गेमिंग की दुनिया में दिखा रहीं दम
भारत के 50 करोड़ गेमर्स में अब करीब 40 फीसद महिलाएं होने का अनुमान. कई तो प्रोफेशनल गेमर बनीं और बड़ी संख्या में दर्शक जुटाने के साथ स्पॉन्सरशिप और टूर्नामेंट जीतने में भी कामयाब हो रहीं

छब्बीस वर्षीया सलोनी पवार बचपन में बड़े भाई सुकृत को हर दिन घंटों कंप्यूटर पर शूटर गेम काउंटरस्ट्राइक 1.6 खेलते देखतीं तो सोचतीं, ''इस बेवकूफ लड़के को बस लोगों को मारने में क्या ही मजा आता है?'' वे बार्बी की दीवानी थीं क्योंकि इस वीडियो गेम में वे माहिर थीं. इसमें खून-खराबा नाममात्र का और तड़क-भड़क ज्यादा थी.
पर शूटर गेम के प्रति भाई के दीवानेपन को देखकर सलोनी ने भी एक दिन इसे आजमाने की कोशिश की; और पाया कि यह तो बहुत मजेदार है. उन्हें याद है, जब उन्होंने बहुत ज्यादा स्कोर बनाया तो उनके भाई ने हैरानी जताते हुए पूछा था, ''लड़कियां तो वीडियो गेम खेलती भी नहीं!''
यह बात शायद एक-दो दशक पहले सच रही होगी. लेकिन आज महिला खिलाड़ी भारत के बढ़ते गेमिंग इकोसिस्टम का एक अहम हिस्सा बन चुकी हैं. निको पार्टनर्स की 'इंडिया गेमर बिहेवियर ऐंड मार्केट इनसाइट' रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 के आखिर तक देश के अनुमानित 50 करोड़ गेमर्स में करीब 40 फीसद महिलाएं थीं; पांच वर्ष पहले यह आंकड़ा 22 फीसद था.
फिक्की-ईवाइ की 2025 की एक रिपोर्ट भी इस ट्रेंड की पुष्टि करते हुए बताती है कि ई-स्पोर्ट्स में महिला प्रशंसकों की संख्या बढ़ रही है, जिसकी वजह 'बॉलीवुड के साथ कोलैबोरेशन और गेम्स में महिला किरदारों का अधिक होना है.' पायल धारे (25 वर्ष)—जिनके यूट्यूब पर 46 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं—जैसी गेमिंग की शौकीन महिलाएं बैटलग्राउंड मोबाइल इंडिया (बीजीएमआइ), ग्रांड थेफ्ट ऑटो वी, फॉल गाइज़ और कॉल ऑफ ड्यूटी जैसे गेम्स में अपनी स्किल्स लाइवस्ट्रीम करती हैं.
हाल में भारत के सबसे बड़े टूर्नामेंटों में से एक बीजीएमआइ सीरीज 2025 जीतने वाली टीम का हिस्सा रहीं तरुषिका (उर्फ शीक, 24 वर्ष) जैसी पेशेवर खिलाड़ी इस मुहिम को पूरे देश में लोकप्रिय बना रही हैं.
सलोनी की तरह ज्यादातर महिला गेमर्स को गेमिंग में दिलचस्पी अपने भाइयों के चलते हुई. पायल बताती हैं कि कैसे वे मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के उमरानाला में चचेरे भाइयों को खेलते देखती थीं और उन्हें भी खेलने का मौका देने की मिन्नतें करती रहती थीं. मुंबई की काशवी हीरानंदानी (उर्फ काशप्लेज़, 28 वर्ष) ने महज चार वर्ष की उम्र में अतारी और निनटेंडो के साथ गेमिंग शुरू कर दी थी; इसका श्रेय उनके बड़े भाई को जाता है, जो चाहते थे कि वे उनके साथ खेलें. काशवी बताती हैं, ''वे कोई मल्टीप्लेयर गेम खेल रहे होते तो मुझे प्लेयर 2 वाला रिमोट मिल जाता था.''
पितृसत्ता को चुनौती
बहरहाल, पुरानी वर्जनाएं आसानी से नहीं टूटतीं. जब भी युवतियों को इस क्षेत्र में मौका मिलता, उन्हें कई तरह के पूर्वाग्रहों का सामना भी करना पड़ता था, जैसे—''अरे वाह, तुम्हें गेमिंग पसंद है?'' या ''अरे, तुम तो दूसरी लड़कियों से बेहतर हो!'' काशवी याद करती हैं कि जैसे-जैसे वे बड़ी हुईं, एक-दूसरे को 'पछाड़ने की भावना' ने सारी हिचकिचाहट पीछे छोड़ दीं. इस शौक के चलते उन्हें परिवार में भी काफी विरोध झेलना पड़ा.
सलोनी याद करती हैं कि कैसे गेमिंग के शुरुआती दिनों में मां अचानक उनके कमरे में आ जातीं और डांटकर लाइवस्ट्रीम बंद करा देतीं. आज मां-बाप उन्हें नकद पुरस्कार वाले टूर्नामेंट में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करते हैं लेकिन उस समय ''यह सब एक बड़ा ड्रामा हो जाता था.'' तीसेक की, हैदराबाद की रहने वाली मौजूद सॉफ्टवेयर डेवलपर सोनाली सिंह कहती हैं, ''मेरे मम्मी-डैडी को आज भी यह सब बेवकूफी भरा लगता है पर चूंकि मेरा एक करियर है, सो मुझे मर्जी से कुछ भी करने देते हैं.''
ऑनलाइन गेमिंग कम्युनिटी खासी क्रूर हो सकती है, खासकर महिलाओं के लिए. पहनावे या लुक्स पर कमेंट करना या फिर किसी लड़की को किचन के बजाए गेम खेलते देख हैरानी जताना आम बात है. तरुषिका कहती हैं, ''खूबसूरती का उनका एक खास पैमाना होता है, जिसमें वे एक गर्ल गेमर को फिट करना चाहते हैं.'' एक बार सोनाली से कहा गया था कि वे अपना फेस कैम बंद कर दें तो कोई भी उसकी स्ट्रीम नहीं देखेगा.
वे बताती हैं, ''कोई महिला गेम हारे तो इसके लिए उसके जेंडर को जिम्मेदार माना जाता है.'' और जीतने पर लोगों की प्रतिक्रियाएं हैरानी जताने वाली भी होती हैं. काशवी सुर्खियों में आईं थीं जब उन्होंने 'कॉल ऑफ ड्यूटी' में एक टॉप मेल गेमर को हरा दिया. बकौल काशवी, ''वह उस समय लाइव स्ट्रीम कर रहा था और उसने कहा, ये लड़की नहीं हो सकती. मेरा प्रतिद्वंद्वी कोई हैकर है. शुक्र है, मैंने अपनी ओर से गेम रिकॉर्ड कर लिया था और उसे यूट्यूब पर अपलोड कर दिया था.'' वह वीडियो वायरल हो गया और इसने काशवी को अच्छी-खासी सैलरी वाली फाइनेंस की नौकरी छोड़ गेमिंग को फुल-टाइम करियर बनाने के लिए प्रेरित किया.
नॉडविन गेमिंग में ई-स्पोर्ट्स: पार्टनरशिप ऐंड स्पेशल प्रोजेक्ट्स के ग्लोबल हेड, निमिष राउत कहते हैं, ''हम ऐसी सोच वाले समाज से आते हैं जिसे लगता है कि 'लड़की होने के बावजूद' वह कैसे जीत रही है.'' इसी आम सोच की वजह से ठाणे की 30 साल की शगुफ्ता इकबाल (उर्फ एक्सवाइवाइए) जैसी मशहूर स्ट्रीमर्स मल्टीप्लेयर राउंड में अपना नाम छिपाना या माइक इस्तेमाल न करना पसंद करती हैं. सलोनी का सामना तो ऐसे गेमर से भी हो चुका है जिसने एक मिक्स्ड टीम छोड़ दी क्योंकि वह ''किसी महिला के साथ नहीं खेल सकता'' था.
रोजी-रोटी का साधन
दरअसल ज्यादातर महिला गेमर्स चाहती हैं कि उन्हें उनके कौशल के आधार पर परखा जाए. तरुषिका महिलाओं के लिए अलग से लीग या टूर्नामेंट में यकीन नहीं रखतीं; उनकी राय में एक महिला टीम में होने से आगे बढ़ने के मौके सीमित हो सकते हैं. वे एक टीम में थीं, उसके संदर्भ में कहती हैं, ''मुझे लगा कि मुझमें ज्यादा काबिलियत है.'' शगुफ्ता के मुताबिक, ''गेमिंग पूरी तरह हुनर पर आधारित है, और हुनर की कोई सीमा नहीं होती.''
बहरहाल, मौजूदा हालात को देखें तो सिर्फ मुकाबले ही महिला गेमर्स को वह आर्थिक सुरक्षा नहीं दे सकते जिसकी बतौर पेशेवर उन्हें जरूरत होगी. सलोनी इस पर जोर देती हैं कि अगर कोई ई-स्पोर्ट्स एथलीट के तौर पर पूरी तरह इसी क्षेत्र में उतरने की योजना बना रहा हो तो उसके पास अलग से आय का साधन जरूर होना चाहिए. शगुफ्ता ने पाया कि भारत में टिकाऊ टीमें और टूर्नामेंट सीमित होने के चलते अपने राउंड्स को स्ट्रीम करना बेहतर है ताकि वे अपने दर्शक बढ़ाकर स्पॉन्सरशिप पा सकें और कमाई बढ़ा सकें. वे कहती हैं, ''कंटेंट बनाने से मुझे ज्यादा आजादी मिलती है और गेमिंग को लोकप्रिय बनाना भी संभव हो पाता है.
आखिरकार इरादा तो यही है कि गेमिंग कम्युनिटी आगे बढ़े.'' एस8यूएल, रेवेनेंट ईस्पोर्ट्स, गॉडलाइक और अल्फा जीगस जैसे ई-स्पोर्ट्स संगठनों ने अब ज्यादा महिला गेमर्स को साथ जोड़ना शुरू कर दिया है. पायल जैसी कुछ गेमर्स ने तो आइसीसी टी-20 वर्ल्ड कप के खिलाड़ियों के अलावा मिस्टर बीस्ट और आइशो स्पीड जैसे ग्लोबल इन्फ्लुएंसर्स के साथ भी खुद को जोड़ा है; दो साल पहले गेमिंग पर एक चर्चा के दौरान उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने का भी मौका मिला.
वे सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली और सर्वाधिक कमाई वाली गेमिंग क्रिएटर्स में से एक हैं. उन्हें मोबीस अवॉर्ड्स 2024 में 'स्ट्रीमर ऑफ द ईयर' का अवॉर्ड मिला, जिसके साथ ही वे भारत की पहली ऐसी महिला गेमर बन गईं जिन्हें कोई इंटरनेशनल अवॉर्ड मिला.
लेकिन हमेशा खेल के प्रति प्रेम होना सबसे जरूरी होता है. सोनाली रोज 2-3 घंटे देती है. वे कहती हैं, ''मुझे गेमिंग से कोडिंग में आठ घंटे बिताने के दौरान होने वाला तनाव दूर करने में मदद मिलती है.'' 16 की उम्र में बतौर गेमर अपना पहला चेक पाने वाली सलोनी ने तबसे अब तक एक लंबा सफर तय किया है. वे मजाकिया लहजे में कहती हैं, ''मम्मी-डैडी मुझे छुट्टियों के लिए गोवा तक न भेजें लेकिन किसी टूर्नामेंट के लिए थाइलैंड जाती हूं तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं.'' बड़ी बात तो यह है कि आज वे अपने भाई से कहीं बेहतर गेमर हैं.