स्मारक राजनीति की वापसी

लखनऊ के ऐशबाग में योगी सरकार करा रही है नए भव्य आंबेडकर मेमोरियल का निर्माण, इसे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलितों को लुभाने की बड़ी कवायद माना जा रहा है

लखनऊ के ऐशबाग इलाके में बन रहा आंबेडकर स्मारक और सांस्कृतिक केंद्र

राजधानी लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन से करीब दो किलोमीटर दूर ऐशबाग का इलाका इन दिनों किसी बड़े निर्माण स्थल में बदल गया है. ईदगाह और रामलीला मैदान के सामने, जहां आम दिनों में चहल-पहल रहती थी, वहां अब जेसीबी, टावर क्रेन, कंक्रीट मिक्सर, डंपर और स्टोन कटिंग मशीनों की लगातार आवाज एक नए स्मारक के आकार लेने की कहानी कह रही है.

ऐशबाग पुलिस स्टेशन के बगल में नजूल की जमीन को पत्थर की ऊंची दीवारों से घेर दिया गया है और भीतर जाने के लिए बनाए जा रहे दो भव्य प्रवेश द्वार इस परियोजना के पैमाने का संकेत देते हैं. अंदर प्रवेश करते ही हरे कपड़े से ढकी डॉ. भीमराव आंबेडकर की आदमकद प्रतिमा दिखती है, जिसके चारों ओर बिखरे पत्थरों को तराशा जा रहा है. यह जगह प्रतीकात्मक स्थल से आगे बढ़कर संस्थागत परिसर का रूप ले रही है.

दो दशक पहले ऐशबाग से करीब आठ किलोमीटर दूर गोमती नगर में बने 'आंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल' के बाद अब शहर में आंबेडकर को समर्पित दूसरा बड़ा स्मारक लगभग तैयार है. 'भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर स्मारक और सांस्कृतिक केंद्र' नामक नया परिसर 5,493.52 वर्ग मीटर में विकसित किया जा रहा है और इसे जुलाई 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है. यह समयसीमा यूं ही तय नहीं की गई है. 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले परियोजना का पूरा होना राजनैतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है.

गतिविधि आधारित परिसर 
परियोजना की नींव 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले 29 जून, 2021 तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने रखी थी. शुरुआत में स्मारक के लिए 45.04 करोड़ रुपए की लागत स्वीकृत हुई थी, लेकिन अब यह बढ़कर 100 करोड़ रुपए से अधिक हो चुकी है. अधिकारियों के मुताबिक, इसमें सभागार, बाहरी विकास कार्य और फिनिशिंग जैसी कई अतिरिक्त परतें जुड़ने से लागत में वृद्धि हुई है.

विभिन्न एजेंसियां अलग-अलग चरणों में निर्माण कार्य कर रही हैं, जिसमें मुख्य संरचना का काम कंस्ट्रक्शन ऐंड डिजाइन सर्विसेज संभाल रही है जबकि डिजाइन और विशेष हिस्सों का कार्य निजी कंपनियों को दिया गया है. पूरे परिसर की अवधारणा केवल स्मारक बनाने तक सीमित नहीं है. इसे एक एक्टिविटी-बेस्ड कॉम्प्लेक्स के रूप में तैयार किया जा रहा है, जहां आंबेडकर के विचारों को केवल प्रतीकों के जरिए नहीं, बल्कि गतिविधियों, शोध और जनभागीदारी के माध्यम से प्रस्तुत किया जाएगा.

परिसर के केंद्र में 25 फुट ऊंची आंबेडकर की प्रतिमा स्थापित की गई है, जिसके चारों ओर पूरा विकास किया गया है. इसके अलावा यहां तीन मंजिला प्रशासनिक भवन, 500 सीटों वाला आधुनिक सभागार, साझा बेसमेंट और बिजली-पानी से जुड़ी सभी आवश्यक सुविधाएं बनाई जा रही हैं.

निर्माण स्थल पर काम कर रहे एक सुपरवाइजर बताते हैं कि अब परियोजना अंतिम चरण में है. वे कहते हैं, ''ढांचा लगभग तैयार है, फिनिशिंग, लैंडस्केपिंग और अंदरूनी सजावट चल रही है. अगर काम इसी रफ्तार से चलता रहा तो जुलाई तक उद्घाटन संभव है.'' मजदूरों की एक टीम पत्थरों पर बारीक नक्काशी कर रही है जबकि दूसरी टीम परिसर की आंतरिक सड़कों और हरियाली को अंतिम रूप देने में जुटी है. काम करते इन मजदूरों के लिए यह निर्माण परियोजना है, लेकिन प्रशासन के लिए बड़े राजनैतिक और सामाजिक संदेश का हिस्सा है.

इस स्मारक की खासियत इसकी बहु-उपयोगी संरचना है. यहां एक पुस्तकालय, संग्रहालय, चित्र दीर्घा और अनुसंधान केंद्र के लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित किए गए हैं. साथ ही शोधकर्ताओं के लिए आवासीय सुविधाएं भी विकसित की जा रही हैं. राज्य सरकार इस शोध केंद्र को लखनऊ के डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय से जोड़ने की योजना पर भी काम कर रही है.

उत्तर प्रदेश के संस्कृति और पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह परियोजना को सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल बताते हैं. उनके अनुसार, ''यह प्रोजेक्ट तीन चरणों में पूरा किया जा रहा है और 15 जुलाई तक पूरी तरह तैयार हो जाएगा.'' वे इस बात पर जोर देते हैं कि यह स्मारक पुराने मॉडल से अलग है. ''यह केवल देखने का स्थान नहीं होगा, बल्कि यहां लोग सीख सकेंगे, रिसर्च कर सकेंगे और आधुनिक तकनीकों के जरिए आंबेडकर के विचारों को समझ सकेंगे.'' मंत्री के अनुसार, ऑडियो-विजुअल और वर्चुअल रियलिटी के जरिए विशेष कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे. 

राजनैतिक और सामाजिक संदेश 
इस पूरे विकास के पीछे राजनैतिक गणित भी उतना ही अहम है. 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सीटों की संख्या 62 से घटकर 36 रह गई थी. लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में संविधान की किताब को हाथ में लेकर 'संविधान बचाओ' का नारा देने वाले कांग्रेसी नेता राहुल गांधी और सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव का ही असर था कि विपक्षी इंडिया गठबंधन ने दलितों के मतों में भारी सेंधमारी कर दी थी.

दलित वोटों के शिफ्ट होने से पिछले दो लोकसभा चुनावों में आरक्षित सीटों पर एकतरफा प्रदर्शन करने वाली भाजपा की सीटें घटकर आधी (आठ) हो गईं. ऐसे में आंबेडकर के नाम पर यह नया स्मारक दलित समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की भाजपा की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि आंबेडकर केवल ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि आज भी सामाजिक और राजनैतिक विमर्श के केंद्र में हैं. ऐसे में उनके नाम पर बनने वाला कोई भी बड़ा प्रोजेक्ट सीधे तौर पर सामाजिक संदेश देता है. ऐशबाग का यह स्मारक भी उसी दिशा में एक कदम है, जहां सरकार यह दिखाना चाहती है कि वह आंबेडकर की विरासत को न सिर्फ संरक्षित कर रही है, बल्कि उसे आधुनिक संदर्भों में आगे भी बढ़ा रही है. हालांकि, लखनऊ में पहले से मौजूद आंबेडकर पार्क का अनुभव इस नए प्रोजेक्ट के मूल्यांकन के लिए एक संदर्भ भी देता है.

गोमती नगर में बना आंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल कभी अपने विशाल आकार और खर्च को लेकर विवादों में रहा था. 123 एकड़ में फैले इस परिसर में हाथियों की कतारें, विशाल स्तंभ और भव्य संरचनाएं उस दौर की राजनीति और प्रतीकवाद को दर्शाती हैं. तब विपक्ष ने इसे फिजूलखर्ची बताया था, लेकिन समय के साथ यह लोकप्रिय पर्यटन स्थल बन गया. ऐशबाग का नया स्मारक इस पुराने मॉडल से अलग रास्ता अपनाता दिखता है.

यहां भव्यता के साथ उपयोगिता पर जोर है. जहां गोमती नगर का स्मारक मुख्य रूप से दर्शनीय स्थल है, वहीं ऐशबाग का परिसर सक्रिय सांस्कृतिक और शैक्षणिक केंद्र बनने की दिशा में तैयार किया जा रहा है. यह बदलाव सिर्फ वास्तुकला में नहीं, सोच में भी नजर आता है. एक ओर पत्थरों की नक्काशी और विशाल गेट इस परियोजना की भव्यता को दर्शाते हैं, दूसरी ओर बन रहे सभागार, लाइब्रेरी और रिसर्च सेंटर इसे एक जीवंत संस्थान की शक्ल देते हैं.

स्थानीय लोगों के बीच भी परियोजना को लेकर उत्सुकता है. पास में चाय की दुकानों पर बैठे लोग बताते हैं कि पिछले एक साल में यहां की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है. एक दुकानदार कहता है, ''पहले यह खाली जमीन थी, अब रोज नए-नए काम होते दिखते हैं.''

डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण करते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

बस्ती संपर्क अभियान 
उत्तर प्रदेश में दलित स्मारकों के निर्माण और नवीनीकरण का सवाल अब सिर्फ स्थापत्य या सांस्कृतिक पहचान तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह सीधे राजनैतिक रणनीति बहस और सामाजिक समीकरणों से जुड़ चुका है. इसी संदर्भ में आंबेडकर की 135वीं जयंती के मौके पर भाजपा ने बस्ती संपर्क अभियान शुरू किया है, जो 15 अप्रैल से प्रदेश भर में चलाया जा रहा है. अभियान का घोषित उद्देश्य आंबेडकर की विरासत को याद करने के साथ यह समझना भी है कि सरकार की योजनाएं और खासकर स्मारकों के नवीनीकरण जैसी पहलकदमियां दलित समुदाय पर कितना असर डाल रही हैं.

यह कवायद डॉ. बी.आर. आंबेडकर मूर्ति विकास योजना की शुरुआत के अगले दिन शुरू हुई है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 14 अप्रैल को आंबेडकर की जयंती के मौके पर, उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में उनकी 75 मूर्तियों के सौंदर्यीकरण और संरक्षण की आधारशिला वर्चुअल ढंग से रखी. इस मौके पर मुख्यमंत्री ने कहा कि पहले चरण में, 75 में से हर जिले में एक मूर्ति को शामिल किया जाएगा, उसके बाद सार्वजनिक जमीन पर बनी सभी मूर्तियों को इसमें शामिल किया जाएगा.

इस पहल का मकसद मूर्तियों की सुरक्षा करना और लोगों को बिना रुकावट के उन्हें श्रद्धांजलि देने का मौका देना है. राज्य के शहरी विकास विभाग को शहरी इलाकों में डॉ. आंबेडकर की मूर्तियों की पहचान करने का काम सौंपा गया है जबकि पंचायती राज विभाग ग्रामीण इलाकों में यह काम करेगा. समाज कल्याण विभाग प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए दोनों विभागों से तालमेल बिठाएगा. 

बस्ती संपर्क अभियान की कमान पार्टी के एससी मोर्चे को सौंपी गई है. योजना के तहत बूथ स्तर तक पहुंचने वाली टीमें बनाई गई हैं, जिनमें सवर्ण और दलित, दोनों समुदायों के नेता शामिल हैं. ये टीमें दलित बस्तियों में जाकर सीधे संवाद करेंगी, योजनाओं की जानकारी देंगी और लोगों से फीडबैक भी लेंगी. भाजपा के प्रदेश एससी मोर्चा के अध्यक्ष राम चंद्र कन्नौजिया के अनुसार, अभियान का अहम उद्देश्य यह भी है कि यह आंका जा सके कि स्मारकों के नवीनीकरण से दलित समाज में कोई वास्तविक बदलाव आया है या नहीं.

दरअसल, स्मारकों की राजनीति उत्तर प्रदेश में नई नहीं है. बसपा प्रमुख मायावती के कार्यकाल में बड़े पैमाने पर पार्कों, मूर्तियों और स्मारकों का निर्माण हुआ, जिन्हें दलित पहचान और आत्मसम्मान के प्रतीक के रूप में पेश किया गया. उस दौर में यह तर्क दिया गया कि ये संरचनाएं सामाजिक रूप से वंचित वर्गों को मनोवैज्ञानिक मजबूती देती हैं और उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर दृश्यता प्रदान करती हैं.

बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय की एसोसिएट प्रोफेसर रचना गंगवार बताती हैं, ''भाजपा अब इसी प्रतीकात्मक राजनीति को नए ढांचे में ढालने की कोशिश करती दिख रही है. फर्क यह है कि पार्टी स्मारकों को केवल पहचान के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि उन्हें कल्याणकारी योजनाओं और विकास के नैरेटिव से जोड़ने की रणनीति अपना रही है.'' बस्ती संपर्क अभियान के दौरान जिला स्तर पर कार्यशालाएं भी आयोजित की जाएंगी, जहां लोगों को सरकारी योजनाओं की जानकारी दी जाएगी और उनकी शिकायतों को दर्ज किया जाएगा.

कितनी कारगर होगी योजना 
अहम सवाल यह है कि क्या स्मारकों का निर्माण या नवीनीकरण वास्तव में सामाजिक सशक्तीकरण में तब्दील हो पाता है. गंगवार बताती हैं, ''जमीन पर कई बार यह देखा गया है कि स्मारक पहचान और गर्व का भाव तो पैदा करते हैं, लेकिन रोजमर्रा की समस्याएं—जैसे रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य—इनसे सीधे हल नहीं होतीं. ऐसे में भाजपा की यह कोशिश कि प्रतीकवाद को विकास और योजनाओं के साथ जोड़ा जाए, एक रणनीतिक बदलाव के रूप में देखी जा रही है.''

साथ ही, यह पहल राजनैतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समाजवादी पार्टी के 'पीडीए' यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ के नैरेटिव का जवाब देने की कोशिश है. भाजपा इस अभियान से यह संदेश देना चाहती है कि वह न केवल दलित पहचान को स्वीकार करती है, बल्कि उनके विकास के लिए ठोस कदम भी उठा रही है.

हालांकि मुख्य विपक्षी पार्टी योगी सरकार के स्मारकों की राजनीति को असल मुद्दों से ध्यान दिलाने की कवायद ही मानती है. सपा आंबेडकर वाहिनी के अध्यक्ष मिठाई लाल भारती कहते हैं, ''भाजपा सरकार की ओर से तैयार किया जा रहा आंबेडकर स्मारक केवल दिखावा है. पार्टी बेरोजगारी, महंगाई, खराब कानून व्यवस्था से जनता का ध्यान हटाना चाहती है. इस सरकार ने दलितों के हितों की पूरी तरह उपेक्षा की है.'' 

पक्ष-विपक्ष के दावों के बीच यह देखने वाली बात होगी कि आंबेडकर स्मारक के रूप में योगी सरकार की पहल दलित समुदाय का कितना भरोसा जीत पाती है और उसे राजनैतिक नतीजों में बदल पाती है.

रचना गंगवार, एसोसिएट प्रोफेसर, बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ के मुताबिक, ''योगी सरकार आंबेडकर के प्रतीक को नए तरीके से स्थापित कर दलित समाज के भीतर अपनी स्वीकृति बढ़ाने की कोशिश कर रही है.''

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