चर्च बनाम सरकार
चुनावी मौसम में ईसाई समूहों के विरोध और सियासी आलोचनाओं के बीच केंद्र सरकार ने विदेशी फंडिंग नियम सख्त बनाने के लिए प्रस्तावित एफसीआरए संशोधनों को फिलहाल टाल दिया है लेकिन इन्हें बाद में लागू किए जाने की आशंकाएं बरकरार

चुनावों के बीच विपक्ष और धार्मिक समूहों के विरोध के सियासी समीकरणों में उलझकर सरकार ने विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को फिलहाल टाल दिया है. इसे 25 मार्च को लोकसभा में पेश किया गया था. हालांकि, ईसाई अल्पसंख्यकों की चिंताएं अब भी खत्म नहीं हुई हैं; उन्हें लगता है कि जब संसद दोबारा बैठेगी तो यह विधेयक फिर से लाया जा सकता है.
ईसाई नेताओं का तर्क है कि प्रस्तावित संशोधन संघवाद को कमजोर करने वाले हैं और समुदाय-संचालित संस्थाओं पर केंद्र सरकार को असीमित अधिकार प्रदान करते हैं. ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के अध्यक्ष आर्चबिशप जोसफ डिसूजा कहते हैं, ''यह तो सीधे तौर पर ईसाई संस्थाओं और उनकी संपत्तियों की लूट है.'' उन्होंने मीडिया से कहा, ''एफसीआरए अधिकारी भारत में एक संविधानेतर तंत्र बन गए हैं...यह भारत में सबसे कम पारदर्शी सरकारी निकायों में एक बन गया है.''
चर्च की चिंता बढ़ाने वाले प्रावधानों में एक 'नामित प्राधिकारी' से संबंधित है—यह सरकार की तरफ से नियुक्त एक ऐसा निकाय है जिसे किसी संगठन का एफसीआरए लाइसेंस रद्द, निलंबित या वापस होने की स्थिति में, संबंधित संगठन के विदेशी फंड और संपत्तियों (जिसमें अचल संपत्ति भी शामिल है) पर नियंत्रण का अधिकार दिया गया है.
एक अन्य प्रावधान 'निष्क्रिय' या प्रतिबंधित एनजीओ की संपत्तियों के हस्तांतरण या बिक्री की अनुमति देता है और इससे प्राप्त राशि भारत की संचित निधि में जमा करने का प्रावधान है. इन संशोधनों ने 'प्रमुख पदाधिकारियों' (निदेशक, ट्रस्टी, प्रमुख कर्मचारी) की परिभाषा का भी विस्तार किया है, ताकि उनकी व्यक्तिगत जवाबदेही बढ़ाई जा सके; साथ ही, विदेशी फंड के इस्तेमाल पर तीन साल की समय-सीमा तय की गई है और प्रशासनिक खर्चों से जुड़े नियमों को सख्त किया गया है.
चर्च के नेताओं का तर्क है कि इन संशोधनों से विदेशी फंडिंग पर निर्भर एनजीओ के लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा और अस्पतालों, स्कूलों और अनाथालयों के संचालन में भी बाधा आ सकती है. केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल के सेक्रेटरी फादर माइकल पुलिकल इसे अलोकतांत्रिक कदम बताते हैं, जो मौलिक अधिकारों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का उल्लंघन करता है.
उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''आशंका है कि यह संशोधन धार्मिक उत्पीड़न का हथियार बन सकते हैं.'' प्रस्तावित संशोधनों के पहले भी इस कानून की आलोचना होती रही है. ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क के संस्थापक और वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंसाल्विस कहते हैं, ''एफसीआरए ने उन लोगों को निशाना बनाया जो बुनियादी मुद्दों पर काम कर रहे थे—जैसे महिला और दलित अधिकार, पर्यावरण कानून, आवास, श्रम कानून और किसानों के अधिकार.''
राजनैतिक असर
इस विधेयक ने केरल—जहां 9 अप्रैल को चुनाव हो चुके हैं—और तमिलनाडु—जहां 23 अप्रैल को मतदान होना है—में सबसे ज्यादा हलचल मचाई. 2 अप्रैल को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने आरोप लगाया कि प्रस्तावित विधेयक ईसाई एनजीओ, गिरिजाघरों और अन्य अल्पसंख्यक संस्थानों पर सीधा हमला है. उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया, ''विपक्ष के विरोध और केरल चुनाव के कारण अभी भले ही सरकार पीछे हट गई हो लेकिन संसद के विशेष सत्र के दौरान एफसीआरए को पास कराने की योजना स्पष्ट नजर आती है.'' तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा, ''विपक्ष किसी भी संशोधन को पास नहीं होने देगा.''
राज्य की कुल आबादी में 18.4 फीसद ईसाइयों की हिस्सेदारी वाले केरल में एफसीआरए के तहत केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास पंजीकृत संगठनों की संख्या 3,090 है. 2017 में मंत्रालय ने 126 संगठनों का पंजीकरण रद्द कर दिया था. 2020 और 2022 में आयकर विभाग ने बिलीवर्स ईस्टर्न चर्च के परिसर से कथित तौर पर 15 करोड़ रुपए की बेहिसाब रकम जब्त की थी. 4 अप्रैल को त्रिशूर में केंद्रीय संसदीय कार्य और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने लोगों की आशंकाएं दूर करने की कोशिश करते हुए कहा, ''ईसाई समुदाय को चिंता करने की कतई जरूरत नहीं है...यह विधेयक सही काम कर रहे एनजीओ की मदद और समर्थन करेगा और सिर्फ उन गैर-कानूनी संगठनों और लोगों के साथ सख्ती बरतेगा जो भारतीय हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं.''
भाजपा की दुविधा
केरल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता इस विधेयक के समय और इसकी वजह से ईसाई वोटरों के पार्टी के खिलाफ लामबंद होने की आशंकाओं से घिरे थे. उन्होंने लोगों तक पैठ बनाने की कोशिशें कीं लेकिन तनाव चुनावी मैदान में भी नजर आने लगा, जब पूंजार से चुनाव लड़ रहे वरिष्ठ नेता पी.सी. जॉर्ज ने आरोप लगाया कि कांजीरापल्ली के बिशप होजे पुलिकल ने कॉन्वेंट को पूंजार में कांग्रेस उम्मीदवारों का समर्थन का निर्देश दिया है. उन्होंने कहा, ''जब चर्च को कोई दिक्कत हुई तो मैं उनके साथ खड़ा था. लेकिन अब ये लोग बेशर्मी से कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन कर रहे हैं.''
जॉर्ज ने प्रस्तावित संशोधन का समर्थन किया और चर्च से पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए अपनी विदेशी फंडिंग का खुलासा करने का आग्रह किया. उनके बेटे शोन जॉर्ज, जो पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं और पाला से चुनाव मैदान में हैं, ने भी इसका समर्थन किया और आरोप लगाया कि चर्च की तरफ से प्रकाशित दैनिक अखबार दीपिका ने चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के खिलाफ झूठी खबरें छापीं. जॉर्ज ने इंडिया टुडे से कहा, ''अगर चर्च भाजपा के खिलाफ काम करता रहेगा तो हम भी उनके प्रति वैसा ही रुख अपनाएंगे.''
2024 में त्रिशूर लोकसभा सीट जीतने के बाद भाजपा ने ईसाइयों के साथ अपना जुड़ाव बढ़ाया और समुदाय के कुछ वर्गों के बीच पैठ बनाई. राज्य नेतृत्व ने अपनी व्यापक रणनीति के तहत कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों को निशाना बनाते हुए 'लव जिहाद' अभियान आगे बढ़ाया. 2023 में साइरो मालाबार चर्च के पूर्व प्रमुख कार्डिनल जॉर्ज एलेनचेरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'एक अच्छा नेता और राजनेता' बताया था और कहा था कि भाजपा से ईसाइयों को कोई खतरा नहीं है.
आर्चबिशप जोसफ पम्प्लानी और बिशप एमेरेटस मैथ्यू अराकल जैसे नेताओं ने भी पार्टी से संपर्क साधा था. हालांकि, एफसीआरए में संशोधन के कदम ने इस पर पानी फेर दिया. विधेयक के ठंडे बस्ते में होने के बावजूद अविश्वास का माहौल कायम है.
