प्रधान संपादक की कलम से
भारत को 51.4 अरब डॉलर की रेमिटेंस देने वाले और दुनिया की अर्थव्यवस्था की धड़कन कहे जाने वाले इस इलाके के लिए यह जंग अचानक आए दिल के दौरे की तरह है.

- अरुण पुरी
पांच हफ्तों तक चली जंग ने नौ बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को झुलसा दिया. अब पश्चिम एशिया में किसी तरह हुआ युद्धविराम राहत देने वाला है. लेकिन ठीक वैसे ही जैसे पिछले साल जून में हमने 'असहज युद्धविराम’ को कवर पर रखा था, इस बार भी जो शर्तें तय हो रही हैं, उनमें अमेरिका-इज्राएल और ईरान के बीच नए टकराव की आशंका बनी हुई है. हालांकि, इस अंक का फोकस वह नहीं है. यहां हम उन छह देशों पर नजर डाल रहे हैं, जिन्हें इस जंग ने अकल्पनीय झटके दिए.
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), कतर, कुवैत, बहरीन, सऊदी अरब और ओमान, ये सभी मिलकर दुनिया की सबसे अहम आर्थिक ताकतों में से एक, गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) बनाते हैं. इसकी सबसे बड़ी पहचान है: दुनिया के करीब पांचवें हिस्से का कच्चा तेल और एलएनजी होरमुज जलडमरूमध्य के जरिए बाहर भेजना. लेकिन इन देशों की अहमियत सिर्फ तेल-गैस तक सीमित नहीं है.
यह देश पहले से समझ रहे थे कि सिर्फ हाइड्रोकार्बन पर टिके रहना लंबे समय तक संभव नहीं है, इसलिए उन्होंने दूसरे सेक्टरों में तेजी से कदम बढ़ाए: एविएशन, टूरिज्म से एआइ तक. इसी वजह से ये देश आज ग्लोबल निवेश के बड़े केंद्र बन चुके हैं और दुनिया के बेहतरीन प्रोफेशनल्स के लिए रहने की पसंदीदा जगह भी, जहां करीब एक करोड़ भारतीय रहते हैं.
इस इलाके की लंबी, स्थिर और लगातार बढ़ती अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका तब लगा, जब 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिका-इज्राएल के भारी हमलों के जवाब में ईरान ने जंग का दायरा बढ़ा दिया. ईरान ने यह दो तरीकों से किया: पहला, होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर, और दूसरा, जीसीसी देशों को सीधे निशाना बनाकर.
पांच हफ्तों में ईरान ने खाड़ी के अपने पड़ोसी देशों पर 5,000 से ज्यादा मिसाइल और ड्रोन दागे. ये हमले सिर्फ अमेरिकी सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं थे, बल्कि सुनियोजित तरीके से ऑयल-गैस फील्ड, रिफाइनरी, एयरपोर्ट, पोर्ट, इंडस्ट्रियल प्लांट और डेटा सेंटर, सब पर हमले हुए. नतीजा यह हुआ कि दुनिया ने आधुनिक दौर का सबसे बड़ा ऊर्जा झटका देखा, जो 1973 के तेल संकट से भी बड़ा साबित हुआ.
भारत को 51.4 अरब डॉलर की रेमिटेंस देने वाले और दुनिया की अर्थव्यवस्था की धड़कन कहे जाने वाले इस इलाके के लिए यह जंग अचानक आए दिल के दौरे की तरह है. जीसीसी देशों को 2026 में करीब 100 अरब डॉलर की उत्पादन गिरावट का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि ऊर्जा सप्लाइ में रुकावट और निवेशकों के टूटे हुए भरोसे ने ग्रोथ की उम्मीदों को तोड़ दिया है. इसका असर तुरंत दिखा: शिपिंग लगभग ठप हो गई, टैंकर रुक गए और बंदरगाह बंद हो गए.
इससे सिर्फ तेल ही नहीं, बल्कि खाने-पीने की चीजों और मैन्युफैक्चरिंग सामान की सप्लाइ भी बुरी तरह प्रभावित हुई. एविएशन सेक्टर पर भी बड़ा असर पड़ा. दुबई और दोहा जैसे बड़े हब में रोजाना करीब 2,000 उड़ानों में से 50 फीसद तक की गिरावट आ गई और सिर्फ पांच हफ्तों में 6 अरब डॉलर का नुक्सान हुआ. टूरिज्म तो प्रभावित हुआ ही. खाड़ी देशों का आर्थिक मॉडल तीन चीजों पर टिका था—निर्बाध ऊर्जा निर्यात, आसान लॉजिस्टिक्स और निवेश के लिए सुरक्षित माहौल. जंग ने इन तीनों की कड़ी परीक्षा ली. भारत के लिए इसका मतलब है कि रेमिटेंस में कमी आ सकती है, जिससे महंगाई के दौर में घरों की आय पर दबाव बढ़ेगा.
इस संकट के कई पहलुओं को समझने के लिए हमने एक खास पैकेज तैयार किया है. शुरुआत में ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा का विश्लेषण है, जो घायल गल्फ क्षेत्र की मौजूदा हालत और शांति प्रक्रिया के असर को समझाता है. इसके बाद ब्रूकिंग्स की सीनियर फेलो स्टेफनी विलियम्स अमेरिका की रणनीति पर नजर डालते हुए सवाल उठाती हैं कि क्या यह युद्धविराम ईरान युद्ध के अंत की शुरुआत है या सिर्फ शुरुआत का अंत. इसके बाद हम उन लोगों का नजरिया पेश कर रहे हैं, जो इस संकट को सीधे महसूस कर रहे हैं.
जीसीसी के हर प्रभावित देश से एक-एक प्रमुख लेखक की राय इसमें शामिल है: सऊदी अरब से अरब न्यूज के एडिटर-इन-चीफ फैसल जे. अब्बास, कतर से द पेनिनसुला के एडिटर-इन-चीफ डॉ. खालिद मुबारक अल-शाफी, कुवैत यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. बदर मूसा अल-सैफ, बहरीन के पूर्व मंत्री अब्दुलनबी अलशोआला, दुबई के लेखक मजहर फारूकी और ओमान के निवेशक यूसुफ हामिद अल बलूशी.
इन सभी की राय में एक तरफ साझा चिंता दिखती है, तो दूसरी तरफ हर देश की अपनी प्राथमिकताएं भी साफ नजर आती हैं. दुबई से मजहर फारूकी अपनी रिपोर्ट में होर्मुज जलडमरूमध्य के पास के हालात को बेहद करीब से दिखाते हैं. वे इस 'शॉक’ को इंसानी नजरिए से समझाते हैं, खासकर उन भारतीय प्रवासियों की कहानी के जरिए जो इस जंग में बिना वजह फंस गए. वहीं बहरीन के अब्दुलनबी अलशोआला युद्धविराम का स्वागत तो करते हैं, लेकिन यह भी मानते हैं कि इस जंग ने उस भरोसे को हिला दिया है जो निवेश को आकर्षित करता है.
अल-सैफ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस रणनीति पर और सीधे सवाल उठाते हैं, जिसमें वे अपनी अनिश्चितता को ही 'मास्टर स्ट्रैटेजी’ बताते हैं. अल-सैफ के मुताबिक यह रणनीति नहीं बल्कि 'अव्वल दर्जे की भूल’ है. वे लिखते हैं, ''जंग सिर्फ चालों का खेल नहीं है. इसके लिए एक साफ रणनीति और तय लक्ष्य जरूरी होता है.’’ सऊदी अरब के लिए फैसल एक साफ लक्ष्य बताते हैं: ''ऐसा ईरान जो अपने पड़ोसियों को नुक्सान न पहुंचा सके.’’
उनके मुताबिक, यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि जख्मी ईरान को यूं ही छोड़ दिया जाए कि वह उन देशों को भी नुक्सान पहुंचाए जिन्होंने बातचीत का रास्ता अपनाया. ओमान के बलूशी का मानना है कि इस जंग से सबसे बड़ा सबक यही है कि 'स्थिरता सिर्फ राजनीतिक जरूरत नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी भी है.’’ कतर के अल-शफी कूटनीति की अहम भूमिका पर जोर देते हैं. उनके मुताबिक, ''टिकाऊ शांति के लिए सबको साथ लेकर चलना, दूरदृष्टि और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है. इनके बिना आज का सुकून सिर्फ अगले बड़े संकट से पहले का छोटा सा विराम साबित होगा.’’
हम इन लोगों के विचारों को एक जैसी राय के तौर पर नहीं, बल्कि अलग-अलग नजरियों के तौर पर पेश कर रहे हैं, जो अपने-अपने भूगोल और राजनीति से प्रभावित हैं. खाड़ी जैसे अहम इलाके में स्थायी समाधान सिर्फ ताकत के दम पर नहीं मिल सकता. इसके लिए ऐसी कूटनीति चाहिए जो सोच-समझकर, धैर्य के साथ और आपसी हितों को ध्यान में रखकर आगे बढ़े.