युवाओं में एकाग्रता का गहराता संकट
भारत में अब कहीं ज्यादा वयस्कों में एडीएचडी के लक्षण सामने आ रहे. बचपन में हुई संभावित अनदेखी और अब व्यस्त जीवनशैली तथा बढ़े स्क्रीनटाइम के चलते हालात और बिगड़े. इसे लेकर बढ़ते संवाद के चलते अब लक्षणों को पहचानने में मदद मिल रही

इरा देवयानी सान्याल बेंगलूरू में एक एचआर कंसल्टेंट हैं. 32 वर्षीया सान्याल पहले बिना किसी चूक के सारे काम अच्छे से निबटा लेती थीं. मगर धीरे-धीरे कोई न कोई खामी रहने लगी. मसलन, ठीक से फॉलोअप न करना, आधे-अधूरे ईमेल लिखना, और मीटिंग करके उसके बारे में ठीक से याद न रख पाना.
वे कहती हैं, ''बचपन में भी मैं ऐसी ही थी, मेरे शिक्षक इसे लापरवाही कहते थे. मुझे लगा कि मैं उससे उबर चुकी हूं.'' असल खुलासा उनके कार्यस्थल पर एक परामर्श सत्र में हुआ. जब उन्होंने एक थेरेपिस्ट को अपनी दिनचर्या बताई तो उन्हें औपचारिक मूल्यांकन की सलाह मिली.
उनकी जांच में पता चला कि पिछले एक दशक से वे जिस समस्या से जूझ रही थीं, वह असल में एडीएचडी यानी अटेंशन डेफिसिट/हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर है. यह तंत्रिका-विकास संबंधी स्थिति है जो एकाग्रता, आवेग पर नियंत्रण और काम करने की गतिविधियों को प्रभावित करती है.
भारत में 18 साल और उससे ज्यादा उम्र के वयस्कों में एडीएचडी मामलों में वृद्धि देखी जा रही है. सोशल साइकियाट्री ऐंड साइकियाट्रिक एपिडेमियोलॉजी जर्नल में प्रकाशित 2024 के एक अध्ययन में दिल्ली-एनसीआर में 18-25 साल के 1,665 युवाओं का परीक्षण किया गया और उनमें 14 फीसद में एडीएचडी के लक्षण पाए गए. उसी शोध-पत्र में की गई एक व्यापक समीक्षा में भारत में 5.5 फीसद से 25.7 फीसद वयस्कों को एडीएचडी से ग्रस्त बताया गया.
एम्स, दिल्ली के मनोरोग ओपीडी के क्लिनिशियंस बताते हैं कि 20-27 साल के युवाओं में एकाग्रता-संबंधी दिक्कतों के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. नई दिल्ली की मनोवैज्ञानिक डॉ. उपासना चड्ढा के माइंडस्केप नाम के मानसिक स्वास्थ्य क्लिनिक में भी एडीएचडी की जांच के लिए युवाओं की भीड़ लगी रहती है. उनमें कई सारे कॉलेज स्टुडेंट या फिर नए प्रोफेशनल्स होते हैं.
एडीएचडी का इलाज कराने वाले ज्यादातर वयस्क मानते हैं कि समस्या वयस्क होने के बाद शुरू हुई. मगर डॉ. चड्ढा बताती हैं, ''एडीएचडी वयस्क होने पर शुरू नहीं होता. इसके लक्षण पहले से मौजूद होते हैं मगर पहचाने नहीं जाते. अब बेहतर जागरूकता और निदान के साधनों के कारण ज्यादा संख्या में युवा वयस्क जांच के लिए आ रहे हैं.'' भारत अब पहले की तुलना में वयस्क एडीएचडी का ज्यादा व्यवस्थित ढंग से अध्ययन और आकलन शुरू कर रहा है.
सेज जर्नल में 2025 की एक समीक्षा के मुताबिक, ऐसे शोध अब तेजी से प्रचलन दर और नैदानिक पैटर्न पर केंद्रित हो रहे हैं. मुंबई के मनोचिकित्सक डॉ. हरीश शेट्टी कहते हैं, ''पहले हम बच्चों में एकाग्रता संबंधी समस्याओं के प्रति बहुत सतर्क रहते थे मगर कॉलेजों या कार्यस्थलों में उतनी सतर्कता नहीं बरतते थे. यह मान लिया जाता था कि यदि एडीएचडी होता तो वह बचपन में ही पहचान लिया जाता.'' वैसे एडीएचडी हमेशा बचपन में अपने सबसे स्पष्ट लक्षण—अत्यधिक सक्रियता—के रूप में प्रकट नहीं होता.
यह भूलने की आदत, काम अधूरे छोड़ना, कमजोर संगठन क्षमता या 'लापरवाही से की गई गलतियों' के रूप में भी दिख सकता है. इन्हें अक्सर व्यक्तित्व संबंधी गुण या अनुशासन की कमी समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है.
फोर्टिस हॉस्पिटल्स में मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार विज्ञान के निदेशक डॉ. समीर पारिख के मुताबिक, ''एडीएचडी के मामले में हम दो अतियों के बीच फंस जाते हैं. या तो हम इसका अत्यधित निदान करते हैं या फिर कम निदान.'' बेंगलूरू के फोर्टिस हेल्थकेयर से जुड़े मनोचिकित्सक डॉ. सचिन बागला कहते हैं, ''उम्र बढ़ने के साथ ही जीवन ज्यादा जटिल होता जाता है, एकाग्रता, प्रबंधन और भावनात्मक नियंत्रण को लेकर अपेक्षाएं भी बढ़ जाती हैं. तभी लंबे समय से मौजूद कठिनाइयां ज्यादा स्पष्ट दिखने लगती हैं—जैसे टालमटोल, भूलने की आदत, आखिरी समय में काम करने की प्रवृत्ति, कैफीन या स्क्रीन पर निर्भरता, और भावनात्मक असंतुलन.''
विचलन पर गया ध्यान
एडीएचडी आज सोशल मीडिया की वजह से चर्चा में है. सना खान, रिया कोठारी और दूसरे मानसिक स्वास्थ्य इन्फ्लुएंसर शॉर्ट वीडियो, रील और एक्सप्लेनर सरीखे माध्यमों का इस्तेमाल करके इस समस्या को सबके सामने ला रहे हैं. वे रोजमर्रा के व्यवहार—जैसे टालमटोल, भूलने की आदत और आवेग—को सरल तरीके से समझाते हैं, ताकि लोग अपनी जिंदगी के पैटर्न को समझ सकें और संभावित अंदरूनी समस्याओं से जोड़ सकें.
वैसे, ये वीडियो इलाज के उपकरण नहीं हैं, मगर इनसे एक शुरुआत तो होती है. इस मामले में सबसे युवा आवाजों में 18 वर्षीया आर्या वर्मा भी शामिल हैं. उन्होंने अपने खुद के इलाज के बाद यूट्यूब पर अपने अनुभव साझा करना शुरू किया. वे कहती हैं, ''कई लक्षण ध्यान में नहीं आते क्योंकि यह एहसास नहीं होता कि आपके व्यवहार का कोई हिस्सा किसी बीमारी से जुड़ा हो सकता है.''
वैसे, चिकित्सक इसको लेकर आगाह करते हैं कि आसानी से उपलब्ध जानकारी हमेशा सटीक नहीं होती. चड्ढा कहती हैं, ''ऑनलाइन चीजें देखकर बहुत सारे लोग यह पक्का मानकर आते हैं कि उन्हें एडीएचडी ही है मगर वाकई वैसा हो, यह जरूरी नहीं.'' डॉ. बागला जोड़ते हैं, ''वयस्कों में एकाग्रता से जुड़ी हर समस्या एडीएचडी नहीं होती. इसलिए सही इलाज के लिए समुचित मूल्यांकन बहुत जरूरी है जिसमें बचपन में बर्ताव के पैटर्न, स्क्रीन की आदतें, लत और अन्य अंतर्निहित मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को देखना शामिल है.''
इस समस्या का एक पहलू यह भी है कि एडीएचडी का पता लगाना उस तरह से संभव नहीं होता जैसा ज्यादातर लोग सोचते हैं. ऐसा कोई एक ब्लड टेस्ट या स्कैन नहीं है जिससे इसके बारे में पक्का पता चल जाए. डॉ. पारिख कहते हैं, ''आप किसी रील या सेल्फ-टेस्ट के आधार पर एडीएचडी का पता नहीं लगा सकते. आपको उस व्यक्ति की पूरी जीवनचर्या पर गौर करना होगा—जैसे वह खास स्थिति में कैसे काम करता है और बदले माहौल में उसमें क्या अंतर आता है.''
अगर किसी व्यक्ति को एडीएचडी से ग्रसित होने का शक हो, तो बेहतर यही होगा कि वह किसी ऐसे मनोचिकित्सक या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से मिले, जो न्यूरोडेवलपमेंटल स्थितियों का जानकार हो. यह मरीज की पूरी जानकारी लेने, लक्षणों को समझने और डायग्नोस्टिक ऐंड स्टैटिस्टिकल मैनुअल ऑफ मेंटल डिसऑर्डर्स जैसे निदान के पैमानों का इस्तेमाल करने पर निर्भर है.
दूसरी ओर, खुद से ही इलाज करना भ्रामक हो सकता है. एडीएचडी से जुड़े कई लक्षण, मसलन, एकाग्रता में दिक्कत, आवेग और बेचैनी जैसे अनुभव ज्यादातर लोगों को कभी-न-कभी होते हैं. मगर कभी-कभार किसी लक्षण का होना, किसी चिकित्सकीय दिक्कत के होने के बराबर नहीं है. फर्क इस बात से पड़ता है कि ये लक्षण कितने लगातार, कितने गंभीर हैं और दैनिक जीवन पर उनका कितना प्रभाव पड़ता है.
डॉ. पारिख कहते हैं, ''आज की हमारी जीवनशैली भी एकाग्रता को प्रभावित करती है. लगातार कई काम एक साथ करना, जल्दीबाजी में रहना, बार-बार काम बदलना. अगर मैं किसी क्षण ध्यान भटकने के कारण गलती कर देता हूं तो इसका मतलब यह नहीं कि मुझे एडीएचडी है. इसका मतलब यह भी हो सकता है कि उस समय मेरा पर्याप्त ध्यान नहीं था.''
उसे वाकई पहचाने और किसी और लक्षण को भी एडीएचडी समझ लेने के बीच का संतुलन ही आज बहुत अहम है. डॉ. पारिख के मुताबिक, ''जब स्पष्ट रूप से चिकित्सकीय दिक्कत मौजूद हो तो एडीएचडी की पहचान जल्दी होनी चाहिए और समय पर इलाज शुरू होना चाहिए. मगर हमें चिकित्सकीय एडीएचडी और जीवनशैली से जुड़ी एकाग्रता संबंधी समस्याओं के बीच अंतर भी करना चाहिए.''
इलाज के तरीके
इसके लिए डॉक्टर व्यवहारगत थेरेपी, परिवेश संबंधी बदलाव और जरूरी होने पर दवाओं के इस्तेमाल की सलाह देते हैं. खासकर, कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (सीबीटी) इलाज के एक मुख्य आधार के तौर पर उभरी है. फरीदाबाद मेंसर्वोदय हॉस्पिटल में न्यूरोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. राजेंदर सिंगला कहते हैं, ''इसका मकसद किसी इंसान को 'ठीक करना' नहीं है, बल्कि ऐसा सिस्टम बनाना है जो बेहतर ढंग से काम करने, सीखने और एकाग्रता बढ़ाने में मदद करे,''
वयस्कों के लिए सीबीटी में बड़े कामों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटना, भूलने से बचने के लिए प्लानर और रिमाइंडर का इस्तेमाल करना, एक तय दिनचर्या बनाना और ध्यान भटकाने वाली चीजों को दूर रखना शामिल है. इसके अलावा, प्रतिक्रिया देने से पहले थोड़ा रुकने की तकनीक सीखना और नियमित रूप से अपनी प्रगति की जांच करना भी शामिल है.
वहीं, दवाइयों के मामले में भी बदलाव आया है. 'सुलाने वाली' या 'आदत डालने वाली' मानसिक बीमारियों की दवाओं की जगह डोपामाइन और नॉरएपिनेफ्रीन के स्तर को बढ़ाने के लिए स्टिमुलेंट्स (जैसे मिथाइलफेनिडेट) और नॉन-स्टिमुलेंट्स (जैसे एटोमोक्सेटीन) का इस्तेमाल किया जाता है. ये ऐसे हॉर्मोन और न्यूरोट्रांसमीटर सतर्कता, एकाग्रता और अपनी भावनाओं पर काबू रखने की क्षमता को बेहतर बनाते हैं.
इलाज के बाद सान्याल अब फर्क महसूस कर रही हैं. थेरेपी के बारे में उनकी राय है, ''यह सिखाती है कि अपने दिमाग के खिलाफ काम करने के बजाए उसके साथ मिलकर कैसे काम किया जाए.'' उनकी बीमारी पूरी तरह खत्म तो नहीं हुई है मगर उन्होंने इस पर काबू करना सीख लिया है.