ये रहे सूत्र आपकी उम्दा सेहत के
भारत में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. डायबिटीज पहले ही काफी फैल चुकी है और दिल से जुड़े खतरे भी चिंता का विषय हैं

नब्बे के दशक के ऐक्शन हीरो सुनील शेट्टी के लिए कभी फिटनेस का मतलब था कैमरे के लिए मसल्स बनाना. आज उनके लिए इसका मतलब कुछ और है—अपनी पोती के लिए स्वस्थ और सक्रिय बने रहना. यह बदलाव सिर्फ उनका निजी नहीं, बल्कि भारत में सेहत की बदलती सोच का आईना है.
आज लोग अपनी सेहत पर पहले से कहीं ज्यादा नजर रख रहे हैं. जिम मेंबरशिप बढ़ रही हैं, बाजार में सप्लीमेंट्स भरे पड़े हैं और वेलनेस रिट्रीट्स डिटॉक्स से लेकर मानसिक शांति तक सब कुछ देने का दावा कर रहे हैं.
लेकिन इसके बावजूद देश में लाइफस्टाइल से उपजी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. भारत को अक्सर डायबिटीज कैपिटल कहा जाता है, युवा हार्ट अटैक का शिकार हो रहे हैं और तनाव अब लगभग एक राष्ट्रीय समस्या बन चुका है.
इसी पृष्ठभूमि में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में वेलनेस पर चर्चा हुई, जहां फिटनेस, पारंपरिक चिकित्सा और मेडिकल डायग्नोस्टिक्स से जुड़े विशेषज्ञों ने इस सवाल पर बात की कि आखिर स्वास्थ्य का मतलब बदल कैसे रहा है.
सुनील शेट्टी के मुताबिक वेलनेस की शुरुआत किसी जटिल रूटीन से नहीं, बल्कि इसके लिए निरंतरता चाहिए होती है. उनकी सोच सरल है, ''आपको चलना है, एक्सरसाइज करनी है, अपने खाने और नींद को समझना है. बाकी कुछ मायने नहीं रखता.'' उन्होंने यह भी जोड़ा कि अपने शरीर को समझना जरूरी है, न कि ट्रेंड्स के पीछे भागना. वे कहते हैं, ''कोई 'सेलिब्रिटी डाइट' नहीं होती.'' बायोमार्कर्स मदद कर सकते हैं, लेकिन वे सौ फीसदी सही नहीं होते—वे सिर्फ यह संकेत देते हैं कि आपके लिए क्या ठीक है और क्या नहीं.
चर्चा का अगला पहलू था पारंपरिक चिकित्सा. वेलनेस उद्यमी मीरा कपूर ने बताया कि आयुर्वेद में लोगों की दिलचस्पी फिर से बढ़ रही है. लेकिन इसे आधुनिक चिकित्सा के खिलाफ नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलन बनाकर देखना चाहिए. उनके अनुसार आज के डायग्नोस्टिक टूल्स—जैसे बायोमार्कर्स और जेनेटिक टेस्ट—शरीर के काम करने के तरीके को पहले से ज्यादा सटीक तरीके से समझने में मदद करते हैं.
लेकिन उन्होंने चेतावनी भी दी कि सिर्फ लैब रिपोर्ट्स पर निर्भर रहना ठीक नहीं. उन्होंने कहा, ''हम यह भूल जाते हैं कि हमारा शरीर हमें क्या बता रहा है.'' खराब नींद, एसिडिटी या लगातार थकान—ये सब संकेत हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. आयुर्वेद हमें 'अंदर झांकने' और शरीर की जरूरतों को समझने की सीख देता है. मीरा कपूर ने शहरी जीवन की हकीकत पर भी बात की. उनके मुताबिक वेलनेस को महंगे रिट्रीट्स या जटिल कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रखा जा सकता. इसे रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाना होगा: ''वह एक घंटा जो आप अपने शरीर को खुद को ठीक करने के लिए देते हैं.''
वेलनेस की इस चर्चा में वरिष्ठ पैथोलॉजिस्ट डॉ. नवीन डेंग ने मेडिकल पक्ष रखा. उनके मुताबिक भारत में बढ़ती लाइफस्टाइल बीमारियों के बीच सबसे बड़ा बदलाव यह है कि स्वास्थ्य व्यवस्था अब इलाज से हटकर रोकथाम की ओर बढ़ रही है. डायग्नोस्टिक्स में हो रही प्रगति अब बीमारियों के खतरे को बहुत पहले पहचानने में मदद कर रही है. उन्होंने बताया कि नए ब्लड टेस्ट ऐसे विकसित हो रहे हैं, जो कई तरह के कैंसर का जोखिम लक्षण दिखने से पहले ही पकड़ सकते हैं.
लेकिन उन्होंने साफ कहा कि कोई भी एडवांस टेक्नोलॉजी अनुशासित जीवनशैली की जगह नहीं ले सकती. ''अब जिंदगी लंबी नहीं, बड़ी होनी चाहिए,'' उन्होंने कहा—सिर्फ सालों की संख्या नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता मायने रखती है.