अब आखिरी शरणस्थली सारंडा पर घेरा

अब झारखंड से नक्सलियों के खात्मे का आखिरी अभियान शुरू. मई और जून के महीने सुरक्षाबलों और उग्रवादियों दोनों के लिए बेहद अहम हैं

ऑपरेशन मेगाबुरू सारंडा में नक्सलियों से बरामद हथियार और साजो-सामान के साथ सुरक्षाबल

राजधानी रांची से 139 किलोमीटर दूर पश्चिमी सिंहभूम जिले पर इस वक्त देशभर की नजरें टिकी हैं क्योंकि केंद्र सरकार की ओर से देशभर में नक्सलियों के खात्मे के ऐलान के बावजूद यहां करीब 50 नक्सली अब भी सक्रिय हैं. हालांकि वे बुरी तरह घिरे हुए हैं.

रविवार 3 मई को आम दिनों की तरह जिले के जगन्नाथपुर इलाके में मुख्य सड़क पर सनिका पूर्ति खेत से लाई सब्जी बेच रही थी. छोटानागरा प्रखंड के जामकुंडी गांव के लगुड़ा देवगम दोपहर में एक बरात जाने की तैयारी में थे. लेकिन इसी गांव से महज पांच किलोमीटर दूर छोटानागरा थाने के अंदर 200 से ज्यादा सीआरपीएफ, कोबरा बटालियन, झारखंड जगुआर और झारखंड पुलिस के जवान जंगल के अंदर सर्च ऑपरेशन की तैयारी कर रहे थे.

थाने के बाहर ऐंटी लैंडमाइन वाहन खड़ा था. अंदर 200 से ज्यादा पल्सर बाइक तैयार थे. गर्मी की वजह से खोजी कुत्ते हांफ रहे थे. यही हाल किरिबुरू और जरायकेला समेत जिले के दूसरे थानों का था. एशिया के सबसे बड़े साल के वृक्षों वाले सारंडा जंगल में गहरे सन्नाटे के बीच आखिरी और अंतिम धमाके की तैयारी में 5,000 से ज्यादा जवान तैयार थे. जवानों से बातचीत के दौरान पता चला कि रविवार की छुट्टी होने के बावजूद जिले के एसपी अमित रेणु सरकारी आवास से ऑपरेशन की निगरानी कर रहे थे. थानेदारों को अपने गुप्तचरों से मिली सूचनाओं का अपडेट ले रहे थे.

दरअसल, 30 मार्च को केंद्र सरकार ने भारत को नक्सलमुक्त घोषित कर दिया. लेकिन झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में अब भी पचासेक नक्सली सक्रिय हैं. इसमें एक-एक करोड़ रुपए के इनामी दो नक्सली, जिसमें एकमात्र बचे पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर उर्फ सुनिर्मल जी उर्फ सागर और केंद्रीय समिति के सदस्य असीम मंडल उर्फ आकाश उर्फ तिमिर शामिल हैं. क्या वजह है कि डेडलाइन के बाद महीने भर से ज्यादा वक्त बीत जाने के बावजूद झारखंड से नक्सलियों का खात्मा नहीं हो पाया?

केंद्रीय और राज्य पुलिस के अफसरों से बातचीत के मुताबिक, फिलहाल तीन मुश्किलें आ रही हैं. पहला, दुर्गम और घना जंगल. सारंडा छोटी लेकिन ऊंचाई वाली 700 से ज्यादा पहाड़ियों का समूह है. जंगल इतना घना कि चार-चार के गुट में बंटे सुरक्षा बल जैसे ही एक दूसरे से अलग रास्ता लेते हैं, आपस में ही क्रॉसफायर का खतरा बन जाता है.

कई हिस्सों में दोपहर को सूरज दिखता है. हालत यह है कि नेत्रा ड्रोन जो कि दिन और रात दोनों समय सटीक ट्रैकिंग और मैपिंग में सक्षम हैं, उनसे भी नक्सलियों की लोकेशन पता नहीं चल पा रही. अगर माओवादियों के किसी इलाके में होने की सूचना मिलती है, तो वहां तक पहुंचने में ही पूरा दिन चला जाता है क्योंकि पहाड़ की ऊंचाई 500 फुट से ज्यादा है. जंगल में पेड़ आपस में इतने सटे हैं कि एक बार अगर कोई साथी नजर से ओझल हो जाए तो उसे ढूंढना मुश्किल.

दूसरी मुश्किल है, हर दिन बदलता ठिकाना. 22 जनवरी को सारंडा जंगल के सेडेल तिराहे से आठ किलोमीटर दूर कुंडी गांव में अब तक का सबसे बड़ा एनकाउंटर 'ऑपरेशन मेगाबुरू' हुआ, जिसमें 1 करोड़ रुपए के इनामी पतिराम माझी समेत कुल 17 नक्सली मारे गए. सीआरपीएफ के आइजी साकेत सिंह और एसपी अमित रेणु की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिन्होंने खुद ग्राउंड पर उतरकर पूरे ऑपरेशन का नेतृत्व किया.

एनकाउंटर के बाद सर्च ऑपरेशन के दौरान सुरक्षाबलों को एक डायरी मिली. इसमें नक्सलियों ने आगामी एक महीने के ठहरने का प्लान लिखा था. उसमें हरेक दल के लिए अलग तारीख और अलग जगह का जिक्र था. इससे पता चला कि वे स्थाई कैंप बनाने की जगह हर दिन ठिकाना बदल रहे हैं. एक जगह पर 24 घंटे से ज्यादा नहीं ठहर रहे.

ऐसे में जब भी उनके किसी जगह पर होने की सूचना मिलती है, पुलिस के पहुंचने से पहले वे वहां से जा चुके होते हैं. 22 जनवरी को सफलता इसलिए मिली क्योंकि उनके आने की खबर पुलिस को एक दिन पहले मिली और वे ड्रोन से उस दिन विजिबल थे.

तीसरा, अनगिनत सुरंगों का जाल. सारंडा के अंदर लैंडमाइन डिटेक्टर, खोजी कुत्ते समेत दूसरे उपकरणों का इस्तेमाल करने के बावजूद सुरक्षाकर्मी जमीन के अंदर बिछी सुरंगों की चपेट में आ रहे हैं. वे नक्सलियों के साथ क्रॉसफायर में नहीं, बल्कि सर्च ऑपरेशन के दौरान सुरंगों की चपेट में आने से मर रहे हैं. यहां तक कि जंगल में मवेशी चराने या लकड़ी तोड़ने गए ग्रामीणों और मवेशियों की भी मौत हुई है.

पुलिस विभाग की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक, बीते एक साल में 15 पुलिसकर्मी और पांच ग्रामीण घायल हुए हैं और दस साल की एक बच्ची की जान गई. हालांकि पुलिस को कामयाबी भी मिली है. इसी दौरान कुल 375 किलो की सुरंगों को डिफ्यूज भी किया गया है. इसमें गिरफ्तार हो चुके 15 साल के एक नक्सली की अहम भूमिका रही.

सारंडा के अलावा दो और इलाके हैं, जहां नक्सली सुरक्षित भाग निकलते हैं. ये हैं कोल्हान और पोड़ाहाट जंगल का क्षेत्र. जब इन्हें सारंडा में घेरा जाता है तो कोल्हान की तरफ भागते हैं और जब कोल्हान में घेरा जाता है तो पोड़ाहाट की ओर बढ़ जाते हैं. यहां तक कि उन्होंने अपनी खुराक में भी तब्दीली की है. वे ऐसा भोजन नहीं ले रहे, जिसे चूल्हे पर पकाना पड़े. बीते तीन महीने में जितने भी सर्च ऑपरेशन हुए हैं, सुरक्षाबलों को वहां से सूखा राशन जैसे भूजा, चूरा, भुजिया के पैकेट आदि के निशान मिले हैं. ऐसे में पुलिस को यह सूचना नहीं मिल रही कि वे कहीं से पांच किलो चावल, दाल या बड़ी मात्रा में सब्जी खरीद रहे हैं. जब वे सूखा राशन भी खरीदने आ रहे हैं तो सिविल ड्रेस में. ऐसे में मुखबिरों के लिए भी इनका सुराग लगाना मुश्किल हो रहा है.

आखिरी लड़ाई की तैयारी
इन कठिनाइयों के बावजूद, आखिरी चोट देने की तैयारी है. ऑपरेशन मेगाबुरू ने उन्हें बड़ी उम्मीद दी है. एसपी अमित रेणु कहते हैं, ''बीते छह महीने में रणनीतिक तौर पर हमें सबसे बड़ी कामयाबी यह मिली है कि हमने इनके रसद और एग्जिट के सभी पॉइंट ब्लॉक कर दिए. इन तक राशन और दवाइयां पहुंच नहीं पा रहीं. ऐसे में नक्सलियों ने खुद को छह से सात के दस्ते में बांट लिया है. किसी एक दल को जब भी वे राशन लेने भेज रहे हैं, हम उन्हें मार गिराते हैं.'' पहली अप्रैल को भी इजरायल पुर्ती नाम का नक्सली इसी क्रम में मारा गया. हालांकि, उसके साथ आए दूसरे छह नक्सली भाग निकलने में कामयाब रहे.

इससे बचने के लिए अब वे दुकानों की बजाए ग्रामीणों पर दबाव डालकर राशन लेने लगे हैं. नाम न छापने की शर्त पर किरिबुरू के रहने वाले एक ग्रामीण बताते हैं कि उनके यहां आखिरी बार जनवरी में रसद लेने नक्सली आए थे. इसके बाद वे कभी दिखे नहीं. इसकी तोड़ के तौर पर पुलिस ने कम्युनिटी पुलिसिंग और बढ़ा दी है. बीते छह महीने में पूरे इलाके में कुल 40 पुलिस कैंप स्थापित किए गए हैं. पुलिस कैंप पहुंची तो उसके साथ बिजली, पानी और दवाई भी पहुंची. लोग पुलिस पर भरोसा कर रहे हैं, कैंप में आकर सहायता ले रहे हैं. असर यह है कि अब लोग खुद आगे आकर पुलिस को सूचनाएं दे रहे हैं.

किरिबुरू के एसडीपीओ अजय केरकेट्टा कहते हैं, ''हमने यह भी पक्का किया है कि अगर किसी ग्रामीण के बारे में सूचना मिलती है कि उसने नक्सलियों को राशन की मदद दी है तो ऐसे लोगों से बस सामान्य पूछताछ कर रहे हैं, किसी तरह का दबाव या मारपीट बिल्कुल नहीं की जा रही.''

यह मुख्यत: 'हो' आदिवासी बहुल इलाका है. छोटानागरा थाने में इसी जिले के निवासी और 'हो' आदिवासी, सैनिक समद को थाना प्रभारी बनाया गया है ताकि स्थानीय लोगों से संवाद बनाने और उनका विश्वास हासिल करने में आसानी हो. बीते पांच महीने में चार नए मोबाइल टावर भी लगाए गए हैं.

अमित रेणु एक बार फिर कहते हैं, ''हम बिल्कुल नहीं चाहते कि नक्सली मारे जाएं. हम चाहते हैं कि वे सरेंडर करें. यहां तक कि उनके परिजन भी यही चाहते हैं. लेकिन अगर वे ऐसा नहीं करते, तो उनका मारा जाना तय है, वह भी बहुत जल्द.''

पता चला है कि मिसिर बेसरा के बेटे सिद्धार्थ बेसरा, जिन्होंने छह साल की उम्र में अपने पिता को आखिरी बार देखा था, 28 अप्रैल से सारंडा के जंगल में एक चिट्टी के साथ लगातार पांच दिन से घूम रहे थे. वे कहते हैं, ''मैं जब छह साल का था, तब पिताजी छोड़कर चले गए. उसके अगले साल मां किसी और के साथ जीवन बिताने चली गईं.'' 35 साल के सिद्धार्थ मुंबई में दिहाड़ी मजदूर हैं और कलर कोटिंग का काम करते हैं.

वे कहते हैं, ''उस चिट्ठी में मैंने सरेंडर की अपील के साथ पारिवारिक स्थिति का भी जिक्र किया है. साथ ही मिलने की इच्छा जताई है.'' सिद्धार्थ की परवरिश करने वाले मिसिर के छोटे भाई 59 साल के देवीलाल बेसरा पेशे से पारा टीचर हैं. वे बताते हैं, ''बीते महीने दिल्ली से कुछ लोग आए थे. हमने उनके माध्यम से अपने भाई के नाम एक चिट्टी भेजी थी, जिसमें मैंने उन्हें सरेंडर करने के लिए कहा है. हालांकि, अभी तक कोई जवाब नहीं मिल सका है.''

सवाल यह भी है कि जब छत्तीसगढ़, ओडिशा सब जगह सरेंडर हो चुके हैं, ऐसे में झारखंड के ये बचे हुए नक्सली आखिर क्यों सरेंडर नहीं करना चाहते? सूत्रों के मुताबिक, दोनों टॉप लीडर मिसिर बेसरा और असीम मंडल सरेंडर करना चाहते हैं लेकिन स्पेशल एरिया कमेटी मेंबर अजय महतो उर्फ टाइगर और रीजनल कमेटी मेंबर मोछू उर्फ मेहनत उर्फ विभीषण इसके पक्ष में नहीं. मिसिर मधुमेह जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं. पर उन्हें चलने में मुश्किल आ रही है. साथ चल रहे छत्तीसगढ़ के अश्विन उर्फ लच्छू कोर्सा बीमार और घायल नक्सलियों का इलाज करते हैं. 

दूसरी तरफ अर्धसैनिक बल, स्पेशल फोर्स और राज्य पुलिस के विशेष दस्तों के 5,000 से ज्यादा जवान सभी जरूरी हथियार और अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी के साथ 24 घंटे ऑपरेशन में लगे हैं. बंगाल चुनाव के बाद यहां अर्धसैनिक बलों की संख्या में और बढ़ोतरी होने जा रही है. योजना है कि तीनों पॉइंट यानी सारंडा, कोल्हान और पोड़ाहाट जंगल से एक साथ घेराबंदी और हमला किया जाए.

राशन बंद, दवाई बंद, लोकल सपोर्ट लगभग खत्म. अगले दो माह यानी मई और जून पुलिस और माओवादी, दोनों के लिहाज से निर्णायक होने जा रहे हैं क्योंकि इसके बाद जब बारिश शुरू हो जाएगी, सारंडा में ऑपरेशन लगभग नामुमकिन हो जाएगा. अभी बारिश नहीं है, तब भी हर हफ्ते चार से पांच जवान, मलेरिया के शिकार हो रहे हैं. बारिश में इसकी संख्या और बढ़ सकती है. साथ ही बरसात होने के बाद जंगल और घना तथा फिसलन भरा हो जाएगा. ऐसे में सुरक्षाबलों को ऑपरेशन करने में अतिरिक्त मुश्किलों का सामना करना होगा.

इधर, केंद्र सरकार की ओर से 8 अप्रैल को हुई समीक्षा के बाद जारी रिपोर्ट के मुताबिक, देश के कुल नौ राज्यों आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल के 37 जिलों को अब 'लीगेसी ऐंड थ्रस्ट डिस्ट्रिक्ट्स' के रूप में वर्गीकृत किया गया है. मतलब अब वे सक्रिय माओवादी हिंसा से प्रभावित नहीं लेकिन सुरक्षा और विकास पर लगातार ध्यान देने की जरूरत बनी हुई है. झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले को 'डिस्ट्रिक्ट ऑफ कंसर्न' श्रेणी में रखा गया है. इसका संकेत है कि उग्रवादी नेटवर्क कमजोर हुए हैं लेकिन सतर्कता अब भी जरूरी है.

पश्चिमी सिंहभूम के एसपी अमित रेणु के मुताबिक, ''हमने उन्हें चारों तरफ से घेरने, रसद ब्लॉक करने के अलावा आर्थिक तौर पर भी नक्सलियों को बड़ा नुकसान पहुंचाया है. बीते दो साल में 51,34,500 रुपए जब्त किए गए हैं. बीते छह महीने में लेवी वसूली की भी कोई सूचना नहीं मिली है. वे बस आखिरी सांस ले रहे हैं.'' 

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