जीने के लिए न्यूनतम की जंग
हरियाणा-दिल्ली से कम मजदूरी, बढ़ती महंगाई और ठेकेदारी शोषण ने नोएडा में श्रमिक असंतोष भड़काया. न्यूनतम मजदूरी 21 फीसदी बढ़ाने के उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले पर उद्योगों ने लागत बढ़ने की चेतावनी दी

यही कोई साढ़े सात बजे हैं सुबह के. नोएडा के सेक्टर 63 की एक संकरी गली में किराए के कमरे से निकलते हुए 28 साल के अनवर मोबाइल में बैंक बैलेंस चेक करते हैं: 1,842 रुपए. महीने की 20 तारीख भी नहीं आई और जेब लगभग खाली. टी-शर्ट बनाने वाली यूनिट में काम करते अनवर की तनख्वाह 12,500 रुपए है.
किराया 2,000 रुपए, बिजली-पानी 1,200 रुपए, घर (बिहार) भेजने के लिए कम से कम 5,000 रुपए—और बाकी बचता है बस गुजारे लायक. वे कहते हैं, ''हम दिन भर मशीन पर झुके रहते हैं लेकिन महीने के अंत में लगता है जैसे कुछ बचा ही नहीं.'' अनवर जैसे हजारों श्रमिकों की यही बेचैनी, दबाव और असंतोष पिछले हफ्ते नोएडा की सड़कों पर फूट पड़ा.
13 अप्रैल को नोएडा में मजदूरों का वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर शुरू हुआ विरोध अचानक हिंसक हो गया. चार दिनों से चल रहा प्रदर्शन उस सुबह अपने चरम पर पहुंचा, जब हजारों मजदूर सड़कों पर उतर आए. दफ्तर और स्कूल जाने के घंटों में मुख्य सड़कें जाम हो गईं, औद्योगिक सेक्टर ठप पड़ गए और इसका असर दिल्ली तक महसूस किया गया. पुलिस को हालात काबू में करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े और लाठीचार्ज करना पड़ा.
शाम तक स्थिति कुछ हद तक सामान्य हुई लेकिन साफ हो चुका था कि यह महज प्रदर्शन नहीं, गहरे आर्थिक असंतोष का विस्फोट है. गौतमबुद्ध नगर की पुलिस कमिशनर लक्ष्मी सिंह के मुताबिक, करीब 42,000 मजदूर 83 जगह सड़कों पर उतरे थे. उन्होंने दावा किया कि हिंसा सिर्फ दो जगहों तक सीमित रही, बाकी जगह बातचीत से स्थिति संभाली गई. पर जमीनी तस्वीर इससे ज्यादा जटिल थी. नोएडा के सेक्टर 60, 62 और 84 जैसे औद्योगिक इलाकों में मजदूरों के बड़े समूहों ने सड़़कें जाम कर दीं, पुलिस से टकराव हुआ, और कई जगहों पर आगजनी/तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं.
पुलिस ने इस पूरे मामले में साजिश के पहलू की भी जांच शुरू कर दी है. नोएडा पुलिस ने श्रमिकों को हिंसा के लिए भड़काने के आरोपी और तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार आदित्य उर्फ रस्टी को 19 अप्रैल को कोर्ट के समक्ष पेश किया. आदित्य सवा लाख रुपए महीने की तनख्वाह पर एक नामी कंपनी में नौकरी करता था.
जांच एजेंसियों का आरोप है कि वह मजदूर बिगुल दस्ता से जुड़कर कामगार आंदोलनों की आड़ में हिंसा भड़काने का काम कर रहा था. कुछ गिरफ्तारियों और बरामद दस्तावेजों के आधार पर दावा किया गया है कि मई 2026 तक एनसीआर को ठप करने की योजना बनाई जा रही थी. हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है, लेकिन इससे संकेत जरूर मिलता है कि आंदोलन के भीतर कई परतें हैं—आर्थिक, सामाजिक और शायद राजनैतिक भी.
वर्षों से जमा असंतोष
इस उबाल की जड़ में है वर्षों से जमा होता आ रहा असंतोष. नोएडा देश के सबसे बड़े औद्योगिक हब में शामिल है, जहां रोजगार और निवेश दोनों बड़े पैमाने पर केंद्रित हैं. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, यहां 11,000 से ज्यादा औद्योगिक इकाइयां संचालित हैं और पूरे उत्तर प्रदेश में मौजूद फैक्ट्रियों में 12.8 लाख से ज्यादा श्रमिक कार्यरत हैं. इनमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी नोएडा-ग्रेटर नोएडा बेल्ट की मानी जाती है. मोटा अनुमान है कि केवल नोएडा औद्योगिक क्षेत्र में ही 3 से 5 लाख प्रत्यक्ष और परोक्ष मजदूर काम कर रहे हैं.
नोएडा के औद्योगिक ढांचे में बड़ी संख्या में मजदूर ठेकेदारी व्यवस्था के तहत काम करते हैं, जहां वेतन कम, काम के घंटे लंबे और सुरक्षा लगभग न के बराबर है. कई मजदूर 10,000-15,000 रुपए के बीच वेतन पर काम कर रहे थे, जो बढ़ती महंगाई और शहरी जीवन की लागत के हिसाब से बेहद कम है.
दिलचस्प है कि इस असंतोष को भड़काने में पड़ोसी राज्य हरियाणा की वेतन वृद्धि ने भी अहम भूमिका निभाई. 9 अप्रैल को हरियाणा सरकार ने न्यूनतम मजदूरी में बड़ा संशोधन किया, जिसके बाद अकुशल मजदूरों की मासिक मजदूरी 15,220 रुपए से ऊपर और कुशल मजदूरों की करीब 19,000 रुपए तक पहुंच गई. दिल्ली में यह आंकड़ा अकुशल मजदूर के लिए 18,456 रुपए और कुशल मजदूर के लिए 22,411 रुपए का है. इसके मुकाबले नोएडा में काम कर रहे मजदूर खुद को पिछड़ा हुआ महसूस कर रहे थे. ''जब पास के राज्यों में ज्यादा वेतन मिल रहा है, तो हम क्यों पीछे रहें?'' यह सवाल लगभग हर प्रदर्शनकारी की जबान पर था.
ठहरा न्यूनतम मजदूरी ढांचा
गौतमबुद्ध नगर ने 2024-25 में उत्तर प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 11.05 फीसद का योगदान दिया, जिससे यह जिले के तौर पर राज्य का सबसे बड़ा आर्थिक योगदानकर्ता बन गया. फिर भी वेतन वृद्धि उस आय से काफी पीछे रह गई है जिसे पैदा करने में यह मदद करता है. वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण के अनुसार, उत्तर प्रदेश में एक मजदूर का औसत वार्षिक वेतन 2021-22 में 1.46 लाख रुपए से बढ़कर 2024-25 में 1.76 लाख रुपए हो गया. इसी अवधि के दौरान, सुपरवाइजर और प्रबंधकीय कर्मचारियों का वेतन 11.85 लाख रु. से बढ़कर 15.05 लाख रु. जा पहुंचा. नोएडा की एक फैक्ट्री में कार्यरत रत्नाकर शर्मा कहते हैं, ''फासला बढ़ता जा रहा है. कम वेतन वाले मजदूरों के लिए मामूली बढ़त, प्रबंधकीय भूमिका वालों के लिए बड़ी वृद्धि. उत्पादकता में वृद्धि पूरे कार्यबल में समान नहीं बंटती.''
उत्तर प्रदेश में न्यूनतम मजदूरी का ढांचा लंबे समय से स्थिर रहा है. यह तथ्य स्थिति को और गंभीर बनाता है. भारत में न्यूनतम मजदूरी अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले ज्यादातर मजदूरों के लिए राज्य ही तय करते हैं. इसमें पांच साल में कम से कम एक बार बदलाव किया जाता है. बीच-बीच में 'परिवर्तनशील महंगाई भत्ता' (वीडीए) के जरिए भी इसमें कुछ समायोजन किए जाते हैं. उत्तर प्रदेश में, अक्तूबर 2016 से अप्रैल 2026 तक एक अकुशल मजदूर की मूल न्यूनतम मजदूरी 5,750 रुपए पर स्थिर रही.
हालांकि, वीडीए को शामिल करने पर न्यूनतम मजदूरी में 52.76 फीसद की बढ़ोतरी हुई—जो अक्तूबर 2016 के 7,214 रुपए से बढ़कर अक्तूबर 2025 में 11,021 रुपए हो गई. यह बढ़ोतरी, अक्तूबर 2016 से फरवरी 2026 के बीच देश में ''औद्योगिक मजदूरों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक' में हुई 54 फीसद की बढ़ोतरी के लगभग बराबर रही. इस पृष्ठभूमि में मजदूरों ने वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया, तो यह धीरे-धीरे व्यापक होता गया. 10 अप्रैल को शुरू हुआ यह प्रदर्शन खासकर फेज-2 के होजरी और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के आसपास केंद्रित था. लेकिन चार दिनों में यह पूरे औद्योगिक क्षेत्र में फैल गया.
मजदूरी बढ़ोतरी पर सवाल
प्रदेश सरकार तुरंत हरकत में आई. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर औद्योगिक विकास आयुक्त दीपक कुमार की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति बनाई गई. उसी की सिफारिशों पर 14 अप्रैल को न्यूनतम मजदूरी में करीब 21 फीसद वृद्धि का ऐलान हुआ. अब गौतमबुद्ध नगर और गाजियाबाद में अकुशल मजदूरों को मासिक मजदूरी 13,690 रुपए, अर्ध-कुशल को 15,059 रुपए और कुशल मजदूरों को 16,868 रुपए महीना मिलेगी.
लेकिन मजदूर संगठनों और ट्रेड यूनियनों का कहना है कि यह बढ़ोतरी 'बहुत कम और बहुत देर से' की गई है. उनका तर्क है कि दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों में मजदूरी 18,000-22,000 रुपए के बीच देखते हुए नोएडा जैसे महंगे शहर में इसका 13,000-16,000 रुपए पर्याप्त नहीं. सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) और हिंद मजदूर सभा जैसे संगठनों ने न्यूनतम 26,000 रुपए मासिक वेतन की मांग रखी है. यूपी में हिंद मजदूर सभा के महासचिव उमाशंकर मिश्र ने कहते हैं, ''हाल के विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में वेतन बढ़ोतरी की घोषणा महज एक दिखावा है क्योंकि न्यूनतम मजदूरी में बदलाव एक दशक से ज्यादा समय से किया ही नहीं गया है.''
श्रम विभाग की शुरुआती जांच में भी गंभीर खामियां सामने आई हैं. नोएडा में 700 ठेकेदारों की जांच में पाया गया कि मजदूरों को तय मानकों से कम पैसा मिल रहा था, ओवरटाइम दिया ही नहीं जा रहा था, पीएफ, ईएसआइसी जैसी सुविधाओं में भी गड़बड़ी थी. ऐसे में 12 ठेकेदारों के लाइसेंस रद्द किए गए और 245 को नोटिस जारी किया गया है.
संतुलित वेतन की कवायद
प्रदेश सरकार मजदूरों की स्थिति सुधारने के लिए नीतिगत और संरचनात्मक दोनों स्तरों पर कदम उठा रही है. सबसे अहम पहल नई 'उत्तर प्रदेश मजदूरी संहिता नियमावली 2026' को लागू करने की तैयारी है, जिसे 'कोड ऑन वेजेस-2019' के अनुरूप बनाया जा रहा है. इसके लागू होते ही एक वेज बोर्ड गठित किया जाएगा, जो भौगोलिक परिस्थितियों और जीवन-यापन की लागत के आधार पर न्यूनतम मजदूरी तय करेगा.
प्रमुख श्रम सचिव डॉ. एम.के. षण्मुगसुंदरम के अनुसार, प्रदेश सरकार ने अंतरिम राहत के तौर पर 1 अप्रैल से मजदूरी में बढ़ोतरी भी लागू कर दी है और पहली बार प्रदेश को तीन श्रेणियों में बांटकर वेतन तय किया गया है. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के नए आधार (दिसंबर 2025) को अपनाकर मजदूरी दरों को महंगाई से जोड़ने की कोशिश की गई है.
फोकस सिर्फ वेतन ही नहीं, बल्कि जीवन स्तर सुधारने पर भी है. श्रमिकों के बढ़ते खर्च को देखते हुए सरकार ने आवासीय सुविधा देने की योजना बनाई है. इसके तहत भवन और अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड (बीओसीडब्ल्यू) के जरिए नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में लेबर हॉस्टल बनाए जाएंगे.
उद्यमी भी खुश नहीं
मजदूरों के वेतन बढ़ाने के फैसले के बाद उद्यमियों में असंतोष पनपा है. 16 अप्रैल को नोएडा कलेक्ट्रेट में उद्यमियों के प्रतिनिधिमंडल ने उच्च स्तरीय समिति के अध्यक्ष दीपक कुमार से मिलकर आपत्तियां दर्ज कराईं और चेताया कि सरकार ने राहत नहीं दी तो वे भी सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे. उद्यमियों का कहना है कि न्यूनतम मजदूरी में 21 फीसद की वृद्धि का असर 26-30 फीसद तक के अतिरिक्त वित्तीय बोझ के रूप में सामने आएगा. 'इंडस्ट्रियल आंत्रप्रेन्योर एसोसिएशन' के अध्यक्ष संजीव शर्मा के मुताबिक, ''एमएसएमई इकाइयों के लिए इसे वहन करना बेहद मुश्किल होगा. कई छोटे उद्योगों पर ताला लग सकता है.'' उनका तर्क है कि उत्पादन लागत बढ़ने पर उत्पादों के दाम बढ़ाने पड़ेंगे, जिससे बड़ी कंपनियां सस्ते विकल्प के लिए दूसरे राज्यों का रुख कर सकती हैं. कारोबारी टी.सी. गौड़ कहते हैं, ''पहले टैरिफ और कच्चे माल की कीमतों ने परेशान किया, फिर ईरान संकट से लागत बढ़ी, और अब वेतन वृद्धि की दोहरी मार पड़ रही है. ऐसे में उद्योग चलाना मुश्किल हो रहा है.''
इस पूरे विवाद के बीच एक नई चिंता भी उभर रही है. मई के पहले दस दिन, जब कंपनियों में बढ़े हुए वेतन के साथ पहली बार भुगतान होगा, हालात की असली परीक्षा होगी. कई कंपनियों के अब भी बढ़ा हुआ वेतन देने को लेकर अनिच्छुक होने की खबरें हैं. ऐसे में अंदेशा है कि आदेश का पालन न हुआ तो श्रमिक फिर से उग्र हो सकते हैं.