बदलाव पलक झपकने की रफ्तार से
कनाडा के बिजनेसमैन सलीम इस्माइल कहते हैं कि किसी कंपनी में कोई क्रांतिकारी विचार तभी पनप सकता है जब उस कंपनी के भीतर मौजूद 'प्रतिरोधी तंत्र’ का मुकाबला किया जा सके.

दुनिया की सबसे बड़ी समस्याएं वास्तव में सबसे बड़े अवसर भी होती हैं. सलीम इस्माइल—जिन्होंने सिलिकॉन वैली में सात साल बिताए, याहू में काम किया और अपनी एक कंपनी गूगल को बेची—का मानना है कि ''एआइ जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के माध्यम से बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं.’’
लेकिन इन तकनीकों को संगठनों के मुख्य कामकाज का हिस्सा बनाने के बजाए, उससे इतर स्वतंत्र रूप से विकसित करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए. इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में उन्होंने देश के सामने मौजूद विभिन्न चुनौतियों, जैसे स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, स्वच्छ जल, ऊर्जा और गरीबी आदि के बारे में बात की और बताया कि कैसे तकनीक इन समस्याओं के समाधान खोजने में तेजी ला सकती है.
वे कहते हैं, ''हम अपने तरीकों को अब इस तरह बदल रहे हैं कि मशीन सीधे मशीन से बात करे. हमें बीच में इंसानों की जरूरत नहीं है. वे बहुत धीमी गति से काम करते हैं, गलतियां करते हैं और राजनीति भी करते हैं. वे बीमार पड़ते हैं, छुट्टियां लेते हैं, यूनियन बनाते हैं और ऐसी और भी बहुत-सी चीजें होती हैं.’’ इस्माइल आगे कहते हैं, ''हम अपने सारे काम स्वाचालित करने जा रहे हैं. इंसान सिर्फ डैशबोर्ड पर नजर रखेंगे और केवल तभी दखल देंगे जब कहीं कोई गड़बड़ी होगी.’’
लेकिन नए अवसरों का लाभ उठाना आसान नहीं होता क्योंकि ये संगठन बदलाव के लिए आसानी से तैयार नहीं होते हैं. इस्माइल कहते हैं कि किसी कंपनी में कोई क्रांतिकारी विचार तभी पनप सकता है जब उस कंपनी के भीतर मौजूद 'प्रतिरोधी तंत्र’ का मुकाबला किया जा सके. बड़ी कंपनियों के भीतर कौशल वाली टीमें बनाई जा सकती हैं और उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने का मौका दिया जा सकता है.
ऐपल इसमें माहिर कंपनी है. इस्माइल बताते हैं, ''वे एक छोटी, बेहद क्रांतिकारी टीम बनाते हैं और उसे संगठन से इतर काम करने का मौका देते हैं. वे उन्हें गोपनीय रखते हैं और टीम को किसी अन्य उद्योग में क्रांति लाने को कहते हैं, चाहे घड़ियां हों, भुगतान हो, खुदरा बिक्री हो या कुछ और हो.’’ बदलाव तब होता है जब किसी की उस पर नजर नहीं होती है.