आसमान में जहाजों का टोटा

एअरस्पेस बंद होने और युद्ध के जोखिम से जुड़े खर्चों ने भारत के सबसे व्यस्त अंतरराष्ट्रीय मार्गों में बाधाएं खड़ी कर दीं. उड़ानें रद्द हो रहीं, किराए आसमान छू रहे और एअरलाइनों पर आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा.

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सफर का सपना टूटा 16 मार्च को दिल्ली के आइजीआइ हवाई अड्डे पर यात्री पश्चिम एशिया जाने वाली विलंबित उड़ानों की जानकारी लेते हुए

दिल्ली के सर्जन डॉ. विजय एस. पांडे अबू धाबी में परिवार के साथ छुट्टियां बिताकर घर लौटने को तैयार थे तभी एयरस्पेस बंद हो गया. 5 मार्च को उन्होंने अगले दिन के लिए फुजैरा से दिल्ली तक स्पाइसजेट की 'स्पेशल डिस्ट्रेस फ्लाइट’ (विशेष आपातकालीन उड़ान) में पांच सीटें बुक कीं, हरेक लगभग 1 लाख रुपए में.

उनके अकाउंट से पैसे तुरंत कट गए लेकिन कोई पीएनआर जेनरेट नहीं हुआ. 6 मार्च की उड़ान रद्द हो गई. 22 मार्च तक भी उनका रिफंड नहीं आया था. अब घर लौट चुके पांडे कहते हैं, ''मैंने सामान्य किराए से पांच गुना ज्यादा पैसे दिए. एअरलाइंस हमारी तकलीफों से मुनाफा कमा रही हैं.’’

घबराहट में बुकिंग, बिना टिकट बने पैसे कटना, उड़ान रद्द हो जाना —सिर्फ पांडे की कहानी नहीं है. सरकार का कहना है कि 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से करीब 4,26,000 भारतीय खाड़ी देशों से लौटे हैं. भारत-खाड़ी विमानन क्षेत्र पर किराया 300-460 फीसद तक बढ़ गया है, उड़ान का समय ज्यादा हो गया है और अचानक उड़ानें रद्द हो रही हैं, जिससे यह अहम रास्ता अब महंगा और अनिश्चित बन गया है.

इसकी वजह है, पूर्वी भूमध्य सागर से लेकर फारस की खाड़ी तक फैला हवाई क्षेत्र बंद हो जाना. इराक, कुवैत और सीरिया नागरिक उड़ानों के लिए पूरी तरह बंद हैं. बहरीन, इज्राएल और कतर में पहले से अनुमति प्राप्त सीमित उड़ानों को ही इजाजत है.

यूएई से आने-जाने का रास्ता महज एक पश्चिमी गलियारे तक सिमटकर रह गया है, जिसके अचानक बंद होने का खतरा रहता है. अप्रैल 2025 में 'ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद से भारतीय-पंजीकृत विमानों के लिए पाकिस्तान का आसमान पहले ही बंद है. इसलिए पश्चिम की ओर जाने वाले दोनों गलियारे जाम हैं.

भारत-खाड़ी उड़ानों के कुल समय में 45 से 120 मिनट की बढ़ोतरी हो रही है. नेवार्क और न्यूयॉर्क से एअर इंडिया की उड़ानें अब ईंधन भरवाने के लिए रोम में रुकती हैं. इंडिगो ने 2 मार्च को एक ही दिन में पश्चिम एशिया की 162 उड़ानें रद्द कर दीं. उसकी 75.9 फीसद अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रद्द हैं.

मार्च के मध्य तक हवाई किराए भी आसमान छूने लगे. अबू धाबी से दिल्ली के लिए एकतरफ का टिकट आम तौर पर 10,000-21,500 रुपए का होता है, जो 39,285 से लेकर 69,678 रुपए में बिक रहा था. दुबई-दिल्ली रूट पर किराया बढ़कर 50,000-60,000 रुपए हो गया और ऐन वक्त पर लिए गए टिकटों की कीमत तो इससे भी ज्यादा थी.

दुबई-कोच्चि रूट पर—जो केरल के 22 लाख प्रवासी समुदाय के लिए जीवनरेखा है—एकतरफ का किराया 62,000 रुपए तक पहुंच गया. भारत-अमेरिका जैसे लंबी दूरी के रूटों पर वापसी का किराया आमतौर पर 45,000-1,00,000 रुपए के बीच होता है, लेकिन वह भी बढ़कर 1.3 लाख से 2.25 लाख रुपए तक पहुंच गया. बेंगलूरू-फ्रैंकफर्ट रूट पर वापसी का किराया लगभग 80,000 रुपए से बढ़कर 1,90,000 रुपए हो गया.

इस इजाफे की वजह सिर्फ सप्लाइ की ही कमी नहीं है. युद्ध का जोखिम बीमा प्रीमियम 10-20 गुना बढ़ गया है, जिससे आने-जाने की उड़ान पर हर नैरोबॉडी फ्लाइट के लिए 30-40 लाख रुपए और वाइडबॉडी के लिए 1 करोड़ रुपए तक का अतिरिक्त खर्च आ रहा है. यह खर्च वापसी में उन उड़ानों के मुसाफिरों से वसूला जाता है जो पूरी तरह भरी होती हैं.

28 फरवरी से एक हफ्ते के भीतर जेट ईंधन की कीमतों में 58.4 फीसद की भारी बढ़ोतरी हुई; इसकी कीमत 99.40 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 157.41 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. दिल्ली में घरेलू एटीएफ (एअर टर्बाइन फ्यूल) की कीमत 96,638 रुपए प्रति किलोलीटर तक जा पहुंची हैं. डायवर्ट की गई लंबी दूरी की हर उड़ान में औसतन चार टन अतिरिक्त ईंधन खर्च होता है, जिससे उड़ते समय हर अतिरिक्त घंटे पर 6,000 से 7,500 डॉलर तक का ज्यादा खर्च आता है.

भारत में एअरलाइंस के कुल परिचालन खर्च में ईंधन का हिस्सा लगभग 40 फीसद होता है. विमानन सलाहकार फर्म कापा इंडिया के सीईओ कपिल कौल कहते हैं, ''यह स्थिति कुछ सप्ताह और रही तो एअरलाइनों का परिचालन असंभव हो सकता है. भारतीय एअरलाइनों को अब तक लगभग 23,500 करोड़ रुपए का नुक्सान हो चुका है. अगर रुपए की कीमत प्रति डॉलर 100 तक पहुंची तो हालात बदतर हो जाएंगे.’’

क्या किया जा रहा
कई एअरलाइंस 'नाजुक वित्तीय स्थितियों’ का सामना कर रही हैं, इसलिए सरकार ने किराए की उन सीमाओं को हटा दिया है जो दिसंबर 2025 में इंडिगो के कारण हुई अफरा-तफरी के दौरान लगाई गई थीं. यह कदम 'फेडरेशन ऑफ इंडियन एअरलाइंस’ की लॉबीइंग के बाद उठाया गया है. साथ ही, एअरलाइंस थोड़ा-सा 'फ्यूल सरचार्ज’ भी लगा रही हैं. हालांकि उनका कहना है कि पूरी लागत की भरपाई के लिए किराए में बढ़ोतरी की जरूरत होगी.

विदेश मंत्रालय अतिरिक्त उड़ानों को मंजूरी देने और छात्रों, कामगारों तथा मेडिकल-इमरजेंसी मामलों को प्राथमिकता के लिए अंतर-मंत्रालयी तंत्र का संचालन कर रहा है. जहां सीधे रास्ते अभी भी बंद हैं, वहां भारत तुर्किए, आर्मेनिया, अजरबैजान और जॉर्डन के रास्ते 'ट्रांजिट कॉरिडोर’ (पारगमन गलियारे) खोलने में मदद कर रहा है. नियमित व्यावसायिक उड़ानें भी अब चरणबद्ध तरीके से शुरू हो गई हैं.

और क्या करने की जरूरत
एशिया पैसिफिक फ्लाइट ट्रेनिंग एकेडमी के सीईओ डी.पी. हेमंत कहते हैं कि दो अहम बातें हैं: एटीएफ पर राज्यों के वैट को तर्कसंगत बनाना और तेल मार्केटिंग कंपनियों (ओएमसी) को, जहां भी संभव हो, मुनाफा कम करने के लिए तैयार करना. सरकार यह संभावना भी टटोल रही है कि क्या ओएमसी का कीमतों में बदलाव, जो अप्रैल में होना है, को कुछ महीनों के लिए टाला जा सकता है, ताकि हवाई किरायों और माल ढुलाई की दरों को अचानक के झटकों से बचाया जा सके.

हेमंत लीज किरायों का मुद्दा भी उठाते हैं. अकेले इंडिगो ही विमानों की लीज पर हर साल 10,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का भुगतान करती है; एअर इंडिया का खर्च भी कई हजार करोड़ रुपए में है. और उन्हें यह पैसा उन उड़ानों के लिए भी देना पड़ता है जो जमीन पर हैं और उड़ान नहीं भर रहीं. हेमंत कहते हैं, ''सरकार को राहत पैकेज लाना चाहिए. हमारे यहां ऑपरेटरों की कमी वाला और कम सेवाओं वाला विमानन बाजार है. विमानन क्षेत्र को लगने वाला कोई भी झटका अर्थव्यवस्था पर बहुत ज्यादा असर डालता है.’’ 

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