प्रधान संपादक की कलम से
भारत की लोकतांत्रिक ताकत हमेशा इस बात में रही है कि उसने जटिलताओं को स्वीकार करते हुए भी दिशा नहीं खोई. महिलाओं का आरक्षण सिर्फ एक कानूनी बदलाव नहीं है. यह उसी क्षमता की परीक्षा है

- अरुण पुरी
नारी शक्ति वंदन अधिनियम सितंबर 2023 में जब सर्वसम्मति से पास हुआ था, तब इसे महिला सशक्तीकरण के क्षेत्र में क्रांति कहा गया था. इस कानून ने लोकसभा में महिलाओं के लिए 33 फीसद सीट आरक्षण का पुराना सपना पूरा किया. इसीलिए जब मोदी सरकार ने इसके अमल में तेजी लाने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया और 131वां संशोधन पेश किया, तो इसे मजबूत राजनैतिक इच्छाशक्ति का कदम माना गया.
उम्मीद थी कि इसका कोई विरोध नहीं होगा. प्रस्ताव के तहत लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करने की बात थी ताकि एक-तिहाई आरक्षण लागू किया जा सके और मौजूदा हिस्सेदारी में कोई कटौती न हो. नई सीटों और क्षेत्रों का निर्धारण परिसीमन से होना था.
नारी शक्ति कानून में यह व्यवस्था थी कि 2027 की जनगणना के बाद यह प्रक्रिया आगे बढ़ेगी. लेकिन नए संशोधन में प्रस्ताव था कि ताजा उपलब्ध जनगणना, यानी 2011 के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाए, ताकि महिलाओं को आरक्षण 2034 के बजाए 2029 के आम चुनाव में ही मिल सके. इस संशोधन की मंशा पर सवाल नहीं उठाए जा सकते थे. यह लोकतांत्रिक सुधार का ठोस कदम था, क्योंकि अभी लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी सिर्फ 13.6 फीसद है, जो बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सबसे कम अनुपातों में से एक है.
विपक्ष के लिए असली खतरे की घंटी परिसीमन था, जिसमें निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा तय होती हैं. विपक्ष को डर था कि इस प्रक्रिया से सत्तारूढ़ दल को फायदा मिल सकता है. इस समयसीमा के चलते जाति जनगणना का सवाल भी टल जाता. नई जनगणना के बाद पहली बार 1931 के बाद ओबीसी आबादी का नवीनतम आंकड़ा सामने आता. विपक्ष के विरोध ने आखिरकार इस बिल को रोक दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी तुलना 'भ्रूण हत्या' से की. यानी दिखने में तकनीकी लगने वाले सवाल अचानक बड़े राजनैतिक बारूदी मैदान में बदल गए.
इन चिंताओं में सबसे बड़ा अंदेशा यह है कि अगर सीटों का बंटवारा आबादी के आधार पर हुआ तो उत्तर भारत के राज्यों का राजनैतिक वजन बढ़ जाएगा और दक्षिणी राज्यों का असर घट जाएगा. यह तब है जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह संसद में कह चुके हैं कि 50 फीसद फॉर्मूले के तहत दक्षिण के पांच राज्यों को 2011 की जनगणना के आधार पर मिलने वाली सीटों की तुलना में 19 अतिरिक्त सीटें मिलेंगी. विपक्ष की आशंकाएं बेबुनियाद भी नहीं हैं.
भारत दो बार परिसीमन टाल चुका है—पहली बार 1976 में इंदिरा गांधी के समय और दूसरी बार 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान—ताकि उन राज्यों को नुक्सान न हो जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई थी. मौजूदा प्रस्ताव बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के उसी पुराने सहमति फॉर्मूले को फिर विवाद में ला सकता है.
इसके साथ प्रतिनिधित्व के भीतर प्रतिनिधित्व का सवाल भी अब तक अनसुलझा है. महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का कोई भी गंभीर प्रयास आगे चलकर ओबीसी महिलाओं के लिए उप-कोटे की मांग जरूर बढ़ाएगा, खासकर जब नई जातीय गणना के आंकड़े सामने आएंगे. यानी जो शुरुआत महिला समानता के सीधे कदम के रूप में हुई, वह अब संघीय संतुलन और सामाजिक न्याय की बड़ी और ज्यादा विवादित बहस में उलझ चुकी है.
फिर भी इस लक्ष्य की तात्कालिकता से इनकार नहीं किया जा सकता. संसद में महिलाओं की संख्या अब भी बेहद कम है और धीरे-धीरे होने वाले बदलाव नाकाफी रहे. विपक्ष का सुझाव है कि मौजूदा 543 सीटों में से ही एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएं. यह रास्ता ज्यादा सीधा और तुरंत लागू होने वाला दिखता है. इससे जनगणना की समयसीमा और परिसीमन जैसी जटिलताओं से बचा जा सकता है. लेकिन इससे राजनैतिक मुश्किलें पैदा होती हैं. कौन-सी सीटें आरक्षित होंगी और किन नेताओं को जगह छोड़नी पड़ेगी, यह सिर्फ तकनीकी सवाल नहीं है. यह हर दल के राजनैतिक हितों को छूता है.
सरकार का जवाबी तर्क है कि सीटें बढ़ाना साफ और व्यावहारिक समाधान है. बड़ी लोकसभा में मौजूदा हिस्सेदारी घटाए बिना महिलाओं को जगह दी जा सकती है. यह उस पुराने लोकतांत्रिक सिद्धांत से भी मेल खाता है कि प्रतिनिधित्व आबादी की वास्तविकता के मुताबिक होना चाहिए. आज असमानता साफ दिखती है. किसी घनी आबादी वाले क्षेत्र का सांसद 30-40 लाख से ज्यादा मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि छोटे इलाके का सांसद एकाध लाख लोगों का. ऐसी असमानता बराबर प्रतिनिधित्व की मूल भावना को कमजोर करती है.
असल मुश्किल है इन टकराते लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाने की. प्रतिनिधित्व की खामियां सुधारने की कोई भी कोशिश क्षेत्रीय अविश्वास बढ़ाने की कीमत पर नहीं होनी चाहिए. महिला न्याय को भी अधूरे राजनैतिक विवादों का बंधक नहीं बनाया जा सकता. लिहाजा आगे का रास्ता एक बड़े फैसले में नहीं, बल्कि चरणबद्ध तरीके और सहमति से निकलता है.
पहली प्राथमिकता 2027 की जनगणना को समय पर और भरोसेमंद तरीके से करने की होनी चाहिए. भरोसेमंद आंकड़ों के बिना परिसीमन प्रक्रिया वैधता हासिल नहीं कर पाएगी. इसके बाद ऐसा परिसीमन आयोग बनना चाहिए, जिसकी संरचना पर सभी दलों को भरोसा हो. तभी इस प्रक्रिया पर राजनैतिक हेरफेर का शक कम होगा. साथ ही महिला आरक्षण कैसे लागू किया जाए, इस पर भी व्यापक सहमति जरूरी है, ताकि यह मुद्दा दूसरे बहस-मुबाहिसों में दब न जाए. चाहे चरणबद्ध अमल हो या अंतरिम व्यवस्था, लक्ष्य यही होना चाहिए कि यह सुधार बेमियादी तौर पर तक टलता न रहे.
इस हफ्ते की आवरण कथा में मैनेजिंग एडिटर कौशिक डेका और सीनियर डिप्टी एडिटर अनिलेश एस. महाजन ने इस गतिरोध के हर पहलू को खंगाला है. उन्होंने अलग-अलग विचारधाराओं के नेताओं, अफसरों, समाज विज्ञानियों और कानूनविदों से बात की है. उनका विश्लेषण एक बात साफ करता है: लोकसभा में शक्ति संतुलन का गणित बड़ा पिटारा खोल चुका है. लेकिन मिथक हमें यह भी याद दिलाता है कि उस पिटारे में उम्मीद भी थी. अब समय है चरणबद्ध फैसलों, सहमति और राजनैतिक साहस का. 2034 का इंतजार नहीं.
भारत की लोकतांत्रिक ताकत हमेशा इस बात में रही है कि उसने जटिलताओं को स्वीकार करते हुए भी दिशा नहीं खोई. महिलाओं का आरक्षण सिर्फ एक कानूनी बदलाव नहीं है. यह उसी क्षमता की परीक्षा है. जो देश अपने लोगों की पूरी ताकत का इस्तेमाल करना चाहता है, वह अपनी आधी आबादी को राजनैतिक शक्ति के हाशिए पर नहीं छोड़ सकता.