इलाज छिपा है आपके जीन में
चिकित्सा विज्ञान में अब 'सबके लिए एक ही दवा‘ वाली सोच छोड़ने का समय आ गया है. कैंसर व दिल की बीमारियों से लेकर टीबी और दुर्लभ विकारों तक, डीएनए सीक्वेंसिंग और जेनेटिक टेस्ट डॉक्टरों को बीमारी की सटीक पहचान करने और सही इलाज चुनने में मदद कर रहे है.

अहमदाबाद के 11 वर्षीय आरव मेहता पर खून की एक दुर्लभ बीमारी के सामान्य इलाज ने असर करना बंद कर दिया था. डॉक्टरों ने पिछले साल उन्हें पहले से प्रचलित दवाएं देने के बजाए कुछ नया करने की सलाह दी: जीनोम की पूरी सीक्वेंसिंग (अनुक्रमण), ताकि खास तौर पर उस जेनेटिक बदलाव को ध्यान में रखकर इलाज शुरू किया जा सके जिसकी वजह से उसे यह बीमारी हुई थी. कुछ ही हफ्तों में आरव के डीएनए की जांच हुई, खराब जीन की पहचान की गई और उस म्यूटेशन के हिसाब से इलाज शुरू हुआ.
कुछ महीनों में उसकी हालत में सुधार साफ नजर आने लगा. आरव जैसे मामले भारतीय स्वास्थ्य सेवा में एक नए युग की शुरुआत हैं, जहां इलाज औसत मरीज के हिसाब से नहीं, बल्कि व्यक्ति के डीएनए और उसकी बीमारी की खास प्रोफाइल पर आधारित होता है. फोर्टिस अस्पताल, दिल्ली के पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. विकास मौर्य कहते हैं, ''एक ही बीमारी वाले सभी मरीजों के एक जैसे इलाज के बजाए सटीक दवा (प्रीसिजन मेडिसिन) जींस, पर्यावरण और जीवनशैली के अंतर के आधार पर संबंधित व्यक्ति के हिसाब से रोकथाम और इलाज सुनिश्चित करती है...
इसका मकसद पूरी आबादी के लिए एक दवा के बजाए व्यक्तिगत चिकित्सा की ओर बढ़ना है, जहां इलाज से जुड़े फैसले मरीज का जैविक डेटा देखकर लिए जाते हैं.’’ डीएनए (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड) एक ऐसा अणु है जो पॉलीन्यूक्लियोटा-इड्स की दो लड़ियां जोड़कर बनता है और कोशिकाओं के अंदर पूरी आनुवंशिक जानकारी सहेजता है, जबकि जीन डीएनए के वे हिस्से हैं जो प्रोटीन बनाने के लिए निर्देशित होते हैं, जो कि हमारे शारीरिक विकास और कामकाज करने के लिए जरूरी है. ये आनुवंशिकता की बुनियादी इकाइयां हैं.
आनुवंशिक म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) कोशिका विभाजन के दौरान डीएनए अनुक्रम या जीनोम (सभी जीन अनुक्रम और अन्य रासायनिक आधारों की व्यवस्था) में होने वाले बदलाव हैं. अगर डीएनए अनुक्रम का कोई हिस्सा गलत जगह पर हो या अधूरा हो, तो आनुवंशिक विकार और बीमारियां हो सकती हैं. जीनोम सीक्वेंसिंग प्रयोगशाला में पूरी डीएनए संरचना को पढ़ने की एक प्रक्रिया है, जिससे बीमारियों के आनुवंशिक कारणों का पता लगाया जा सकता है.
रिसर्च व डायग्नोस्टिक्स कंपनी, जेनेटिको के संस्थापक और सीईओ अर्जुन गुप्ता कहते हैं, ''भारत में हजारों ऐसे अंतर्विवाही जनसंख्या समूह हैं जिनकी अपनी विशिष्ट आनुवंशिक पहचान है. इसका मतलब है कि हमारे यहां के आनुवंशिक बदलाव और बीमारियों के जोखिम पश्चिमी देशों की तुलना में अलग हैं.’’ जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट जैसे सरकारी कार्यक्रमों ने 99 विभिन्न समूहों के 10,000 से अधिक भारतीय जीनोम की सीक्वेंसिंग की है.
इससे एक ऐसा डेटाबेस तैयार हुआ है जिसका उद्देश्य बीमारी की पहचान, दवाओं के असर का पूर्वानुमान और इलाज के बेहतर तरीके विकसित करना है. इसी तरह, इंडियन कैंसर जीनोम एटलस भी विशेष रूप से भारतीयों में होने वाले कैंसर म्यूटेशन के पैटर्न को समझने की कोशिश कर रहा है. हालांकि सटीक इलाज की शुरुआत कैंसर के इलाज से हुई थी लेकिन अब इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है, खासकर दुर्लभ जेनेटिक बीमारियों, दिल की बीमारियों और दिमाग से जुड़ी बीमारियों के क्षेत्र में. भारत के अस्पताल इलाज का सही तरीका चुनने के लिए जीनोमिक टेस्टिंग पैनल (ऐसे टेस्ट जो कैंसर से जुड़े कई जीन का विश्लेषण करते हैं) का इस्तेमाल कर रहे हैं.
साथ ही, फार्माकोजेनोमिक टेस्ट के जरिए यह पता लगाया जा रहा है कि मरीज पर कौन-सी दवा ज्यादा कारगर होगी. स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी और आंखों की रोशनी से जुड़ी वंशानुगत बीमारियों के लिए जीन-आधारित इलाज अब खास केंद्रों के जरिए उपलब्ध कराए जा रहे हैं. यह बदलाव जितनी जल्द हो उतना ही अच्छा है. दुनियाभर में कैंसर के कुल मामलों में भारत की हिस्सेदारी 7-8 फीसद है जबकि दुनिया में टीबी के करीब 27 फीसद मामले यहीं पाए जाते हैं. इसके अलावा, अनुमान है कि करीब सात करोड़ भारतीय दुर्लभ बीमारियों के साथ जी रहे हैं, जिनमें से कई आनुवंशिक हैं.
भारत में सटीक इलाज का बाजार तेजी से बढ़ने की उम्मीद है, क्योंकि जीनोम सीक्वेंसिंग अब सस्ती हो रही है. मार्केट रिसर्च फर्म आइएमएआरसी के मुताबिक, 2025 में इस बाजार का आकार 2.67 अरब डॉलर (लगभग 24,898 करोड़ रुपए) था, और इसके हर साल 11-12 फीसद की दर से बढ़ने का अनुमान है. कैंसर के इलाज ने खोली राह सटीक चिकित्सा के लिए कैंसर सबसे उपयुक्त क्षेत्र बना हुआ है.
पहले कई तरह के कैंसर का इलाज केवल इस आधार पर तय किया जाता था कि ट्यूमर शरीर के किस हिस्से में है और कितना फैला है लेकिन अब डॉक्टर उन खास म्यूटेशन की पहचान कर सकते हैं जो इस बीमारी को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार होते हैं. कोच्चि के रहने वाले 46 वर्षीय चार्टर्ड अकाउंटेंट रोहित मेनन को 'एडवांस्ड नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर’ का पता चला. कीमोथेरेपी शुरू करने के बजाए, उनके डॉक्टरों ने ट्यूमर की जीनोम सीक्वेंसिंग की, जिससे एक ईजीएफआर जीन म्यूटेशन का पता चला.
उन्होंने इसके हिसाब से खास थेरेपी ली और कुछ ही महीनों के भीतर उनका ट्यूमर छोटा हो गया और बीमारी स्थिर हो गई. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि लक्षित दवाएं कैंसर कोशिकाओं को बढ़ाने वाले विशिष्ट म्यूटेशन को रोकती हैं, जबकि कीमोथेरेपी शरीर की तेजी से बढ़ने वाली सभी कोशिकाओं पर हमला करती है. जर्नल ऑफ क्लिनिकल आँकोलॉजी में प्रकाशित 2026 के एक अध्ययन के अनुसार, कुछ विशेष प्रकार के एडवांस कैंसर के मामलों में, जिन मरीजों का इलाज जीनोम सीक्वेंसिंग और उससे संबंधित खास थेरेपी के आधार पर किया गया, उनमें बीमारी के बिना बढ़े जीवित रहने की दर पारंपरिक कीमोथेरेपी लेने वाले मरीजों की तुलना में 30-40 फीसद अधिक रही.
कुछ कैंसर के लक्षण दिखने से पहले ही उनका पता लगाया जा सकता है. डॉ. मौर्य कहते हैं, ''लिक्विड बायोप्सी टेस्ट रक्त में ट्यूमर डीएनए के अंशों की पहचान कर सकते हैं, कभी-कभी लक्षणों के उभरने से कई साल पहले ही. इससे इलाज शुरुआती चरण में करना संभव हो सकता है.’’ हालांकि, बहुत कुछ ट्यूमर की जैविक संरचना और बीमारी की अवस्था पर निर्भर करता है. गुरुग्राम स्थित नारायणा हॉस्पिटल में आँकोलॉजी सर्विसेज निदेशक डॉ. रणदीप सिंह कहते हैं, ''भारत में कैंसर चिकित्सा के क्षेत्र में अब ट्यूमर जीनोम सीक्वेंसिंग का उपयोग लगातार बढ़ रहा है, हालांकि इसका प्रभाव कैंसर के प्रकार और उसकी स्टेज के आधार पर अलग-अलग होता है.’’
जेनोमिक सीक्वेंसिंग एडवांस लंग कैंसर, पित्त नली के कैंसर, एडवांस प्रोस्टेट कैंसर, कई दौर के उपचारों के बाद स्तन कैंसर और मेटास्टैटिक कोलन कैंसर के इलाज पर काफी कारगर साबित हो रही है. बेहतर और सटीक दवाएं इसके के अलावा, सटीक चिकित्सा का उपयोग अब संक्रामक रोगों और दुर्लभ आनुवंशिक विकारों के इलाज में भी तेजी से किया जा रहा. तपेदिक (टीबी) इसका एक प्रमुख उदाहरण है.
टीबी के इलाज की सफलता काफी हद तक इसकी शुरुआती पहचान पर निर्भर करती है. जेनेटिक टेस्टिंग लैब मेडजीनोम में इन्फेक्शियस डिजीज जीनोमिक्स की एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. गुनीशा पसरीचा कहती हैं, ''जल्द पहचान होने से डॉक्टर समय पर सही इलाज शुरू कर पाते हैं और दवाओं को बेअसर करने वाले बैक्टीरिया के प्रकार को फैलने से रोका जा सकता है.’’ पारंपरिक टीबी कल्चर टेस्ट से यह पता लगाने में तीन से आठ हफ्ते लग सकते हैं कि मरीज पर कौन-सी दवा असर नहीं कर रही.
वहीं जीनएक्सपर्ट/सीबीएनएएटी, ट्रूनेट और जीनोम सीक्वेंसिंग जैसे मॉलिक्यूलर और जीनोमिक टेस्ट कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों के भीतर इसका पता लगा सकते हैं. इस प्रकार, सटीक चिकित्सा का सबसे बड़ा फायदा यही है कि इससे बेहतर इलाज सुनिश्चित होता है. फार्माकोजीनोमिक्स (जिससे यह पता चलता है कि किसी व्यक्ति की आनुवंशिक संरचना दवाओं के प्रति उसके शरीर की प्रतिक्रिया को कैसे प्रभावित करती है) की वजह से ही मरीजों को अब वे दवाएं मिल पाती हैं जो उन पर वास्तव में असर करती हैं. इससे अवसाद, रक्तचाप और डायबिटीज के इलाज में अपनाई जाने वाली बार-बार दवा बदलकर देखने की जरूरत घट जाती है.
भारत में हृदय रोग विज्ञान के क्षेत्र में फैमिलियल हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया और इनहेरिटेड कार्डियोमायोपैथी जैसी स्थितियों के लिए जेनेटिक टेस्ट का इस्तेमाल अब उन लोगों की पहचान करने के लिए किया जा रहा है जिन्हें इन बीमारियों का सबसे अधिक खतरा है. इसी तरह, न्यूरोलॉजी में गंभीर विकारों की पहचान और इलाज के लिए जेनेटिक टेस्टिंग का इस्तेमाल बढ़ रहा है. इसके साथ ही, जीनोमिक्स सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी बहुत मददगार साबित हो सकता है.
इसकी मदद से बीमारियों के फैलने के तरीकों पर नजर रखी जा सकती है, संक्रमण कहां से फैलना शुरू हो रहा, समय रहते इसकी पहचान की जा सकती है. सबसे बड़ी बाधा अपने देश में सटीक चिकित्सा को तेजी से अपनाने में लागत और इन्फ्रास्ट्रक्चर सबसे बड़ी बाधाएं हैं. कई उन्नत जीनोमिक टेस्ट और विशिष्ट थेरेपी महंगी हैं और इंश्योरेंस में कवर नहीं होतीं. ट्यूमर जीनोम सीक्वेंसिंग की लागत 20,000 रुपए से 80,000 रुपए तक हो सकती है जबकि खास कैंसर थेरेपी की लागत हर महीने 1.5 लाख रुपए से 4 लाख रुपए तक हो सकती है.
दवा-प्रतिरोधी टीबी के लिए जीनोम सीक्वेंसिंग टेस्ट की लागत निजी केंद्रों में 10,000 रुपए से 25,000 रुपए तक होती है, जिससे सरकारी अस्पतालों के बाहर इनकी पहुंच सीमित हो जाती है. कुछ दुर्लभ बीमारियों के लिए जीन थेरेपी की लागत कई करोड़ रुपए तक हो सकती है, जो कि ज्यादातर मरीजों के बूते के बाहर है. लागत तो समस्या का सिर्फ एक पहलू भर है. सटीक चिकित्सा के लिए खास लैब, बायोइन्फॉर्मेटिक्स सिस्टम और कुशल मॉलिक्यूलर साइंटिस्ट की जरूरत होती है, जो जीनोमिक रिपोर्ट समझ सकें और इलाज तय करने में मदद कर सकें.
इनमें कई सुविधाएं अभी सिर्फ बड़े शहरों के बड़े अस्पतालों में ही उपलब्ध हैं, जैसे एम्स दिल्ली, टाटा मेमोरियल मुंबई और नारायणा और अपोलो हॉस्पिटल चेन. दिल्ली के अपोलो एथेना वीमेन कैंसर सेंटर में मेडिकल और प्रीसिजन आँकोलॉजी की प्रिंसिपल लीड, डॉ. ज्योति वाधवा कहती हैं, ''भारत में सटीक चिकित्सा को लागू करने में कई अड़चनें हैं. लागत, इन्फ्रास्ट्रक्चर, प्रशिक्षित विशेषज्ञ की कमी और मॉलिक्यूलर ट्यूमर बोर्ड (मेडिकल एक्सपर्ट्स का एक पैनल जो जीनोमिक्स के आधार पर कैंसर के मुश्किल मामलों की समीक्षा करता है) तक सीमित पहुंच आदि मुख्य बाधाएं हैं.’’
वहीं, डॉ. सिंह कहते हैं, ''सबसे बड़ी बाधाएं मानकीकरण, नतीजों को समझने और प्रशिक्षित विशेषज्ञों की उपलब्धता में हैं.’’ एक और बड़ी चुनौती है डीएनए सीक्वेंसिंग से मिले डेटा को क्लिनिकल डेटा, इलाज के इतिहास और मरीज पर असर के बारे में जानकारी को एक साथ मिलाकर समझना. भारत में मेडिकल रिकॉर्ड अक्सर बिना किसी तय ढांचे के होते हैं और कई अलग-अलग सिस्टम में स्टोर किए जाते हैं, जिससे जीनोमिक डेटा को इलाज संबंधी जानकारी के साथ सही तरीके से मिलाना मुश्किल हो जाता है.
भारत में सटीक चिकित्सा का भविष्य सिर्फ ज्यादा जीनोम की सीक्वेंसिंग में ही नहीं है, बल्कि उस जानकारी को इस्तेमाल लायक बनाने में भी है. अगले बड़े बदलाव में जीनोमिक डेटा को रोजमर्रा के इलाज संबंधी फैसले लेने की प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा. और, अगर ऐसा होता है, तो सटीक चिकित्सा अगले दस वर्षों में बीमारी की पहचान, इलाज के चुनाव और बीमारी की रोकथाम के तरीकों में सचमुच एक बड़ा बदलाव ला सकती है.