कैमरे का कर्मयोगी
रघु राय ऐसी दृश्य-स्मृति छोड़ गए हैं, जिसमें भारत का अतीत समाया है—इसका दुख, गरिमा, इसकी पवित्रता और कभी न भरने वाले जख्म. उनकी तस्वीरें प्रभावशाली और लयात्मक होती थीं. उन्होंने आम आदमी को देश की कहानी बनाया

रघु राय (83 वर्ष) के देहावसान के साथ 26 अप्रैल को भारत ने न केवल एक असाधारण फोटोग्राफर बल्कि ऐसे उपासक को भी गंवा दिया जो दुनिया को कैमरे के सहारे दिल से देखता था. उनके लेंस ने महज प्रकाश परावर्तन के सिद्धांत पर काम नहीं किया बल्कि संस्कृति के प्राचीन आलोक को इस कदर आत्मसात कर लिया कि उसमें कैद हर विषय भारतीयता में सराबोर हो गया और नितांत निजी के साथ सबका हो गया.
ठीक वैसे ही, जैसे कोई मंदिर अपनी वास्तुकला के कारण नहीं बल्कि आपके भीतर जागे भावों के कारण पवित्र बन जाता है; रघु राय का भारत एक ऐसा भारत है, जहां तमाम अंतर्विरोधों, अराजकता और उमड़ती-घुमड़ती भीड़ के बीच भी सहज गरिमा की आभा छिपी होती है—जीवन जीने की एक ऐसी स्वाभाविक सरलता, जो खुद में एक मौन उत्सव है, और इसका चंदन-लेप है.
राय के चले जाने से भारत ने अपना सबसे निष्ठावान विजुअल इतिहासकार खो दिया है—एक ऐसा इतिहासकार, जिसने देश के छह दशकों के दृश्य-इतिहास को अपनी कला से सुशोभित किया है.राय के बारे में सिर्फ तारीफ के शब्द कहना उनके कद को छोटा करना होगा. वे पहले ऐसे भारतीय थे जिन्होंने मैग्नम फोटोज में अपनी जगह बनाई, और वह भी खुद हेनरी कार्तिए-ब्रैसां के नॉमिनेशन पर.
हां, उन्हें पद्मश्री, फ्रांसीसी गणराज्य से ऑफिसियर डेस आर्ट्स एट डेस लेटर्स और टाइम, लाइफ, नेशनल ज्योग्राफिक जैसी पत्रिकाओं से कई सम्मान मिले. लेकिन ये उनकी जिंदगी के कुछ तमगे भर हैं, उनकी जिंदगी नहीं. उनकी जिंदगी तो कहीं ज्यादा सादगी भरी और क्रांतिकारी थी—हर दिन कुछ नया खोजने का सिलसिला, एक ऐसी लगन जो उन्हें मैदान में ले जाती और वहां की हलचल और सुस्ती के बीच वे कुछ ऐसी तस्वीर ढूंढ़ निकालते जो किसी गुजरते पल को हमेशा के लिए यादगार बना देती.
जिन लोगों ने इंडिया टुडे में उनके साथ काम किया है—जहां उन्होंने 1980 के दशक में मशहूर फोटो एडिटर के तौर पर काम किया था—उन्हें वह जबरदस्त जुनून जरूर याद होगा जिसके साथ वे अपनी तस्वीरों को सही जगह दिलाने के लिए लड़ते थे. वे शब्दों के दबदबे के हमेशा खिलाफ रहे, वे कहते थे कि शब्द ''ईंट की एक दीवार'' हैं जिसे ''खिड़कियों'' की जरूरत होती है—यानी तस्वीरों की ऐसी खिड़की जो उस दीवार को सांस लेने की जगह दें. उनके मुताबिक, ''इन खिड़कियों के बिना पाठक बंद कमरे में फंसा रह जाता है, जहां वह बस बासी हवा में सांस लेता रहता है.''
वे तस्वीरों को डबल स्प्रेड यानी आमने-सामने के दो पन्नों में जगह देने और बिना काटे-छांटे छापने के लिए बहस करते थे, ऐसी तस्वीरें जिन्हें खुलकर सांस लेने और अपना पूरा मतलब जाहिर करने के लिए भरपूर जगह मिले. वे अक्सर संपादकों की उम्मीद से कहीं ज्यादा बार जीतते थे; क्योंकि एक बार जब आप यह देख लेते कि उनकी तस्वीरें खाली जगह का इस्तेमाल कर क्या कमाल कर सकती हैं, तो फिर कोई दलील बचती नहीं थी.
अंधेरे के साथ उनकी तस्वीरें जो कमाल कर सकती थीं, उनके बारे में कहने के लिए शब्द नहीं बचते. राय की ब्लैक ऐंड व्हाइट तस्वीरें एक ऐसी टोनल रेंज में होती थीं, जिसकी बराबरी उनके समकालीन और या उनके बाद की पीढ़ी वाले बहुत कम भारतीय फोटोग्राफर कर पाए हैं. उनके प्रिंट गहरे, आर्किटेक्चरल काले रंगों के साथ सबसे अलग होते थे—ऐसी परछाइयां जो जानकारी की कमी छिपाने के लिए नहीं बल्कि उसकी गहराई उकेरने के लिए होती थीं. ऐसा विजुअल दबाव जो तस्वीर के रौशन पहलू को जरूरत से ज्यादा वजनी बना देता था.
यह सिर्फ एक पारखी नजर का नतीजा नहीं था. यह डार्करूम केमिस्ट्री थी, जिसे किसी कीमियागर जैसी दीवानगी के साथ अपनाया गया था. राय नेगेटिव से बारीक से बारीक डिटेल निकालने के लिए अपने सिल्वर प्रिंट्स को आखिरी दम तक इस्तेमाल करते थे. रघु राय के किसी प्रिंट में काले रंगों का अध्ययन करने पर एक ऐसे इंसान का पता चलता है जो रोशनी को ठीक वैसे ही समझता था, जैसे कोई संगीतकार खामोशी की गहराई को.
बादल से भरे आसमान के नीचे जामा मस्जिद की पृष्ठभूमि में प्रार्थना करती एक महिला. कोलकाता के एक घाट पर दुर्गा की भव्य मूर्ति के बिल्कुल विपरीत खड़ी एक अकेली विधवा. दिल्ली के दरियागंज में एक दीवार के पास से गुजरते दो लोग—उम्र और आर्थिक स्थिति के मामले में एक-दूसरे से पूरी तरह अलग. ये सिर्फ तस्वीरें नहीं हैं, बल्कि रागों जैसी रचनाएं हैं जिन्हें रोशनी में उतारा और संजोया गया है.
और वे सही मायनों में संगीत को समर्पित एक हस्ती थे. उन्हें किसी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत कार्यक्रम की तस्वीरें लेते देखना, एक ही समय में दो अलग-अलग प्रस्तुतियां देखने जैसा था. जहां मंच पर बैठे उस्ताद राग में पूरी तरह डूब जाते थे, वहीं राय भी उस राग के विस्तार में कहीं गुम हो गए नजर आते थे, उनका शरीर आनंद से झूम उठता था और उनके मुंह से अनायास ही 'वाह!' निकल पड़ता. यह उद्गार उन शास्त्रीय गायकों के राय के खींचे जोशीले और भावपूर्ण चित्रों में सबसे प्रमुख स्वर बनकर उभरता है.
बिस्मिल्लाह खान, भीमसेन जोशी और मल्लिकार्जुन मंसूर के उनके चित्रों में, अक्सर इन कलाकारों के सिर ऊपर की ओर उठे दिखाई देते हैं, जो उनकी पूरी तरह से समर्पित भक्ति-भावना को व्यक्त करते हैं. सबसे कमाल की बात तो यह है कि तस्वीरों में दिखने वाला आसपास का माहौल—यानी रोजमर्रा की आम चीजें—भी पूरी तरह संगीत की धुन में ही रची-बसी होती हैं. ये तस्वीरें राय की उपस्थिति को दर्शाती हैं, वे न सिर्फ भक्ति को कैमरे में कैद कर रहे होते थे, बल्कि उसे अपने भीतर शिद्दत से महसूस भी करते थे.
जो बात राय को सबसे अलग मुकाम पर खड़ा करती है, वह है उनकी तस्वीरों की रचना-शैली. वे एक ही समय पर चित्रात्मक और काव्यात्मक दोनों हैं. औद्योगिक माहौल की कठोरता और तनाव के बीच कामगारों की तस्वीरों में, उनके शरीर एक शांत और सहज सुंदरता के साथ दिखते हैं. उनके राजनैतिक चित्रों में भी—जिनमें इंदिरा गांधी का चित्र सबसे यादगार है—दृश्य का मुख्य आकर्षण उनकी कोमल शारीरिक भाषा होती थी—साड़ी का पल्लू, जो सत्ता और शक्ति का प्रतीक होता था, और हाथों की मुद्रा, जो उनकी मानवीय संवेदना को दर्शाती थी.
जमीन में दबे एक बच्चे की कांच-सी चमकती आंखों में भोपाल गैस त्रासदी का गहरा मानवीय दर्द साफ झलकता है; इस दर्द को बच्चे के माथे को सहलाते एक हाथ के स्पर्श ने और भी मार्मिक बना दिया. बारीकियों पर उनका जान-बूझकर दिया गया जोर ही राय की तस्वीरों का सबसे विशिष्ट और अनिवार्य तत्व बनाता है. जैसे, बच्चे की तस्वीर में छिपी मानवीय भंगिमा युगांतरकारी घटना समेटे है.
उनकी तस्वीरों में एक दार्शनिक विचार की छाया लगातार रहती है और वह है उनकी गहरी मानवीय संवेदना. उन्होंने सहज ही जान लिया था कि किसी घटना का असली प्रभाव उसकी विशालता या भव्यता में नहीं छिपा होता. साधारणता और विनम्रता उसे महत्वपूर्ण बनाते हैं—जैसे किसी शरणार्थी महिला की आंखों में अटके आंसू; घाट पर बैठे किसी बुजुर्ग के हाथ; या किसी झुग्गी-बस्ती के किनारे रोशनी की एक किरण अपनी आंखों में समेट कोई बच्चा. राय ने आम लोगों और अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाने वाले लोगों को राष्ट्र की सामूहिक स्मृति के केंद्र में स्थापित किया. उनकी तस्वीरों में साधारणता कभी केवल पृष्ठभूमि बनकर नहीं रही; बल्कि उस कहानी का मुख्य पात्र ही रही.
उनका सिद्धांत: कभी कुछ न छोड़ो
उनकी दार्शनिक सोच का सबसे अप्रत्याशित रूप स्ट्रीट फोटोग्राफी में पैनोरमिक कैमरे के इस्तेमाल में नजर आया. ज्यादातर फोटोग्राफर नजारों और भव्य दृश्यों को कैद करने के लिए पैनोरमिक कैमरे का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन राय ने एकदम उलट रुख अपनाया. उनके सधे हाथों में लंबा फ्रेम सड़क के किसी कोने और वहां नजर आ रहे हर व्यक्ति और वस्तु को किसी भेदभाव के बिना एक साथ समेटने का जरिया बन गया. पैनोरमिक कैमरे ने उन्हें वह समानता दी जिसकी उन्हें हमेशा से तलाश थी—कोई विषय दरकिनार नहीं किया, हर किसी पर एक समान और पूरे इत्मीनान के साथ नजर डाली गई. यह एक तकनीकी विरोधाभास था, जो तभी समझ आता है जब आप उनकी सबसे गहरी सहज प्रवृत्ति को समझते हैं—और वह प्रवृत्ति थी—कभी किसी को फ्रेम से बाहर न करना.
दिल्ली के सांस्कृतिक जीवन में उनकी मौजूदगी बहुत बड़ी थी—उनका डील-डौल भी बड़ा था और उनकी हंसी भी; वे अपने मानकों को लेकर बहुत सख्त थे लेकिन जो युवा उनसे कुछ सीखने आते, उनके प्रति बहुत उदार थे. भारतीय फोटोग्राफरों की तीन पीढ़ियां उनकी नजर, उनके देखने के अंदाज को अपने भीतर समेटे हैं—चाहे उन्हें इसका एहसास हो या न हो. वे जिस तरह रोशनी को साधते थे, जिस तरह आसान तस्वीरों से बचते थे. जिस तरह सही पल का इंतजार करते थे.
रघु राय अपने पीछे सिर्फ अपना काम नहीं छोड़ गए. बल्कि भारत की एक दृश्य-स्मृति छोड़ गए हैं, जिसमें पूरा इतिहास समाया है—इसका दुख, इसकी गरिमा, इसकी पवित्रता, इसके गहरे जख्म, इसके महाराजा और इसके प्रवासी, इसकी खामोशी और इसका शोर. यह सब कुछ तस्वीरों के जरिए हमेशा के लिए सुरक्षित हो गया है. वह माला उस हाथ से छूट गई है जिसने उसे पिरोया. लेकिन मोती सही-सलामत हैं—हर एक मोती—चमकदार, जीवंत. उन्होंने अपनी आंखें बंद कर ली हैं लेकिन उनकी तस्वीरें दिख रही हैं, बोल रही हैं.
इंडिया टुडे के फोटो एडिटर के तौर पर राय शब्दों के दबदबे के हमेशा खिलाफ रहे. वे कहते थे, शब्द 'ईंटों की दीवार' हैं जिसे 'खिड़कियों' की जरूरत होती है, ऐसी खिड़की जो उस दीवार को सांस लेने की जगह दे. राय की मौजूदगी पुरअसर थी. भारतीय फोटोग्राफरों की तीन पीढ़ियां उनकी नजर, उनके देखने के अंदाज को अपने भीतर समेटे हैं, चाहे उन्हें इसका एहसास हो या न हो.