टुकड़ों में लड़ेगी बाजी?

चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में अप्रैल में हो रहे चुनाव से पहले कांग्रेस खासी विरोधाभासी स्थिति में—केरल में वह मजबूती से मुकाबले में, लेकिन बाकी जगह लड़खड़ा रही. यह हाल लचर-लुचपुचे पार्टी ढांचे, कमजोर गठजोड़ और नेताओं के पलायन के चलते.

mandate 2026: congress 
कांग्रेस नेता राहुल गांधी 6 मार्च को कोल्लम में

कांग्रेस अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनावों में ऐसी पार्टी के तौर पर उतर रही है जिसकी लड़ाई की शर्तें हर चुनावी मैदान में बिल्कुल अलहदा हैं. केरल में वह गठबंधन की सबसे दमदार पार्टी है. तमिलनाडु में दुश्मनों से घिरी गठबंधन की दोयम साझेदार है. असम में वह चौतरफा घिरे विपक्ष के तौर पर हाथ-पैर मार रही है. पश्चिम बंगाल में बमुश्किल ही दिख रही है. और पुदुच्चेरी में वह गठबंधन के ऊहापोह में फंसी है.

यह विरोधाभास भारत की ग्रैंड ओल्ड पार्टी के विरोधाभासों से बखूबी मेल खाता है. राष्ट्रीय स्तर पर वह प्रासंगिक है लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर टुकड़ों में बंटी है. उसमें जब-तब अच्छे प्रदर्शन की कौंध तो दिखती है लेकिन दशकों की सांगठनिक सड़ांध, दलबदल, ताकतवर क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों के उभार और भाजपा की ध्रुवों में साफ-साफ बांटने वाली मशीनरी से उसका ढांचा एकदम जर्जर हो गया है.

कांग्रेस की जिस तरह की जरूरतें हैं, उसके चलती उसकी पूरी चुनावी रणनीति पैबंद जैसी व्यवस्था में बदल गई है. जहां वह बेहतर रूप में मौजूद है वहां सत्ता-विरोधी भावना को मजबूत करे, जहां कोई चारा न हो वहां क्षेत्रीय मोर्चों का सहारा ले और आलाकमान की देखरेख में अंदरूनी दरारों पर लीपापोती करे. लेकिन यह तथ्य है कि इसमें नई जान फूंकने का काम बीहड़ और खतरनाक ढंग से नाजुक बना हुआ है.

केरल
चुनावों की तरफ बढ़ रहे राज्यों में से केरल ही है जहां कांग्रेस के पास सरकार बनाने का सबसे मजबूत मौका है. कांग्रेस की अगुआई वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) पिछले पांच सालों में एक के बाद एक मिली तीन चुनावी फतहों के उत्साह से भरा चुनावी दौड़ में उतर रहा है—2021 के बाद हुए विधानसभा के पांच उपचुनावों में से चार में जीत, 2024 में लोकसभा की 20 सीटों में 18 पर शानदार जीत और दिसंबर 2025 में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में 941 ग्राम पंचायतों में 505 पर कब्जा.

मगर केरल में तिकोने मुकाबले का मतलब यह भी है कि सत्ता-विरोधी भावना का फायदा सीधे-सीधे विपक्ष को नहीं मिलेगा. भाजपा ने 2024 में केरल की अपनी बिल्कुल पहली लोकसभा सीट त्रिशूर से जीती और अब वह 140 सदस्यों की विधानसभा में से 10-15 सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है. ऐसे में कई राजनैतिक पर्यवेक्षकों की माने तो वह इतने ज्यादा लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ)-विरोधी वोट अपनी तरफ खींच रही है कि मतदाताओं की नाराजगी के बावजूद मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन सत्ता में बने रह सकते हैं.

कांग्रेस ने अभी तक अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है. हालांकि नेता विपक्ष वी.डी. सतीशन यूडीएफ के चुनाव अभियान का मुख्य चेहरा बनकर उभरे हैं. उन्होंने 25 दिनों की 'पुतुयुग यात्रा’ की अगुआई की, जो 121 जनसभाओं के बाद 7 मार्च को तिरुवनंतपुरम में पार्टी के बड़े नेता राहुल गांधी के संबोधन के साथ खत्म हुई. दो और गंभीर दावेदार हैं—अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में संगठन के प्रभारी महासचिव के.सी. वेणुगोपाल और रमेश चेन्नितला.

एक और घटना ने पार्टी के तनावों को उघाड़कर रख दिया. केपीसीसी के पूर्व अध्यक्ष के. सुधाकरन ने कन्नूर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की मांग की, बावजूद इसके कि आलाकमान ने मौजूदा सांसदों के राज्य विधानसभा चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी है. कई दिनों की खुलेआम खींचतान के बाद सुधाकरन 19 मार्च को माने, लेकिन इस संकट की वजह से कांग्रेस उम्मीदवारों की दूसरी सूची आने में देर हो चुकी थी. और इस बीच वेणुगोपाल-सतीशन खेमे तथा चेन्नितला-सुधाकरन गठजोड़ के बीच फूट खुलकर सामने आ चुकी थी.

चुनाव अभियान भी एलडीएफ की दशक भर लंबी हुकूमत (2016-2026) के खिलाफ सत्ता-विरोधी भावना पर केंद्रित है. इसमें सबरीमाला मंदिर में सोने की चोरी के आरोपों, केरल के राजकोषीय संकट, कल्याणकारी पेंशन मिलने में देरी और प्रस्तावित के-रेल गलियारे को लेकर उठे विवाद को प्रमुखता से उठाया जा रहा है.

जमीन के अधिग्रहण, पारिस्थितिकी तंत्र को होने वाले जोखिम और भारी लागत की वजह से इस गलियारे का विरोध हो रहा है. चुनाव अभियान में राहुल को उतारा गया है, जो चुनाव को 'बदलाव’ के लिए वोट की तरह पेश कर रहे हैं. कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस की जीत के शिल्पकार रह चुके चुनावी रणनीतिकार सुनील कानुगोलू की नियुक्ति से 'मिशन 2026’ की कोशिशों की गंभीरता का पता चलता है.

अलबत्ता यूडीएफ के रणनीतिकारों को पिछले इतिहास पर नजर दौड़ाना चाहिए और उसकी फिक्र करनी चाहिए. 2010-11 में मोर्चे ने स्थानीय निकायों के चुनावों में 2025 से भी बड़ी जीत हासिल की थी लेकिन उस बढ़त और जज्बे को विधानसभा चुनाव में वैसी प्रभावशाली जीत में तब्दील नहीं कर पाया था. प्रचार के लिए मिला 25 दिनों का सीमित समय भी केरल के विधानसभा चुनाव के इतिहास में सबसे कम है और यह सत्ताधारियों के मुकाबले उन्हें ललकारने वालों के लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण है.

असम
यहां कांग्रेस चुनाव से ठीक पहले अपने पूर्व राज्य अध्यक्ष, एक मौजूदा लोकसभा सांसद, तीन मौजूदा विधायकों और अपने पूर्व उपाध्यक्ष से हाथ धो बैठी. वे सब के सब भाजपा की ओर कूच कर गए. ऐसे माहौल में चुनाव अभियान की कमान 43 वर्षीय गौरव गोगोई के हाथों में सौंपी गई. मई 2025 में राज्य अध्यक्ष नियुक्त किए गए गोगोई अपना पहला विधानसभा चुनाव जोरहाट से लड़ रहे हैं, जहां गठबंधन में शामिल रायजोर दल के मुखिया अखिल गोगोई विपक्ष के मुख्यमंत्री पद के चेहरे के तौर पर खुले आम उनका अनुमोदन कर रहे हैं.

कांग्रेस ने छह पार्टियों के गठबंधन असोम सोन्मिलितो मोर्चे का तानाबाना बुना है, और ऊपरी असम में पार्टी की उम्मीदें अहोम समुदाय के तीन नेताओं—गौरव, अखिल और असम जातीय परिषद के प्रमुख लुरिनज्योति गोगोई—के साथ आने पर टिकी हैं. वे मिलकर उस क्षेत्र में गैर-भाजपाई वोटों को लामबंद करने की आस लगाए हैं जहां अहोम मतदाता आठ सीटों पर पारंपरिक रूप से निर्णायक रहते आए हैं.

इतना ही अहम यह है कि पार्टी ने बदरुद्दीन अजमल के ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआइयूडीएफ) के साथ गठबंधन करने से इनकार कर दिया. यह 2021 में नाकाम हुई उस रणनीति के बिल्कुल उलट था जब भाजपा ने कांग्रेस पर 'मुस्लिम पार्टी’ होने का ठप्पा लगा दिया. इसकी कीमत पार्टी को ऊपरी असम की कई सीटें खोकर चुकानी पड़ी थी.

2026 का गुणाभाग यह है कि एआइयूडीएफ के मुस्लिम वोट बैंक को औपचारिक गठबंधन के बिना स्वाभाविक ढंग से यूं ही हथिया लिया जाए. यह 2024 के लोकसभा चुनाव के पैटर्न को दोहराने की तरह है जब रकीबुल हुसैन ने धुबरी में अजमल को दस लाख से भी ज्यादा वोटों से धूल-धूसरित कर दिया था.

कांग्रेस के कठघरे मेेंं प्रियंका गांधी, गौरव गोगोई (बाएं) और विपक्ष के नेता देवब्रत सैकिया गुवाहाटी में सरमा के खिलाफ कांग्रेस क

मगर परिसीमन की वजह से उन सीटों की संख्या मोटे तौर पर 35 से घटकर 24 पर आ गई है जहां मुसलमानों के वोट निर्णायक हैं. उधर वोटों का बंटना असल खतरा बना हुआ है, खासकर जब एआइयूडीएफ मैदान में है और एनडीए के सहयोगी दल असम गण परिषद (एजीपी) ने 13 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं, जिनमें कांग्रेस और एआइयूडीएफ दोनों के दलबदलू शामिल हैं.

मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा के खिलाफ पार्टी का 20 सूत्री 'आरोपपत्र’ प्रियंका गांधी वाड्रा ने फरवरी में गुवाहाटी में जारी किया. उसमें उन पहलुओं पर निशाना साधा गया है जिसे कांग्रेस 'सिंडीकेट राज’ कहती है, और अवैध खनन, नशीले पदार्थों की तस्करी, टोल वसूली के नेटवर्क के जरिए व्यवस्थागत भ्रष्टाचार के आरोप लगाती है.

चुनाव अभियान में नागरिकता (संशोधन) कानून को लागू करने, बेरोजगारी और सच्चे भारतीय नागरिकों को निकाल देने वाले बेदखली अभियानों को लेकर भाजपा पर हमले किए जा रहे हैं. कांग्रेस ने 126 में से 94 सीटों के उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं. स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष के तौर पर प्रियंका की नियुक्ति से असम से पार्टी नेतृत्व के गहरे जुड़ाव की झलक मिलती है, खासकर जब पहली बार गांधी परिवार का कोई सदस्य उम्मीदवार चुनने वाली समिति में है.

तमिलनाडु
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) की अगुआई वाले सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलांयस में कांग्रेस को 28 सीटें दी गईं, जो 2021 में उसे मिली सीटों से तीन ज्यादा और डीएमके के सभी सहयोगी दलों में भी सर्वाधिक थीं. मगर यह समझौता खतरनाक ढंग से टूटने की कगार पर पहुंच गया. पार्टी ने शुरुआत में गठबंधन में सत्ता के बंटवारे के 'झारखंड फॉर्मूले’ की दुहाई देते हुए 40 से ज्यादा सीटों और राज्य मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी की मांग की. डीएमके ने दोनों मांगें सिरे से ठुकरा दीं.

कांग्रेस के डेटा एनैलिटिक्स के प्रमुख और राहुल के विश्वासपात्र प्रवीण चक्रवर्ती ने दिसंबर 2025 में अभिनेता से सियासतदां बने विजय के तमिलगा वेट्टी कलगम (टीवीके) से मुलाकात की. इससे डीएमके में नाराजगी फैल गई क्योंकि उसे लगा कि कांग्रेस वैकल्पिक गठबंधन की तलाश कर रही है. जवाब में डीएमके ने 3 मार्च की समयसीमा तय कर दी, और इसके समर्थन में ठोस आंकड़े पेश किए: 2011 में जब कांग्रेस ने आखिरी बार अकेले चुनाव लड़ा, तब उसने 63 में से 5 सीटें जीतीं, और 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने दम पर वोट हिस्सेदारी महज 4.5 फीसद थी.

आखिरकार सोनिया गांधी ने पी. चिदंबरम को डीएमके के प्रमुख और मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन से मिलने भेजा. 4 मार्च को जो समझौता हुआ और जिसमें पार्टी को 28 सीटें और राज्यसभा की एक सीट दी गई, उससे व्यावहारिक लेनदेन की झलक मिली.

तमिलनाडु में कांग्रेस 2021 में दी गई 25 सीटों में से 18 जीती थीं, 72 फीसद की यह सफलता दर पूरी तरह डीएमके की सांगठनिक मशीनरी और वोटों के हस्तांतरण की बदौलत हासिल हुई थी. डीएमके का जनाधार कायम रहता है, तो कांग्रेस को अपनी 28 सीटों में से ज्यादातर आसानी से जीत लेनी चाहिए.

पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल की सभी 294 सीटों पर अकेले लड़ने का कांग्रेस का फैसला उसकी 2026 की रणनीतियों में शायद सबसे गुस्ताखी भरा है. 2021 में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई और उसकी वोट हिस्सेदारी 2.94 फीसद पर सिमट गई. इस बार सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने सीटों के बंटवारे में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और उसके राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने तो यहां तक कह दिया कि कांग्रेस टीएमसी को 'एकतरफा समर्थन’ दे.

बहरामपुर से पांच बार सांसद रह चुके और अपनी यह सीट 2024 में टीएमसी के हाथों गंवा बैठे अधीर रंजन चौधरी के बहरामपुर क्षेत्र से चुनाव लड़ने की उम्मीद की जा रही है. ऐसा हुआ तो वे 1996 के बाद पहली बार राज्य स्तर का चुनाव लड़ेंगे. 70 की उम्र में वे बंगाल में पार्टी का सबसे जाना-पहचाना चेहरा हैं.

राज्य अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने पार्टी संगठन को नए सांचे में ढाला, जिला इकाइयों की संख्या 28 से बढ़ाकर 33 की और राजनैतिक मामलों और चुनाव समितियों का विधिवत गठन किया. मगर कांग्रेस ने 21 मार्च तक उम्मीदवारों की सूची जारी नहीं की थी और ऐसा करने वाली वह आखिरी बड़ी पार्टी थी.

चतुष्कोणीय लड़ाई के तानेबाने (टीएमसी बनाम भाजपा बनाम कांग्रेस बनाम वाम दल) ने ऐसा परिदृश्य पैदा कर दिया है, जिसमें कांग्रेस की मौजूदगी का असर जीत के फासले पर ही पड़ सकता है. 2006 में पार्टी ने अकेले लड़कर 21 सीटें जीती थीं. यह इतना ऊंचा रिकॉर्ड है जिसे अंतत: पाने की आशा वह करती है.

पुदुच्चेरी
सबसे फौरी संकट इस छोटे-से केंद्र शासित प्रदेश में सामने आया जब डीएमके के साथ सीटों के बंटवारे के समझौते को नामांकन के आखिरी दिन 23 मार्च को अंतिम रूप दिया जा सका. समझौते के तहत कांग्रेस 30 में से 16 सीटों पर और डीएमके 14 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. 2021 में डीएमके ने छह और कांग्रेस ने दो सीटें जीती थीं, मगर कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव पर भरोसा करके चल रही है, जिसमें वह 30 में से 28 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही थी.

उस बढ़त को जीत में बदलने के लिए गठबंधन को जमीन पर कारगर होना होगा. सीटों के बंटवारे में देरी का असर पहले ही कई उम्मीदवारों की तैयारी पर पड़ चुका है और पार्टी का टिकट हासिल न कर पाने वाले नेताओं के दिलों में टीस कायम है. चुनावी जंग के पांचों मैदानों में एक पैटर्न साफ नजर आता है—कांग्रेस की राष्ट्रीय पहचान और मुद्दों को पेश करने की उसकी काबिलियत जमीन पर उसकी संगठन क्षमता से कहीं ज्यादा मजबूत है. नतीजा, 2026 में वह ऐसी पार्टी के तौर पर कदम रख रही है जो राज्य दर राज्य अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए जूझ रही है.

उम्मीद के कुछ टापू
चुनावी जंग के पांचों मैदानों में कांग्रेस की रणनीति कहीं जीत पक्की करने की तो कहीं पूरी तरह से सूपड़ा साफ होने वाली स्थिति से बचने की

केरल: पूर्व स्थानीय सांसद राहुल गांधी की लोकप्रियता और रणनीतिकार सुनील कानुगोलू की निपुण व्यूहरचना से उत्साहित कांग्रेस यूडीएफ के मजबूत गठबंधन की अगुआई कर रही है. मगर मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा को लेकर चल रही खींचतान और बहुकोणीय मुकाबलों की वजह से तस्वीर धुंधली.

असम: उसने छह पार्टियों का गठबंधन बनाया है, जिसमें गौरव गोगोई विपक्ष के मुख्यमंत्री पद के चेहरे हैं. मगर दलबदल, अंतर्कलह, जमीन पर कमजोर संगठन और परिसीमन के बाद मुस्लिम वोट बैंक की चुनावी अहमियत में कमी से अभियान लड़खड़ाया.


तमिलनाडु: सत्तारूढ़ डीएमके का दोयम साझेदार होने के नाते कांग्रेस की किस्मत सत्ता-विरोधी भावना और विजय की टीवीके के असर से जुड़ी है. गठबंधन को लेकर आंतरिक असंतोष भी.

पश्चिम बंगाल: महज वजूद की लड़ाई—कोई भरोसेमंद चेहरा नहीं, जर्जर संगठन और पिछले चुनावों की शून्य सीटों के आंकड़े में सुधार की चुनौती.

पुडुच्चेरी: कांग्रेस को फिर उठ खड़े हुए और पिछले चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करने वाले अपने सहयोगी दल डीएमके के साथ कड़ा मोलभाव करना पड़ा. सीटों के बंटवारे में नामांकन के आखिरी दिन तक देरी की वजह से सत्तारूढ़ एनडीए को बढ़त की संभावना. 

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