह थे और यह आठ दिसंबर 2025 को राज्यसभा के पटल पर रखी गई. 2024 में एनटीए की 14 परीक्षाओं में से कम से कम पांच नाकाम हुईं. छह महीने बाद नीट-यूजी 2026 रद्द करनी पड़ी है.
यह मिला नुस्खा
राधाकृष्णन समिति की पहली प्रस्तावना ही यह थी कि एनटीए लगातार अपने उद्देश्य पर अमल दूसरों के हाथ में नहीं सौंप सकती. एजेंसी खरीद दफ्तर की तरह बनाई गई थी. इसने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआइआर) से लेकर परीक्षाएं शुरू कीं,
छपाई, ढुलाई, निरीक्षण और मूल्यांकन के काम ठेके पर दे दिए. लेकिन समिति ने इसके ठीक उलटा सुझाया था—पेशेवर परीक्षा संस्थान में उसके अपने विषय विशेषज्ञ हों, अधिकारों से लैस शासकीय निकाय हो, और ऐसा नेतृत्व हो जो परीक्षा का विज्ञान समझता हो.
समिति ने 2,00,000 से ज्यादा अभ्यर्थियों की कोई भी परीक्षा कई चरणों और सत्रों में करवाने की सिफारिश की, जिसमें पारदर्शिता हो, डिजि यात्रा के मॉडल पर 'डिजि-एग्जाम' की परत हो, जो बायोमेट्रिक्स और एआइ वेरिफिकेशन के जरिए आवेदन को प्रवेश से जोड़े. तीसरा प्रस्ताव कंप्यूटर की सहायता से सुरक्षित 'पीपीटी' मॉडल था, जिसमें एनक्रिप्टेड प्रश्नपत्र परीक्षा केंद्रों के भीतर गोपनीय सर्वरों पर डिजिटली भेजे जाएं और नियंत्रित स्थितियों में स्थल पर ही छापे जाएं.
समिति ने जमीन पर चुनाव सरीखा ढांचा बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसमें पुलिस, खुफिया और तकनीकी अधिकारियों के साथ कलेक्टर के मातहत जिला स्तरीय समन्वय समितियां हों, सीसीटीवी और ऑडिट लॉग, ऑनलाइन मैलप्रैक्टिस पोर्टल, और 1,000 सुरक्षित मानक परीक्षा केंद्रों का नेटवर्क, उत्तरपूर्व और पहाड़ी राज्यों के लिए मोबाइल इकाइयां हों.
संसद की स्थायी समिति ने इसमें प्रशासनिक फौलाद जोड़ दी. उसने कहा कि एनटीए ने छह से ज्यादा सालों में करीब 448 करोड़ रुपए का अधिशेष जमा किया है; इस धन का इस्तेमाल संस्था की भीतरी क्षमता का निर्माण करने के लिए किया जाए. उसने काली सूची में डाली गई फर्म की राष्ट्रव्यापी पंजिका रखने की सिफारिश की, और कहा कि कोचिंग का शिकंजा कमजोर करने के लिए प्रश्नपत्रों को स्कूल पाठ्यक्रमों के ज्यादा अनुरूप बनाए.
कुछ पर कार्रवाई भी की गई. मंत्रालय ने समिति से कहा कि नीट-यूजी के 94 फीसद केंद्र अब राज्य या सरकार के स्वामित्व वाली इमारतों में हैं और जिला कलेक्टरों ने समन्वय समितियों की अध्यक्षता की. इस साल एजेंसी ने जीपीएस से पीछा किए जा रहे वाहनों, बायोमेट्रिक सत्यापन, एआइ-की सहायता से सीसीटीवी निगरानी, दिल्ली में केंद्रीयकृत निगरानी कक्ष, और 5जी जैमरों का इस्तेमाल किया. लीक से कुछ हफ्ते पहले एनटीए ने खुलेआम दावा किया कि उसने एआइ के साथ परीक्षा के चारों तरफ 'संपूर्ण किला' बना लिया है.
मगर ढांचागत सुधारों को चुपचाप ताक पर रख दिया गया. अमल पर निगरानी के लिए जो उच्च अधिकारप्राप्त समिति बनाई जानी थी, वह बनाई ही नहीं गई. मिले-जुले एनक्रिप्टेड छपाई मॉडल की प्रायोगिक शुरुआत तक नहीं हुई. कई सत्रों में कंप्यूटर-आधारित परीक्षा करवाना पचड़े में पड़ गया क्योंकि मंत्रालय एक ही पाली में परीक्षा करवाने पर जोर दे रहा है जबकि एनटीए का कहना है कि 22 लाख अभ्यर्थियों के लिए उसे करीब 20 पालियों की जरूरत होगी. एजेंसी खुद खोखली हो गई. 16 स्वीकृत स्थायी पदों में से महज तीन भरे हैं. जून 2024 से अक्तूबर 2025 के बीच कोई पूर्णकालिक प्रमुख नहीं था. प्रश्नपत्र आज भी संविदा कर्मचारी बना रहे हैं.
व्यवस्था का दोष
संयुक्त प्रवेश परीक्षा या जेईई (जो इंजीनियरिंग के लिए एनटीए ही आयोजित करती है) के मुकाबले नीट में लीक की आशंका ज्यादा होती है. वजह है कि जेईई मेन्स के कई पालियों में और कंप्यूटर-आधारित फॉर्मेट से नुक्सान एक सत्र तक ही सिमटा रहता है. चीन की गाओकाओ से तुलना कहीं ज्यादा साफ है. इसमें हर साल 1.34 करोड़ अभ्यर्थियों के लिए व्यवस्थाएं की जाती हैं.
प्रश्नपत्रों को राजकीय गोपनीयता के खाने में रखा जाता है. अलग-थलग सुविधा केंद्रों पर उनके मसौदे बनते हैं. उच्च सुरक्षा वाली जेलों में छपाई होती है. हथियारबंद पहरेदारों के साथ लाए-ले जाते हैं. ड्रोन और एआइ से निगरानी की जाती है. 1949 से महज तीन पुष्ट लीक हुई हैं.
इस व्यवस्था ने समिति के सुझाए सबसे आसान सुधार जज्ब कर लिए लेकिन इमारतें, कैमरे, बायोमेट्रिक्स और ढांचागत सुधार टाल दिए. फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन ने अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. वह ढांचागत जीर्णोद्धार या एनटीए को बदलने की मांग कर रहा है. एजेंसी के 12 मई के बयान में दुर्दशा की पहचान किए बिना उसे स्वीकार किया गया. उसने कहा कि ''उस भरोसे के सम्मान में जिस पर राष्ट्रीय परीक्षा टिकी होती है'', यह परीक्षा रद्द करने का आदेश दिया गया.
15 मई को प्रेस कॉन्फ्रेंस में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्वीकार किया कि राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों को लागू करने के प्रयासों के बावजूद चूक हुई है, और इसकी जिम्मेदारी भी ली. उन्होंने घोषणा की, ''समस्या की जड़ ओएमआर है और इसलिए अगले वर्ष से परीक्षा कंप्यूटर-आधारित टेस्ट (सीबीटी) मोड में आयोजित की जाएगी.''
परीक्षाओं का संचालन भारतीय माता-पिता और राज्यसत्ता के बीच भरोसे के अघोषित अनुबंध के आधार पर किया जाता है. परिवार व्यवस्था की वित्तीय क्रूरता यह मानकर सह लेते हैं कि परीक्षा ईमानदार और निष्पक्ष होगी. वह भरोसा टूटा है, साथ ही 22 लाख आकांक्षियों का मनोबल भी. अगले वर्ष छात्रों की यह परीक्षा सरकार और एनटीए के लिए भी एक परीक्षा ही होगी.