अब बस इंतजार में आंखें

पश्चिम एशिया में युद्ध के चलते व्यापार और यात्रा के रास्ते रुक जाने से भारत के प्रवासी धीरे-धीरे स्वदेश लौट रहे; शिपमेंट रुकने और तनख्वाहें घटने से वे खासे संकट में.

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लेबनान में भारत के राजदूत नूर रहमान शेख 11 मार्च को बेरुत से दिल्ली के लिए रवाना हो रहे भारतीयों के साथ

अमेरिका और इज्राएल के ईरान पर अचानक हमलों से ठीक एक दिन पहले ही दुबई में बसे व्यापारी अनीश तिवारी ने बड़ी उम्मीदों के साथ दक्षिण अफ्रीका के एक ग्राहक को उम्दा किस्म की सुरक्षा डिवाइसें बेची थीं. 2 मार्च को उनके बैंक खाते में 2 करोड़ रुपए आने वाले थे लेकिन तब तक आसमान में युद्धक विमान और ड्रोन आकर छा गए. 15 करोड़ रु. की उनकी शिपमेंट होर्मुज जलडमरूमध्य में फंस गई.

एक पखवाड़े बाद भी लड़ाई कम होने के कोई संकेत नजर नहीं आए तो उन्होंने फैसला किया कि जो हुआ सो हुआ और भारत जाने का टिकट खरीद लिया. अब उनकी भारत से तभी वापस जाने की योजना है जब होर्मुज का रास्ता फिर से खुल जाएगा. वे कहते हैं, ''यूएई में आम लोगों की जिंदगी बेहद सामान्य है लेकिन अनिश्चितता कारोबार के लिए नुक्सानदेह है.’’

फिर भी वे खुशकिस्मत लोगों में से एक हैं. उनके जैसे व्हाइट-कॉलर कर्मचारी युद्ध की मार से काफी हद तक बचे हुए हैं. लेकिन पश्चिम एशिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के दो-तिहाई लोग—जिनकी संख्या लगभग 90 लाख है—कंस्ट्रक्शन, लॉजिस्टिक्स, ट्रैवल और हॉस्पिटैलिटी जैसे क्षेत्रों में कम वेतन पर नौकरियां कर रहे हैं. पिछले दिनों भारत सरकार ने बार-बार कहा है कि घरेलू गैस सप्लाइ के साथ-साथ, इन लोगों की सलामती भी देश की सबसे बड़ी प्राथमिकता है.

क्या किया जा रहा
भारत दुनिया भर के उन तीन प्रमुख देशों में एक है जो समुद्री परिवहन के लिए कामगार मुहैया कराते हैं. भारत का योगदान लगभग 13 फीसद है. मौजूदा संकट से करीब 23,000 भारतीय समुद्री कामगारों के प्रभावित होने का अनुमान है. भारत सरकार ने सभी समुद्री कामगारों के लिए, भले वे किसी भी देश को हों, एक 24/7 हेल्पलाइन शुरू की है. इस महीने एक खास कंट्रोल रूम और क्विक रिस्पॉन्स टीम भी बनाई गई है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही संसद में कहा कि युद्ध शुरू होने के बाद से पश्चिम एशिया से 3.75 लाख भारतीय वापस लौटे हैं. सऊदी अरब इस पहल का अहम केंद्र है. कुवैत में भारतीय राजदूत परमिता त्रिपाठी का कहना है कि भारतीय कामगारों को सऊदी अरब के लिए ट्रांजिट वीजा दिलाने में मदद की जा रही है, जिससे वे वहां से हवाई जहाज से भारत लौट सकें.

कुवैत की जजीरा एयरवेज को छह भारतीय हवाई अड्डों के लिए उड़ानों का एक विशेष परमिट दिया गया है. लगभग 1,100 लोग और 17 लोगों के पार्थिव शरीर यहां लाए गए हैं. इराक में कार्यरत कामगारों को भी रियाद पहुंचने के लिए कहा गया है, जहां से भारतीय दूतावास उनकी आगे की यात्रा का इंतजाम करता है.

और क्या करने की जरूरत है?
इस जंग के लंबा खिंचने के साथ ही वहां से विस्थापित हुए लोगों के रोजगार की चिंता रहेगी. पश्चिम एशिया से हर साल आने वाली 50 अरब डॉलर की रेमिटेंस रकम भी दांव पर लगी है. तक्षशिला इंस्टीट्यूशन की रिसर्च एनालिस्ट शोभांकिता रेड्डी कहती हैं कि हजारों 'ब्लू-कॉलर’ (शारीरिक श्रम करने वाले) कामगारों को अनिवार्य छुट्टी पर भेज दिया गया है या उन्हें कम घंटों के लिए बुलाया जा रहा है, लेकिन बहुत कम लोग भारत लौट रहे हैं.

वे कहती हैं, ''हर कामगार भारत में जितना कमाता है, उसके मुकाबले वहां कम से कम तीन गुना ज्यादा कमाकर देश में कम से कम चार लोगों के अपने परिवार का भरण-पोषण करता है. ये ऐसी नौकरियां हैं जिसमें उनकी जगह कोई भी आसानी से ले सकता है. ऐसे ज्यादातर लोगों ने फिलहाल वहीं रुके रहने का फैसला किया है.’’

युद्ध ने कई सुविधाओं को बर्बाद कर दिया है, लिहाजा, कतर, सऊदी अरब और यूएई की तेल और एलएनजी रिफाइनरियों में स्टाफ की किल्लत रहेगी. इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स ऐंड फाइनेंशियल एनालिसिस के एनर्जी स्पेशलिस्ट (दक्षिण एशिया) चरित कोंडा कहते हैं, ''कार्यबल का स्वरूप बदल जाएगा. भारतीय लोग हर कौशल के काम कर रहे हैं, लेकिन पुनर्निर्माण के काम में ज्यादा महंगी 'व्हाइट-कॉलर’ भूमिकाएं कम हो जाने और ब्लू-कॉलर वाली नौकरियां बढ़ जाने की संभावना है.’’

एग्जीक्यूटिव सर्च और टैलेंट एडवाइजरी फर्म एबीसी कंसल्टेंट्स के शिव अग्रवाल का मानना है कि बड़े पैमाने पर रिवर्स माइग्रेशन शुरू होने में अभी छह महीने और लग सकते हैं. वे कहते हैं, ''निश्चित ही भर्तियों पर रोक है. इसके अलावा, प्रतिभाशाली लोग अभी जीसीसी (खाड़ी सहयोग परिषद) के देशों में नौकरियां लेने को तैयार नहीं है.’’

शारजाह में इंडियन बिजनेस ऐंड प्रोफेशनल काउंसिल के चेयरमैन लालू सैमसन कहते हैं, ''पर्यटन पर वाकई असर पड़ा है और स्टाफ ने शिफ्ट कम कर दी हैं, लेकिन नियोक्ता प्रशिक्षित कर्मियों को रोके रखना चाहते हैं.’’

अकेली आबादी जो शायद मौजूदा संकट से थोड़ी खुश हो सकती है, वह है जीसीसी देशों के कक्षा 10 और 12 के छात्र—जिनके 220 स्कूलों की वार्षिक परीक्षाएं सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकंडरी एजुकेशन ने रद्द कर दी हैं. 

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