एक कदम आत्म-निर्भरता की ओर

देश में सैन्य और नागरिक हेलिकॉप्टरों की अप्रत्याशित मांग बढ़ने के साथ ही निजी कंपनियां इसे पूरी करने के लिए विदेशी कंपनियों से साझेदारी कर रहीं. यह भारत के आत्मनिर्भर एअरोस्पेस हब बनने की दिशा में साबित हो सकता है अहम मोड़

एच125 दुनिया का सबसे ज्यादा बिकने वाला हल्का हेलिकॉप्टर

भारत हेलिकॉप्टर सेक्टर में एक बड़े उछाल की ओर बढ़ रहा है—और इस बार मांग पूरी करने के लिए सिर्फ विदेशी खरीद पर निर्भरता नहीं होगी, बल्कि विदेशी कंपनियां भारत की बड़ी रक्षा कंपनियों के साथ साझेदारी कर उत्पादन करेंगी.

यह भारत के आत्मनिर्भर एअरोस्पेस हब बनने की दिशा में अहम मोड़ साबित हो सकता है. भारतीय सेना के मौजूदा हेलिकॉप्टर बेड़े का बड़ा हिस्सा साठ और नब्बे के दशक के बीच शामिल किया गया था और अब वह पुराना पड़ रहा है.

अगले दशक में 1,000 से ज्यादा हेलिकॉप्टरों की जरूरत को देखते हुए, सेना को एक तरफ तेजी से बूढ़े हो रहे बेड़े को बदलना है और दूसरी तरफ जमीन, समुद्र और ऊंचाई वाले इलाकों में बढ़ती जरूरतों के लिए क्षमता भी तैयार करनी है.

उत्तरी सीमा पर हिमालयी क्षेत्रों में तैनात सैनिकों तक रसद पहुंचाने वाले हल्के हेलिकॉप्टरों से लेकर समुद्री सुरक्षा और बहुउद्देश्यीय अभियानों में इस्तेमाल होने वाले प्लेटफॉर्म तक, रोटरी एविएशन अब भारत के रक्षा आधुनिकीकरण का अहम हिस्सा बनता जा रहा है.

इसी के साथ नागरिक क्षेत्र में भी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और आपात सेवाओं की जरूरत बढ़ी है. इससे हेलिकॉप्टर अब सिर्फ अमीरों और वीआइपी इस्तेमाल का साधन नहीं, बल्कि जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर बनते जा रहे हैं.

बढ़ती मांग को देखते हुए दुनिया की बड़ी कंपनियां भारत में अपनी मौजूदगी मजबूत कर रही हैं—एअरबस हेलिकॉप्टर्स, ‌लियोनार्डो एस.पी.ए., बेल टेक्स्ट्रॉन और सिकोर्स्की इसमें शामिल हैं. एयरबस हेलिकॉप्टर्स और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड के बीच साझेदारी, साथ ही लियोनार्डो एस.पी.ए. और अदाणी डिफेंस ऐंड एअरोस्पेस का गठजोड़, भारत में स्थानीय निर्माण व्यवस्था की ओर बदलाव का संकेत है.

अदाणी डिफेंस के सीईओ आशीष राजवंशी कहते हैं कि फिलहाल वैश्विक हेलिकॉप्टर बाजार में भारत की हिस्सेदारी दो फीसदी से भी कम है. उनके मुताबिक, इस मांग को पूरा करने के लिए ऐसा मजबूत घरेलू इकोसिस्टम चाहिए जिसमें सरकारी संस्थान, निजी उद्योग और वैश्विक तकनीकी साझेदार मिलकर काम करें.

वे कहते हैं, ''हमारा फोकस भारत में लंबी अवधि की एयरोस्पेस निर्माण क्षमता तैयार करना है, ताकि अहम प्लेटफॉर्म देश में ही डिजाइन किए जाएं, बनाए और संचालित किए जा सकें. यह आत्मनिर्भर भारत के बड़े लक्ष्य में योगदान देगा.'' उद्योग के अनुमान के मुताबिक, भारत का हेलिकॉप्टर बाजार 2024 के 1.58 अरब डॉलर (करीब 14,975 करोड़ रुपए) से बढ़कर 2032 तक 2.88 अरब डॉलर (करीब 27,296 करोड़ रुपए) तक पहुंच सकता है.

रक्षा जरूरतों का दबाव
दशकों से भारतीय सेना चीता और चेतक हेलिकॉप्टरों पर निर्भर रही है. फ्रांसीसी मूल के ये हेलिकॉप्टर सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एअरोनॉ‌टिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने भारत में लाइसेंस के तहत बनाए थे. अब इन 600 से ज्यादा हेलिकॉप्टरों की सेवा अवधि खत्म होने के करीब है.

पुराने हेलिकॉप्टरों को बदलने की सबसे बड़ी जरूरत रिकॉनेसेंस ऐंड सर्विलांस हेलिकॉप्टर (आरएसएच) कार्यक्रम में दिख रही है. 2008 में शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट 2025 में रक्षा मंत्रालय की नई रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (आरएफआइ) के बाद फिर तेज हुआ.

इसकी अनुमानित लागत 15,000-20,000 करोड़ रुपए है. इस कार्यक्रम के तहत सेना को ऊंचाई वाले इलाकों में इस्तेमाल के लिए 200 हल्के हेलिकॉप्टर चाहिए—120 भारतीय आर्मी के लिए और 80 भारतीय वायु सेना के लिए. इसमें मेक इन इंडिया पर जोर है, यानी किसी भारतीय और विदेशी कंपनी के संयुक्त उपक्रम के जरिए निर्माण. आरएसएच कार्यक्रम को लेकर कंपनियों के बीच जबरदस्त प्रतिस्पर्धा है.

मसलन एअरबस हेलिकॉप्टर्स 2027 से टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (टीएएसएल) के साथ मिलकर अपने एच125 सिंगल-इंजन हल्के हेलिकॉप्टर भारत में बनाएगी. इसके लिए कर्नाटक के वेमागल में फाइनल असेंबली लाइन लगाई जा रही है, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां ने फरवरी में किया था. निजी क्षेत्र से जुड़ी यह भारत की पहली हेलिकॉप्टर असेंबली लाइन होगी, जिसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है.

इसी कार्यक्रम में मुंबई की मैक्स एअरोस्पेस ऐंड एविएशन ने अमेरिकी कंपनी बेल टेक्स्ट्रॉन के साथ साझेदारी की है. दोनों बेल 407जीएक्सआइ हेलिकॉप्टर को भारत में असेंबल करने की योजना बना रहे हैं और नागपुर में असेंबली लाइन लगाने की तैयारी है.

समुद्री जरूरतें भी तेजी से बढ़ रही हैं. नैवल यूटिलिटी हेलिकॉप्टर (एनयूएच) कार्यक्रम का मकसद नौसेना और तटरक्षक बल में इस्तेमाल हो रहे पुराने चेतक हेलिकॉप्टरों को बदलना है. अगस्त 2025 में रक्षा मंत्रालय ने 76 हेलिकॉप्टरों के लिए आरएफआइ जारी की—51 नौसेना और 25 कोस्ट गार्ड के लिए. इसकी अनुमानित लागत करीब 5,000 करोड़ रुपए है.

करीब 5.5 टन अधिकतम वजन वाले ये हेलिकॉप्टर सर्च ऐंड रेस्क्यू, मेडिकल निकासी और निगरानी जैसे अभियानों में इस्तेमाल होंगे. दिलचस्प बात यह है कि एचएएल का स्वदेशी यूटिलिटी हेलिकॉप्टर-मेरीटाइ (यूएच-एम), जिसका वजन 5.8 टन तक है, भी इस दौड़ में शामिल है. नौसेना 2027 से उपलब्ध होने पर इसे खरीदने की योजना बना रही है.

निजी कंपनियों के विकल्प भी तेजी से मजबूत हो रहे हैं. एनयूएच कार्यक्रम के लिए टाटा-एयरबस की साझेदारी मल्टीरोल एच160एम हेलिकॉप्टर पेश करेगी. वहीं फरवरी में अदाणी डिफेंस ऐंड एअरोस्पेस ने लियोनार्डो एस.पी.ए. के साथ समझौता कर भारत में हेलिकॉप्टर निर्माण का पूरा इकोसिस्टम विकसित करने का ऐलान किया—जिसमें उत्पादन, असेंबली और फ्लाइट ट्रेनिंग शामिल होगी. दोनों कंपनियां एडब्ल्यू169एम जैसे हल्के ट्विन-इंजन मल्टीरोल हेलिकॉप्टर पेश कर सकती हैं.

रक्षा मंत्रालय ने 2024 में एचएएल के साथ अलग से 5,083 करोड़ रुपए का समझौता किया था, जिसके तहत तटरक्षक बल के लिए छह एएलएच (एडवांस्ड लाइट हेलिकॉप्टर) एमके-थ्री मेरीटाइम रोल हेलिकॉप्टर खरीदे जाने थे. इनमें से चार हेलिकॉप्टर अप्रैल 2026 में उसे सौंप दिए गए.

अब बड़ा सवाल यह है कि टाटा और अदाणी जैसी निजी कंपनियों की एंट्री और विदेशी कंपनियों के साथ उनकी साझेदारी का असर एचएएल पर क्या होगा, जो लंबे समय से भारत के हेलिकॉप्टर इकोसिस्टम की रीढ़ रहा है? एचएएल ने एएलएच ध्रुव और लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर (एलसीएच) प्रचंड जैसे महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म डिजाइन और तैयार किए हैं.

एचएएल के पूर्व अधिकारी गोपाल सुतार कहते हैं कि भारत अब उन चुनिंदा देशों में शामिल हो चुका है जो शुरू से अंत तक हेलिकॉप्टर डिजाइन और निर्माण करने में सक्षम हैं, और इस क्षमता के केंद्र में एचएएल है. वे कहते हैं, ''इन साझेदारियों के जरिए भारत के एअरोस्पेस सेक्टर में नई पूंजी, आधुनिक निर्माण तकनीक और वैश्विक सप्लाइ चेन का जुड़ाव आ रहा है.'' सुतार के मुताबिक यह बदलाव एचएएल के लिए खतरा नहीं, बल्कि एक प्रोत्साहन है. 

एचएएल का भविष्य अब ‌इंडियन मल्टी-रोल हेलिकॉप्टर (आइएमआरएच) जैसे उन्नत कार्यक्रमों पर टिका होगा. यह मध्यम क्षमता वाला हेलिकॉप्टर है, जिसे फ्रांसीसी कंपनी साफ्रान के साथ मिलकर विकसित किया जा रहा है. इसका उद्देश्य रूस मूल के एमआइ17 हेलिकॉप्टरों के बड़े बेड़े को धीरे-धीरे बदलना है. इसके साथ एचएएल ध्रुव एनजी जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए नागरिक बाजार में भी विस्तार करना चाहता है. हालांकि सुतार दो बड़ी चुनौतियों की ओर भी इशारा करते हैं—विदेशी इंजन सप्लाइ चेन पर लगातार निर्भरता और कुशल मानव संसाधन की संभावित कमी.

नागरिक क्षेत्र में बढ़ें उड़ानें
जहां सैन्य जरूरतें सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोर रही हैं, वहीं लंबे समय में नागरिक हेलिकॉप्टर बाजार ज्यादा संभावनाएं रखता है. भारत में फिलहाल करीब 270 पंजीकृत नागरिक हेलिकॉप्टर हैं—इतने बड़े देश के हिसाब से यह बेहद छोटी संख्या है. भारत में प्रति दस लाख आबादी पर सिर्फ 0.18 हेलिकॉप्टर हैं जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 28 और कनाडा में 68 है.

सरकार नीतिगत कदमों के जरिए इस क्षेत्र की संभावनाएं बढ़ाने में जुटी है. मिसाल के तौर पर उड़ान 5.1 योजना के तहत दूरदराज और कम सेवा वाले इलाकों में हेलिकॉप्टर रूट शुरू करने पर जोर दिया जा रहा है. इससे क्षेत्रीय कनेक्टिविटी, आपदा राहत, आपात चिकित्सा सेवाएं, कानून व्यवस्था और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा.

 

 

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