आप पर टूटा आसमान
आप के राज्यसभा सदस्यों और दिग्गज नेताओं के पाला बदलने से अगले साल पंजाब में होने वाली चुनावी जंग के समीकरण बदले

हलचल तो बंगाल और दूसरी जगहों पर थी, लेकिन उससे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को राजधानी में आम आदमी पार्टी (आप) पर सर्जिकल स्ट्राइक करने में कोई हिचक नहीं हुई. 24 अप्रैल को आप के 10 राज्यसभा सांसदों में से सात भगवा खेमे में चले गए,
इनमें छह पंजाब और एक दिल्ली से हैं. उनमें आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल के करीबी राघव चड्ढा तथा संदीप पाठक, कारोबारी अशोक मित्तल, विक्रमजीत सिंह साहनी और राजिंदर गुप्ता, क्रिकेटर हरभजन सिंह और सामाजिक कार्यकर्ता-नेता स्वाति मालीवाल (दिल्ली से) शामिल हैं.
बेशक, ये आंकड़े ऊपरी सदन में ही फर्क डालते हैं लेकिन उनसे निकलने वाले संकेत बड़े असर की ओर इशारा करते हैं. पार्टी के 10 सांसदों में से सात के पाला बदल लेने से चड्ढा गुट की संख्या दलबदल कानून की दो-तिहाई की शर्त के पार हो गई है. इस तरह, अब पंजाब की सात राज्यसभा सीटों में से छह पर भाजपा का कब्जा हो गया है, जहां 2022 के विधानसभा चुनाव में उसे कुल 117 सीटों में से सिर्फ दो सीटें मिली थीं.
राज्यसभा में उसकी संख्या 113 तक पहुंच गई है जो अकेले दम पर साधारण बहुमत से महज 10 कम है. 245 सदस्यीय इस सदन में एनडीए की संख्या बढ़कर 149 हो गई है. आप अब घटकर केवल छह सांसदों तक सिमट गई है, जिनमें तीन लोकसभा में हैं.
आगे क्या होने वाला है, इसका अंदाजा पांच अप्रैल को ही मिल गया था, जब चड्ढा को राज्यसभा में पार्टी के उप-नेता पद से हटाकर उनकी जगह अशोक मित्तल को बना दिया गया था. पिछले कुछ महीनों से ही अफवाहें तैर रही थीं कि चड्ढा पार्टी छोड़ सकते हैं. हैरानी तो उनके पाला बदलने के तरीके से हुई. राज्यसभा में आप नेता संजय सिंह ने सोशल मीडिया पर लिखा कि भाजपा में जाना ''पंजाब के लोगों और संविधान के साथ विश्वासघात'' है.
भाजपा के लिए शायद सबसे बड़ी उपलब्धि आप के राष्ट्रीय महासचिव संदीप पाठक हैं, जो पार्टी का संगठन संभालते थे. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आइआइटी) दिल्ली से जुड़े होने के नाते पाठक ने आप की सियासी लामबंदी को व्यवस्थित रूप दिया था, बूथ-स्तर पर संगठन बनाया, कार्यकर्ताओं के नेटवर्क का विस्तार किया और डेटा-आधारित फीडबैक की व्यवस्था बनाई थी. पंजाब में उनकी भूमिका बेहद अहम थी, जहां पार्टी 2017 में मिली 20 सीटों से 2022 के विधानसभा चुनाव में कुल 117 में 92 सीटों की बुलंदी पर पहुंच गई. उन्होंने गोवा और गुजरात में आप की जमीन तैयार करने में भी अहम भूमिका निभाई थी.
बाकियों में, 15 अप्रैल को फेमा से जुड़े कथित मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मित्तल के पंजाब के ठिकानों पर छापा मारा था. आरएसएस से मित्तल के परिवार का पुराना नाता है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत का पक्ष मजबूत करने के लिए अमेरिका भेजे गए डेलीगेशन में मित्तल भी शामिल थे. और मालीवाल तो 2024 में केजरीवाल के साथ हुए विवाद के बाद से ही पार्टी से बाहर थीं.
आप के लिए वरिष्ठ नेताओं का इस तरह एक साथ पार्टी छोड़ना उसकी सियासी पहचान के लिए गहरा झटका हो सकता है. पार्टी की कामयाबी की इमारत उसकी आपसी एकजुटता और मजबूत तथा सुगठित नेतृत्व की नींव पर खड़ी है. वह अपने अनुशासन और अपने संदेशों पर पूर्ण नियंत्रण की क्षमता पर गर्व करती रही है. उसी मॉडल ने उसे दिल्ली में लगातार जीत दिलाई और पंजाब में विस्तार की जमीन तैयार की. लेकिन 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद अब बड़े दलबदल से उसके कमजोर होने की ऐसी धारणा बन सकती है, जिस पर जल्द से जल्द काबू पाना जरूरी होगा.
सतह के नीचे खलबली
लगता है, भाजपा ने सही वक्त पर झटका दिया. अब इकलौते पंजाब में ही आप सत्ता में है, जहां फरवरी 2027 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. वहां सियासी समीकरण बेहद पेचीदा हो चले हैं. भगवंत मान की अगुआई वाली सरकार के पास भारी बहुमत है, फिर भी चड्ढा और पाठक जैसे नेताओं के विधायी दल पर असर को कम करके नहीं आंका जा सकता. 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान टिकट बांटने में ये दोनों नेता अहम थे, और उन्होंने कई विधायकों के साथ अपने संबंध बना रखे हैं.
आप के संजय सिंह और मान जैसे नेताओं ने चड्ढा के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है कि 65 विधायक उनके संपर्क में हैं. मान ने कहा, ''पार्टी ने उन्हें सम्मान, पद और ताकत दी लेकिन उन्होंने पाला बदल लिया. वे पंजाब के गद्दार हैं. वे भूल रहे हैं कि पंजाब के लोग गद्दारों को माफ नहीं करते.'' मान ने भरपूर भरोसा जताया कि उनका कोई भी विधायक पार्टी छोड़कर नहीं जाएगा.
हालांकि, भाजपा के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि चड्ढा और पाठक दोनों के जरिए लगभग 60 विधायक उनके संपर्क में हैं. लेकिन भाजपा नेतृत्व ऐसे वक्त तोड़फोड़ नहीं करना चाहता, जिससे चुनाव के साल भर पहले मान सरकार गिर जाए और आप को सहानुभूति का लाभ मिल जाए.
पार्टी के कुछ नेताओं के दलबदल से पहले ही गुटबाजी से जूझ रही पंजाब इकाई में विधायकों की सौदेबाजी की स्थिति मजबूत हो गई है. असल में भाजपा उम्मीद कर रही है कि विधायकों के मोलतोल और सत्ता-विरोधी लहर मिलकर आप की पंजाब इकाई के भीतर इतनी हलचल पैदा कर देंगे कि चुनाव आते-आते सब कुछ अपने आप ही बिखर जाएगा.
नुक्सान की भरपाई
आप की ताजा मुश्किलों के बारे में पूछने पर संजय सिंह बताते हैं कि भाजपा ने ''दलबदल की राजनीति'' में महारत हासिल कर ली है. वह ईडी और सीबीआइ के दुरुपयोग के जरिए उन सांसदों को अपनी तरफ खींच रही है, जिन्हें ''आप के टिकट से फायदा मिला और फिर उन्होंने हमें धोखा दिया.'' संजय सिंह कहते हैं, ''पूरे देश में हमारे लोगों को पार्टी छोड़ने के लिए भाजपा परेशान कर रही है.''
वे जम्मू-कश्मीर में पार्टी विधायक मेहराज मलिक और गुजरात में चैतर वसावा की मिसाल देते हैं. दोनों को ही ''मनगढ़ंत आरोपों'' में जेल जाना पड़ा है. वहीं, राज्यसभा सांसदों के पाला बदलने पर संजय सिंह कहते हैं कि आप उनको अयोग्य ठहराने की मांग के साथ सुप्रीम कोर्ट जाएगी.
उधर, आप सुप्रीमो केजरीवाल ने शायद एक दिन भी पार्टी के भीतर डैमेज कंट्रोल में नहीं लगाया. आप के एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते हैं, ''भाजपा चाहती है कि यह घटना (सात सांसदों का पार्टी छोड़ना) चर्चा का मुख्य विषय बन जाए और नैरेटिव बदल जाए, मगर हम ऐसा होने नहीं देंगे. हमारी बड़ी लड़ाई पर कोई असर नहीं पड़ेगा.'' दिल्ली हाइ कोर्ट में चल रहा कथित शराब घोटाला मामला केजरीवाल और आप के लिए सबसे अहम मुद्दा बना हुआ है.
आप प्रमुख ने ऐलान किया है कि वे जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में आगे की सभी सुनवाई से खुद को अलग रखेंगे. जस्टिस शर्मा निचली अदालत के फैसले के खिलाफ सीबीआइ की अपील की सुनवाई कर रही हैं. निचली अदालत ने केजरीवाल, उनके करीबी सहयोगी मनीष सिसोदिया और अन्य को बरी कर दिया था.
जस्टिस शर्मा ने इस मामले की सुनवाई से हट जाने की केजरीवाल की याचिका खारिज कर दी, तो उन्होंने सीधे जज को पत्र लिखा. अपनी शिकायत में उन्होंने जस्टिस शर्मा के ''आरएसएस के विधि प्रकोष्ठ के साथ सार्वजनिक जुड़ाव'' और इस तथ्य का जिक्र किया कि उनके बच्चे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अधीन केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में शामिल हैं. मेहता ही शराब मामले में सीबीआइ के वकील हैं.
सिसोदिया ने भी इन्हीं वजहों का हवाला देकर अदालती सुनवाई से अलग रहने का ऐलान किया है. उन्होंने कहा कि उन्हें जस्टिस शर्मा की अदालत से ''न्याय की कोई उम्मीद नहीं है.'' इस न्यायिक बहिष्कार से आप कार्यकर्ताओं को एकजुट होने का नया मुद्दा मिल गया है—उत्पीड़न का नैरेटिव, जो दलबदल विरोधी किसी भी याचिका से कहीं ज्यादा प्रभावी है. आप का शीर्ष नेतृत्व कह रहा है कि ''सत्याग्रह के अलावा अब कोई और रास्ता नहीं बचा है.'' केजरीवाल आप कार्यकर्ताओं के साथ राजघाट भी पहुंचे और गांधीजी की समाधि पर फूल चढ़ाए.
आज आप भाजपा की रणनीति से जख्मी है. भ्रष्टाचार के आरोप, सहयोगियों का पाला बदलना, और दिल्ली में हार—इन सबने केजरीवाल को शराब मामले में बरी होने के बाद मिली थोड़ी राहत को खत्म कर दिया. फिर भी, स्थिति एकदम हाथ से नहीं निकली है. आप की फौरी चुनौती यही है कि नैरेटिव पर अपना दबदबा कायम करे. पार्टी नेतृत्व को कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना और संगठन में अनुशासन मजबूत करना होगा.
उन्हें पार्टी के अंदरूनी कलह के बजाए सरकार के कामकाज पर ध्यान केंद्रित करना होगा. आने वाले कुछ महीने केजरीवाल टीम की असली परीक्षा लेंगे. आप को 2027 के चुनाव से पहले नुक्सान की भरपाई और अपनी गति फिर हासिल करनी होगी; वरना उसे हाशिए पर धकेल दिए जाने का खतरा बना रहेगा.
भगवंत मान की अगुआई में पंजाब सरकार के पास विधानसभा में भारी बहुमत है, लेकिन दलबदलू चड्ढा और पाठक जैसे नेताओं के विधायकों पर असर को कम नहीं आंका जा सकता, न अनदेखा किया जा सकता है.

