टोही नजरों के खिलाफ जंग

टोही नजरों के खिलाफ जंग पश्चिम एशिया के युद्ध ने सीसीटीवी प्रणालियों के जरिए बढ़ते खतरों को उजागर कर दिया. इसी को देखते हुए मोदी सरकार ने इनके ऑपरेशन को नियंत्रित और सीमित करने के लिए लागू किए सख्त नियम-कायदे.

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

रक्षा विशेषज्ञ बरसों से निगरानी करने वाले कैमरों के तेजी से चौतरफा फैलाव को लेकर आवाज उठाए आए हैं. दुश्मन के इंटरनेट से जुड़े सीसीटीवी (क्लोज्ड सर्किट टेलीविजन) को हैक करके संवेदनशील जानकारियों का खजाना झटक लेने का खतरा पहले से ही मौजूद रहा है. अब पश्चिम एशिया में चल रही जंग से ऐसी हैकिंग की बदौलत किए जा सकने वाले कहीं ज्यादा भयावह खतरों का पता चला है.

चौराहों, इमारतों और शहर की सड़कों पर लगे कैमरों का इस्तेमाल उनके मूल मकसद से हटकर लक्ष्य पर नजर रखने और सटीक हमला बोलने के लिए किया जा रहा है. आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (एआइ) के क्षेत्र में हुई प्रगति की बदौलत सेनाएं इन कैमरों से मिले फुटेज के विशाल भंडारों का तुरत-फुरत विश्लेषण करती हैं और इसके जरिए लक्ष्यों की सटीक पहचान करती हैं.

इज्राएल ने तेहरान के निगरानी कैमरे के जाल को हैक करके कई दिनों तक हर चेहरे और वाहन की जानकारियां बटोरीं. उनकी दिनचर्या और आवाजाही का नक्शा तैयार किया और इस तरह ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई तथा दूसरे बड़े अधिकारियों का पीछा करके 28 फरवरी को उन्हें मार डाला.

भारत में सीसीटीवी का खतरा मार्च के आखिरी दिनों में पूरी तरह समझ में आया जब उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद पुलिस ने पाकिस्तान से जुड़े जासूसी के उस घेरे को नेस्तनाबूद कर दिया जो मौजूदा कैमरों को केवल हैक ही नहीं उससे ज्यादा कुछ करता था.

इस गिरोह के लोगों ने दिल्ली-एनसीआर में संवेदनशील जगहों पर इनके बजाए सौर ऊर्जा से संचालित सीसीटीवी कैमरे लगा दिए. इन कैमरों का लाइव फुटेज सीमा पार पाकिस्तान की इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (आइएसआइ) के हैंडलरों को भेजा जाता था. जांचकर्ताओं ने खुलासा किया कि इस नेटवर्क को अपने जाल का विस्तार भारत के दूसरे शहरों में करने का काम सौंपा गया था. देशभर में तकनीकी तौर पर कमजोर 30 लाख से ज्यादा सीसीटीवी कैमरे लगे हैं.

उनमें आधे सैन्य अहातों और उच्च सुरक्षा वाले बुनियादी ढांचे समेत सरकारी परिसरों में लगे हैं और सुरक्षा संबंधी खतरा पैदा कर रहे हैं. इनमें से 90 फीसद हिकविजन और दहुआ जैसी चीनी फर्मों के बनाए हैं. इसका मतलब है कि कथित इलेक्ट्रॉनिक जासूसी का लाभ बस बीजिंग को मिल रहा है. भारत की आशंकाओं को पश्चिम एशिया में हकीकत में बदलते देख नई दिल्ली ने आखिरकार निर्णायक कदम उठाया.

सरकार ने चीनी निर्माताओं के सीसीटीवी कैमरों और उनसे जुड़े साजोसामान पर प्रतिबंध लगा दिया. केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के मातहत कार्यरत मानकीकृत परीक्षण और गुणवत्ता प्रमाणन (एसटीक्यूसी) की ओर से लागू प्रमाणन की नई शर्तें 1 अप्रैल से प्रभावी हो गईं. इसके तहत सीसीटीवी से जुड़े सभी उत्पादों की बिक्री या इस्तेमाल से पहले परीक्षण और मंजूरी से गुजरना होगा.

नियमों के तहत इन उपकरणों में छेड़छाड़ से सुरक्षित बाहरी घेरे और मालवेयर का पता लगाने वाले मजबूत एन्क्रिप्शन लगे होने चाहिए ताकि वे ऐसी कमजोरियों से मुक्त हों जिनसे उन तक दूर से पहुंचा जा सके. नए नियम उन शर्तों से निकले हैं जो मंत्रालय ने अप्रैल 2024 में जारी की थीं. मैन्युफैक्चरर को इनके अनुसार ढलने के लिए दो साल दिया गया था. अभी तक 500 से ज्यादा सीसीटीवी मॉडल प्रमाणित और स्थापित भी हो चुके हैं.

अहम परिसंपत्तियों की सुरक्षा
फरवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में देश में दूरसंचार के राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे के बारे में टोह लेने की कथित चीनी कोशिशों को लेकर गंभीर चिंता जाहिर की गई थी. सरकार अब देश की दूरसंचार रीढ़ को महफूज रखने के लिए तंत्र स्थापित कर रही है, जिसमें दूरसंचार विभाग, रक्षा मंत्रालय और खुफिया एजेंसियों के बीच तिमाही समन्वय बैठकें होना अनिवार्य बना दिया गया है.

बेहद अहम राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे को इस खतरे की जड़ में 2021 का वह विशाल साइबर जासूसी अभियान है जो चीनी सरकार से जुड़े धड़ों ने चलाया था. उस ऑपरेशन में कम से कम सात स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर (एसएलडीसी) को निशाने पर लिया गया, जो लद्दाख में चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के नजदीक स्थापित थे. ये सेंटर बिजली भेजने और ग्रिड पर नियंत्रण रखने के लिए जिम्मेदार होते हैं.

अंदेशा यही है कि हमलावरों ने सीसीटीवी नेटवर्कों में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले इंटरनेट प्रोटोकॉल (आइपी) कैमरों और उनके साथ इंटरनेट से जुड़ी डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर (डीवीआर) प्रणालियों में सेंध लगा ली. उसका मकसद भारत के बिजली के बुनियादी ढांचे के बारे में खुफिया जानकारी इकट्ठा करना था. 2021 में ही लद्दाख में बिजली वितरण केंद्रों को हैक करने की दो अलहदा चीनी कोशिशों को नाकाम कर दिया गया.

केंद्र के निर्देश के फौरन बाद अप्रैल में ही दिल्ली सरकार ने अपने लोक निर्माण विभाग के लगाए गए चीनी मूल के 1,40,000 सीसीटीवी कैमरों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए संभावित खतरा मानकर हटाने का फैसला किया. दिल्ली के पीडब्ल्यूडी मंत्री प्रवेश वर्मा ने कहा, ''निगरानी का बुनियादी ढांचा महज नजर रखने का मामला नहीं है. यह संवेदनशील डेटा पर नियंत्रण का मामला भी है.’’ उन्होंने कहा कि सरकार उनकी जगह भरोसेमंद और उन्नत प्रणालियां लगाएगी.

चीनी साजिश
भारतीय विशेषज्ञ अकेले नहीं थे जो वर्षों से चीनी सीसीटीवी कैमरों पर संदेह जता रहे. 2022 में ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की सरकारों ने सुरक्षा चिंताओं का हवाला देकर सरकारी विभागों और संवेदनशील प्रतिष्ठानों पर चीनी सीसीटीवी पर प्रतिबंध लगाया. चिंता की एक मुख्य वजह यह थी कि चीनी सरकार के आंशिक या पूर्ण मालिकाना हक के मातहत काम कर रहीं ये चीनी कंपनियां 2017 के राष्ट्रीय इंटेलिजेंस कानून के मुताबिक बीजिंग की सुरक्षा सेवाओं के साथ सहयोग के लिए बाध्य हैं.

अक्तूबर 2025 में अमेरिकी फेडरल कम्युनिकेशंस कमिशन ने हिकविजन, दहुआ और हुआवेई सरीखी चीनी फर्मों पर पाबंदी कड़ी करते हुए इन कंपनियों के पुर्जों से बने उपकरणों को भी नई आयात मंजूरी देने पर रोक लगा दी. पूर्व राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा समन्यवक लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) राजेश पंत का मानना है कि सॉफ्टवेयर से चलने वाले सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को दुश्मन हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है.

वे कहते हैं, ''इंटरनेट के जरिए जुड़े सीसीटीवी कैमरों का निगरानी, नुक्सान के आकलन और काम ठप करने सरीखे हमलों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. राष्ट्रीय सुरक्षा की दिशा में सरकार का यह अच्छा कदम है.’’ भारत एआइ से लैस सीसीटीवी कैमरों के अपने नेटवर्क का विस्तार कर रहा है. उन्हें सुरक्षा, पुलिस व्यवस्था और स्मार्ट बुनियादी ढांचे के लिए अनिवार्य औजार की तरह लगा रहा है.

मगर विशेषज्ञ बताते हैं कि इन कैमरों के बेहद अहम पुर्जे—चिपसेट, फर्मवेयर (हार्डवेयर सिस्टम-ऑन-चिप या एसओसी से जुड़े माइक्रोकोड/ सॉफ्टवेयर)—मोटे तौर पर चीन से जुड़ी सप्लाइ चेन से आते हैं. सो, निगरानी ग्रिड पर सच्ची संप्रभुता को लेकर सवाल उठ खड़े होते हैं. एक भारतीय खुफिया अधिकारी यह भी कहते हैं कि आधुनिक निगरानी कैमरे दूर से चालू किए जा सकते हैं. मसलन, इनके जरिए दूर से आवाज सुनी जा सकती है या वाहनों की नंबर प्लेट पढ़ी जा सकती है.

एक विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि वीडियो सिक्योरिटी सर्विलांस (वीएसएस) प्रणाली या सीसीटीवी सिर्फ कैमरा भर नहीं हैं. इनमें वीडियो नेटवर्क रिकॉर्डर भी लगे हो सकते हैं, जिनके जरिए बाद में विश्लेषण के लिए रखी गई तस्वीरों को ऐसे नेटवर्क से जोड़ दिया जाता है जो दूरदराज के वेब सर्वरों से जुड़ा हो सकता है. इसके जरिए विजुअल डेटा चीन भेजा जा सकता है जहां इसे एआइ से जोड़ा जा सकता है और मिली-जुली खुफिया तस्वीरें बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसा तेहरान में हुआ.यहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे उभरते हैं.

ऑडिट की जरूरत
अब विशेषज्ञ कैमरों के मौजूदा जाल को लेकर चिंतित हैं. टेलीकॉम इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट एन.के. गोयल कहते हैं, ''ये नियम नए निगरानी कैमरों की खरीद के बारे में हैं. मौजूदा लाखों कैमरों का कोई समाधान नहीं निकाला गया है.’’ वे ऐसे सीसीटीवी के समग्र ऑडिट की मांग करते हैं. विदेशी निर्भरता और उसके खतरों से बाहर निकलने का एक तरीका स्वदेशी उत्पादन है.

मगर एक विशेषज्ञ मेक इन इंडिया नीति की एक दुखती रग की ओर ध्यान दिलाते हैं. खरीद के नियम स्थानीय सामग्री के इस्तेमाल को पुरस्कृत करते हैं मगर यह सांचा खुफिया जानकारी जमा करने वाली परतों पर नियंत्रण की गारंटी नहीं है. वे कहते हैं, ''कैमरे भारत में एसेंबल और पैकेज किए जा सकते हैं, बिल भी भारत में बनाए जा सकते हैं, फिर भी एसओसी माइक्रोचिप तो 100 फीसद आयातित हैं, जो आम तौर पर चीनी मूल की होती हैं, मगर ताइवान, हांगकांग या यूएई के मार्फत भेजी जाती हैं, और फर्मवेयर भी आम तौर पर चीनी होता है मगर स्वदेशी का नकाब ओढ़कर आता है.’’

वे कहते हैं कि आइटी मंत्रालय के एसटीक्यूसी की ओर से प्रमाणित इकाइयां हमेशा वही नहीं होतीं जो संवेदनशील जगहों पर लगाई जाती हैं, जिससे जांचे गए नमूनों और वास्तव में लगाई गई इकाइयों के बीच खतरनाक फासला पैदा हो जाता है. वे 2024 में करीब 15,000 करोड़ रुपए की लागत से रेलों के सभी कोच और इंजनों में एआइ की ताकत से चलने वाले करीब 75,000 सीसीटीवी लगाने की भारतीय रेलवे की योजना का हवाला देते हैं.

कंपनी की इनवॉइस में इन्हें ताइवान से आए बताया गया मगर मुंबई के एयर कार्गो कॉम्प्लेक्स ने कहा कि ये चीन से आए थे. इन मुश्किलों से उबरने के लिए कुछ विशेषज्ञ मांग करते हैं कि सीसीटीवी को रणनीतिक बुनियादी ढांचे की तरह संवेदनशील क्षेत्र माना जाए. वे पांच सिद्धांतों पर आधारित ज्यादा कठोर राष्ट्रीय सिद्धांत की पेशकश करते हैं.

ये पांच सिद्धांत हैं: लगाई गई एक-एक इकाई का (सिर्फ दिए गए नमूनों का ही नहीं) सत्यापन; चिपसेट, फर्मवेयर और उद्गम के बारे में अद्यतन जानकारी का पूरा खुलासा; बदले गए पुर्जों और फर्मवेयर में किए गए बदलावों की फिर से जांच; बेहद अहम क्षेत्रों में वीएसएस टेक्नोलॉजी के लिए प्रतिबंधित या नकारात्मक सूची बनाना; और बंदरगाहों, हवाई अड्डों और रक्षा सुविधाओं सरीखे अत्यधिक अहम क्षेत्रों के लिए ज्यादा सख्त मानदंड लागू करना.

नई मशीनों का महज सत्यापन ही नहीं, बल्कि संवेदनशील क्षेत्रों में लगे सभी मौजूदा सीसीटीवी की पूरी जांच ही भारत को उनसे पैदा होने वाले खतरों से निजात दिला सकती है. ये नियम तो केवल नए निगरानी कैमरों की खरीद के बारे में हैं जो खरीदे और फिर लगाए जाने हैं. मगर मौजूदा लाखों कैमरों का कोई समाधान नहीं निकाला गया है.

ऐसे में अंदेशे बरकरार हैं. एन.के. गोयल प्रेसिडेंट, टेलीकॉम इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया भारत की नई सर्विलांस नीति भारत में बने, आयातित या बेचे गए, इंटरनेट से जुड़े किसी भी सीसीटीवी कैमरे को 1 अप्रैल से केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के मानकीकृत जांच और गुणवत्ता प्रमाणन (एसटीक्यूसी) के नियम-कायदों के अनुसार प्रमाणित होना होगा. 

Read more!