आम पर आफत

मौसम की मार, कीड़े-मकोड़ों के प्रकोप और बाजार की झोलझाल से पूरे उत्तर भारत, यहां तक कि कोंकण तक आम की पैदावार पर जैसे पाला पड़ा. किसानों की आय घटी, निर्यात पर संकट और लाखों बागवानों की आजीविका पर खतरे के बादल

लखनऊ में मलिहाबाद के रहमानखेड़ा इलाके में मौजूद रोहित कुमार के बाग में पेड़ों पर ढूंढने पर भी आम नहीं दिखते. आम की पूरी फसल आंधी-पानी की भेंट चढ़ गई है

लखनऊ के प्रसिद्ध 'मैंगो बेल्ट' में मलिहाबाद के रहमानखेड़ा गांव के किसान जय प्रकाश जब अपने बाग में जाते हैं तो उनकी आंखों में चमक नहीं, चिंता की परत साफ दिखाई देती है. पांच एकड़ में फैले दशहरी आम के उनके बाग में कुछ हफ्ते पहले तक बौर और अमियों की बहार थी.

उन्हें बेहतर पैदावार और बाजार में दाम भी अच्छे मिलने की उम्मीद थी. लेकिन तभी आया आंधी और बेमौसम बारिश का दौर. उनकी उम्मीद पर जैसे ओले बरस पड़े. ''इस साल फसल बहुत अच्छी दिख रही थी,'' वे धीमी आवाज में कहते हैं, ''लेकिन मौसम ने सब तबाह कर दिया. अब साल भर का खर्च कैसे चलेगा?''

जय प्रकाश बताते हैं कि सामान्य वर्षों में उनके बाग से 80 से 100 क्विंटल प्रति एकड़ तक आम निकलते थे. यानी हर साल करीब 400 से 500 क्विंटल. औसतन 25-30 रुपए किलो के हिसाब से उनकी कुल बिक्री 10 से 12 लाख रुपए तक पहुंच जाती थी. लागत निकालकर भी उन्हें 6-7 लाख रुपए का शुद्ध लाभ मिल जाता था.

इस बार हालात बिल्कुल उलट हैं. मौसम की मार, बौर झड़ने और कीड़े-मकोड़ों के प्रकोप के कारण पैदावार में 40 फीसद से ज्यादा गिरावट का अनुमान है. यानी इस बार जय प्रकाश के बाग की पैदावार घटकर 300 क्विंटल के आसपास सिमट सकती है. ऊपर से गुणवत्ता गिरने के कारण बाजार भाव भी 15-20 रुपए प्रति किलो तक नीचे आने का अंदेशा है.

ऐसे में उनकी कुल बिक्री घटकर बमुश्किल छह लाख रुपए रह जाएगी, जबकि लागत लगभग पहले जैसी ही रहेगी. इस हिसाब से उन्हें इस सीजन में सीधे-सीधे करीब पांच लाख रुपए तक का नुक्सान झेलना पड़ सकता है. उनकी चिंता है, ''हमारा पूरा साल इसी फसल पर टिका रहता है. यह फसल बिगड़ी तो बच्चों की पढ़ाई से लेकर घर का खर्च चलाना भी मुश्किल हो जाएगा.''

जय प्रकाश की यह कहानी सिर्फ उन्हीं की नहीं बल्कि बल्कि उत्तर भारत में आम के लाखों किसानों की है. लखनऊ के 'मैंगो बेल्ट' से जुड़े 20,000 से ज्यादा किसानों के लिए इस समय दशहरी आम की मिठास के पीछे गहरी कड़वाहट छिपी है. लखनऊ का मलिहाबाद दशहरी आम के लिए दुनिया भर में जाना जाता है.

यहां की फल पट्टी करीब 30,000 हेक्टेयर में फैली है और यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश में आम की उपज का अहम केंद्र माना जाता है. लेकिन इस बार मौसम के हिलते-डुलते मिजाज ने इस पूरी अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया है. तापमान में अचानक उतार-चढ़ाव, बेमौसम बारिश और बढ़ती नमी ने आम की फसल को कई स्तरों पर प्रभावित किया है.

लखनऊ में रहमानखेड़ा स्थित आइसीएआर-सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर सबट्रॉपिकल हॉर्टिकल्चर के वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस बार सबसे बड़ी समस्या फल बनने की प्रक्रिया यानी फ्रूट सेटिंग में आई गिरावट है. मार्च महीने के मध्य में फूल आने के समय तापमान का अस्थिर रहना आम के लिए बेहद नुक्सानदायक साबित हुआ. कई बागों में जहां फल लगने चाहिए थे, पेड़ खाली रह गए. वैज्ञानिक पी.के. शुक्ल बताते हैं, ''कुछ बागों में फल लगे हैं, लेकिन पूरे क्षेत्र की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती.''

अप्रत्याशित मौसम ने कीड़े-मकोड़ों और कई रोगों को जैसे दावत दे दी. बढ़ी हुई नमी और रात के तापमान में गिरावट ने पाउडरी मिल्ड्यू, दहिया (खर्रा) और एंथ्रेक्नोज जैसे रोगों को तेजी से फैलने का मौका दिया. इसके साथ ही भुनगा, गुझिया और फल मक्खी जैसे कीटों का प्रकोप भी बढ़ गया है. बागवान सर्वेश बताते हैं कि उन्होंने समय से कीटनाशकों का छिड़काव किया, इसके बावजूद ''इस बार मौसम इतना खराब रहा कि सारी कोशिशें बेकार हो गईं.''

दरअसल, आम की फसल एक बेहद संवेदनशील प्रक्रिया से गुजरती है. फूल यानी बौर से फल बनने तक हर चरण में मौसम की भूमिका निर्णायक होती है. विशेषज्ञों के अनुसार, रात का तापमान अगर 15 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाए तो फल का भ्रूण विकास बाधित हो सकता है. यही इस बार बड़े पैमाने पर देखने को मिला. ऊपर से बारिश ने स्थिति और बिगाड़ दी. बौर पर लगे फूल झड़ने लगे और उनमें फंगस लगने का खतरा बढ़ गया. मलिहाबाद, काकोरी और माल जैसे क्षेत्रों में इस बार यही पैटर्न दिखा है. जहां पहले फल बनने की प्रक्रिया कम हुई, वहीं बाद में बारिश ने बचे बौर को नुक्सान पहुंचाया. बागवान संजीत सिंह के मुताबिक, ''समय पर धूप न मिलने से नुक्सान 30-40 फीसद तक पहुंच चुका है.''

कोंकण का 'हापुस' संकट
महाराष्ट्र में कोंकण का हाल देखिए. रत्नागिरी जिले के निवेंडी गांव में अपने बाग में खड़े ओमकार कुलकर्णी दादाजी के समय से फल दे रहे पुराने आम के पेड़ की ओर इशारा करते हैं, तो उनकी आवाज में चिंता साफ झलकती है: ''कभी यही पेड़ 70 क्रेट अल्फांसो आम देता था. इस साल बमुश्किल 10 क्रेट निकलेंगे.'' यहां से करीब 200 किलोमीटर दूर सिंधुदुर्ग के मालवण में किसान संजय नारे सामान्य वर्षों में 25,000 बक्से बेचते थे, लेकिन इस बार 5,000 बक्सों तक पहुंचना भी चुनौती बन गया है. कोंकण का यह संकट पूरे क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था को झकझोर रहा है.

दरअसल, कोंकण क्षेत्र इस साल आम की खेती में अप्रत्याशित नाकामी झेल रहा है. कृषि विभाग के मुताबिक, यहां सामान्य वर्षों में करीब 2.5 लाख टन अल्फांसो यानी हापुस आम पैदा होता है. इस बार इसमें 80 फीसद तक गिरावट का अनुमान है. 2025 के मौसम में इस क्षेत्र में 1,29,427 हेक्टेयर में आम की खेती हुई थी, खासकर रत्नागिरी (68,550 हेक्टेयर) और सिंधुदुर्ग (34,598 हेक्टेयर) में. 2,74,949 टन की कुल उपज में रत्नागिरी का योगदान 1,84,602 टन और सिंधुदुर्ग का 38,058 टन था. इस साल हालात पूरी तरह उलट गए हैं. इसका सीधा असर बाजार में दिख रहा है. मुंबई में अल्फांसो 800 से 2,000 रुपए प्रति दर्जन बिक रहा है, जबकि पिछले साल कीमत 600 से 1,000 रुपए के बीच थी. 

इस संकट की शुरुआत मौसम की अनियमितताओं से हुई. दिसंबर में जब आम के पेड़ों पर भारी मात्रा में बौर आए, तो किसानों को बंपर फसल की उम्मीद थी. कई बागों में स्थिति ऐसी थी कि पेड़ों पर पत्ते तक दिखाई नहीं दे रहे थे. लेकिन इसके बाद मौसम ने अचानक करवट ली. मॉनसून की देर से वापसी, सर्दियों में तापमान का 10 डिग्री सेल्सियस से नीचे गिरना, दिन और रात के तापमान में भारी अंतर और कोहरे की मार ने फूलों को नुक्सान पहुंचाया. परागण करने वाले जीवों की गतिविधियां भी प्रभावित हुईं, जिससे बड़ी संख्या में फूल फल में तब्दील ही नहीं हो पाए. नतीजतन बौर आने का पहला चक्र लगभग पूरी तरह बर्बाद हो गया और बाद के चक्र भी कमजोर पड़ गए.

महाराष्ट्र के कोंकण में मौसम की मार से आम की फसल चौपट हो गई है

मिठास पर भी असर
समस्या भी सिर्फ पैदावार तक ही सीमित नहीं. गुणवत्ता पर भी इसका सीधा असर पड़ा है. आम की मिठास, रंग और टिकाऊपन सब प्रभावित हो रहे हैं. विशेषज्ञ बताते हैं कि ज्यादा बारिश और नमी के कारण आम में मिठास 30-40 फीसद तक घट सकती है. यही वजह है कि इस बार फल भले दिखने में ठीक हों लेकिन स्वाद में वह बात नहीं रहने वाली. संकट को और गहरा बनाती हैं बाजार और व्यवस्था से जुड़ी समस्याएं.

मलिहाबाद में मंडी तो बनी, लेकिन उसका संचालन आज तक ठीक से शुरू नहीं हो सका. किसानों को सड़क किनारे फुटपाथ पर आम बेचना पड़ता है. रहमानखेड़ा में बने मैंगो पैक हाउस को लेकर भी बागवानों में नाराजगी है. वहां ''सिर्फ खास लोगों का आम खरीदे जाने'' का आरोप है. छोटे किसानों को कई तरह की खामियां बताकर लौटा दिया जाता है. कीटनाशकों को लेकर भी स्थिति चिंताजनक है.

किसानों को सही सलाह देने वाला कोई मजबूत तंत्र नहीं. नतीजा: दुकानदार ही 'विशेषज्ञ' बन बैठे हैं. नकली दवाओं की भरमार है, जिनके इस्तेमाल से फसल और खराब हो रही है. एक किसान के मुताबिक, ''दवा असली है या नकली, इसकी जांच का कोई सिस्टम नहीं. हम अंदाज से छिड़काव करते हैं.'' इस बार परागण करने वाले जीवों की कमी भी एक बड़ा कारण बना है. मधुमक्खियों की संख्या में गिरावट ने प्राकृतिक परागण को प्रभावित किया है. इसके पीछे अत्यधिक कीटनाशकों का उपयोग भी जिम्मेदार माना जा रहा है. परागण ठीक से न होने पर फल लगने की प्रक्रिया प्रभावित होगी ही.

इस पूरे संकट के बीच बागों के प्रबंधन पर भी सवाल उठ रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि मलिहाबाद क्षेत्र में पारंपरिक तरीकों से खेती अब चुनौती बन रही है. काकोरी के आम किसान शैलेंद्र राजन कहते हैं, ''पेड़ों की छंटाई, कैनोपी मैनेजमेंट और पोषण प्रबंधन पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बाराबंकी में इन तकनीकों का बेहतर इस्तेमाल हो रहा है, जिससे वहां पैदावार ज्यादा है.''

कई बागों में पेड़ बहुत घने हो चुके हैं, जिससे हवा और धूप का ठीक प्रवाह नहीं हो पाता. इसका असर सीधे फूलों और फलों की गुणवत्ता पर पड़ता है. पिछले साल यहां करीब 3 लाख मीट्रिक टन आम पैदा हुआ था. इस बार हालात को देखते हुए उत्पादन में खासी गिरावट का अंदेशा है. मलिहाबाद का दशहरी अपनी खास मिठास और खुशबू के लिए जाना जाता है. इसे भौगोलिक संकेतक (जीआइ टैग) भी मिला हुआ है. लेकिन लगातार बिगड़ते मौसम और घटती गुणवत्ता के कारण इसकी वैश्विक पहचान पर भी खतरा मंडराने लगा है.

पहाड़ पर 'मिलीबग' का हमला
उत्तराखंड में आम की फसल पर सबसे बड़ा खतरा कीटों के बढ़ते प्रकोप के रूप में सामने आया है, तराई से लेकर पहाड़ी घाटियों तक. यहां भी बौर और अमियों ने किसानों में हौसला भर दिया था पर बदले मौसम हालात पूरी तरह बदल दिए. मार्च में बारिश और ओलावृष्टि ने परागण की प्रक्रिया को भी बाधित किया था. इसके बाद बढ़ी नमी और तापमान में उतार-चढ़ाव ने कीटों और रोगों के फैलाव के लिए अनुकूल माहौल बना दिया.

उधम सिंह नगर और हरिद्वार के मैदानी इलाकों के साथ-साथ पहाड़ी घाटियों में बसे गांवों के बागों में इस समय 'मिलीबग' का प्रकोप बढ़ रहा है. यह कीड़ा नई कोपलों, फूलों और छोटे फलों पर हमला करता है, जिससे फल बनने की प्रक्रिया पर सीधे चोट पड़ती है. कई बागों में पेड़ों की पत्तियों और मंजरी पर दिखता सफेद चिपचिपा पदार्थ मिलीबग की पहचान है. यह कीट न केवल पेड़ों की बढ़वार रोकता है, बल्कि लगे हुए फलों को भी गिरा देता है. विशेषज्ञों के अनुसार, तापमान में अचानक बढ़ोतरी और सूखे के बीच बनी नमी की स्थिति 'मिलीबग' के फैलाव के लिए सबसे अनुकूल होती है. समय रहते नियंत्रण न किया गया तो यह बड़े स्तर पर फसल को नुक्सान पहुंचा सकता है. पहाड़ी क्षेत्रों में समस्या और गंभीर है क्योंकि वहां तकनीकी सलाह और कीटनाशकों की उपलब्धता सीमित है.

यहां तो टिकोरे ही नहीं बचे
बेमौसम गर्मी, बारिश और तेज आंधी ने बिहार और झारखंड में भी आम की फसल पर कम कहर नहीं बरपाया है. कुछ इलाकों में तो पेड़ों पर टिकोरे तक नहीं बचे. जहां बचे हैं, वहां कीड़ों और मौसम की मार से फसल प्रभावित हो रही है. बिहार के मधुबनी जिले के सरिसब पाही गांव के किसान अमल झा की कहानी इस संकट की गंभीरता को बयान करती है. उनके पास करीब 140 पेड़ों वाले आम के दो बगीचे हैं, लेकिन इस साल एक भी आम नहीं बचा.

जनवरी-फरवरी में बगीचों में अच्छे बौर आए लेकिन मार्च की शुरुआत में बारिश नहीं हुई, जबकि उस समय हल्की बारिश टिकोरे बनने के लिए जरूरी होती है. इसके बजाए भीषण गर्मी पड़ी, जिससे बौर और टिकोरे झडऩे लगे. मार्च के तीसरे हफ्ते में आई आंधी और बारिश ने बची-खुची फसल भी खत्म कर दी. यह संकट सिर्फ मधुबनी तक सीमित नहीं.

बिहार सरकार के आकलन के मुताबिक, नेपाल सीमा से सटे 12 जिलों के 111 प्रखंडों में आम समेत कई फसलें बुरी तरह प्रभावित हुई हैं. किसानों को मुआवजा देने की तैयारी जरूर की जा रही है, लेकिन पैदावार में आई भारी गिरावट से बाजार में आम की उपलब्धता और कीमत दोनों प्रभावित हो सकते हैं. झारखंड में भी हालात बहुत अलग नहीं. गुमला जिले में आम्रपाली आम के बड़े पैमाने पर बाग लगाए गए हैं. यहां के पालकोट, घाघरा और रायडीह प्रखंडों में करीब 1,12,000 पेड़ हैं. पिछले साल यहां लगभग 6,000 मीट्रिक टन आम की पैदावार हुई थी लेकिन इस बार यह घटकर केवल 1,000 से 1,200 मीट्रिक टन रहने का अनुमान है, यानी उपज में करीब 70-80 प्रतिशत तक गिरावट का अंदेशा है.

निर्यात की चिंता बढ़ी 
मौसम की मार के साथ-साथ इस बार एक और बड़ा संकट सामने है—अंतरराष्ट्रीय हालात. पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने निर्यात को लेकर चिंता बढ़ा दी है. मलिहाबाद का दशहरी आम अब सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं. पिछले कुछ सालों में इसका निर्यात तेजी से बढ़ा है. दुबई, अमेरिका और यूरोप के बाजारों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है. पिछले वर्ष जून में आम के सीजन में उत्तर प्रदेश का मलिहाबादी दशहरी सीधे दुबई के बाजारों में भेजा गया था.

उद्यान, कृषि विपणन और कृषि निर्यात राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिनेश प्रताप सिंह ने रहमानखेड़ा स्थित मैंगो पैक हाउस से 1,200 किलो दशहरी के पहले अंतरराष्ट्रीय कन्साइनमेंट को हरी झंडी दिखाकर दुबई रवाना किया था. यह पहला मौका था जब यूपी के एफपीओ (किसान उत्पादक संगठन) को सीधे विदेश से ऑर्डर मिला था. इस खेप का मूल्य 2,992 अमेरिकी डॉलर यानी लगभग 2.5 लाख रुपए था. अब इस व्यापार पर खाड़ी युद्ध की काली छाया मंडरा रही है.

पिछले 15 साल से आम का निर्यात कर रहे पुणे के अभिजीत भोसले कहते हैं, ''अंतरराष्ट्रीय बाजार बहुत संवेदनशील होता है. युद्ध या तनाव का सीधा असर एयर कार्गो, शिपिंग और मांग पर पड़ता है. स्थिति बिगड़ने पर निर्यात कम हो सकता है.'' पिछले साल भारत से 3,000-3,200 मीट्रिक टन आम का निर्यात हुआ था, लेकिन इस बार अनिश्चितता ज्यादा है. अगर निर्यात घटता है तो इसका असर घरेलू बाजार पर भी पड़ेगा. हालांकि मंत्री दिनेश प्रताप सिंह कहते हैं कि सरकार किसानों की समस्याओं पर नजर रखे हुए है.

झारखंड के गुमला जिले के पालकोट प्रखंड के बैगमा गांव में बीते साल आम की बंपर पैदावार हुई, अबकी किसान तेज गर्मी, पानी

खेती के तरीकों से बढ़ा संकट
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी आम की फसल को नुक्सान पहुंचा है. जबलपुर स्थित जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय में हॉर्टिकल्चर विभाग के डीन रह चुके डॉ. एस.के. पांडे बताते हैं कि मध्य प्रदेश में आम की व्यावसायिक पैदावार इंदौर, बैतूल, खंडवा और रीवा में होती है. यहां मुख्य रूप से लंगड़ा और दशहरी जैसी प्रजातियों के आम पैदा होते हैं जिनकी खपत स्थानीय है.

मार्च-अप्रैल में मौसम की मार से प्रदेश की 40 फीसद फसल प्रभावित हुई. पड़ोस के छत्तीसगढ़ में कलमी के बजाए प्राकृतिक रूप से उगे बीजू आम की संख्या ज्यादा है. छत्तीसगढ़ में अमचूर बड़ी मात्रा में होता है. आम सुखाकर बेचना महिलाओं का बड़ा कुटीर है. राज्य के जाने-माने किसान राजाराम त्रिपाठी ने बताते हैं, ''यहां का अमचूर मैंने दुबई तक में बिकते देखा. मौसम की मार से उसके कारोबार पर असर दिखेगा.''

हालांकि बागवानी विशेषज्ञ मानते हैं कि आम की फसल पर यह संकट सिर्फ मौसम की देन नहीं. खेती के तरीकों ने भी इसे गहरा किया है. ग्रोथ रेगुलेटर, कीटनाशकों और उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग पेड़ों की प्राकृतिक वृद्धि को प्रभावित कर रहा है. इससे जहां एक ओर फल जल्दी लगते हैं, वहीं पेड़ों की समग्र सेहत बिगड़ती है. इसका सबसे बड़ा असर परागण पर पड़ा है. मधुमक्खियों और परागण करने वाले दूसरे जीवों की संख्या में कमी आई है, जिससे क्रॉस-पॉलिनेशन प्रभावित हुआ है. कुछ किसान इस संकट के पीछे प्रदूषण को भी जिम्मेदार मानते हैं. स्थानीय रासायनिक उद्योगों और कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाला धुआं आम की फसलों को नुक्सान पहुंचा रहा है.

किसानों पर दोहरी मार 
इस संकट का सबसे बड़ा असर किसानों की आय पर पड़ा है. खासकर ठेके पर आम उगाने वाले किसान दोहरी मार झेल रहे हैं. पैदावार घटने के बावजूद उन्हें जमीन का किराया देना पड़ता है, जबकि सरकारी मुआवजा जमीन मालिक को मिलता है. महाराष्ट्र में राज्य सरकार से मिलने वाला 22,000 रुपए प्रति हेक्टेयर मुआवजा किसानों को नाकाफी लगता है. एक हेक्टेयर में करीब 100 पेड़ होते हैं, यानी प्रति पेड़ सिर्फ 220 रुपए, जबकि एक एकड़ बाग की देखभाल में करीब तीन लाख रुपए तक का खर्च आता है. सो, किसान पांच लाख रुपए हेक्टेयर मुआवजे की मांग कर रहे हैं.

इस संकट का असर फसल तक ही सीमित नहीं, बल्कि पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है. रत्नागिरी में 100 से ज्यादा कैनिंग यूनिट्स हैं, जिन पर करीब 25,000 लोगों की रोजी-रोटी निर्भर है. आम की कमी के चलते काम घटने से इन यूनिट्स में कर्मचारियों की संख्या कम की जा रही है. ट्रांसपोर्ट, पैकेजिंग और मजदूरी से जुड़े लोग भी प्रभावित हो रहे हैं.

बॉक्स के अलावा झोले बनाने वालों और दूसरे छोटे व्यवसायों पर भी इसका सीधा असर पड़ा है, जिससे यह संकट एक 'डोमिनो इफेक्ट' की तरह फैलता जा रहा है. सरकार स्थिति से निबटने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सहारा लेने की बात कर रही है. उसके जरिए मौसम के पूर्वानुमान और फसल प्रबंधन की जानकारी किसानों तक पहुंचाने की योजना बनाई जा रही है. लेकिन जमीन पर आम किसानों की फिक्र कम होने का नाम नहीं ले रही.

—साथ में धवल एस. कुलकर्णी, पुष्यमित्र, आनंद दत्त, एम.सी. पांडेय और मनीष दीक्षित

 

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