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पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस 15 साल से सत्ता में है और उसका रिकॉर्ड मिला-जुला रहा है. इसका जवाब पार्टी ने सर्जिकल अंदाज में अपने विधायकों की छंटनी करके दिया है.

29 अप्रैल 2026 अंक
29 अप्रैल 2026 अंक

- अरुण पुरी.

असम, केरल और पुदुच्चेरी में वोटिंग हो चुकी है. लेकिन जिन दो सबसे अहम राज्यों में चुनाव बाकी हैं—पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु—वहां माहौल बेहद गर्म है, क्योंकि यह सिर्फ एक आम लोकतांत्रिक कवायद नहीं. इन दोनों राज्यों में चुनाव प्रचार स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं है.

लोकसभा सीटों के परिसीमन और केंद्र से राज्यों को मिलने वाले पैसों के बंटवारे जैसे बड़े राष्ट्रीय और संघीय मुद्दे भी चुनावी फिजां में गूंज रहे हैं. इन दो राज्यों के बाहर भी लोगों की दिलचस्पी इस बार सामान्य से कहीं ज्यादा है.

इसकी एक वजह मैदान में मौजूद बड़े चेहरे हैं. दोनों मौजूदा मुख्यमंत्री—ममता बनर्जी और एम.के. स्टालिन—ऐसे दिग्गज नेता हैं जिन्होंने पहले भी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मजबूत चुनावी ताकत का सामना किया है.

दोनों अब अपनी सरकार के कामकाज पर बड़े जनमत परीक्षण का सामना कर रहे हैं, और इस तरह उनका राजनैतिक भविष्य दांव पर है. बंगाल और तमिलनाडु क्रमश: 42 और 39 लोकसभा सीटों के साथ राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदलने की ताकत रखते हैं. यही वजह है कि अब तक हाथ से बाहर रहे इन राज्यों में अपना झंडा गाड़ना भाजपा के लिए सबसे बड़ा लक्ष्य है. अब तक दोनों राज्य उसकी पकड़ से बाहर हैं.

दोनों राज्यों में सत्ता विरोधी लहर एक खामोश लेकिन गहरा असर डालने वाली ताकत है. दोनों पार्टियों को साफ एहसास है कि मतदाता बदलाव चाहते हैं. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस 15 साल से सत्ता में है और उसका रिकॉर्ड मिला-जुला रहा है. इसका जवाब पार्टी ने सर्जिकल अंदाज में अपने विधायकों की छंटनी करके दिया है. मौजूदा विधायकों में से करीब 40 फीसद को बदला गया है. 294 सदस्यीय विधानसभा में तृणमूल के पास अभी 224 सीटें हैं.

इनमें से 74 मौजूदा विधायकों का टिकट पूरी तरह से काट दिया गया है, जबकि 15 को दूसरी सीटों पर भेजा गया है. तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कलगम (डीएमके) छह बार सत्ता में रहा, लेकिन दोबारा लगातार सत्ता में लौटने का मौका उसे सिर्फ एक बार मिला था, वह भी 1971 में.

इसलिए डीएमके ने भी बदलाव का बड़ा संदेश देने की कोशिश की है. 234 सदस्यीय विधानसभा में उसके पास 133 सीटें हैं और जिन 164 सीटों पर वह चुनाव लड़ रहा है, उनमें करीब 60 नए चेहरों को उतारा गया है. पार्टी के लगभग 45 फीसद मौजूदा विधायकों को उनकी पुरानी सीटों से दोबारा टिकट नहीं दिया गया है.

अगर यह सब उनकी अंदरूनी कमजोरियों की खामोश स्वीकारोक्ति है, तो उसका असर उनके चुनाव प्रचार में बिल्कुल नहीं दिखता. वहां दोनों नेता ताकत, भरोसे और आक्रामकता के साथ मैदान में नजर आ रहे हैं. इन दोनों राज्यों में भाजपा की मौजूदगी ने ममता और स्टालिन को यह चुनाव 'दिल्ली दरबार’ के खिलाफ सम्मान की लड़ाई के तौर पर पेश करने का मौका दिया है. इसके जरिए वे क्षेत्रीय पहचान और राज्य के गौरव को भी उभार रहे हैं.

जैसा कि ममता कहती हैं, ''कुल 19 राज्य और केंद्र सरकार मेरे खिलाफ एक साथ आ गए हैं.’’ दोनों नेताओं के पास हमलावर राजनीति के लिए मुद्दों की कमी नहीं है. हाल की घटनाओं ने उन्हें काफी सामग्री दे दी है. बंगाल में, जहां मुकाबला ज्यादा करीबी माना जा रहा है, चुनाव से ठीक पहले हुई स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआइआर) प्रक्रिया ने मतदाता सूची को करीब 11 फीसद घटा दिया. वोटरों की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.83 करोड़ रह गई.

जिस पार्टी को हर चुनाव की शुरुआत में करीब 30 फीसद बढ़त के साथ देखा जाता है—यह इशारा बंगाल की मुस्लिम आबादी की ओर है—उसके लिए एसआइआर को उस संरचनात्मक बढ़त पर चोट माना जा रहा है. आंकड़े बताते हैं कि वोटर सूची से नाम कटने में मुस्लिम मतदाता अनुपात से ज्यादा प्रभावित हुए हैं. राज्य में 74 ऐसी सीटें हैं जहां मुस्लिम आबादी 40 से 90 फीसद के बीच है. 2021 में तृणमूल ने इनमें से 71 सीटें जीती थीं.

तमिलनाडु में वोटर सूची से नाम कटने की दर और ज्यादा, यानी 15 फीसद रही. वहां मतदाताओं की संख्या 6.41 करोड़ से घटकर 5.44 करोड़ रह गई. लेकिन डीएमके के कार्यकर्ताओं की मजबूत जमीनी निगरानी ने इसे बड़ा मुद्दा नहीं बनने दिया. हालांकि वोटिंग से ठीक पहले स्टालिन को क्षेत्रीय भावना मजबूत करने के लिए एक और बड़ा हथियार मिल गया है: लोकसभा सीटों के होने वाले परिसीमन का मुद्दा.

इन दो अलग-अलग राज्यों में भाजपा दो अलग रणनीतियों के साथ उतर रही है. बंगाल में पार्टी एक तरफ जोरदार और आक्रामक जनसभाओं का सहारा ले रही है, जिसकी अगुआई कभी ममता बनर्जी के शिष्य रहे शुभेंदु अधिकारी कर रहे हैं. दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता बेहद शांत लेकिन असरदार तरीके से बूथ स्तर पर माइक्रो मैनेजमेंट और वोटर मोबिलाइजेशन में जुटे हैं.

ममता पर हमलों का सुर भी बहुत सोच-समझकर तय किया गया है, क्योंकि वे निजी हमलों को राजनैतिक सहानुभूति में बदलने की माहिर मानी जाती हैं. तमिलनाडु में भाजपा और भी ज्यादा संयमित भूमिका में है. वहां वह एआइएडीएमके की लगभग खामोश सहयोगी बनकर चल रही है क्योंकि पार्टी नहीं चाहती कि ज्यादा नजदीकी से एआइएडीएमके को नुक्सान हो.

यहां उम्मीद यह है कि सोच-समझकर बनाया गया विपक्षी मोर्चा ओबीसी वोट बैंक का बड़ा हिस्सा अपने पक्ष में खींच लेगा. इन चुनावों में कुछ वाइल्ड कार्ड भी हैं. अभिनेता विजय की राजनीति में एंट्री युवाओं के बीच नई लहर पैदा कर रही है, जिसका सही अंदाजा दोनों बड़े गठबंधन पूरी तरह नहीं लगा पा रहे. इसके साथ नाराज किसान भी एक बड़ा फैक्टर हैं. इतने बड़े और जटिल चुनावों में मामूली अंतर ही सब कुछ तय करते हैं. इसलिए मुकाबला पहली नजर में जितना दिख रहा है, उससे कहीं ज्यादा करीबी हो सकता है.

दांव सिर्फ इन दो राज्यों तक सीमित नहीं. अगर ममता बनर्जी लगातार चौथी बार जीत दर्ज करती हैं तो वे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति की पहली कतार में पहुंच जाएंगी, ऐसी ताकत और गति के साथ जिसकी बराबरी कम ही नेता कर पाएंगे. अगर स्टालिन सत्ता बचाने में सफल रहते हैं, तो इंडिया गठबंधन को दक्षिण भारत में मजबूत आधार मिलेगा और कांग्रेस को अपना सबसे भरोसेमंद क्षेत्रीय साथी भी. भाजपा के लिए इन दोनों में से किसी एक राज्य में भी बड़ी सफलता देश की राजनैतिक तस्वीर बदल सकती है.

इस हफ्ते हमारी आवरण कथा आपको दोनों चुनावी मैदानों के भीतर ले जाती है—रणनीति, सीटों का गणित, बड़े चेहरे और अंदरूनी दरारों तक. संभव है कि ये हाल के वर्षों के भारत के सबसे अहम विधानसभा चुनाव साबित हों.

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